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सवाल “भारत” के वजूद का

वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां हूं। कई अन्य मित्र-संबंधी भी पहुंचे हैं। घर में भावी समारोह की चहल-पहल है। घर के सदस्य आगामी आयोजन की तैयारी में जुटे हैं और कुछएक अतिथि उस कार्य में अपना योगदान भी दे रहे हैं। अधिकांश अन्य प्राप्तवयस्क, प्रौढ़, एवं अपेक्षया वृद्ध अतिथिगण बाहर खुले में दो-दो-तीन-तीन के समूह में परस्पर वार्तालाप में जुटे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफोन की महत्ता कम नहीं है, विशेषतः नवयुवाओं, किशोर-किशोरियों तथा प्राप्तवय बच्चों के लिए। इस मौके पर उक्त अल्पवयस्क वर्ग के कुछएक सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त हैं।

मैं एक कुर्सी पर बैठा हुआ चारों तरफ़ का नजारा देख रहा हूं। लोगों के परिधानों, उनके हावभावों, उठने-बैठने एवं हंसने-बोलने के तौर-तरीकों आदि को बारीकी से देखना मेरे लिए सदा से एक रोचक विषय रहा है। मैं ऐसे वैविध्यपूर्ण वातावरण में शायद ही कभी ऊबता हूं। इस समय भी मैं जिज्ञासु दृष्टि से सभी को देख रहा हूं।

मेरी नजर बगल की कुर्सी पर बैठे आठ-दश-वर्षीय एक बच्चे पर पड़ती है। वह भी एक स्मार्टफोन के साथ खेल रहा है, शायद अपने मित्रों के संदेश किसी “सोशल मीडिया” (सामाजिक संपर्क माध्यम?) पर देख रहा है। उसकी उंगलियां सधे अंदाज में फोन के पर्दे पर चलती हैं। मेरे पास भी स्मार्टफोन है पर उसका प्रयोग मैं वैसी प्रवीणता से नहीं कर पाता जैसी इन आधुनिक बच्चों में देखता हूं। मैं उस बच्चे से पूछना चाहता हूं वह क्या कर रहा है, क्या-क्या कर सकता है, इत्यादि। असमंजस में हूं कि पूछूं या नहीं। बड़ों की भांति बच्चे भी संवेदनशील हो सकते हैं। उस बच्चे की निजता में हस्तक्षेप करूं क्या? करूं तो किस बहाने? आज के युग में निजत्व बहुत माने रखने लगा है।

अंततः मैं उसकी एकाग्रता में खलल डाल ही लेता हूं और पूछता हूं, “क्या आप बताना चाहेंगे कि आप अभी क्या कर रहे हैं?”

आम तौर पर मैं बच्चों को आप कहकर नहीं पुकारता, लेकिन इस समय अनायास ही उसके प्रति औपचारिक हो रहा हूं। वह कहता है, “मैं व्हट्सऐप पर दोस्तों के साथ मैसेजेज़ शेयर कर रहा हूं। उसके पहले मैंने उनको यहां की फोटोज़ भेजीं।”

“अच्छा! फोन पर “गेम” भी खेलते होंगे? और भी बहुत-सी चीजें कर लेते होंगे?” मैं फिर पूछता हूं। मैं गेम कहने के बजाय खेल कहना पसंद करता हूं। लेकिन इस समय गेम शब्द ही मेरे मुख से निकलता है। मध्यम वर्ग के आजकल के बच्चे हिन्दी के शब्द बोलते ही कहां हैं?

वह जवाब देता है, “हां-हां, क्यों नहीं! गेम भी खेलता हूं। ई-मेल पढ़ सकता हूं। फोन रिचार्ज कर सकता हूं। ट्रेन-रेज़र्वेशन कर सकता हूं।”

“क्या आप गूगल-मैप के बारे में भी जानते हैं? अपने फोन पर उसे भी देख सकते हैं क्या?” मैं कुछ और जानना चाहता हूं।

वह भी मेरी बातों में दिलचस्पी लेता है। कदाचित् स्मार्टफोन की अपनी जानकारी से मुझे प्रभावित करना चाहता है। ऐसा करना मनुष्यों के स्वभाव में होता ही है और बहुत-से बच्चों में भी यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। मैं पूछता हूं, “क्या गूगल मैप के सहारे मुझे दिखा सकते हैं कि आप अभी किस जगह पर हैं।”

वह फोन के पर्दे पर जादुई अंदाज में अपना हाथ फेरता है और मुझे वैवाहिक स्थल तथा संबंधित शहर की स्थिति दिखा देता है। मैं फिर पूछता हूं, “क्या मैप में जापान कहां है इसे भी यह बता सकते हैं?”

वह उसी करिस्माई अंदाज से मैप में जापानी द्वीप-समूह की स्थिति दिखाता है और मुझसे कहता है, “आप क्या जापान के शहरों की लोकेशन भी जानना चाहेंगे?”

“नहीं, इतना काफी है। …” कहते हुए मैं प्रशंसात्मक शब्द बोलता हूं, “वाह, आपका फोन ही स्मार्ट नहीं, आप भी स्मार्ट हैं। … अच्छा, अब जरा भारत कहां है यह भी मैप में दिखा दें।”

दो-एक क्षणों तक उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। फिर अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोलता है, “आपका मतलब इंडिया से है क्या? मेरी टीचर ने एक बार बताया था कि इंडिया को भारत भी कहते हैं। लेकिन मुझे थोड़ा कंफ़्यूज़न है। …”

मैं हामी भरता हूं। उसके फोन के पर्दे पर इंडिया नजर आने लगता है।

“चलिए, इतना काफ़ी है। आपको इतनी देर डिस्टर्ब किया। अब आप अपना व्हट्सऐप वाले काम पर लौट चलिए।” कहते हुए मैं पास में काफी-प्यालों की ट्रे लिए घूम रहे व्यक्ति को इशारा करता हूं। वह पास आता है और मैं एक प्याली काफी ले लेता हूं।

सोचने लगता हूं कि क्या “भारत” का वजूद खत्म हो जायेगा? मेरा इशारा भारत देश की ओर नहीं है। मेरा मतलब तो “भारत” शब्द से है जिसे हमारे पुरखे उस भूभाग के संबोधन के तौर पर प्रयोग में लेते रहे हैं जिसे अब लोग इंडिया कहते हैं। क्या देश का “भारत” संबोधन आने वाली पीढ़ियों के लिए अपरिचित हो जायेगा?

शायद हां! – योगेन्द्र जोशी

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“वसुधैव कुटुम्बकम् …” – पंचतंत्र ग्रंथ में मूर्ख पंडितों की कथा

अपने भारत देश की सभ्यता-संस्कृति की प्रशंसा में अनेक जनों को तरह-तरह के नीति-वाक्यों के दृष्टांतों के साथ बोलते हुए मैंने सुना हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “परोपकाराय सतां विभूतयः”, “अतिथिदेवो भव”, “सत्यमेव जयते” इत्यादि नीति-वाक्यों का उल्लेख करते हुए वे देखे जा सकते हैं। इन कथनों के माध्यम से वे यह जताने की कोशिश करते हैं कि हमारे समाज की मान्यताएं तो सर्वश्रेष्ठ रही हैं। इस संदर्भ में मैं अपने वर्तमान गृह मंत्री को शीर्ष पर रखता हूं। वे हर मौके पर ऐसी उक्तियों से भारतीय समाज की प्रशंसा करते हैं।

इन नीति वचनों को कहने वाले उन प्रसंगों को नजरअंदाज करते हैं जो प्राचीन संस्कृत साहित्य में इनसे संबंधित रहे हैं। उदाहरणार्थ “सत्यमेव जयते” (शुद्ध ‘जयति’ है) को ही ले लीजिए। इस पर मैंने एक आलेख बहुत पहले लिखा था (देखें मेरी ब्लॉग-पोस्ट 4/10/2008)। यह उक्ति मुण्डक उपनिषद्‍ के एक मंत्र का वाक्यांश है। मंत्र में यह संदेश है कि…

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“ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति” – शङ्कराचार्यरचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्‍ – ५

जन्ममरण के चक्र से मुक्ति का सार्थक साधन ज्ञान ही है। आदिशंकराचार्य के यह और अन्य आध्यात्मिक विचार इस आलेख में प्रस्तुत हैं।

इस चिट्ठे के छ: आलेखों की शृंखला की यह मेरी छ्ठी एवं अंतिम प्रविष्टि है। ध्यान रहे कि इन आलेखों में आदिशंकराचार्य द्वारा विरचित “चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम्” के १८ छंदों की चर्चा की जा रही है। (देखें इसका पूर्ववर्ती आलेख, दिनांक २३ मार्च, २०१७)

पहले आलेख में इस बात का उल्लेख किया गया था कि इस रचना में कुल सत्रह छंद हैं और उनके अतिरिक्त एक स्थायी छंद (भज गोविन्दं भज गोविन्दं …) भी है जो इनमें से प्रत्येक छंद के बाद प्रयुक्त हुआ है। यदि उक्त स्तोत्र को भजन के तौर पर गाया जाये तो यह छंद प्रत्येक के बाद गाया जायेगा। इसकी भूमिका गायन के स्थायी के समान है। इसे आगे उद्धृत किया जा रहा है:

[

भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते ।

प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्‍ करणे ॥

अर्थ – अरे ओ मूर्ख, गोविन्द का भजन कर यानी ईश्वर-भक्ति में मन लगा। जब…

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निरर्थक बहस का अंत

घटना सन् २०१४ के मार्च की है। होली का दिन था। कुछ ही दिनों के बाद संसद के आम चुनाव होने थे। मेरे पड़ोसी-जन सात-आठ की संख्या में मुझसे एवं मेरी अर्धांगिनी से मिलने आये, अबीर-गुलाल के साथ। वे सभी उम्र में मुझसे कुछ छोटे ही रहे हैं, अतः वे ही होली मिलने हमारे पास आते हैं। उनमें से उत्साही एक सज्जन ने घर के बाहर गेट के पास लगे पानी के नल के नीचे रखी बाल्टी में रंग घोलकर मेरे ऊपर उड़ेल भी दिया। यह सब तो होली मनाने का पारंपरिक तरीका ही है। हमने गुझिया, मिठाई एवं नमकीन आदि से उन सभी का स्वागत किया। साथ में पेश किया कांच के गिलासों में शरबत।  होली के अवसर पर मिलने वालों की इस तरीके से आवभगत की अपेक्षा तो रहती ही है।

अस्तु, यह सब घटना का अहम पहलू नहीं है। असल बात जिसका उल्लेख मैं यहां करने जा रहा हूं वह है होली के कुछ काल के बाद होने वाले आम चुनावों पर बहस। हमारे अड़ोस-पड़ोस में भाजपा का कोई कार्यकर्ता नही रहता, किंतु उस दल के प्रति झुकाव रखने वाले ही अधिक हैं, या यों कहूं कि प्रायः सभी हैं। इसलिए मुझसे भी उम्मीद की जाती है कि मैं भी तब के भाजपा उम्मीदवार यानी श्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में अपना मत डालूं। बता दूं कि मोदी जी मेरे शहर वाराणसी के संसदीय क्षेत्र के ही प्रत्याशी थे। उस आम चुनाव में यदि मुझे किसी के पक्ष में मत डालना होता तो संभवतः मोदीजी के ही पक्ष में डालता

किंतु मेरे अपने कारण रहे हैं जिनके तहत मैं किसी को भी अपना मत नहीं देता हूं। ऐसा मैं पिछले पंद्रह-बीस वर्षों से कर रहा हूं। मतदान हर चुनाव में किया है, लेकिन किसी के पक्ष में नहीं। आरंभ में मतपत्र पर अमान्य मुहर लगाता था। बाद में जब निर्वाचन आयोग के नियम 49-ओ (49-O) के अंतर्गत फॉर्म 17-ए (17-A) के बारे में जानकारी हुई तो उसका उपयोग करने लगा। और जब आयोग ने “नोटा” का विकल्प जनता को दिया तो मैं उसका उपयोग करने लगा।

हां तो बात करता हूं होली के उस मौके की। तब घूम-फिरकर बात देश के आम चुनाव पर आके टिक गयी। केंद्र एवं प्रदेश की सरकारों से कम ही लोग संतुष्ट थे यह बात कही जा रही थी। देश भर में मोदी से उम्मीदें पाले हुए लोग काफी थे। बदलाव होना ही चाहिए इस बात की हिमायत अधिकांश लोग कर रहे थे। इसलिए मेरे वे सभी आगंतुकगण मोदीजी के पक्ष में मतदान करने पर जोर डालने लगे। मुझे उनके प्रस्ताव में खास दिलचस्पी न लेते देख किसी एक ने पूछा, “आप तो चुप खड़े हैं। … बताइए, मोदीजी को ही वोट डाल रहे हैं न?”

मैंने सिर हिलाते हुए जवाब दिया, “मैं तो नोटा बटन दबाने के पक्ष में हूं।”

मेरी पत्नी की ओर मुखातिब होकर दूसरे ने कहा, “भाभीजी, आप भी नोटा की बात करती हैं क्या?”

वे बोली, “नहीं, ऐसा नहीं। मैं तो मोदीजी की समर्थक हूं, लेकिन ये नोटा की बात करते हैं। पिछले कई चुनावों से ये किसी को भी वोट न देने की नीति अपनाए हुए हैं।”

फिर वे लोग मुझसे बोले, “अरे भाई सा’ब, क्यों अपना वोट बरबाद करते हैं। नोटा बटन दबाने से कुछ लाभ तो होने से रहा। नोटा के बावजूद जन-प्रतिनिधि चुने ही जायेंगे और कोई न कोई दल सरकार बनायेगा ही।”

मैंने कहा, “दरअसल मैं अपने देश के मौजूदा लोकतांत्रिक मॉडल का विरोधी हूं, और अपना विरोध दर्ज कराने का मेरे पास नोटा ही विकल्प है।”

राजनैतिक दलों, उनके नेताओं, और आम निर्वाचकों के बारे में उनके अपने विचार थे और मेरे अपने असहमति वाले। वे नोटा का विचार त्यागने के लिए तरह के तर्क देते रहे और मैं नोटा के पक्ष में अपनी दलीलें पेश करते रहा। बहस लंबी खिंचने लगी। वे मेरे तर्कों से संतुष्ट नहीं थे और मैं उनकी बात मानने को तैयार न था। मुझे बहस निरर्थक लग रही थी। मुझे इस बात का शौक कतई नहीं रहा है कि दूसरे मेरी बात मानें ही। लेकिन अपने स्वतंत्र विचारों का अधिकार मुझे है इस पर मैं सदा ही जोर डालता हूं।

मुझे लगा कि बहस का समापन किया जाना चाहिए। अतः मैंने कहा “आप सब इतना कुछ समझा रहे तो आपकी बात मान लेता हूं। चलिए एक वोट मेरी तरफ से भी मोदीजी को।”

“आप सीरियस नहीं हैं। हमें टरका रहे हैं। …” कोई एक बोला।

“अरे भई, कह रहा हूं न कि मोदीजी को वोट दे दूंगा। अभी इसी समय वोट तो डालना नहीं है। तब इससे अधिक मैं क्या कह सकता, क्या कर सकता हूं।” मैंने उत्तर दिया।

मेरी बात पर उनको विश्वास हुआ कि नहीं मैं नहीं जानता। किंतु अब उस बहस के बाद विसर्जित होने का मौका तो सभी को मिल ही गया। वे चले गये।

मैंने जो करना था वही किया। बाद में किसको वोट दिया यह सिवाय मेरे कौन जान सकता था? और कोई जान भी लेता तो क्या करता?

मैं यहां विस्तार से यह नहीं समझा सकता कि मैं क्यों मौजूदा लोकत्रांतिक मॉडल का विरोध करता हूं। यह एक लंबी बहस का विषय है। अति संक्षेप में यही बता सकता हूं कि यहां चुनावों में भागीदारी निभाने वाले दल बात तो लोकतंत्र की करते हैं लेकिन खुद अपने दल के भीतर लोकतंत्र पनपने ही देते हैं। अपवादों को छोड़ दें। प्रायः सभी दल एक व्यक्ति अथवा परिवार की बपौती के तौर पर अस्तित्व में हैं। उनके कार्यकर्ता बंधुआ मजदूरों की भांति बंधुआ कार्यकर्ता के माफिक लगते हैं। वे सब मुखिया के निर्णयों से बंधे रहते हैं। हर पार्टी में बीस-बीस प्रतिशत आपराधिक छवि के लोग भरे हुए हैं। नेताओं के कोई सिद्धांत नहीं। कौन कब किस पार्टी में चला जाये इसका कोई हिसाब ही नहीं। राजनीति जातीयता एवं धार्मिकता से मुक्त होने के बजाय उस पर अधिकाधिक निर्भर होती जा रही है। राजनेता खुले आम कायदे-कानूनों का उल्लंघन करते हैं। कितने नेता हैं जो जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, उनको उचित मार्ग पर ले जा रहे हैं? उच्छृंखता, अपशब्दों का बोला जाना, बातबात में मारपीट पर उतर जाना, अपराधियों को बचाना और निरपराधों को फंसाना, आदि इनके चरित्र में देखने को मिलता है। मैं ऐसे नेताओं को अपना मत नहीं दे सकता। लेकिन अपना मताधिकार भी नहीं छोड़ सकता। अतः नोटा मेरा चुना हुआ विकल्प है। – योगेन्द्र जोशी

 

 

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स्वतंत्रता दिवस 2016: देश ने वह नहीं पाया जिसकी उम्मीद थी

सूचनात्मक टिप्पणी

यह आलेख मैंने कल १५ अगस्त के उपलक्ष पर अपने दूसरे ब्लॉग (https://indiaversusbharat.wordpress.com) के लिए लि्खा था। किंतु भूलवश मैं इसे यहां पोस्ट कर बैठा। गलती कैसे हुई इसका ध्यान नहीं है। अब इसे वहां स्थानांतरित कर दिया है। (https://indiaversusbharat.wordpress.com/2016/08/16/) पाठकों से क्षमायाचना।

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दारोगा की धुनाई

चंद रोज पहले टीवी के किसी चैनल पर पंजाब राज्य के पुलिस बल से जुड़ा एक समाचार देखने-सुनने को मिला । चैनल पर दिखाए गये वीडियो क्लिप में पुलिस के दो-तीन जवान एक युवक को बेरहमी से पीटते नजर आ रहे थे । उस आम युवक – जाहिर है कि वह कोई “खास श्रेणी” का रसूखदार व्यक्ति नहीं था – की गलती यह थी कि वह अपने किसी मित्र की उन पुलिसवालों के साथ हो रही बहस की वीडियो क्लिप मोबाइल पर रिकार्ड कर रहा था । पुलिस के जवानों की नजर जब उस पर पड़ी तो उन्हें उसकी हरकत किसी “अपराध” से कम नहीं लगी । उन्होंने उसका मोबाइल छीनकर वीडियो रिकाडिंग मिटा दी और “कानून की मर्यादा बनाए रखने” तथा सबक सिखाने के लिए उसकी पिटाई भी कर दी । वे मोबाइल अपने साथ ले गए कि नहीं यह मुझे स्पष्ट नहीं हो सका । उनको शायद यह पता नहीं रहा होगा कि पास के एक दुकान का सीसीटीवी कैमरा घटना की रिकार्डिंग कर रहा है ।

उसी दिन पुलिस बल से जुड़ी दूसरी घटना के समाचार की भी जानकारी मिली । महाराष्ट्र राज्य से संबंधित उस समाचार के अनुसार तीन पुलिस वाले अर्धरात्रि के समय मिठाई की उस समय बंद एक दुकान में घुस गये ताला तोड़कर । और “संवेदनशीलता का परिचय देते हुए” उन्होंने वहां सो रहे कर्मचारियों की तबियत से मरम्मत की । समाचार में बताया गया कि वे दुकान के किसी कर्मचारी से खफा थे ।

इन दो समाचारों ने मुझे लगभग उसी समय की एक स्थानीय घटना की याद दिला दी । मैं घर के पास की सब्जीसट्टी पर सब्जियां और फल खरीदने गया था । वहां एक पेड़ के नीचे एक सब्जी विक्रेता जमीन पर सब्जियों की ढेरियां लगाकर बेच रहा था । मैं खरीदफरोख्त करने लगा । इसी दौरान ठेले पर भूरे जटाधारी नारियल (पुष्ट लेकिन पानी वाले) बेच रहा एक आदमी उसके पास पहुंचा और बोला, “कल खूब धुनाई हुई उसकी ।”

सब्जी वाला उस घटना से पहले से ही वाकिफ रहा होगा जिसके संदंर्भ में उक्त बात कही होगी । उस नारियल वाले से मैं भी यदाकदा नारियल खरीदा करता हूं और उस नजर से देखें तो वह एक प्रकार से मेरा भी परिचित था, सीमित अर्थ में ही सही । मुझे घटना के बारे में जिज्ञासा हुई, अतः मैंने उससे पूछा, “क्यों, क्या हुआ, किसकी धुनाई हो गई ?”

“अरे कुछ नहीं … । आजकल एक दारोगा इस सड़क पर गस्त लगाता है । उसी की धुनाई कर दी कुछ लड़कों ने ।”  उसने जवाब दिया ।

“आखिर मामला क्या था, क्या बात हो गई थी ।” मैंने पूछा ।

“दो-तीन रोज पहले उसने बी.एच.यू. (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) में पढ़ने वाले एक लड़के को किसी बहाने पीट दिया और उसका मोबाइल भी छीन लिया । वह लड़का जब बाद में बी.एच.यू. गया और उसने अपने दोस्तों को घटना के बारे में बताया तो उन्होंने तय किया कि दारोगा को सबक सिखाया जाए । तय हुआ कि वह लड़का उसी इलाके में जाए और देखे कि उससे फिर से सामना हो जाए । तब वह दोस्तों को खबर कर दे । कल 25-30 की संख्या में जुटकर वे लोग अपनी योजना में सफल हो गये । उन्होंने दारोगा की पिटाई कर दी ।”

“लेकिन अखबार में तो इस बारे में कोई खबर नहीं आई ।” मैंने घटना के प्रति शंका जताई ।

“अखबार में हर बारदात के बारे में थोड़े ही छपता है । कोई बहुत बड़ी घटना तो थी नहीं । ऐसी बातें तो शहर में अक्सर होती ही रहती हैं । किसी ने शिकायत भी नहीं की होगी । लड़के क्योंकर शिकायत करते ? और दारोगा भी सोचता होगा कि मामले में कहीं वही न फंस जाए ।”

मैंने घटना की सत्यता के बारे कुछ लोगों से जानना चाहा । किसी ने कहा कि ऐसी कोई जानकारी उसे नहीं है तो किसी और ने कहा कि उसने भी ऐसी घटना के बारे में सुना । अन्य किसी ने कहा कि ऐसी छोटी-मोटी बातें तो होती ही रहती हैं । पुलिस का रवैया अधिकांशतः अच्छा नहीं रहता यह बात लोग अवश्य मानते दिखे ।

परतंत्र भारत में पुलिस व्यवस्था अंगरेजों ने अपने हित साधने के लिए स्थापित की थी । अतः पुलिस जनों में तब आम लोगों के प्रति सेवाभाव न रहा हो तो बात समझ में आती है । लेकिन स्वतंत्र भारत में दो से अधिक पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी पुलिस-बल उसी ढर्रे पर चल रहा हो तो अपने को तकलीफ तो होती ही है । समाचार माध्यमों में उनके अवैधानिक कारनामों तथा लापरवाही की खबरें छपती रहती हैं।  उनकी मानसिकता कभी बदलेगी क्या ? इस सवाल का जवाब मेरा मन नहीं में ही देता है । – योगेन्द्र जोशी

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नीयत डोल गयी मूंगफली की चंद फलियों पर

मैं घर के पास के मुख्य मार्ग से लौट रहा हूं । रास्ते में सड़क के किनारे कच्ची जमीन पर भट्टी सुलगाए हुए दो भाई मूंगफली भूनकर बेच रहे हैं । बड़े-से कड़ाह में एक भाई भूनने का काम करता है तो दूसरा ग्राहकों को तौलकर बेचता है । मैं इनको करीब दो महीनों से यहां अपना छोटा-सा कारोबार करते हुए देख रहा हूं । पिछले वर्षों तक मैंने इनको यहां कभी नहीं देखा था । पूछे जाने पर बताते हैं कि ये इसी साल पहली बार मेरे शहर में रोजीरोटी की तलाश में पहुंचे हैं । मूंगफली भूनकर बेचने का धंधा उनकी समझ में आया, सो उसी पर लग गये।

उस रास्ते से कभी-कभार आते-जाते मैं भी उनसे मूंगफली खरीद लेता हूं । वे पच्चीस रुपया पाव बेचते हैं, जब कि आम ठेलों पर भुनी मूंगफली बेचने वालों की दर 35 रुपया पाव है । दाम के साथ मूंगफली में अंतर जरूर रहता है । ठेले वाले कच्ची मूंगफली को छानकर-फटककर साफ करते हैं, अपुष्ट या खोखली फलियों को हटाते हैं और तब भूनते हैं, जब कि ये भाई बाजार से बोरों में भरी मूंगफली को जैसा का तैसा ही इस्तेमाल करते हैं ।

इनके पास पहुंचकर मैं ठहर जाता हूं । दो-तीन गाहक पहले से मौजूद हैं । मुझसे ठीक पहले बारी आती है एक दंपती की । महिला बाइक से उतरकर मूंगफली खरीदती हैं, मेरे अनुमान से पाव भर, और उनके पति बाइक पर बैठे प्रतीक्षा करते हैं । महिला मूल्य चुकाते हुए दुकानदार से मूंगफली भरी पॉलिथीन की थैली थाम लेती हैं । जिज्ञासावश मैं उनके हावभाव गौर से देख रहा हूं । चलते-चलते वे मुठ्ठी में कुछ मूंगफली उठा लेती हैं । हो सकता कि उनके मन में बाइक पर बैठे उन्हें ठूंगने का विचार हो । मैं सोचने लगता हूं कि बाइक में बैठकर अपने को संतुलित रखते हुए यह कार्य आसान तो नहीं ही होगा । लेकिन ऐसा कुछ होना नहीं है । वे मुठ्ठी की सामग्री अपनी झोली में डालती हैं, बाइक पर बैठती हैं, और बाइक चल देती हैं । उस समय मैं अकेला गाहक बच जाता हूं ।

मैं विक्रेता से पूछता हूं, “आपके खरीददार ढेरी में से बिना पूछे कुछ मूंगफली उठा लेते हैं क्या ?”

जवाब मिलता है, “हां, कोई-कोई गाहक खरीदते-खरीदते लगे हाथ दो-चार फलियां ठूंग ही लेते हैं । पर सब ऐसा नहीं करते ।”

मैं अपनी साइकिल पर सवार होकर घर की ओर बढ़ जाता हूं । उस महिला की मुठ्ठी में भला कितनी मूंगफली समाई होगी इस बात का मैं रास्ते में अनुमान लगाता हूं । मुझे लगता है कि मुश्किल से बीस-तीस पैसे की रही होगी, या थोड़ा अधिक पचास पैसे की, या उससे कुछ अधिक की ।

जीवन की यह एक विडंबना ही तो है कि कभी-कभी खाते-पीते व्यक्ति की नीयत उतने कम पर भी डोल जाती है । कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे मिला है अंगूर और जामुन के साथ भी । – योगेन्द्र जोशी

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