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परीक्षा में नकल – तब और अब

आज से ५९ वर्ष पहले की एक घटना मुझे याद आती है जब मैं पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के एक विद्यालय का छात्र था। उस समय उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था। मुझे यू.पी. बोर्ड के हाई स्कूल (१०वीं कक्षा) की परीक्षा देनी थी।

मैं एक छोटे-से गांव में जन्मा था और उसी के पास की पाठशाला (प्राथमिक विद्यालय) में मेरी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा हुई थी। हाई स्कूल के लिए मुझे गांव से करीब ७-८ किलोमीटर दूर के विद्यालय जाना पड़ा था। उस पर्वतीय क्षेत्र में आनेजाने के लिए आम तौर पर पगडंडी वाले ही रास्ते होते थे। अब तो पर्वतीय क्षेत्रों में भी सड़कों का जाल बिछ चुका है, इसलिए कुछ राहत जरूर है। आवागमन की समुचित सुविधा के अभाव में अपने विद्यालय के निकट भाड़े (किराये) पर रहना मेरी विवशता थी।

उस समय देश को स्वतंत्र हुए मात्र १४-१५ वर्ष हुए थे। नई सरकारें गांव-देहातों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार में लग चुकी थीं। फिर भी विद्यालयों की संख्या काफी कम थी। प्राथमिक पाठशालाएं दो-दो, तीन-तीन किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित मिलते थे, लेकिन हाई-स्कूल, इंटरमीडिएट स्तर के विद्यालय तो परस्पर २५-३० किमी (पैदल मार्ग से) की दूरी पर होते थे। इसलिए अधिकतर छात्रों को अपने घरों से दूर विद्यालय के निकट रहने की व्यवस्था करनी होती थी। कदाचित दूरी के कारण छात्रों की सुविधा के लिए उनका विद्यालय ही १०वीं-१२वीं के परीक्षाकेन्द्र बना दिये जाते थे।

उस क्षेत्र की तत्कालीन शैक्षणिक एवं भौगोलिक स्थिति के उपर्युल्लेख के बाद मैं नकल की एक घटना पर आता हूं। अप्रैल का महीना था। हम परीक्षार्थियों के लिए इंटरमीडिएट स्तर का हमारा विद्यालय ही परीक्षा केन्द्र था। जैसा मुझे याद पड़ता था लगभग रोज ही या हर दूसरे दिन किसी न किसी विषय की परीक्षा होती थी। मैं विज्ञान वर्ग का परीक्षार्थी था। अन्य कुछ कला वर्ग के छात्र थे। हर वर्ग में छः विषय होते थे जिनमें एक-दो वैकल्पिक भी हुआ करते थे। हरएक के दो और हिन्दी के तीन प्रश्नपत्र होते थे।

परीक्षा में नकल जैसे शब्द से हम परिचित थे। वस्तुतः परिचय तो प्राथमिक पाठशाला की कक्षाओं से ही था। लेकिन कभी किसी का परीक्षा में नकल करने का साहस नहीं होता था। नकल का आरोप किसी पर लगे तो अध्यापकवृंद के रोष का सामना करना तो पड़ता ही था साथ ही अभिभावकों के उपदेश भी सुनने पड़ते थे। नकल को एक निन्द्य कार्य के रूप में देखा जाता था। विद्यालय में माहौल नकल के विरुद्ध मिलता था और निरीक्षण कार्य में लगे अध्यापक काफी सचेत रहते थे।

ऐसे माहौल में एक दिन (दो-तीन दिन बासी) समाचार सुनने को मिला कि फलांने विद्यालय में एक छात्र नकल करते पकड़ा गया। उस जमाने में यह एक चरचा योग्य समाचार था। “छात्र की यह हिम्मत कि परीक्षा में नकल कर बैठा?”

दरअसल सन् १९६० के शुरुआती वर्षॉ तक किसी भी प्रकार का कदाचार बहुत कम था और चोरी-छिपे ही होता था जैसा मुझे अपने बुजुर्गों से सुनने को मिलता था।

लेकिन अब? अब स्थिति बहुत बदल चुकी है। पूरे देश के क्या हाल हैं इस बारे में टिप्पणी नहीं कर सकता। लेकिन यह कहने में हिचक नहीं है कि हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में काफी गिरावट आई है। समाचार माध्यमों से प्राप्त जानकारी के अनुसार परीक्षा में नकल के मामले विरले नहीं रह गये हैं। न अभिभावक और न ही शिक्षक छात्रों को नकल के विरुद्ध प्रेरित करते हैं। कई मौकों पर शिक्षक ही इस असामाजिक क्रियाकलाप में लिप्त पाये गये हैं। नकल माफिया जैसे शब्द सुनने को मिलने लगे हैं। मेरे किशोरावस्था काल से समाज बहुत बदल चुका है। – योगेन्द्र जोशी

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सुकून का एहसास

त्रिलोचन बाबू ने घर के मुख्य प्रवेशद्वार (गेट) के खटखटाये जाने की आवाज सुनी। आम तौर पर लोग गेट के बगल में लगी घंटी का बटन दबाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने सोचा कि कोई अजनबी होगा जिसे घंटी का अंदाजा न रहा हो। अखबार का हाथ में पकड़ा हुआ पन्ना फेंकते हुए-से अंदाज में उन्होंने सोफे के एक तरफ रखा और उठकर कमरे का दरवाजा खोलने पहुंचे। गर्दन बाहर निकालते हुआ गेट की तरफ देखा। बाहर कोई खड़ा था। वे बाहर आये और गेट की तरफ बढ़े। कोई नया चेहरा था जिसे उन्होंने शायद पहले कभी देखा नहीं था। सवाल किया, “मैंने आपको पहचाना नहीं। मुझसे काम है या किसी और के बारे में …?” कहते हुए गेट का एक पल्ला खोल दिया।

बाहर खड़े आगंतुक ने कहा, “दरअसल आपसे पानी मांगना चाहता था। गरमी है; प्यास लगी है।”

त्रिलोचन बाबू ने उक्त आगंतुक को ऊपर से नीचे तक देखा और पास में खड़ी की गयी साइकिल तथा उस पर लटके जूट के बोरे आदि को देखा तो बोले, “मुझे लगता है आप फेरी लगाकर घरों से कभाड़ इकट्ठा करते हैं।”

आगंतुक ने हामी भरी। त्रिलोचन बाबू “ठीक है, एक मिनट रुकिए, अंदर से पीने को पानी ले आता हूं।” कहते हुए लौटे और घर के अंदर दाखिल हुए। रसोईघर के सादे पानी के साथ फ्रिज का अतिशीतल पानी लोटे में मिलाकर उन्होंने हल्का ठंडा पानी तैयार किया और बाहर लौट आये। उस आगंतुक को लोटा सौंपते हुए किंचित् उलाहना भरे अंदाज में बोले, “गरमी के दिन हैं आप फेरी का काम करते हैं। आपको एक बड़ी बोतल में पानी लेकर चलना चाहिए। माना कि पानी ठंडा नहीं रह सकता, फिर भी पानी तो पानी ही है; शरीर की जरूरत पूरी करेगा ही।”

कभाड़ वाले ने जवाब दिया, “पानी लेकर ही चला करता हूं, बाबूजी। लेकिन आज रास्ते में पानी पीने को बोतल हाथ में लेते समय गिर गयी। उसका ढक्कन ढीला था, खुल गया और पानी जमीन में फैल गया।

“चलिए कोई बात नहीं। आप ये पानी पीजिए। तब तक में घर में देखता हूं शायद कोई बेहतर बोतल पड़ी हो।” कहते हुए वे वापस कमरे में आये।

उन्हें प्लस्टिक की एक खाली बोतल मिल गयी। उसमें ठंडा पानी भरकर बाहर ले आये और कभाड़ वाल्रे को सौंप दिया। उनकी नजर उस आदमी के पैरों की ओर पड़ी तो देखा कि उसने हवाई चप्पलें पहन रखी हैं जिनमें से एक का पट्टा टूटा था जिसे डोरी से बांधकर काम चलाऊ बना रखा था। जिज्ञासावश उन्होंने पूछ डाला, “आप टूटे पट्टे वाली चप्पल पहने हैं, दूसरी जोड़ी चप्पलें खरीद लेते। इसका क्या भरोसा रास्ते में धोखा दे जायें।”

“बाबूजी, अपनी आमदनी ज्यादा तो है नहीं। परिवार बड़ा है, माँ-बाप, दो बच्चे, और हम दो जने। पत्नी भी घरों में काम करती है। फिर भी कमाई कम पड़्ती है इसलिए हम दोनों (पति-पत्नी) की कोशिश होती है कि अपने पर कम से कम खर्च करें। ये चप्पलें कुछ दिन काम दे जाएंगी। देरसबेर खरीदनी तो पड़ेंगी ही।” जवाब था।

त्रिलोचन बाबू ने दोएक क्षण के लिए कुछ सोचा, फिर बोले, “मेरे पास इस्तेमाल की हुई एक जोड़ी चप्पलें हैं। ठीकठाक हालत में हैं। मैं अधिक पहनता नहीं। अगर आपको खुद पहनने में एतराज न हो तो आपको दे सकता हूं।”

“आप बुजुर्ग हैं। आपका आशीर्वाद समझकर पहन सकता हूं अगर मेरे पैर में फिट हो जायें तो।” उसने प्रस्ताव स्वीकारते हुए जवाब दिया।

त्रिलोचन बाबू घर के भीतर गये। अपनी एक जोड़ी चप्पलें उठा लाये और कभाड़ वाले को सौंपते हुए बोले, “मेरी पहनीं हैं। इसलिए इनको एक बार धो लीजियेगा।”

कभाड़ वाले ने चप्पलें पकड़ीं, गौर से उलट-पलटकर देखा और फिर बोरे में रखने का उपक्रम करने लगा। त्रिलोचन बाबू कुछ सोचते हुए बोले, “कितनी देर हुई है काम पर निकले हुए? लगता है अभी बोहनी नहीं हुई।”

“हां, अभी बोहनी नहीं हो पायी है। लेकिन हो जायेगी। घंटा भर ही तो हुआ है घर से निकले।” उसका जवाब था।

“अच्छा, ऐसा करिये घर में इस समय कुछ पुराने अखबार पड़े हैं। उन्हें लेते जाइए।” कहते हुए त्रिलोचन बाबू घर में दाखिल हुए और अखबारों का छोटा-सा पुलिंदा उठा लाए, जिसे कभाड़ वाले को सौंपते हुए बोले, “बोहनी के नाम पर इसे लेते जाइये। इसकी कोई कीमत देने की जरूरत नहीं है।”

कभाड़ वाले ने उस बंडल को लेकर अपने जूट के बोरे में डाला। बोरे को साइकिल पर लटका कर वह चलने को तैयार हुआ। “अच्छा, बाबूजी, चलता हूं।” कहते हुए उसने उनकी तरफ देखा जरूर, किंतु अधिक कुछ बोला नहीं। त्रिलोचन बाबू को उसकी आंखों में कृतज्ञता का भाव नजर आ रहा था। हो सकता है उन्हें भ्रम हुआ हो। उसे उन्होंने २-४ सेकंड तक जाते हुए देखा, फिर कमरे में लौट आये।

वापस सोफे पर बैठते हुए अखबार का पन्ना हाथ में लिया और सोचने लगे, ‘उस आदमी की जो मदद की थी देखा जाए तो वह कुछ खास नहीं थी। लेकिन उसके लिए उस समय वह भी कुछ माने तो रखता ही होगा। ऐसा न भी हो तो भी मुझे सुकून का महसूस तो हो ही रहा है। बदले में यही मेरे लिए बहुत है।’

‘आइंदा क्यों न किसी की छोटी-मोटी मदद की जाए?’ वे मन में सोचते हैं और जवाब सूझता है, ‘हां, हां, क्यों नहीं? गेट पर कोई आए तो उससे पूछा तो जा सकता है।’ – योगेन्द्र जोशी

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लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार (२)

इंडिया बनाम भारत

इस समय बेंगलूरु में हूं गृहनगर वाराणसी से दूरलॉकडाउन में कुछ ढील मिल चुकी है। कहने को रेलयात्रा एवं हवाईयात्रा की सुविधा आरंभ हो चुकी है। लेकिन भ्रम इतना फैला है कि वापसी यात्रा की तिथि तय नहीं हो पा रही है। मैं २४ घंटे व्यस्तता से बिता सकता हूं, परंतु दो-अढाई मास के इस अनियोजित प्रवास में अपनी आम दैनिक चर्या से वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है। यहां बहुमंजिली २३ इमारतों वाले विस्तृत परिसर के चारों ओर टहलने में सुबह-शाम आधा-आधा घंटा लग जाता है। टहलते समय परिसर के पर्यावरण, परिसर-निवासियों भाषा-जीवनशैली, कोरोना महामारी, लॉकडाउन एवं समाचारों को लेकर तरह-तरह के विचार मन में उठते हैं। परस्पर असंबद्ध, संक्षिप्त, तथा बिखरे हुए विचार पूर्ववर्ती आलेख तथा इस स्थल पर…

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लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार

लॉकडाउन काल में मन में अनेक बातें आई-गईं। उनमें से कुछ को यहां लिख डाला।

इंडिया बनाम भारत

इस समय हम बेंगलूरु में हैं अपने बेटे के पास। एक मास के नियोजित बेंगलूरु-प्रवास के बाद तारीख २२ मार्च को लौटना था अपने गृहनगर वाराणसी को, किंतु पहले “जनता” कर्फ्यू फिर लॉकडाउन घोषित हो जाने पर यात्रा स्थगित कर दी। इस समय उसका चौथा चरण चल रहा है। बीते २१ ता. को हमारे अनियोजित प्रवास के दो माह हो गये। हवाई सेवा प्रारंभ होने की खबर है लेकिन सर्वत्र भ्रम फैला है।

अब ऊब होने लगी है। वैसे मेरे लिए २४ घंटे व्यस्तता से बिताना कोई कठिन काम नहीं है। परंतु इस अनियोजित प्रवास में मेरी जो आम दैनिक चर्या होती थी उससे वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है।

हम बहुमंजिली इमारतों और उनके बहु-अपार्टमेंटों के विस्तृत परिसर में रह रहे हैं।

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कोरोना वाइरस (विषाणु) – मेरे कार्यक्रम निरस्त, दैनिक चर्या बदल गई

कोरोना विषाणु (वाइरस) ने दुनिया में कहर ढा रखा है। अपने महीने भर के पूर्वतः चयनित कार्यक्रम को निरस्त करते हुए अपने शहर से दूर महानगरी में चार हफ्ता रुकना पड़ गया है। नई दिनचर्या अपनानी पड़ी है। उसी का लेखा-जोखा।

इंडिया बनाम भारत

कोरोना संक्रमण

पूरी दुनिया इस समय ऐसी विपदा झेल रही है जिसकी दूर-दूर तक किसी को आशंका नहीं थी। चीन से चले कोरोना (COVID-19) नामक विषाणु ने अनेक विश्व-नागरिकों को तेजी से रोगग्रस्त कर दिया है और उनमें से कई काल के गाल में भी समा गए हैं। यह विषाणु कहां से आया, कैसे पैदा हुआ, जैसे प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित हैं। विश्वसमुदाय में कई जन मिल जाएंगे जो इसे चीनियों के उस खानपान से जोड़कर देखते हैं जिसमें कुछ भी अखाद्य नहीं होता यदि वह विषैला न हो तो। कहते हैं कि वहां कुत्ते-बिल्ली, मेढक-सांप, चूहे-चमगादड़, आदि सभी का मांस भक्षणीय माना जाता है। कदाचित इस विषाणु का स्रोत चमगादड़ है। कदाचित!

लेकिन लोग इस संभावना से आगे चलकर भी देखते हैं। कइयों को शंका है कि यह चीन की किसी चूक का दुष्परिणाम है; अथवा चीन ने यह विषाणु जैविक हथियार के तौर पर ईजाद किया है और जानबूझ…

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महाभारत महाकाव्य में मूषक एवं विडाल की अल्पकालिक मित्रता की कथा

मानव समाज में परस्पर के संबंध स्वार्थ पर आधारित रहते हैं। इस तथ्य से जुड़ी मूषक एवं विडाल की अल्पकालिक मित्रता की महभारत की कथा का जिक्र इस चिट्ठे में किया गया है।

निकट भविष्य में देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। अपने-अपने हित साधने या अस्तित्व बचाने के लिए राजनैतिक दल मेल-बेमेल गठबंधन बनाने में जुटे हैं। बेमेल गठबंधनों को देखने पर मुझे महाकाव्य महाभारत (शान्ति पर्व, अध्याय १३८) में वर्णित विडाल (बिलाव) एवं मूषक (मूस) की अल्पकालिक मित्रता की एक कथा याद आ रही है। उसी कथा से संबंधित कुछएक नीतिवचनों का उल्लेख यहां पर कर रहा हूं।

संक्षेप में कथा कुछ इस प्रकार है — किसी वन में एक विशाल पेड़ था, जिसके जड़ के पास एक मूस (बड़े आकार का चूहा) बिल बनाकर रहता था। उसी पेड़ पर एक बिलाव (बिल्ला) भी रहा करता था। बिल्ले से बचते हुए मूस बिल के बाहर भोजन की तलाश में निकला करता था।

एक बार एक बहेलिये ने पेड़ के पास जाल बिछा दिया, जंगली जानवरों एवं पक्षियों को फंसाकर कब्जे में लेने के लिए। उसका इरादा दूसरे दिन प्रातः आकर…

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अंग्रेजी छोड़ेंगे नहीं, आम आदमी समझे या न समझे परवाह नहीं

अपना देश भारत, जिसे इंडिया कहना देशवासियों को पसंद है, एक विचित्र देश है विरोधाभासों तथा विडंबनाओं से भरा। भाषा के क्षेत्र में विरोधाभास साफ-साफ झलकता है। एक तरफ भारतीय भाषाओं को सम्मान देने और उन्हें अधिकाधिक अपनाने की बात कही जाती है, दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रति अप्रतिम लगाव कोई छोड़ने को तैयार नहीं। इस बात की परवाह कोई नहीं करता कि उसकी अंग्रेजी दूसरों को परेशानी में डाल सकता है। भाषा से जुड़े कल के अपने अनुभव को मैं यहां कथा रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।

मैं कल अपने बैंक की निकट की शाखा में गया। मैं बचत-खाता-पटल (काउंटर) पर पहुंचा। मुझे इंटरनेट के माध्यम से किए गए लेन-देन के असफल होने के कारण के बारे में जानना था। तत्संबंधित असफलता का संदेश मेरे मोबाइल फोन पर प्राप्त हुआ था किंतु उस असफलता का कारण स्पष्ट नहीं था। मैं बैंककर्मी द्वारा पहले से ही किये जा रहे कार्य के पूरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। इसी बीच एक युवक उस पटल पर आया। वह अपने मोबाइल पर बैंक द्वारा भेजे गए एक संदेश का मतलब जानना चाहता था। काउंटर के पारदर्शी शीशे के दूसरी तरफ़ बैठे बैंक-कर्मी को संदेश दिखाते हुए उसने पूछा, “जरा देखिए तो मेरे फोन पर यह क्या मैसेज आया है।

अपने अन्य कार्य में व्यस्त बैंक-कर्मी ने कहा, “आप खुद पढ़िए न और मुझे भी सुना दीजिए

युवक ने कहा, “मेरे समझ में नहीं आ रहा है। आप देख दीजिए न

बैंक-कर्मी ने कहा, “ठीक है, पढ़िए क्या लिखा है।

युवक क्षण भर हिचकिचाया और फिर बोला, “दरअसल मैसेज अंग्रेजी में है और इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूं मैं।

मैं उस युवक की समस्या समझ गया। बैंक-कर्मी अपने हाथ में आया काम निपटा ले यह सोचकर मैंने उस युवक से कहा, “लाइए अपना मैसेज मुझे दिखाइए।

संदेश सामान्य प्रकार का था, बैंक एटीएम से निकाले गए पैसे के बारे में जानकारी। मैंने युवक को समझाया, “आपने एटीएम से पैसा निकाला था क्या?

उसका जवाब हां में था। आगे मैंने उसको बताया, “ऐसी जानकारी बैंक अपने ग्राहकों को भेजते रहते हैं ताकि वे देख सकें कि किसी और ने तो लेनदेन की धोखाधड़ी तो नहीं की है। ऐसे संदेशों को सावधानी से देख लेना चाहिए ताकि कुछ गड़बड़ होने पर बैंक को सूचित किया जा सके।

उसकी समझ में बात आ गई और वह बैंक शाखा से बाहर चला गया।

मैं सोचने लगा क्या अजीव विडंबना है कि आज भी इस देश में अंग्रेजी और केवल अंग्रेजी का राज चल रहा है। हिन्दी को राजभाषा की “उपाधि” दे तो दी गई, किंतु उसे व्यवहार में लेना सरकारी संस्थानों ने अभी तक नहीं सीखा है। अन्य भारतीय भाषाओं का तो नंबर ही नहीं आने का।

मुश्किल से 15-16% देशवासी होंगे जो अंग्रेजी ठीक से समझ पाते हों। अपने-अपने कार्यालयों के कार्यों की अंग्रेजी उनको समझ में आ जाती होगी, क्योंकि वह एक स्थापित ढर्रे की भाषा होती है। लेकिन उसके परे दूसरे कार्य-क्षेत्रों की अलग प्रकार की भाषा उनको अच्छी तरह समझ में आती होगी इसमें मुझे शंका है। अस्तु।

बैंक जैसी संस्थाओं को तो हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषा में भी ग्राहकों को संदेश देना ही चाहिए ताकि अंग्रेजी के संदेशों को समझने के लिए दूसरों के पास किसी को न जाना पड़े। वे क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल का दावा तो करते हैं, लेकिन अंकीय (डिजिटल) माध्यम से संदेश-प्रेषण में अभी बहुत पीछे हैं।

ऐसी घटनाओं को देखने पर मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के दिन (1960 के आसपास) याद आते हैं जब त्वरित संदेश के लिए “तार” (टेलीग्राम) भेजे जाते थे, जो केवल अंग्रेजी में अंकित रहते थे। तब साक्षरता वैसे ही कम थी और तिस पर अंग्रेजी जानने वाले तो विरले ही होते थे, जिनके पास दूर-दूर से लोग आते थे तार का मज़मून समझने के लिए। – योगेन्द्र जोशी

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“न विश्वसेत् अविश्वस्ते …” – पंचतंत्र में वर्णित कौवे एवं चूहे की नीतिकथा

पंचतंत्र के नीतिवचनों पर आधारित अपनी 7 फरवरी 2010 की पोस्ट में मैंने ग्रंथ का संक्षिप्त और एक प्रकार से अधूरा परिचय दिया था। उसके बारे में इस स्थल पर विस्तार से बताना मेरा उद्देश्य नहीं है। फिर भी इतना कहना चाहूंगा कि इसमें व्यावहारिक जीवन से संबंधित सार्थक नीति की तमाम बातें कथाओं के माध्यम से समझाई गयी हैं । इन कथाओं में अधिकतर पात्र मनुष्येतर प्राणी यथा लोमड़ी, शेर, बैल, कौआ आदि हैं। कथाएं आपस में शृंखलाबद्ध तरीके जुड़ी हुई हैं अर्थात्‍ एक कथा में दूसरी कथा और उसमें तीसरी आदि के क्रम से कथाओं का बखान किया गया है। उक्त ग्रंथ पांच खंडों में विभक्त है जिन्हें “तंत्र” पुकारा गया है। ये हैं:

1. मित्रभेदः, 2. मित्रसंप्राप्तिः, 3. काकोलूकीयम्, 4. लब्धप्रणाशम्, एवं 5. अपरीक्षितकारकम् ।

प्रत्येक तंत्र में किसी एक प्रकार की विषयवस्तु लेकर कथाएं रची गई हैं, जैसे मित्रभेदः में वे कथाएं हैं जो दिखाती हैं कि…

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सवाल “भारत” के वजूद का

वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां हूं। कई अन्य मित्र-संबंधी भी पहुंचे हैं। घर में भावी समारोह की चहल-पहल है। घर के सदस्य आगामी आयोजन की तैयारी में जुटे हैं और कुछएक अतिथि उस कार्य में अपना योगदान भी दे रहे हैं। अधिकांश अन्य प्राप्तवयस्क, प्रौढ़, एवं अपेक्षया वृद्ध अतिथिगण बाहर खुले में दो-दो-तीन-तीन के समूह में परस्पर वार्तालाप में जुटे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफोन की महत्ता कम नहीं है, विशेषतः नवयुवाओं, किशोर-किशोरियों तथा प्राप्तवय बच्चों के लिए। इस मौके पर उक्त अल्पवयस्क वर्ग के कुछएक सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त हैं।

मैं एक कुर्सी पर बैठा हुआ चारों तरफ़ का नजारा देख रहा हूं। लोगों के परिधानों, उनके हावभावों, उठने-बैठने एवं हंसने-बोलने के तौर-तरीकों आदि को बारीकी से देखना मेरे लिए सदा से एक रोचक विषय रहा है। मैं ऐसे वैविध्यपूर्ण वातावरण में शायद ही कभी ऊबता हूं। इस समय भी मैं जिज्ञासु दृष्टि से सभी को देख रहा हूं।

मेरी नजर बगल की कुर्सी पर बैठे आठ-दश-वर्षीय एक बच्चे पर पड़ती है। वह भी एक स्मार्टफोन के साथ खेल रहा है, शायद अपने मित्रों के संदेश किसी “सोशल मीडिया” (सामाजिक संपर्क माध्यम?) पर देख रहा है। उसकी उंगलियां सधे अंदाज में फोन के पर्दे पर चलती हैं। मेरे पास भी स्मार्टफोन है पर उसका प्रयोग मैं वैसी प्रवीणता से नहीं कर पाता जैसी इन आधुनिक बच्चों में देखता हूं। मैं उस बच्चे से पूछना चाहता हूं वह क्या कर रहा है, क्या-क्या कर सकता है, इत्यादि। असमंजस में हूं कि पूछूं या नहीं। बड़ों की भांति बच्चे भी संवेदनशील हो सकते हैं। उस बच्चे की निजता में हस्तक्षेप करूं क्या? करूं तो किस बहाने? आज के युग में निजत्व बहुत माने रखने लगा है।

अंततः मैं उसकी एकाग्रता में खलल डाल ही लेता हूं और पूछता हूं, “क्या आप बताना चाहेंगे कि आप अभी क्या कर रहे हैं?”

आम तौर पर मैं बच्चों को आप कहकर नहीं पुकारता, लेकिन इस समय अनायास ही उसके प्रति औपचारिक हो रहा हूं। वह कहता है, “मैं व्हट्सऐप पर दोस्तों के साथ मैसेजेज़ शेयर कर रहा हूं। उसके पहले मैंने उनको यहां की फोटोज़ भेजीं।”

“अच्छा! फोन पर “गेम” भी खेलते होंगे? और भी बहुत-सी चीजें कर लेते होंगे?” मैं फिर पूछता हूं। मैं गेम कहने के बजाय खेल कहना पसंद करता हूं। लेकिन इस समय गेम शब्द ही मेरे मुख से निकलता है। मध्यम वर्ग के आजकल के बच्चे हिन्दी के शब्द बोलते ही कहां हैं?

वह जवाब देता है, “हां-हां, क्यों नहीं! गेम भी खेलता हूं। ई-मेल पढ़ सकता हूं। फोन रिचार्ज कर सकता हूं। ट्रेन-रेज़र्वेशन कर सकता हूं।”

“क्या आप गूगल-मैप के बारे में भी जानते हैं? अपने फोन पर उसे भी देख सकते हैं क्या?” मैं कुछ और जानना चाहता हूं।

वह भी मेरी बातों में दिलचस्पी लेता है। कदाचित् स्मार्टफोन की अपनी जानकारी से मुझे प्रभावित करना चाहता है। ऐसा करना मनुष्यों के स्वभाव में होता ही है और बहुत-से बच्चों में भी यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। मैं पूछता हूं, “क्या गूगल मैप के सहारे मुझे दिखा सकते हैं कि आप अभी किस जगह पर हैं।”

वह फोन के पर्दे पर जादुई अंदाज में अपना हाथ फेरता है और मुझे वैवाहिक स्थल तथा संबंधित शहर की स्थिति दिखा देता है। मैं फिर पूछता हूं, “क्या मैप में जापान कहां है इसे भी यह बता सकते हैं?”

वह उसी करिस्माई अंदाज से मैप में जापानी द्वीप-समूह की स्थिति दिखाता है और मुझसे कहता है, “आप क्या जापान के शहरों की लोकेशन भी जानना चाहेंगे?”

“नहीं, इतना काफी है। …” कहते हुए मैं प्रशंसात्मक शब्द बोलता हूं, “वाह, आपका फोन ही स्मार्ट नहीं, आप भी स्मार्ट हैं। … अच्छा, अब जरा भारत कहां है यह भी मैप में दिखा दें।”

दो-एक क्षणों तक उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। फिर अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोलता है, “आपका मतलब इंडिया से है क्या? मेरी टीचर ने एक बार बताया था कि इंडिया को भारत भी कहते हैं। लेकिन मुझे थोड़ा कंफ़्यूज़न है। …”

मैं हामी भरता हूं। उसके फोन के पर्दे पर इंडिया नजर आने लगता है।

“चलिए, इतना काफ़ी है। आपको इतनी देर डिस्टर्ब किया। अब आप अपना व्हट्सऐप वाले काम पर लौट चलिए।” कहते हुए मैं पास में काफी-प्यालों की ट्रे लिए घूम रहे व्यक्ति को इशारा करता हूं। वह पास आता है और मैं एक प्याली काफी ले लेता हूं।

सोचने लगता हूं कि क्या “भारत” का वजूद खत्म हो जायेगा? मेरा इशारा भारत देश की ओर नहीं है। मेरा मतलब तो “भारत” शब्द से है जिसे हमारे पुरखे उस भूभाग के संबोधन के तौर पर प्रयोग में लेते रहे हैं जिसे अब लोग इंडिया कहते हैं। क्या देश का “भारत” संबोधन आने वाली पीढ़ियों के लिए अपरिचित हो जायेगा?

शायद हां! – योगेन्द्र जोशी

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“वसुधैव कुटुम्बकम् …” – पंचतंत्र ग्रंथ में मूर्ख पंडितों की कथा

अपने भारत देश की सभ्यता-संस्कृति की प्रशंसा में अनेक जनों को तरह-तरह के नीति-वाक्यों के दृष्टांतों के साथ बोलते हुए मैंने सुना हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “परोपकाराय सतां विभूतयः”, “अतिथिदेवो भव”, “सत्यमेव जयते” इत्यादि नीति-वाक्यों का उल्लेख करते हुए वे देखे जा सकते हैं। इन कथनों के माध्यम से वे यह जताने की कोशिश करते हैं कि हमारे समाज की मान्यताएं तो सर्वश्रेष्ठ रही हैं। इस संदर्भ में मैं अपने वर्तमान गृह मंत्री को शीर्ष पर रखता हूं। वे हर मौके पर ऐसी उक्तियों से भारतीय समाज की प्रशंसा करते हैं।

इन नीति वचनों को कहने वाले उन प्रसंगों को नजरअंदाज करते हैं जो प्राचीन संस्कृत साहित्य में इनसे संबंधित रहे हैं। उदाहरणार्थ “सत्यमेव जयते” (शुद्ध ‘जयति’ है) को ही ले लीजिए। इस पर मैंने एक आलेख बहुत पहले लिखा था (देखें मेरी ब्लॉग-पोस्ट 4/10/2008)। यह उक्ति मुण्डक उपनिषद्‍ के एक मंत्र का वाक्यांश है। मंत्र में यह संदेश है कि…

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