निरर्थक बहस का अंत

घटना सन् २०१४ के मार्च की है। होली का दिन था। कुछ ही दिनों के बाद संसद के आम चुनाव होने थे। मेरे पड़ोसी-जन सात-आठ की संख्या में मुझसे एवं मेरी अर्धांगिनी से मिलने आये, अबीर-गुलाल के साथ। वे सभी उम्र में मुझसे कुछ छोटे ही रहे हैं, अतः वे ही होली मिलने हमारे पास आते हैं। उनमें से उत्साही एक सज्जन ने घर के बाहर गेट के पास लगे पानी के नल के नीचे रखी बाल्टी में रंग घोलकर मेरे ऊपर उड़ेल भी दिया। यह सब तो होली मनाने का पारंपरिक तरीका ही है। हमने गुझिया, मिठाई एवं नमकीन आदि से उन सभी का स्वागत किया। साथ में पेश किया कांच के गिलासों में शरबत।  होली के अवसर पर मिलने वालों की इस तरीके से आवभगत की अपेक्षा तो रहती ही है।

अस्तु, यह सब घटना का अहम पहलू नहीं है। असल बात जिसका उल्लेख मैं यहां करने जा रहा हूं वह है होली के कुछ काल के बाद होने वाले आम चुनावों पर बहस। हमारे अड़ोस-पड़ोस में भाजपा का कोई कार्यकर्ता नही रहता, किंतु उस दल के प्रति झुकाव रखने वाले ही अधिक हैं, या यों कहूं कि प्रायः सभी हैं। इसलिए मुझसे भी उम्मीद की जाती है कि मैं भी तब के भाजपा उम्मीदवार यानी श्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में अपना मत डालूं। बता दूं कि मोदी जी मेरे शहर वाराणसी के संसदीय क्षेत्र के ही प्रत्याशी थे। उस आम चुनाव में यदि मुझे किसी के पक्ष में मत डालना होता तो संभवतः मोदीजी के ही पक्ष में डालता

किंतु मेरे अपने कारण रहे हैं जिनके तहत मैं किसी को भी अपना मत नहीं देता हूं। ऐसा मैं पिछले पंद्रह-बीस वर्षों से कर रहा हूं। मतदान हर चुनाव में किया है, लेकिन किसी के पक्ष में नहीं। आरंभ में मतपत्र पर अमान्य मुहर लगाता था। बाद में जब निर्वाचन आयोग के नियम 49-ओ (49-O) के अंतर्गत फॉर्म 17-ए (17-A) के बारे में जानकारी हुई तो उसका उपयोग करने लगा। और जब आयोग ने “नोटा” का विकल्प जनता को दिया तो मैं उसका उपयोग करने लगा।

हां तो बात करता हूं होली के उस मौके की। तब घूम-फिरकर बात देश के आम चुनाव पर आके टिक गयी। केंद्र एवं प्रदेश की सरकारों से कम ही लोग संतुष्ट थे यह बात कही जा रही थी। देश भर में मोदी से उम्मीदें पाले हुए लोग काफी थे। बदलाव होना ही चाहिए इस बात की हिमायत अधिकांश लोग कर रहे थे। इसलिए मेरे वे सभी आगंतुकगण मोदीजी के पक्ष में मतदान करने पर जोर डालने लगे। मुझे उनके प्रस्ताव में खास दिलचस्पी न लेते देख किसी एक ने पूछा, “आप तो चुप खड़े हैं। … बताइए, मोदीजी को ही वोट डाल रहे हैं न?”

मैंने सिर हिलाते हुए जवाब दिया, “मैं तो नोटा बटन दबाने के पक्ष में हूं।”

मेरी पत्नी की ओर मुखातिब होकर दूसरे ने कहा, “भाभीजी, आप भी नोटा की बात करती हैं क्या?”

वे बोली, “नहीं, ऐसा नहीं। मैं तो मोदीजी की समर्थक हूं, लेकिन ये नोटा की बात करते हैं। पिछले कई चुनावों से ये किसी को भी वोट न देने की नीति अपनाए हुए हैं।”

फिर वे लोग मुझसे बोले, “अरे भाई सा’ब, क्यों अपना वोट बरबाद करते हैं। नोटा बटन दबाने से कुछ लाभ तो होने से रहा। नोटा के बावजूद जन-प्रतिनिधि चुने ही जायेंगे और कोई न कोई दल सरकार बनायेगा ही।”

मैंने कहा, “दरअसल मैं अपने देश के मौजूदा लोकतांत्रिक मॉडल का विरोधी हूं, और अपना विरोध दर्ज कराने का मेरे पास नोटा ही विकल्प है।”

राजनैतिक दलों, उनके नेताओं, और आम निर्वाचकों के बारे में उनके अपने विचार थे और मेरे अपने असहमति वाले। वे नोटा का विचार त्यागने के लिए तरह के तर्क देते रहे और मैं नोटा के पक्ष में अपनी दलीलें पेश करते रहा। बहस लंबी खिंचने लगी। वे मेरे तर्कों से संतुष्ट नहीं थे और मैं उनकी बात मानने को तैयार न था। मुझे बहस निरर्थक लग रही थी। मुझे इस बात का शौक कतई नहीं रहा है कि दूसरे मेरी बात मानें ही। लेकिन अपने स्वतंत्र विचारों का अधिकार मुझे है इस पर मैं सदा ही जोर डालता हूं।

मुझे लगा कि बहस का समापन किया जाना चाहिए। अतः मैंने कहा “आप सब इतना कुछ समझा रहे तो आपकी बात मान लेता हूं। चलिए एक वोट मेरी तरफ से भी मोदीजी को।”

“आप सीरियस नहीं हैं। हमें टरका रहे हैं। …” कोई एक बोला।

“अरे भई, कह रहा हूं न कि मोदीजी को वोट दे दूंगा। अभी इसी समय वोट तो डालना नहीं है। तब इससे अधिक मैं क्या कह सकता, क्या कर सकता हूं।” मैंने उत्तर दिया।

मेरी बात पर उनको विश्वास हुआ कि नहीं मैं नहीं जानता। किंतु अब उस बहस के बाद विसर्जित होने का मौका तो सभी को मिल ही गया। वे चले गये।

मैंने जो करना था वही किया। बाद में किसको वोट दिया यह सिवाय मेरे कौन जान सकता था? और कोई जान भी लेता तो क्या करता?

मैं यहां विस्तार से यह नहीं समझा सकता कि मैं क्यों मौजूदा लोकत्रांतिक मॉडल का विरोध करता हूं। यह एक लंबी बहस का विषय है। अति संक्षेप में यही बता सकता हूं कि यहां चुनावों में भागीदारी निभाने वाले दल बात तो लोकतंत्र की करते हैं लेकिन खुद अपने दल के भीतर लोकतंत्र पनपने ही देते हैं। अपवादों को छोड़ दें। प्रायः सभी दल एक व्यक्ति अथवा परिवार की बपौती के तौर पर अस्तित्व में हैं। उनके कार्यकर्ता बंधुआ मजदूरों की भांति बंधुआ कार्यकर्ता के माफिक लगते हैं। वे सब मुखिया के निर्णयों से बंधे रहते हैं। हर पार्टी में बीस-बीस प्रतिशत आपराधिक छवि के लोग भरे हुए हैं। नेताओं के कोई सिद्धांत नहीं। कौन कब किस पार्टी में चला जाये इसका कोई हिसाब ही नहीं। राजनीति जातीयता एवं धार्मिकता से मुक्त होने के बजाय उस पर अधिकाधिक निर्भर होती जा रही है। राजनेता खुले आम कायदे-कानूनों का उल्लंघन करते हैं। कितने नेता हैं जो जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, उनको उचित मार्ग पर ले जा रहे हैं? उच्छृंखता, अपशब्दों का बोला जाना, बातबात में मारपीट पर उतर जाना, अपराधियों को बचाना और निरपराधों को फंसाना, आदि इनके चरित्र में देखने को मिलता है। मैं ऐसे नेताओं को अपना मत नहीं दे सकता। लेकिन अपना मताधिकार भी नहीं छोड़ सकता। अतः नोटा मेरा चुना हुआ विकल्प है। – योगेन्द्र जोशी

 

 

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भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक – शिक्षकों के वेतन से वसूली

हाल के नोटबंदी के निर्णय के बाबत केंद्र सरकार ने दावा किथा था कि इससे भ्रष्टाचार रोकना संभव होगा। तब से मैं सोच रहा हूं कि जब भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति के आचरण का अभिन्न अंग बन चुका हो तब उससे कैसे मुक्ति मिल सकती है। अवश्य ही उपयुक्त कानून के तहत भ्रष्ट व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है, बशर्ते कि उसका भ्रष्ट कृत्य पकड़ में आ जाए। लेकिन उससे क्या व्यक्ति भ्रष्ट मानसिकता से मुक्त हो जाता है? अपनी भ्रष्ट लिप्सा की पूर्ति के लिए वह उपयुक्त अवसरों की तलाश जारी रखेगा ही ऐसा मेरा मत है। इस विषय पर मेरा चिंतन-मनन चल ही रहा था कि एक दिन संयोगवश मेरी भेंट एक महिला रिश्तेदार से हो गयी। उन्होंने जो कहा उससे मेरा इतना ज्ञानवर्धन तो हो ही गया कि जब भ्रष्टाचार के एक रूप पर रोक लगती है तो वह दूसरे रूप में अवतरित हो जाता है। समाज में जब तक असीमित लोभ-लालच वाले लोगों की सुलभता बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार को उपजाऊ भूमि की कमी नहीं रहेगी। पेश है महिला रिश्तेदार से वार्तालाप एक लघुकथा के रूप में।   

मैं कार्यवशात् उन महिला के शहर गया था। रिश्तेदार होने के नाते मैं मिलने के लिए उनसे घर पहुंच गया था। मैंने उनसे पूछा, “अब तो बच्चे बड़े हो गये होंगे। अपना समय-यापन कैसे करती हैं?”

उन्होंने कहा, “पिछले तीन-चार साल से मैं एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ा रही हूं। मैं काम के लिए घर से अधिक दूर जाने की इच्छुक नहीं थी, इसलिए पास ही के एक विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी कर ली।”

“सरकारी है या निजी आपकी शिक्षण संस्था?” मैंने जानना चाहा।

उनका उत्तर था, “है तो निजी किंतु सरकारी अनुदान मिलता है विद्यालय को।”

“तब तो कई मामलों में सरकारी नियम-कानून लागू होते होंगे और तनख्वाह ठीक-ठाक मिलती होगी।”

“हां, कागजों में तो सब ठीक रहता है लेकिन हकीकत में नहीं।”

“क्या मतलब?” मैंने जिज्ञासा प्रकट की।

“देखिए तनख्वाह तो मुझे लगभग 25000 रुपया मिलती है और वह मेरे बैंक खाते में जमा भी हो जाती है। लेकिन मुझसे करीब आधी वसूल भी ली जाती है। … इस हाथ से दिया और उस हाथ से ले लिया।”

कुछ क्षणों के लिए मैं उनकी ओर जिज्ञासु दृष्टि से देखता रहा; फिर बोला, “मैं आपका कहना ठीक से समझ नहीं पाया। क्या ऐसा आपके ही साथ हो रहा है या …।”

वे बीच में बोल पड़ीं, “न, न; सभी के साथ यही है, क्या शिक्षक-शिक्षिका और क्या चपरासी। दरअसल हमारी प्रधानाध्यापिका के पति ही विद्यालय चलाते हैं और उन्हीं के परिवार के लोग प्रबंधन आदि में शामिल हैं। प्रबंधन कागजों में सब कुछ साफ-सुथरा दिखाता है। इसलिए हम लोगों का वेतन बैंक खातों में पहुंच जाता है। प्रधानाध्यपिका हमसे कहती हैं कि खाते से लगभग आधा वेतन निकालकर उनके हाथ में सौंप दें। उनका कहना होता है कि विद्यालय के विकास-कार्यों के लिए धन जुटाना जरूरी है। यही तरीका उन्होंने अपना रखा है। कितना विकास के लिए है और कितना उनकी जेब के लिए यह बता पाना मुश्किल है।”

“आप लोग शिकायत नहीं करते?” मैंने पूछा।

“किससे शिकायत करें? किसी न किसी बहाने से नौकरी से निकाल देंगी। हरएक की अपनी-अपनी विवशता है। इसलिए सभी चुप रहते हैं।”

इस विषय पर आगे कुछ पूछना निरर्थक था। मेरे लिए उनके अनुभव की जानकारी काफी थी यह समझने के लिए कि भ्रष्टाचारी तो अपना काम किसी न किसी रास्ते निकाल ही लेगा। जिसका अंतकरण ही उसे न रोके उसे कोई क्या रोकेगा। इसलिए देश में भ्रष्टाचार है और आगे भी बना रहेगा। – योगेन्द्र जोशी

 

 

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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों में ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं (2)

बीते ग्रीष्मकाल के दौरान करीब डेड़ माह के लिए मैं कनाडा के लंदन शहर में था, अपने बहू-बेटे के पास। यह शहर अंग्रेजों के द्वारा कनाडा के पूर्वी इलाके में बसाया गया था, जब कनाडा उनका उपनिवेश हुआ करता था। शहर का नाम ब्रितानी महानगर लंडन (लंदन?) के नाम पर ही रखा गया और उस नदी का नाम भी टेम्स रखा गया जिसके किनारे यह शहर बसा है। टेम्स इंग्लैंड के लंडन में बहने वाली नदी का नाम है।

कनाडा उन विकसित देशों में से एक हैं जहां लगभग हर परिवार के पास कार रहती है। किसी-किसी परिवार में अधिक कारें भी हो सकती हैं जो उसकी हैसियत एवं आवश्यकता पर निर्भर करता है। मैंने तो सड़कों पर मरम्मत करने या साफ-सफाई करने वालों (श्रमिकों) को देखा है, जो अपनी कार अथवा उसके तुल्य बहु-उद्येशीय चौपहिया वाहन से आते हैं और उनको निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने के बाद अपने काम में जुट जाते हैं। अवश्य ही वहां यातायत की नागरिक सुविधाओं, जैसे नगरीय बस-प्रणाली, की व्यवस्था है और जरूरत के हिसाब से टैक्सी-सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं। लेकिन स्वयं की कार से आवागमन की तुलना में ये महंगी पड़ती हैं। इसलिए अपने पास कार हो तो किफ़ायत तथा सुविधा दोनों ही होती हैं।

अभी मेरे बहू-बेटे के पास कार नहीं है। दरअसल उन दोनों को कार चलानी आती भी नहीं है, यद्यपि वे वहां 4-5 साल से रह रहे हैं। आरंभ में वे जब वहां पढ़ रहे थे तो उन्हें कार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। किंतु बाद में नौकरी-पेशे में आने के बाद बेटे ने प्रशिक्षकों से कार चलाना सीखा और उनकी देखरेख में कई-कई घंटे उसे चलाने का अभ्यास भी किया। प्रशिक्षक की फ़ीस एवं कार का किराया उसे महंगा पड़ता था। अपनी कार होती तो उसे प्रशिक्षण कुछ सस्ता पड़ता। अभी तक वह 50-60 हजार रुपये के तुल्य (डालर) धनराशि या उससे भी अधिक खर्च कर चुका होगा। उसने बताया कि वह तब तक कार नहीं खरीद सकता जब तक उसके पास वाहन-चालन का लाइसेंस न हो। उसकी जानकारी में यह वहां का नियम है। इस नियम के कुछ अपवाद अवश्य होंगे।

पिछली गरमियों में जब मैं उसके पास था तो उसने ड्राइविंग लाइसेंस (वाहन-चालन अनुज्ञापत्र/अनुमतिपत्र) पाने के लिए तत्संबंधित परीक्षा दी। जैसा कि सभी विकसित देशों की व्यवस्था है परीक्षा दो चरणों में होती है। पहले चरण में लिखित परीक्षा “ऑन-लाइन” संपन्न होती है, जिसमें वाहन-चालन से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देना होता है। यह चरण अपेक्षया सरल होता है। दूसरे चरण में परीक्षार्थी को वाहन चलाकर दिखाना होता है। करीब एक घंटे की इस परीक्षा में शहर की सड़कों, चौराहों, पार्किंग स्थलों आदि से होते हुए वाहन चलाने की योग्यता की जांच होती है। परीक्षार्थी को वाहन निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने, उसे पीछे चलाकर निकालने, चौराहे पर “ट्रैफ़िक लाइट” के अनुसार रुकने, आदि का कार्य बिना गलती के संपन्न करना होता है।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इन विकसित देशों में सड़कें “लेनों” में विभक्त रहती हैं और चालक को निर्धारित लेन के भीतर बने रहना होता है। लेन बदलने के लिए पीछे के वाहनों को पर्याप्त समय पहले “इंडिकेटर लाइट” से संकेत देना होता है। सड़्कों पर सफ़ेद, पीली, लाल लाइनें खिंची रहती हैं, कहीं ठोस (solid,  ————), तो कहीं खंडित (broken या  dashed,  —  —  —) और कहीं अन्य प्रकार की। इन सबके सुनिश्चित प्रयोजन होते हैं जिसकी जानकारी परीक्षार्थी को होना आवश्यक है, और उसे इन बातों को ध्यान में रखते हुए वाहन चलाना या रोकना होता है। वस्तुतः यातायात के सुस्पष्ट एवं कठोर नियम होते हैं, जिनके उल्लंघन पर परीक्षार्थी को लाइसेंस नहीं मिल सकता है। उन नियमों का यहां पर विवरण देना न संभव है और न वैसा करना मेरा उद्येश्य है।

वापस अपने बेटे की परीक्षा की बात पर। वाहन-चालन की परीक्षा का परिणाम उसके परीक्षक ने तत्काल सौंप दी। उसकी कमियों का उल्लेख करते हुए उसे अनुत्तीर्ण (फ़ेल) घोषित कर दिया। वह घर निराश होकर लौटा। पूछने पर उसने कहा, “परीक्षा में दो प्रकार के दोष देखे जाते हैं। पहले वे दोष जो गंभीर श्रेणी में गिने जाते हैं और उनके आधार पर परीक्षा के दौरान ही अभ्यर्थी को लाइसेंस के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। दूसरे वे दोष या गलतियां जो स्वयं में गंभीर नहीं मानी जाती हैं लेकिन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी गलतियों के लिए 5-5, 10-10 के नकारात्मक (निगेटिव) अंक नियत होते हैं।”

बेटे ने मुझसे आगे कहा, “उसके परीक्षक ने उसे नकारात्मक 40 (यानी -40) अंक दिये। अगर नकारात्मक 30 अंक या उससे कम होते तो गलतियों को अजरअंदाज करते हुए मुझे लाइसेंस के लिए योग्य मान लिया जाता। चूंकि 40 (30 से अधिक) नकारात्मक अंक मिले इसलिए मैं अनुत्तीर्ण मान लिया गया।”

मैंने उससे पूछा,“किस प्रकार की चूक हुई थीं तुमसे?”

उसने परीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट दिखाई जिसमें कहां-कैसी गलती उसने की थी इसका क्रमबद्ध संक्षिप्त विवरण था। उसने एक उदाहरण से बात स्पष्ट की, “मुझे एक जगह कार पार्क करने के लिए कहा गया। मेरी कार का अगला हिस्सा पार्किंग के लिए खिंची गई सीमारेखा से 3-4 इंच आगे बढ़ गयी। यह होना नहीं चाहिए था। समझ लिजिए ऐसी ही 3-4 गलतियां हुई थीं।”

इस वाकये पर मुझे उस महिला का स्मरण हो आया जिससे मेरी पत्नी का परिचय हमारे इंग्लैंड प्रवास (1983-85) के दौरान हुआ था। वह विवाह के बाद अपने ब्रितानी नागरिकता वाले पति के पास पंजाब से आ गयी थीं। मेरी पत्नी की उनके साथ किंचित्‍ निकटता हो गयी थी। उस काल में उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस के तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिल सकी थी। हमारे भारत वापसी के बाद एक दिन उनका पत्र मिला कि चौथे प्रयास में उनको लाइसेंस मिल गया। वे बहुत खुश थीं।

कनाडा के उसी लंडन शहर में हमारा एक पूर्व-परिचित युवक भी अपने परिवार के साथ रहता है। उससे मेरे बेटे के पारिवारिक संबंध हैं। बेटे ने हमें यह बताया कि उसकी पत्नी भी लाइसेंस पाने में अपने पहले प्रयास में सफल नहीं हो पाई हैं।

जाहिर है कि कनाडा में (उसी प्रकार अन्य विकसित देशों में) ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं होता है। अपने देश में ड्राइविंग-लाइसेंस प्रदान करने के कोई सुस्थापित कायदे-कानून हैं कि नहीं मुझे नहीं मालूम। अगर होंगे तो केवल कागजों में होंगे क्योंकि व्यवहार में मुझे वे कभी दिखे नहीं।

मैंने स्कूटर-चालन का लाइसेंस अपने शहर वाराणसी में सन् 1981 में लिया था। तब वाहन-चालन संबंधी मेरा कोई परीक्षण नहीं हुआ था। दो-तीन सवाल पूछे गये और वहीं बैठे एक डाक्टर ने आंख-कान एवं शारीरिक रोगों के बारे में कुछ सवाल किए जिनका समुचित उत्तर मैंने दे दिए। उसने भी “ओके” कर दिया और दूसरे दिन मुझे लाइसेंस मिल गया। उसके बाद 2-3 बार नवीनीकरण कराया; वह भी बिना अधिक सवाल-जवाब के हो गया। अब तो मैंने स्कूटर चलाना ही छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जैसे उम्रदराज लोगों के लिए यहां की यातायात व्यवस्था में स्कूटर चलाना जोखिम का काम है।

मेरी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके मामले में वाहन-चालन का परीक्षण “ढंग-से” हुआ हो। जब मैंने लाइसेंस लिया था तब मुझे लगा था कि लाइसेंस तो लूले-लंगड़े, अंधे-बहरे भी ले सकते हैं। परिवहन कार्यालयों में ऐसे दलाल आपको मिल जायेंगे जो लाइसेंस का “प्रबंध” करने का धंधा करते हैं। घर बैठे आप लाइसेंस पा सकते हैं। सच पूछिये तो लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफ़िक हुआ करता था। “पैसा खर्च करो और लाइसेंस पाओ।” आज स्थिति कितनी बदली है मैं बता नहीं सकता। सुना है कि अब बहुत कुछ कंप्यूटरीकृत हो चुका है। और आवेदनकर्ता के हाथ की अंगुलियों की छाप ली जाती है। किंतु सही तरीके से वाहन-चालन की योग्यता का परीक्षण होता है या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है। मुझे आशंका है कि अभी भी लाइसेंस पैसे के लेनदेन से मिलता होगा बिना परीक्षण के।

विकसित देशों में नागरिकों के सुरक्षा सर्वोपरि होती है, इसलिए वे व्यवस्था की उस खामी को बर्दास्त नहीं करते जो सुरक्षा के लिए खतरा हो। सुरक्षा की इस भावना से संबंधित एक वाकये का जिक्र मैंने पहले की एक ब्लॉग-पोस्ट  में भी किया है।

हम भारतीय विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं, परंतु अपने तौर-तरीकों को बदलना नहीं चाहते हैं। याद रहे कि सफल लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग से पहले जिम्मेदारी की भावना की जरूरत होती है, जो अपने देशवासियों में बहुत कम है। – योगेन्द्र जोशी

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नमस्ते से “गुड मॉर्निंग” तक की यात्रा

मुझे मौजूदा मोहल्ले में रहते हुए करीब 30 साल बीत चुके हैं। शुरुआती दो वर्षों के बाद से अपने निजी मकान में रह रहा हूं। मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। मैंने इन भाइयों के माता-पिता को देखा है। मैं उनकी पीढ़ी को पहली पीढ़ी संबोधित कर रहा हूं और तदनुसार उक्त भाइयों को दूसरी पीढ़ी के कहूंगा। अब वे माता-पिता इस संसार में नहीं रहे। सुना है कि इस मोहल्ले की भूमि कभी इनकी एवं इनके पट्टीदारों की हुआ करती थी। कालोनाइज़र को जमीन बेचने पर मिले पैसे का समुचित उपयोग ये लोग शायद नहीं कर पाये होंगे। इसलिए इनकी माली हालत सामान्य या उससे बदतर रही है ऐसा मेरा सोचना है। ये पांचों भाई मोहल्ले के पास ही लगने वाली फल-सब्जी-सट्टी में थोक अथवा फुटकर कारोबार करके परिवार का पालन-पोषण करते आये हैं।

अब दूसरी पीढ़ी के इन भाइयों की उम्र साठ के आसपास उसके कुछ ऊपर-नीचे होनी चाहिए ऐसा मेरा अनुमान है। इनमें से कोई साक्षर भी है कि नहीं मुझे ठीक से नहीं मालूम; मैंने कभी पूछा नहीं। कोई साक्षर होगा भी तो उसे मात्र अक्षरज्ञान से कुछ और अधिक ज्ञान नहीं होगा। आम तौर पर वे वाराणसी में प्रचलित भोजपुरी बोलते हैं, किंतु मेरे साथ सामान्य हिन्दी में ही बात करते हैं।

इसके आगे यह भी बता देता हूं कि इनमें से सभी की संतानें संख्या में 4 से 7 के बीच हैं। इस तीसरी पीढ़ी की प्रायः सभी संतानें राज्य-सरकारी/परिषदीय स्कूलों में पढ़ने अवश्य जाया करते थे,  किंतु कोई भी +2 स्तर पार नहीं कर सका। मेरा अनुमान है कि शायद कोई भी हाई-स्कूल उत्तीर्ण नहीं है। फिर भी वे (युवक न कि युवतियां) अच्छा कारोबार कर ले रही है। कइयों ने तो सब्जियों-फलों का पुस्तैनी धंधा छोड़कर नये धंधे भी अपना लिए हैं। अब माहौल काफी बदल चुका है। किसी के भी अधिकतम तीन बच्चे हैं। इस चौथी पीढ़ी के कुछ बच्चे निजी अंग्रेजी विद्यालयों में भी पढ़ रहे हैं।

उक्त विवरण देने के पीछे मेरा मकसद एक दृष्टांत प्रस्तुत करना है कि हमारे देशवासियों के दिलोदिमाग पर आधुनिकता और अंग्रेजी किस प्रकार राज कर रही है । उपर्युक्त खानदान की चार पीढ़ियों – परदादा-परदादी से लेकर आज के नये बच्चों की पीढ़ियों को मैं पिछले करीब तीस साल से देख रहा हूं। चौथी पीढ़ी आते-आते इन लोगों में स्पष्टतः दिखाई देने वाला सांस्कृतिक/भाषायी परिवर्तन मैंने अनुभव किया है। दूसरी पीढ़ी के सबसे बढ़े भाई की सबसे बढ़ी बहू आज भी पारंपरिक लिबास यानी सीधे पल्लू की साड़ी पहने हुए रहती है। लेकिन इन परिवारों की बाद में आईं बहुएं उल्टे पल्लू की साड़ियों में दिखाई देती हैं। दिलचस्प है कि वे हल्का-सा घूंघट अभी नहीं छोड़ पाईं हैं। सुनता हूं कि उनमें से कुछ हाईस्कूल पास भी हैं।

इन पांच भाइयों के बच्चे जब छोटे थे तब वे अपने-अपने माता-पिता को “माई-बाबू” या इसी प्रकार के संबोधन से पुकारते थे। परंतु बड़े हो जाने और अपने-अपने कामधंधों के दौरान समाज के अन्य वर्गों के संपर्क में आने के बाद उनमें से कुछ ने “मम्मी-पापा” का प्रयोग आरंभ कर दिया । अपने देश में अब गैर-रिश्तेदार या अजनबी आदमी को “अंकल” शब्द से पुकारना प्रायः पूरी तरह प्रचलन में आ चुका है, जिसमें संबोधित व्यक्ति की उम्र वक्ता से पर्याप्त अधिक होती है। अंकल संबोधन माता-पिता की उम्र वाले के लिए और  दादा-दादी की उम्र वाले के लिए भी प्रयुक्त होने लगा है।

तीसरी पीढ़ी के उक्त बच्चे मुझे आरंभ से ही अंकल कहते आये हैं। पहले उनका अभिवादन “नमस्ते” हुआ करता था, किंतु अब उनमें से दो-तीन ऐसे हैं जो “गुड मॉर्निंग” पर उतर आये हैं। मेरा प्रत्युत्तर उसी पुरानी शैली में “नमस्ते” रहता है। दुआ-सलाम की बात प्रायः प्रातः काल ही होती है। मैंने इस पर गौर नहीं किया कि वे दोपहर या संध्या पश्चात्‍ भी “गुड मॉर्निंग” ही कहते हैं या कुछ और। उनमें से एक टैक्सी चलाता है, उसे अवश्य अधिक जानकारी होगी।

चौथी पीढ़ी के जो बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं वे अंग्रेजी को लेकर कुछ अधिक ही उत्साहित हैं। वे किसी स्तरीय विद्यालय में नहीं पढ़ते, बल्कि उन्हीं विद्यालयों में से एक में पढ़ते हैं जो आजकल हर गली-कूचे-नुक्कड़ पर अंग्रेजी-माध्यम के नाम पर खुलते देखे जा सकते हैं। वे बच्चे हिन्दी की गिनतियां शायद ठीक-से नहीं जानते हैं। विद्यालय अंग्रेजी पर ही जोर डालते हैं, क्योंकि अंग्रेजी ही सुन्दर भविष्य की कुंजी है यह सभी का मानना है। उनमें से कुछ ने मेरे लिए “गुड मॉर्निंग” का अभिवादन अपना लिया है। बच्चों के जन्मदिन पर केक भी कटने लगे होंगे और “हैप्पी बर्थडे टु यू” का गायन भी होने लगा होगा। मोहल्ले की गली में उन बच्चों को इस गीत को गाते-गुनगुनाते हुए भी मैंने एक-दो बार देखा है।

तो यह है पहली पीढ़ी की निपट निरक्षरता से चौथी पीढ़ी की अंग्रेजी शिक्षा तक पहुंचने की यात्रा का विवरण। और साथ में संबोधन, अभिवादन, एवं पहनावे में आये परिवर्तन की कहानी। -योगेन्द्र जोशी

 

 

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नोटबंदी के बाद लाला को मिला मुफ़्त का पैसा

टिप्पणी: यह लघुकथा साहित्य शिल्पी नामक ई-पत्रिका में छ्प चुकी है (दिनांक 2016-11-29)| आम तौर पर मैं अपने अनुभवों को लघुकथा के रूप में ढ़ालकर इस चिट्ठे पर पेश करता हूं, लेकिन यह पूर्णतः काल्पनिक है, सामयिक घटना पर आधारित।

मैं घर के पास की दुकान से घर के लिए रोजमर्रा का जरूरी सामान लेकर आ रहा था। सामने से मुरारीलाल साइकिल से आते दिख गया। मैं रुक गया। जैसे ही वह नजदीक पहुंचा मैंने उसे रोकने के लिए आवाज दी, “अरे ओ लाला!”

उसने अपनी दायीं ओर नजर घुमाई और मुझे देखकर साइकिल रोकते हुए पास आ गया। मैंने टोका, “अरे लाला, इतनी तेजी से कहां से आ रहे हो? जरा आजू-बाजू भी देख लिया करो। कभी-कभी हमारे जैसे परिचित, यार-दोस्त, राह में बतियाने के लिए खड़े मिल जाते हैं।”

उसने जवाब दिया, “बैंक से आ रहा हूं। हजार-पांचसौ के कुछ नोट जमा करने थे। बहुत भीड़ थी, तीन-चार घंटे लग गये। सुबह का घर से निकला हूं, बिना चाय-नास्ते के, इसलिए पहुंचने की जल्दी थी।”

“चाय-नास्ते के बिना दम निकला जा रहा हो तो चलो मेरे साथ; मैं चाय पिलाता हूं। दो कदम की दूरी पर ही तो मेरा घर है।” मैंने कहा।

वह साथ हो लिया। मैंने चुटकी ली, “बड़े छिपे रुस्तम निकले, भई। हम तो तुम्हें कंगाल समझते थे। तुम तो घर में नोटों की गड्ढी छिपाए पड़े हो यह आज पता चला। पुराने नोट बंद क्या हुए कि लोगों के घरों से जमा नोट निकलने लगे।”

“नहीं यार, अपनी किस्मत कहां जो घर में नोट जमा हों”

“तो फिर कहीं डांका डाले थे क्या? या कहीं कूड़े में मिल गये थे?”

“नहीं भई। बस किसी ने दान में दे दिए समझो।”

“पहेली मत बुझाओ; साफ-साफ बताओ कहां से पा गए नोट?”

“बताता हूं … बताता हूं क्या हुआ। तुम तो मेरे चचेरे भाई, जीवनलाल जी को जानते ही हो। वैसे तो वे उधार में भी पैसा देने से किसी न किसी बहाने बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन कल शाम एक लाख के पुराने नोट लेकर पहुंच गये घर पर और बोले, ‘मुरारी मेरा एक काम करो। ये पैसा लो और अपने बैंक खाते में जमा कर लो। डेड़-दो साल बाद आधा मुझे दे देना और आधा तुम रख लेना।’ मैंने उनकी बात मान ली। गरीब को पचास हजार रुपये मिल रहे हों तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।” उसने मुझे समझाया।

अब तक हम घर पर पहुंच चुके थे। घर में दाखिल होते हुए मैंने श्रीमती जी को आवाज दी और मुरारीलाल को चाय-वाय पिलाने का अनुरोध किया। फिर मुरारी की तरफ़ मुखातिब होते हुए कहा, “आज तक तुम्हारे खाते में तनख्वाह के अलावा कभी एक धेला भी जमा नहीं हुआ होगा। इस बार उसमें अनायास एक लाख की रकम जमा हो गयी। बदकिस्मती से अगर कोई राजस्व अधिकारी पूछ बैठे कि यह रकम कहां से आई तब क्या स्पष्टीकरण देना होगा इसे भी सोच लेना।”

मुरारीलाल का चेहरा देख मुझे लगा कि वह गंभीर सोच में पड़ गया है।  – योगेन्द्र जोशी

 

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नकद-बगैर पैसे का लेनदेन (कैसलेस मनी ट्रांजैक्शन) – निजी अनुभव

मौजूदा केंद्र सरकार के द्वारा 500 एवं 1000 के नोटों पर पाबंदी के बाद लोगों के बीच अफ़रातफ़री-सी मची है। अवश्य ही अनेक जनों को पैसे के लेनदेन में दिक्कतें आ रही हैं और बैंकों से वे नये नोट पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। इस नोटबंदी से पैदा हो रही दिक्कतों के फलस्वरूप नकदी बगैर लेनदेन की चर्चा भी जोरशोर से उठ रही है। जानकार लोग बता रहे हैं की देश की जनता को यथासंभव बिना नकदी के लेनदेन के तरीके को अपनाना चाहिए। इससे नकद पैसे की जरूरत को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है। इस मुद्दे को लेकर यहां पर बताना चाहता हूं कि किस प्रकार मैं स्वयं नकद बगैर लेनदेन करता आ रहा हूं।

बैंक चेक से लेनदेन मैं लंबे समय से करता आ रहा हूं। बैंकों के कंप्यूटरीकरण और इंटरनेट के प्रयोग से पहले नकद अथवा चेक (अथवा उसके तुल्य बैंक ड्राफ़्ट आदि) से ही भुगतान किया जा सकता था। बैंक शाखाओं के इंटेरनेट से जुड़ने के वाद लेनदेन के तरीके के विकल्प भी ग्राहकों को मिल गये।

बैंकों के इंटरनेट से जुड़ने से पहले मैंने चेक से अधिक से अधिक लेनदेन करना शुरु कर दिया था। जहां कहीं चेक स्वीकार्य नहीं होते थे वहां मैं मजबूरन नकद पैसे देता था। मेरी कोशिश होती थी कि 2-4 हजार से अधिक की राशि का भुगतान चेक से कर सकूं। ऐसी स्थिति बाजार से घरगृहस्थी के सामानों, जैसे टीवी, फ़्रिज, स्कूटर आदि, खरीदने में उत्पन्न होती थी। मैंने पाया कि दुकानदार चेक स्वीकारने में आनाकानी करते हैं। उन्हें यह शंका बनी रहती थी कि चेक का भुगतान ही न हो पाये और उसके लिए ग्राहक से पैसा वसूलना गंभीर समस्या बन जाए। चेक का बिना भुगतान लौट आना चेक-दाता का अपराध माना जाता है और चेक का मामला अक्सर अदालत तक पहुंच जाता है। दुकानदारों का चेक न लेने का यह एक गंभीर कारण होता था और वह आज भी है। ऐसा होना ग्राहकों के प्रति अविश्वास पैदा करता है। मैं दुकानदारों की विवशता को समझता हू। अतः चेक से लेनदेन के लिए मैंने विश्वसनीयता का एक तरीका अपनाया। मैं दुकानदार को अपना समुचित परिचय देने के बाद चेक थमा देता था और कहता था, “आप मेरे चेक को भुना लीजियेगा और जब आपको पैसा मिल जाए तो मुझे सूचित कर दीजिएगा या सामान भेज दीजिएगा।”

मेरे उपर्युक्त आश्वासन पर दुकानदार चेक स्वीकार लेते थे। कई बार वे मुझ पर विश्वास करते हुए वांछित सामान भी उसी समय दे देते थे।

जब इंटरनेट बैंकिंग की शुरुआत हुई तो मेरे पास नये विकल्प भी खुल गये। मुझे याद आता है कि इस दिशा में सबसे पहले आइसीआइसीआइ (ICICI) बैंक आगे बढ़ा। बाद में भारतीय स्टेट बैंक में भी यह सुविधा प्राप्त हो गई। मैंने सबसे पहले एटीएम-सह-डेबिट (ATM-cum-DEBIT) कार्ड का प्रयोग करना आरंभ किया। मेरा पैसे के लिए बैंक जाना प्रायः बंद ही हो गया। मैं जेब में बहुत कम कैश लेकर चलने लगा, यात्राओं में भी। जहां आवश्यकता हुई नजदीक के एटीम-स्थल पर पहुंचकर आवश्यक नकद निकाल लेता था।

जब इंटरनेट बैंकिंग की सुविधा मुझे उपलब्ध हुई तो पैसे का लेनदेन मेरे लिए और सरल हो गया। कई सरकारी तथा गैरसरकारी संस्थाओं ने इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से भुगतान लेना शुरु कर दिया और उसके साथ ही मैंने भी उसी तरीके से भुगतान आरंभ कर दिया। आरंभ में रेलवे आरक्षण के लिए नजदीकी आरक्षण केंद्र पर जाना पड़ता था, लेकिन नयी सुविधा के साथ मेरे लिए घर से ही यह कार्य संपन्न करना संभव हो गया। इस तरीके से आरक्षण करना मुझे सस्ता भी पड़ता है क्योंकि आरक्षण केंद्र जाना और लाइन में लगना अधिक महंगा साबित होता है।

अब तो मेरा लगभग सब लेनदेन इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से होता है है, चाहे टाटास्काइ का भुगतान हो या मोबाइल-रिचार्ज का भुगतान। पिछले कुछ सालों में मेरे नगर वाराणसी के जलकर एवं बिजली बिलों का भुगतान भी इस माध्यम से होने लगा है।

मैं आज भी मोबाइल फोन के “ऐप” का प्रयोग उपर्युक्त लेनेदेन के लिए नहीं करता। इसके दो कारण हैं। पहला कंप्यूटर पर काम करने का मैं आदी हो चुका हूं, उसमें टाइप करना और पढ़ना मेरे जैसे उम्रदराज व्यक्ति के लिए सुविधाजनक होता है। दूसरा इसे अधिक सुरक्षित पाता हूं, विशेषकर इसलिए कि बैंक की वेबसाईट के साथ संपर्क करने पर मोबाइल पर भी समुचित संदेश मिलता है।

मैं सोचता हू कि ई–वैलेट जैसे आधुनिकतम माध्यमों का प्रयोग करना भी मैं आरंभ कर दूं।

मुझे आश्चर्य होता है जब पढ़ेलिखे और जिम्मेदार पदों पर कार्यरत लोग भी इंटारनेट बैंकिंग जैसी सुविधा का प्रयोग करने से घबड़ाते हैं। मेरे एक पूर्व सहयोगी – वे एवं मैं अब विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त – इंटरनेट का इस्तेमाल वर्षों से कर रहे हैं, लेकिन आज भी पैसे के लेनदेन के लिए उसे प्रयोग में लेने को तैयार नहीं हैं। अन्य कनिष्ठ सहयोगी के हाल भी यही हैं। मुझे और भी लोग मिल चुके हैं जो ई-बैंकिंग को असुरक्षित मानते हैं। संभव है निकट भविष्य में स्थिति तेजी से बदल जाये। – योगेन्द्र जोशी

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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों से कितना पीछे हैं हम (1)

अपना देश विकसित बनने की आकांक्षा लेकर चल रहा है। किन्तु इस बात को समझने की कोशिश देशवासी, विशेषतः देश के कर्णधार राजनेता, नहीं करते हैं कि विकसित देशों के नागरिक नियमों का पालन करते हैं। यह कहना अतिरंजित नहीं होगा कि नागरिक नियमों का पालन उनकी जीवन-पद्धति का हिस्सा बन चुका है। हो सकता है चार-पांच पीढ़ियों पहले उनकी स्थिति बहुत संतोषप्रद न रही हो, किंतु जब हर आने वाली पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी को बहुधा नियमों से बंधे देखती होगी तो वह स्वयं उसके अनुसार ढलती गयी होगी। मनुष्य को अपनी बाल्यावस्था में अपने परिवेश में जो देखने तथा अनुभव करने को मिलता है उसी के अनुसर उसकी सोच बनती है। मैंने अनुभव किया है कि विकसित देशों के नागरिक स्वयं अपने एवं उन लोगों, जिनके बीच वे रहते हैं, के हितों के प्रति काफी हद तक सचेत रहते हैं। मेरा काम कैसे बने केवल यह सोचकर चलना शायद उनकी सोच में नहीं रहता। ऐसा नहीं कि वहां कायदे-कानूनों का उल्लंघन कोई भी नहीं करता, किंतु वैसे लोग कमोबेश अपवाद के तौर पर पाये जाते हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि विकसित देशों में कायदे-कानूनों को तोड़ने वाले को बचाने के लिए नेता-वेता और आम आदमियों की भीड़ जमा नहीं होती है जैसा कि हमारे देश में अक्सर होता है।

मुझे विकसित देश का अनुभव कोई 30 वर्ष पहले तब हुआ था जब मैं उच्चाध्ययन एवं शोधकार्य के लिए विलायत गया हुआ था। तब अपने देश एवं उस देश की व्यवस्थाओं का अंतर मुझे साक्षात्‍ देखने का अवसर मिला था। किंतु अपने निर्धारित उद्येश्य की पूर्ति करने की व्यस्तता में मैंने उस समय वहां की नागरिक व्यवस्था की बारिकियों पर कोई चिंतन-मनन नहीं किया था। परंतु बीते ग्रीष्मकाल में एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ भारतीय पर्यटक की हैसियत से कनाडा में अपने बेटे-बहू के पास सात-आठ सप्ताह के प्रवास का जब मुझे अवसर मिला तो वहां की नागरिक व्यवस्था को समझने की कोशिश भी मैंने की थी।

सभी विकसित देशों में एक बात सामान्यतः देखने को मिलती है और वह है नागरिक सुरक्षा। ये बात मैंने कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन तथा इटली में अनुभव की है, और अन्य देशों के बारे में तत्संबंधित जानकारी परोक्षतः प्राप्त की है। नागरिक सुरक्षा से मतलब है किसी व्यक्ति के जानमाल की सुरक्षा, और उसमें भी ‘जान’ की सुरक्षा पहले फिर ‘माल’ की। जो लोग ऐसे कार्यों में लगे हों जिनमें जान खोने का जोखिम हो उनके लिए भी सुरक्षा के यथासंभव प्रयास किए जाते हैं।

सुरक्षा की उक्त नीति के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को जानबूझकर अपनी अथवा किसी अन्य व्यक्ति की सुरक्षा से खिलवाड़ करने की छूट नहीं मिलती है। इस हेतु कड़े नियम हैं और आम तौर पर सभी नागरिक उन नियमों से वाकिफ रहते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मैं समझता हूं ऐसा वे स्वेच्छया करते हैं। अवश्य ही कुछ इस भय से भी करते होंगे कि नियमों का उल्लंघन करते पकड़े जाने पर दंडित होना पड़ेगा। विकसित देशों में नेताओं एवं उच्चाधिकारियों के परिजनों को भी नहीं बख़्शा जाता है।

अपने देश में ये सब कल्पना से परे है। सुरक्षा भगवान भरोसे रहती है और जब भी दुर्घटना होती है तो उससे कोई सीख नहीं ली जाती है; न आम नागरिक सीख लेता है और न ही शासकीय तंत्र।

अब मैं कनाडा के अपने प्रवास के दौरान अनुभव में आयी एक घटना का जिक्र करता हूं। मेरे बेटे-बहू एक 11-मंजिली इमारत की 10वीं मजिल में स्थित अपार्ट्मेंट में रहते हैं। इमारत में कुल करीब 100 अपार्ट्मेंट हैं। एक दिन रसोई के बिजली के “हॉट-प्लेट” (चूल्हा) पर रोटी सेंकने अथवा पापड़ भूनने में कुछ धुंआ उठने लगा। यों तो धुंआ कुछ हद तक चूल्हे के ऊपर लगे पंखे-चिमनी के माध्यम से बाहर निकल जाता है, किंतु अधिक मात्रा होने पर उसका कुछ हिस्सा कमरों में फैल जाता है। उस समय धुंए की मात्रा कुछ अधिक हो गयी थी। फलतः रसोई से सटे कमरे में “स्मोक-सेंसर” का अलार्म (चेतावनी ध्वनि) बज गया। घबराहट में चूल्हे एवं रोटी/पापड़ का काम बंद करके हम लोगों ने स्नानगृह का “एग्जास्ट फैन” चलाते हुए सभी दरवाजे-खिड़कियां खोल दीं ताकि धुंआ निकल जाये। उस समय बेटे को छोड़कर हम तीन – बहू, मेरी पत्नी और मैं – घर में थे।

बाद में जब बेटा घर आया तो उसको हमने घटना के बारे में बताया। तब उसने घर में लगे “अलार्म बटन” के बारे में बताया कि उसे दबाने पर अलार्म बंद हो जाता है। लेकिन “स्मोक-सेंसर” अपना कार्य करता रहता है। बहू को भी उस “बटन” की जानकारी नहीं थी। बेटे ने यह भी बताया कि यदि धुंए की स्थिति नहीं बदली तो पच्चीस-तीस सेंकंड बाद फिर अलार्म बजता है। लेकिन इस बार वह पूरी इमारत में तथा हर अपार्टमेंट में बजता है और परिसर के कार्यालय में भी बज उठता है। उसकी सूचना अग्निशमन-दल को भी तुरंत पहुंच जाती है।

बेटे ने यह भी बताया कि अपार्टमेंट के नियमानुसार उस “सामुदायिक” चेतावनी (अलार्म) के बाद हर व्यक्ति का दायित्व होता है वह तुरंत अपने कमरे/अपार्टमेंट से बाहर खुले में निकल आवे। यदि संयोग से बड़ी दुर्घटना न घटी और यह पाया जाये कि अमुक व्यक्ति अपार्टमेंट में ही रह गया था। तो उसे 500 कनाडाई डॉलर का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

“आपने अपना जीवन जोखिम में डालने का अपराध क्यों किया?” यह सवाल वहां पूछा जाता है। वस्तुतः यह वैसा ही अपराध है जैसा कि आत्महत्या करना। क्या अपने देश में ऐसा सोचा जा सकता है? यहां तो दुर्घटनाओं के पीछे जिसका हाथ हो उसे तक सजा नहीं मिलती! मामला अक्सर कोर्ट में चला जाता है और फिर वर्षों तक मामला चलता रहता है। तब तक बहुत कुछ बदल चुकता है और शायद ही कोई दंडित होता है! – योगेन्द्र जोशी

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