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परीक्षा में नकल – तब और अब

आज से ५९ वर्ष पहले की एक घटना मुझे याद आती है जब मैं पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के एक विद्यालय का छात्र था। उस समय उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था। मुझे यू.पी. बोर्ड के हाई स्कूल (१०वीं कक्षा) की परीक्षा देनी थी।

मैं एक छोटे-से गांव में जन्मा था और उसी के पास की पाठशाला (प्राथमिक विद्यालय) में मेरी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा हुई थी। हाई स्कूल के लिए मुझे गांव से करीब ७-८ किलोमीटर दूर के विद्यालय जाना पड़ा था। उस पर्वतीय क्षेत्र में आनेजाने के लिए आम तौर पर पगडंडी वाले ही रास्ते होते थे। अब तो पर्वतीय क्षेत्रों में भी सड़कों का जाल बिछ चुका है, इसलिए कुछ राहत जरूर है। आवागमन की समुचित सुविधा के अभाव में अपने विद्यालय के निकट भाड़े (किराये) पर रहना मेरी विवशता थी।

उस समय देश को स्वतंत्र हुए मात्र १४-१५ वर्ष हुए थे। नई सरकारें गांव-देहातों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार में लग चुकी थीं। फिर भी विद्यालयों की संख्या काफी कम थी। प्राथमिक पाठशालाएं दो-दो, तीन-तीन किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित मिलते थे, लेकिन हाई-स्कूल, इंटरमीडिएट स्तर के विद्यालय तो परस्पर २५-३० किमी (पैदल मार्ग से) की दूरी पर होते थे। इसलिए अधिकतर छात्रों को अपने घरों से दूर विद्यालय के निकट रहने की व्यवस्था करनी होती थी। कदाचित दूरी के कारण छात्रों की सुविधा के लिए उनका विद्यालय ही १०वीं-१२वीं के परीक्षाकेन्द्र बना दिये जाते थे।

उस क्षेत्र की तत्कालीन शैक्षणिक एवं भौगोलिक स्थिति के उपर्युल्लेख के बाद मैं नकल की एक घटना पर आता हूं। अप्रैल का महीना था। हम परीक्षार्थियों के लिए इंटरमीडिएट स्तर का हमारा विद्यालय ही परीक्षा केन्द्र था। जैसा मुझे याद पड़ता था लगभग रोज ही या हर दूसरे दिन किसी न किसी विषय की परीक्षा होती थी। मैं विज्ञान वर्ग का परीक्षार्थी था। अन्य कुछ कला वर्ग के छात्र थे। हर वर्ग में छः विषय होते थे जिनमें एक-दो वैकल्पिक भी हुआ करते थे। हरएक के दो और हिन्दी के तीन प्रश्नपत्र होते थे।

परीक्षा में नकल जैसे शब्द से हम परिचित थे। वस्तुतः परिचय तो प्राथमिक पाठशाला की कक्षाओं से ही था। लेकिन कभी किसी का परीक्षा में नकल करने का साहस नहीं होता था। नकल का आरोप किसी पर लगे तो अध्यापकवृंद के रोष का सामना करना तो पड़ता ही था साथ ही अभिभावकों के उपदेश भी सुनने पड़ते थे। नकल को एक निन्द्य कार्य के रूप में देखा जाता था। विद्यालय में माहौल नकल के विरुद्ध मिलता था और निरीक्षण कार्य में लगे अध्यापक काफी सचेत रहते थे।

ऐसे माहौल में एक दिन (दो-तीन दिन बासी) समाचार सुनने को मिला कि फलांने विद्यालय में एक छात्र नकल करते पकड़ा गया। उस जमाने में यह एक चरचा योग्य समाचार था। “छात्र की यह हिम्मत कि परीक्षा में नकल कर बैठा?”

दरअसल सन् १९६० के शुरुआती वर्षॉ तक किसी भी प्रकार का कदाचार बहुत कम था और चोरी-छिपे ही होता था जैसा मुझे अपने बुजुर्गों से सुनने को मिलता था।

लेकिन अब? अब स्थिति बहुत बदल चुकी है। पूरे देश के क्या हाल हैं इस बारे में टिप्पणी नहीं कर सकता। लेकिन यह कहने में हिचक नहीं है कि हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में काफी गिरावट आई है। समाचार माध्यमों से प्राप्त जानकारी के अनुसार परीक्षा में नकल के मामले विरले नहीं रह गये हैं। न अभिभावक और न ही शिक्षक छात्रों को नकल के विरुद्ध प्रेरित करते हैं। कई मौकों पर शिक्षक ही इस असामाजिक क्रियाकलाप में लिप्त पाये गये हैं। नकल माफिया जैसे शब्द सुनने को मिलने लगे हैं। मेरे किशोरावस्था काल से समाज बहुत बदल चुका है। – योगेन्द्र जोशी

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किस्सा कदाचार की मानसिकता का

हम हिंदुस्तानी पश्चिम के विकसित देशों के लोगों को भौतिकवादी कहने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं, गोया कि हम भौतिकवाद से ऊपर उठे हों । मेरा तो मानना है कि हम भौतिकवाद में उनसे भी आगे हैं, अन्यथा हमारे समाज में इतना भ्रष्टाचार क्यों होता ? ऐसा लगता है कि कदाचार हमारी सामूहिक सोच का एक अभिन्न अंग है और भ्रष्ट आचरण की निंदा हम केवल दिखावे के लिए करते हैं । हम लोगों की सोच में आर्थिक हितों को भ्रष्ट तरीके से साधने की इच्छा कितनी प्रबल रहती है इसका अनुभव मुझे एक बार देश के बाहर ब्रिटेन में भी हुआ था ।

आज से करीब अढ़ाई दशक पहले मैं इंग्लैंड के नगर साउथहैम्पटन में अवस्थित विश्वविद्यालय में उच्चाध्ययन हेतु गया हुआ था । मेरे साथ मेरी धर्मपत्नी तथा दो-चार वर्ष की उम्र वाले दो बच्चों का परिवार भी था । ब्रिटेन समाज-कल्याण वाला एक देश है और तदनुसार वहां पर प्रायः हर व्यक्ति को अपनी आमदनी के अनुसार सामाजिक कल्याण के राष्ट्रीय कोष में आर्थिक योगदान देना होता है । मेरे वेतन से भी नियमानुसार एक अंश की कटौती विश्वविद्यालय द्वारा कर ली जाती थी । ज्ञातव्य तथ्य यह है कि उस काल में वहां प्रचलित नियमों के अनुसार हर परिवार को बच्चों की परवरिश के लिये उक्त कोष से सरकारी अनुदान भी मिला करता था, जो सामान्यतः बच्चों की माता को दिया जाता था, पिता को नहीं । इसके पीछे यह तर्क दिया जाता था कि बच्चों के लालन-पालन का जिम्मा आम तौर पर माता को निभानी होती है, और माता-पिता के तलाक होने पर, जो कि असामान्य घटना नहीं हुआ करती थी, माता के ऊपर ही उनकी जिम्मेदारी आ पड़ती थी । मेरे परिवार को भी बच्चों के नाम पर सरकारी मदद मिलती थी, जो मेरी पत्नी निकटस्थ डाकघर से प्राप्त करती थीं ।

उन्हीं दिनों मेरे हमवतन एक सज्जन भी उसी शिक्षण-संस्था में उच्चानुशीलन के लिए आ पहुंचे । वे लंबे अर्से से विदेशों में अलग-अलग स्थानों पर कार्य कर चुके थे और उस समय वे अमेरिका से वहां आये थे । एक ही विभाग में कार्यरत होने और समान भाषाभाषी होने के कारण हमारे बीच मित्रता स्थापित हो गयी ।

समय बीतता गया और कालांतर में मेरा देश-वापसी का समय आ गया । इसी बीच मेरे वे मित्र भी हमसे भेंट करने पहुंचे । बातचीत के दौरान जब बच्चों के नाम मिलने वाले अनुदान की चर्चा हुयी तो उन्होंने सुझाव दिया कि मेरी पत्नी को चाहिए कि वे डाकघर को खाते में जमा पैसे को बैंक खाते में स्थानांतरण करने के निर्देश दें । उनकी राय थी कि हम डाकघर को इंग्लैंड छोड़ने की बात न बतायें ताकि डाकघर होते हुए बैंक खाते में पैसा जमा होता रहे । बैंक खाता चालू रखें और उसकी चेकबुक अपने साथ भारत लेते जायें । जब तक हो सके अपने भारतीय बैंक में इंग्लैंड से धनांतरण करते रहें । उनका मत था कि यह कुछ समय तक चलता रहे और अंत में पैसे की निकासी बंद होने पर डाकघर तथा बैंक के खाते स्वयमेव निष्क्रिय हो जायेंगे । उनके सुझाव बिना प्रतिवाद के हमने सुन किया और किया वही जो हमें करना था । वहां के अपने शेष बचे दायित्व मैंने पूरे किये और आने से एक दिन पहले अपने बैंक खाते को बंद करवाया । और पत्नी ने भी सप्ताह भर पहले ही अपने डाकघर को ब्रिटेन छोड़ने की सूचना देते हुए निवेदन-पत्र दे दिया कि किस दिन से उनका सरकारी अनुदान बंद किया जाना है । हमारे लौटने की पूरी हो चुकी थी ।

कह नहीं सकता कि वे सज्जन सुझाव देते वक्त गंभीर थे या नहीं । मैं नहीं समझता कि वे मजाक में सब कुछ कह गये हों । पर सोचता हूं कि मजाक में ऐसी बातें व्यक्ति की मानसिकता को प्रतिबिंबित करती हैं । भारत लौटने पर मेरा उनसे संपर्क टूट गया । बाद में उन्होंने अपने वक्त पर क्या किया होगा यह मालूम नहीं । – योगेन्द्र

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