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कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा

मुझे एक गाय मुहल्ले की अपनी गली के नुक्कड़ पर घास चरती हुई मिल गयी । आजकल बरसात का मौसम है । बारिस के नाम पर इस मौसम में अपेक्षा से बहुत कम पानी बरसा है अपने इलाके में, फिर भी जमीन में इतनी नमी तो आ ही गई है कि सड़कों-गलियों की कच्ची जमीन पर मौसमी घास उग सके । बस वही घास वह गाय चर रही थी । मैं पास से गुजरने लगा तो उसने मुझे गौर से देखा । उसे शायद मेरा चेहरा देखा-पहचाना-सा लग रहा था ।

Stray Cow

मैंने उसकी ओर मुखातिब होकर पूछा, “क्यों भई गैया माई, आज इधर कैसे ? आजतक तो आपको ऐसे चरते हुए नहीं देखा; कम से कम अपनी इस गली में तो कभी नहीं ।”

“बस यों ही, समझ लें तफरी लेने निकल पड़ी मैं भी । कभी-कभी जिन्दगी में कुछ चेंज भी तो होना चाहिए ।” उसका जवाब था ।
उसकी बात मैं समझ नहीं पाया । अधिक कुछ और पूछे बिना मैं आगे बढ़ गया ।

मैंने उसे सुबह-शाम जब भी देखा घर के नजदीक की मुख्य सड़क के किनारे के एक मकान के सामने ही बंधा देखा था दो-तीन अन्य गायों के साथ । जरूर उस मकान के मालिक ने पाल रखा होगा उन सबको । उस दुमंजिले मकान के भूतल पर किराने की दुकान है उसी मकान मालिक की; और साथ में चलता है गाय-भैंसों के चारे का कारोबार । एक आटा-चक्की भी चलती है वहां; मैं कभी-कभार आटा खरीद ले आता हूं वहां से । ऐसे ही मौकों पर अथवा वहां से सड़क पर पैदल गुजरते हुए मैंने उस गाय को खूंटे से बंधे और नांद से चारा-पानी खाते हुए देखा है । लेकिन कभी भी शहर के आम छुट्टा जानवरों की तरह उसे इधर-उधर घूमते-चरते नहीं देखा । वह पालतू जो थी ।

मुझे जिज्ञासा हुई देखूं कि माजरा क्या है । मैंने सड़क पर आते-जाते उस खूंटे पर गौर करना शुरू किया । अब वह गाय उस खूंटे से बंधी नहीं दिखाई देती, कभी नहीं । मैं समझ गया वह अब बेकार हो चुकी है; वह बूढ़ी हो रही होगी और बछड़े-बछिया जनकर दूध देने की क्षमता खो चुकी होगी । इसलिए उसके मालिक ने उसे अपने हाल पर छोड़ दिया है । अब वह छुट्टा गाय बन गई है दूसरे कई अन्य गायों की तरह ।

मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के पचास-पचपन साल पहले के वे दिन याद आते हैं जब हमारे घरों में गायें पहली थीं । बारह-चौदह साल तक दूध देने के बाद वे इस कार्य से निवृत्त हो जाती थीं । उन्हें तब खदेड़कर जंगल में नहीं छोड़ दिया जाता था, बल्कि अन्य गाय-भेंसों के साथ वे भी पलती रहती थीं । लेकिन वे अधिक दिन नहीं जी पाती थीं और दो-तीन साल में दम तोड़ देती थीं । अवश्य ही तब उनके शवों को जंगल में डाल दिया जाता था । उनका मांस गिद्धों एवं जानवरों का भोजन बनता था । लेकिन यहां वह सब नहीं था ।

लंबे अर्से के बाद एक दिन वह मोहल्ले की ही किसी गली में मुझे मिल गयी लंगड़ाते हुए । मैंने उससे पूछा, “ये पैर में चोट कैसे लगी ?”

जवाब था, “क्या बताऊं, सड़क पार करते वक्त एक कार से टकरा गई ।”

“देखकर चला करिए, अपने शहर में सड़कें पार करना इतना आसान थोड़े ही है ।” मैंने सलाह दी ।

“देखकर ही चल रही थी, कारवाले को ही शायद नहीं दिखाई दिया ।”

“यानी कि कारवाला आपसे टकराया । यही न ?”

“यह मैं कैसे कहूं ? कारवाला बड़ा आदमी होता है, उसको भला कैसे दोष दिया जा सकता है । दोषी तो सदा कमजोर ही माना जाएगा न । यही तो इस दुनिया का उसूल है ।”

उसकी इस टिप्पणी का क्या जवाब दूं मैं सोच नहीं पा रहा रहा था । “चलिए, कुछ दिन में आपका पांव ठीक हो जाए यही प्रार्थना है मेरी ।” कहते हुए मैं वहां से चल दिया ।

यह मेरी उससे अंतिम मुलाकात थी । उसके बाद मैंने उसे कभी नहीं देखा । वह शायद दिवंगत हो गई होगी । या फिर कुछ और …। मैं स्वयं से पूछता हूं कि गोसेवा का दंभ भरने वाले भारतीय समाज में क्या कोई वाकई गोसेवक होता हैं या गोशोषक । – योगेन्द्र जोशी

 

Tags: गोसेवा, service to cow, गौ माता, mother cow, छुट्टा पशु, stray animals

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