Tag Archives: तिरुमल तिरुपति देवस्थानम्‍

तिरुमल तिरुपति के दर्शन का असफल प्रयास और बंगाली मोशाय की चिंता

इधर कुछ दिनों से तथाकथित बाबा राम रहीम की चर्चा समाचार माध्यमों में छाई हुई है। संबंधित समाचारों और उनको लेकर टीवी चैनलों पर प्रस्तुत बहसों को सुनकर मेरे मन में यह सवाल उठने लगा कि क्यों और कैसे लोग इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के अंध-भक्त बन जाते हैं। इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के तौर-तरीकों को देखने के बाद भी उनके मन में किसी प्रकार की शंका क्यों नहीं उठती? वे इनको भगवान तक का दर्जा कैसे दे बैठते हैं? किंचित् चिंतन करने पर मुझे लगने लगा कि आम आदमी वस्तुतः बहुत कायर होता है – कायर अज्ञात के प्रति, अज्ञात भविष्य के प्रति। अधिकांश मनुष्य अमूर्त शक्तियों में विश्वास करते हैं और उन्हें यह भय रहता है कि ऐसी शक्तियां यदि रुष्ट हो गयीं तो उनका अनिष्ट कर सकती हैं। जो व्यक्ति समस्याओं के दौर से गुजर रहा होता है वह उनके निदान एवं समाधान के लिए मंदिरों, पंडे-पुजारियों, ज्योतिषियों, और तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं आदि के पास पहुंचता है। मूल में अज्ञात शक्तियों का भय होता है ऐसा मेरा सोचना है।

विचार करते-करते मुझे कोई चौदह-पंद्रह वर्ष पहले की एक घटना की याद आ गई। अक्टूबर का महीना था और नौ-दिवसीय शारदीय नवरात्र का पर्व चल रहा था। मेरा प्रायशः पूरा जीवन उत्तर भारत में ही बीता है और यहां के अनुभवों के आधार पर मेरा सोचना यही रहा है कि नवरात्र का समय देवी दुर्गा (या उनके विभिन्न अवतारों) के दर्शन-पूजन का समय होता है। अपनी इसी धारणा से वशीभूत होकर मैंने शारदीय नवरात्र का समय तिरुमल (तिरुमला?) तिरुपति देवस्थानम् के दर्शन के लिए चुना, यह सोचते हुए कि इस देवी-पर्व के समय वहां तीर्थयात्रियों की भीड़ नहीं होगी। मैं अपनी पत्नी के साथ रेलगाड़ी से तिरुपति शहर पहुंच गया और वहां से तिरुमल पहाड़ियों पर स्थित तिरुमल तिरुपति वेंकटेश (श्रीपति वैकुण्ठेश भगवान विष्णु) मंदिर परिसर भी पहुंच गया।

वहां पहुंचने पर हमारी यह गलतफहमी दूर हो गई कि शारदीय नवरात्र-काल में तिरुमल में यात्रियों की भीड़ कम होगी। दरअसल इसी समय वहां भव्य “ब्रह्मोत्सव” का आयोजन होता है। पूरा मंदिर परिसर सजा रहता है। रात भर देवमूर्तियों की सजी हुई झांकियां विशाल मंदिर परिसर में घुमाई जाती हैं। उन्हीं में से एक में तिरुपति वेंकटेश की प्रतिकृति भी रहती है जिसके दर्शन-पूजन के लिए भीड़ उमड़ी रहती है। पूरे नवरात्र रात-दिन चहल-पहल रहती है।

तिरुमल में दर्शन के लिए अलग-अलग मूल्यों के टिकटों की व्यवस्था रहती है और उसी के अनुसार दर्शनार्थियों को छोटी-बड़ी पंक्तियों में खड़ा होना पड़ता है। इसके अतिरिक्त मुफ्त दर्शन वाली पंक्ति भी लगती है, परंतु उसमें दर्शन पाने में काफी समय लगता है। हम लोगों ने टिकट पाने की कोशिश की। पता चला कि पूरे नवरात्र भर के लिए सामान्यतः उपलब्ध टिकट बिक चुके हैं। विशेष मूल्य के टिकट (हजार-दो-हजार या अधिक के टिकट शायद मिल जायें ऐसा कइयों ने सुझाया। उपलब्ध जानकारी भ्रमित करने वाली ही थी। रात एक-डेड़ बजे तक हम भाग-दौड़ करते रहे, एक कार्यालय से दूसरे तक दौड़ते रहे, बैंक की शाखा (रात में भी खुली हुई) के चक्कर लगाते रहे, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

दूसरे दिन मुफ्त दर्शन के लिए ५००-६०० मीटर लंबी पंक्ति में हम भी लग लिए। तिरुमल में दर्शन की व्यवस्था मुझे अजीब और असुविधाजनक लगी। मैं अधिक विस्तार से वर्णन नहीं कर रहा हूं किंतु इतना बता दूं वहां १५-२० बड़े-बड़े हॉल हैं जिनमें दर्शानार्थियों को प्रतीक्षारत रहने के लिए टिका दिया जाता है। दर्शन के लिए एक-एक कर हॉलों को खोला जाता है और लोग आगे बढ़ते हैं। ब्रह्मोत्सव के समय भीड़ इतनी होती है कि उनको कभी-कभी आगे किसी और हॉल में फिर-से टिका दिया जाता है। हम भी एक हॉल में इंतिजार करने लगे। मालूम पड़ा कि दर्शन रात्रि ११-१२ बजे होंगे। हम संतुष्ठ थे कि चलो दर्शन तो हो ही जायेंगे। बाद में जानकारी को पुख्ता करने के लिए एक स्वयंसेवक (वॉलंटिअर) से पूछा तो पता चला कि दर्शन के लिए ११-१२ बजे का वक्त उस रात का नहीं बल्कि अगली रात का है।

हमारा माथा ठनका। हमारे लौटने का आरक्षण अगले दिन ३-४ बजे का था। हमने दर्शन का विचार त्यागा और बाहर आने के लिए तैयार हुए। पर यह क्या! हॉल के प्रवेश-द्वार पर तो ताला लटका था। वहां ठीक-से हिन्दी या अंग्रेजी समझने वाला स्वयंसेवक नहीं मिला जो हमारी समस्या समझ सके। बड़ी मुश्किल से एक युवक मिला जिसने हमारे मदद की। हम बाहर निकले और राहत की सांस ली। दूसरे दिन रेलगाड़ी से लौट आए बिना दर्शन किए।

इस घटना का रोचक पक्ष है एक बंगाली महाशय की दुश्चिंता जो हमारे देखने में आई। जब हम टिकट के लिए भाग-दौड़ कर रहे थे तब हमारी उनसे मुलाकात हुई। वे सज्जन तीस-बत्तीस वर्ष के युवा थे और कलकत्ता से पत्नी और छोटे बच्चों के साथ दर्शनार्थ आये थे। हमारी तरह वे भी परेशान थे। जब कहीं भी कोई उम्मीद नहीं दिखी तो उन्होंने हमारे सामने अपनी चिंता साझा की, “अब कैसे दर्शन होंगे? हम यहां अधिक समय टिकने की स्थिति में नहीं। बिना दर्शन के लौटना अनिष्टकारी होगा। हमें मालूम ही नहीं था कि इस समय दर्शन पाना इतना मुश्किल होगा।”

देव-दर्शन की कोई संभावना नहीं यह बात हमारे लिए भी निराशाजनक थी। जिस उद्देश्य से घर से चले थे उसका पूरा न हो पाना अच्छा तो नहीं लग रहा था। फिर भी इस बात को एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग मानकर हम सहज थे। इसके विपरीत वे महाशय बेहद चिंतित थे किसी अनिष्ट की आशंका को लेकर। उनके चेहर पर दुश्चिंता के भाव स्पष्ट झलक रहे थे। उनका कहना था, “देव-दर्शन किए बिना लौटना अनिष्टकारी तो होगा ही। अब हम क्या करें?”

हमने उनको समझाया, “देखिए दर्शन नहीं हो पा रहे हैं तो इसमें आपकी क्या गलती? परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि आपके लिए दर्शन संभव नहीं हो पा रहे हैं। क्या आप भगवान्‍ को इतना कमजोर समझते हैं कि एक साधारण मनुष्य़ की भांति वह भी बात-बात पर नाखुश हो जाएं? आपने मंदिर के दर्शन कर लिए, परिसर की झांकियों की भी झलक पा ली है। ये कम है क्या? यदि बहुत चिंता हो तो श्री व्यंकटेश से प्रार्थना करिए कि अगली बार दुबारा आने और दर्शन पाने का सुअवसर आपको प्रदान करें।”

मेरी बात उन्होंने गंभीरता से सुनी। मुझे लग रहा था कि उनको मेरी सलाह पसंद आ गई। उस रात हमने उनसे विदा ले ली। अगले दिन हम मुफ्त दर्शन पाने हेतु पंक्ति में लग लिए। उसके बाद क्या हुआ यह बता चुका हूं। उन चिंताग्रस्त महाशय से दुबारा भेंट नही हो सकी। उनकी दुश्चिंता यथावत्‍ बनी रही या नहीं मैं कह नहीं सकता। उस घटना से मुझे यह ज्ञान तो मिला ही कि सामान्य मनुष्य अनागत के बारे में सोच-सोचकर परेशान हो जाता है। वह अदृश्य शक्तियों में विश्वास ही नहीं करता बल्कि उनसे भय भी खाता है। वह सोचता है कि एक मनुष्य की भांति वे शक्तियां भी बात-बात पर रुष्ट हो सकती हैं और व्यक्ति का अहित कर सकती हैं। लेकिन वे शक्तियां क्या वास्तव में मनुष्य की तरह कमजोर होती हैं? मेरे मत में यह भ्रम मात्र है। – योगेन्द्र जोशी

 

Advertisements

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories, Story