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अपनाओ भ्रष्ट तरीका और कमाओ पैसा

मेरा एक दांत कीड़ा लगने से खराब हो रहा था । मैं उसके इलाज के लिए पास के दंत-चिकित्सक के पास गया । मुझे राय दी गयी कि दांत की ‘कैपिंग’ करवा लूं तो वह वर्षों काम दे देगा । कैपिंग में दांत को चारों ओर से थोड़ा घिस दिया जाता है और उसके ऊपर विशेष प्रकार के ‘सीमेंट’ के द्वारा धातु का एक नपा-तुला खोल चढ़ा दिया जाता है । मैंने हांमी भर दी । मुझे अगले दिन फिर आने के लिए कहा गया ।

मैं अगले दिन निर्धारित समय पर दांत के उस चिकित्सक के पास पहुंच गया । चिकित्सक ने उस तकनीकी कर्मकार को भी बुला रखा था जिसने ‘पेरिस आफ् प्लास्टर’ के माध्यम से मेरे खराब दांत का सांचा तैयार करना था । उस समय चिकित्सक की क्लिनिक में तीन अन्य लोग पहले से ही बैठे हुए थे और उसके साथ बातचीत में मशगूल थे । मैं दंत-चिकित्सा के लिए बने विशेष कुर्सी पर बैठ गया । वहां पहुंचे कर्मकार ने अपना कार्य आरंभ कर दिया । उसने चिकित्सा औजारों की मदद से दांत को चारों ओर से घिसा । फिर ‘प्लास्टर आफ् पेरिस’ की गाढ़ी, लगभग ठोस-सी, लुगदी बनायी और अपना धातुकीय उपकरण प्रयोग में लेते हुए उस लुगदी से दांत का सांचा तैयार किया । पूरा कार्य चुपचाप शांति से संपन्न हो गया । मेरे अनुमान से उस कार्य में दस-पंद्रह मिनट लगे होंगे ।

इस दरमियान मैं तो बोल नहीं सकता था । वह कर्मकार भी शांत रहा । फलतः चिकित्सक समेत वहां मौजूद चारों लोगों की बातचीत हम आराम से सुन सकते थे । उन लोगों की बातचीत कहां से और कैसे आरंभ हुयी थीं यह तो मैं नहीं जानता । हां, मेरी मौजूदगी में वे आपस में जो कुछ कह रहे थे उसे में समझ पा रहा था । उनके मुख से जो शब्द निकल रहे थे वे चौंकाने वाले तो थे ही, मेरी समझ में वे किसी भी भले आदमी को विचलित कर सकते थे । हमारे समाज में भ्रष्टाचार का कोढ़ कितना गहरे और कितने व्यापक स्तर पर फैला है इस बात का अंदाजा उनके वार्तालाप से मिल रहा था । वहां पहुंचे तीनों आगंतुकों में से एक ही व्यक्ति चिकित्सक से बातें कर रहा था, शेष दो उसकी बातें केवल सुन रहे थे । उस वार्तालाप के शब्द तो मुझे यथावत् याद नहीं, किंतु बातें कुल मिलाकर इस प्रकार हो रही थीं:-

आगंतुक, “अगर आप कहें तो वहां आपके ट्रांसफर की कोशिश करूं । कोई पचास हजार का इंतजाम करना होगा । इतने से काम बन जायेगा ।”

चिकित्सक, “इतना खर्च करें ? भला कितना फायदा होगा ट्रांसफर से, और कैसे ?”

“आपने तो वहां की ओ.पी.डी. देखी होगी । कोई डेड़ सौ मरीज आते हैं दिन भर में …”

“नहीं, मुझे अधिक आइडिया नहीं है । यूं मैं उस अस्पताल से कोई दो हफ्ते अटैच रही हूं । खैर, आगे बोलें ।”

“हां, तो संडे और छुट्टियों को मिलाकर देखें तो कह सकते हैं कि औसतन करीब-करीब सौ मरीज तो रोजाना आते ही हैं । अगर उनमें से पच्चीस-तीस को भी एक्स-रे के लिए कहा जायेगा तो आपको तीस रुपये प्रत्येक के नाम पर मिलेगा ही । करीब आठ सौ रुपये तो हर रोज के ऐसे मिल ही जाने हैं । कम से कम दो सौ तो औरों की दवा बगैरह के नाम पर अपने पास आना ही है । इस प्रकार हजार-एक हर दिन का मिलना ही है ।”

मैं समझ गया कि पैसा कहां से आना है । मैंने सुन ही रखा था कि एक्स-रे एवं पैथॉलॉजी लैब में किये जाने वाली जांचों का कमिशन चिकित्सकों को मिलता है और दवा की दुकानों से भी । उक्त वार्तालाप में उसी कमिशन का संकेत था । मामला सरकारी अस्पताल का था जहां चिकित्सकीय जांच-पड़ताल की व्यवस्था ध्वस्त रखी जाती है, ताकि मरीजों को बाहरी परीक्षण-केंद्रों पर जांच के लिए मजबूरन जाना पड़े और बदले में वहां से चिकित्सक को कमिशन मिल सके । वाह रे मेरा देश महान् !

“लेकिन काम का बोझ तो ज्यादा ही होगा ।” चिकित्सक ने कहा ।

आगंतुक, “अरे नहीं, सुबह करीब आठ बजे से करीब दिन के दो बजे तक । तब तक सब निबट जाता है । उसके बाद आराम करिये, या मन हो तो शाम को थोड़ा प्रैक्टिस कर लें ।”

वार्तालाप चल ही रहा था कि दांत के सांचे का मेरा कार्य संपन्न हो चुका था । मैंने दंत-चिकित्सक से इजाजत ली । मुझे आगंतुक तथा उसके बीच चल रही बातचीत सुनने में बेचैनी हो रही थी । आगे कुछ और सुनूं यह मैं नहीं चाहता था ।

घर लौटते समय मेरे मन में यह सवाल रह-रहकर उठ रहा था कि क्या भ्रष्टाचार इस देश का स्थायी राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है । चोरी-छिपे भ्रष्ट तरीकों से धन कमाने की बातें पहले भी सुनने में आती थीं, किंतु अब कैसे-कैसे हथकंडे अपनाये जायें इसकी चर्चा खुलकर होती है । अंधाधुंध धन कमाने से मतलब, जैसे भी हो, उसमें बुराई ही क्या है ? स्वयं को विश्वगुरु तथा धर्मपरायण कहने वाले और भौतिकवाद के लिए पाश्चात्य देशों को कोसने वाले देश का हाल है ये । भगवान् भी बचाने से रहा अब तो ! – योगेन्द्र

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किस्सा कदाचार की मानसिकता का

हम हिंदुस्तानी पश्चिम के विकसित देशों के लोगों को भौतिकवादी कहने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं, गोया कि हम भौतिकवाद से ऊपर उठे हों । मेरा तो मानना है कि हम भौतिकवाद में उनसे भी आगे हैं, अन्यथा हमारे समाज में इतना भ्रष्टाचार क्यों होता ? ऐसा लगता है कि कदाचार हमारी सामूहिक सोच का एक अभिन्न अंग है और भ्रष्ट आचरण की निंदा हम केवल दिखावे के लिए करते हैं । हम लोगों की सोच में आर्थिक हितों को भ्रष्ट तरीके से साधने की इच्छा कितनी प्रबल रहती है इसका अनुभव मुझे एक बार देश के बाहर ब्रिटेन में भी हुआ था ।

आज से करीब अढ़ाई दशक पहले मैं इंग्लैंड के नगर साउथहैम्पटन में अवस्थित विश्वविद्यालय में उच्चाध्ययन हेतु गया हुआ था । मेरे साथ मेरी धर्मपत्नी तथा दो-चार वर्ष की उम्र वाले दो बच्चों का परिवार भी था । ब्रिटेन समाज-कल्याण वाला एक देश है और तदनुसार वहां पर प्रायः हर व्यक्ति को अपनी आमदनी के अनुसार सामाजिक कल्याण के राष्ट्रीय कोष में आर्थिक योगदान देना होता है । मेरे वेतन से भी नियमानुसार एक अंश की कटौती विश्वविद्यालय द्वारा कर ली जाती थी । ज्ञातव्य तथ्य यह है कि उस काल में वहां प्रचलित नियमों के अनुसार हर परिवार को बच्चों की परवरिश के लिये उक्त कोष से सरकारी अनुदान भी मिला करता था, जो सामान्यतः बच्चों की माता को दिया जाता था, पिता को नहीं । इसके पीछे यह तर्क दिया जाता था कि बच्चों के लालन-पालन का जिम्मा आम तौर पर माता को निभानी होती है, और माता-पिता के तलाक होने पर, जो कि असामान्य घटना नहीं हुआ करती थी, माता के ऊपर ही उनकी जिम्मेदारी आ पड़ती थी । मेरे परिवार को भी बच्चों के नाम पर सरकारी मदद मिलती थी, जो मेरी पत्नी निकटस्थ डाकघर से प्राप्त करती थीं ।

उन्हीं दिनों मेरे हमवतन एक सज्जन भी उसी शिक्षण-संस्था में उच्चानुशीलन के लिए आ पहुंचे । वे लंबे अर्से से विदेशों में अलग-अलग स्थानों पर कार्य कर चुके थे और उस समय वे अमेरिका से वहां आये थे । एक ही विभाग में कार्यरत होने और समान भाषाभाषी होने के कारण हमारे बीच मित्रता स्थापित हो गयी ।

समय बीतता गया और कालांतर में मेरा देश-वापसी का समय आ गया । इसी बीच मेरे वे मित्र भी हमसे भेंट करने पहुंचे । बातचीत के दौरान जब बच्चों के नाम मिलने वाले अनुदान की चर्चा हुयी तो उन्होंने सुझाव दिया कि मेरी पत्नी को चाहिए कि वे डाकघर को खाते में जमा पैसे को बैंक खाते में स्थानांतरण करने के निर्देश दें । उनकी राय थी कि हम डाकघर को इंग्लैंड छोड़ने की बात न बतायें ताकि डाकघर होते हुए बैंक खाते में पैसा जमा होता रहे । बैंक खाता चालू रखें और उसकी चेकबुक अपने साथ भारत लेते जायें । जब तक हो सके अपने भारतीय बैंक में इंग्लैंड से धनांतरण करते रहें । उनका मत था कि यह कुछ समय तक चलता रहे और अंत में पैसे की निकासी बंद होने पर डाकघर तथा बैंक के खाते स्वयमेव निष्क्रिय हो जायेंगे । उनके सुझाव बिना प्रतिवाद के हमने सुन किया और किया वही जो हमें करना था । वहां के अपने शेष बचे दायित्व मैंने पूरे किये और आने से एक दिन पहले अपने बैंक खाते को बंद करवाया । और पत्नी ने भी सप्ताह भर पहले ही अपने डाकघर को ब्रिटेन छोड़ने की सूचना देते हुए निवेदन-पत्र दे दिया कि किस दिन से उनका सरकारी अनुदान बंद किया जाना है । हमारे लौटने की पूरी हो चुकी थी ।

कह नहीं सकता कि वे सज्जन सुझाव देते वक्त गंभीर थे या नहीं । मैं नहीं समझता कि वे मजाक में सब कुछ कह गये हों । पर सोचता हूं कि मजाक में ऐसी बातें व्यक्ति की मानसिकता को प्रतिबिंबित करती हैं । भारत लौटने पर मेरा उनसे संपर्क टूट गया । बाद में उन्होंने अपने वक्त पर क्या किया होगा यह मालूम नहीं । – योगेन्द्र

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