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सुकून का एहसास

त्रिलोचन बाबू ने घर के मुख्य प्रवेशद्वार (गेट) के खटखटाये जाने की आवाज सुनी। आम तौर पर लोग गेट के बगल में लगी घंटी का बटन दबाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने सोचा कि कोई अजनबी होगा जिसे घंटी का अंदाजा न रहा हो। अखबार का हाथ में पकड़ा हुआ पन्ना फेंकते हुए-से अंदाज में उन्होंने सोफे के एक तरफ रखा और उठकर कमरे का दरवाजा खोलने पहुंचे। गर्दन बाहर निकालते हुआ गेट की तरफ देखा। बाहर कोई खड़ा था। वे बाहर आये और गेट की तरफ बढ़े। कोई नया चेहरा था जिसे उन्होंने शायद पहले कभी देखा नहीं था। सवाल किया, “मैंने आपको पहचाना नहीं। मुझसे काम है या किसी और के बारे में …?” कहते हुए गेट का एक पल्ला खोल दिया।

बाहर खड़े आगंतुक ने कहा, “दरअसल आपसे पानी मांगना चाहता था। गरमी है; प्यास लगी है।”

त्रिलोचन बाबू ने उक्त आगंतुक को ऊपर से नीचे तक देखा और पास में खड़ी की गयी साइकिल तथा उस पर लटके जूट के बोरे आदि को देखा तो बोले, “मुझे लगता है आप फेरी लगाकर घरों से कभाड़ इकट्ठा करते हैं।”

आगंतुक ने हामी भरी। त्रिलोचन बाबू “ठीक है, एक मिनट रुकिए, अंदर से पीने को पानी ले आता हूं।” कहते हुए लौटे और घर के अंदर दाखिल हुए। रसोईघर के सादे पानी के साथ फ्रिज का अतिशीतल पानी लोटे में मिलाकर उन्होंने हल्का ठंडा पानी तैयार किया और बाहर लौट आये। उस आगंतुक को लोटा सौंपते हुए किंचित् उलाहना भरे अंदाज में बोले, “गरमी के दिन हैं आप फेरी का काम करते हैं। आपको एक बड़ी बोतल में पानी लेकर चलना चाहिए। माना कि पानी ठंडा नहीं रह सकता, फिर भी पानी तो पानी ही है; शरीर की जरूरत पूरी करेगा ही।”

कभाड़ वाले ने जवाब दिया, “पानी लेकर ही चला करता हूं, बाबूजी। लेकिन आज रास्ते में पानी पीने को बोतल हाथ में लेते समय गिर गयी। उसका ढक्कन ढीला था, खुल गया और पानी जमीन में फैल गया।

“चलिए कोई बात नहीं। आप ये पानी पीजिए। तब तक में घर में देखता हूं शायद कोई बेहतर बोतल पड़ी हो।” कहते हुए वे वापस कमरे में आये।

उन्हें प्लस्टिक की एक खाली बोतल मिल गयी। उसमें ठंडा पानी भरकर बाहर ले आये और कभाड़ वाल्रे को सौंप दिया। उनकी नजर उस आदमी के पैरों की ओर पड़ी तो देखा कि उसने हवाई चप्पलें पहन रखी हैं जिनमें से एक का पट्टा टूटा था जिसे डोरी से बांधकर काम चलाऊ बना रखा था। जिज्ञासावश उन्होंने पूछ डाला, “आप टूटे पट्टे वाली चप्पल पहने हैं, दूसरी जोड़ी चप्पलें खरीद लेते। इसका क्या भरोसा रास्ते में धोखा दे जायें।”

“बाबूजी, अपनी आमदनी ज्यादा तो है नहीं। परिवार बड़ा है, माँ-बाप, दो बच्चे, और हम दो जने। पत्नी भी घरों में काम करती है। फिर भी कमाई कम पड़्ती है इसलिए हम दोनों (पति-पत्नी) की कोशिश होती है कि अपने पर कम से कम खर्च करें। ये चप्पलें कुछ दिन काम दे जाएंगी। देरसबेर खरीदनी तो पड़ेंगी ही।” जवाब था।

त्रिलोचन बाबू ने दोएक क्षण के लिए कुछ सोचा, फिर बोले, “मेरे पास इस्तेमाल की हुई एक जोड़ी चप्पलें हैं। ठीकठाक हालत में हैं। मैं अधिक पहनता नहीं। अगर आपको खुद पहनने में एतराज न हो तो आपको दे सकता हूं।”

“आप बुजुर्ग हैं। आपका आशीर्वाद समझकर पहन सकता हूं अगर मेरे पैर में फिट हो जायें तो।” उसने प्रस्ताव स्वीकारते हुए जवाब दिया।

त्रिलोचन बाबू घर के भीतर गये। अपनी एक जोड़ी चप्पलें उठा लाये और कभाड़ वाले को सौंपते हुए बोले, “मेरी पहनीं हैं। इसलिए इनको एक बार धो लीजियेगा।”

कभाड़ वाले ने चप्पलें पकड़ीं, गौर से उलट-पलटकर देखा और फिर बोरे में रखने का उपक्रम करने लगा। त्रिलोचन बाबू कुछ सोचते हुए बोले, “कितनी देर हुई है काम पर निकले हुए? लगता है अभी बोहनी नहीं हुई।”

“हां, अभी बोहनी नहीं हो पायी है। लेकिन हो जायेगी। घंटा भर ही तो हुआ है घर से निकले।” उसका जवाब था।

“अच्छा, ऐसा करिये घर में इस समय कुछ पुराने अखबार पड़े हैं। उन्हें लेते जाइए।” कहते हुए त्रिलोचन बाबू घर में दाखिल हुए और अखबारों का छोटा-सा पुलिंदा उठा लाए, जिसे कभाड़ वाले को सौंपते हुए बोले, “बोहनी के नाम पर इसे लेते जाइये। इसकी कोई कीमत देने की जरूरत नहीं है।”

कभाड़ वाले ने उस बंडल को लेकर अपने जूट के बोरे में डाला। बोरे को साइकिल पर लटका कर वह चलने को तैयार हुआ। “अच्छा, बाबूजी, चलता हूं।” कहते हुए उसने उनकी तरफ देखा जरूर, किंतु अधिक कुछ बोला नहीं। त्रिलोचन बाबू को उसकी आंखों में कृतज्ञता का भाव नजर आ रहा था। हो सकता है उन्हें भ्रम हुआ हो। उसे उन्होंने २-४ सेकंड तक जाते हुए देखा, फिर कमरे में लौट आये।

वापस सोफे पर बैठते हुए अखबार का पन्ना हाथ में लिया और सोचने लगे, ‘उस आदमी की जो मदद की थी देखा जाए तो वह कुछ खास नहीं थी। लेकिन उसके लिए उस समय वह भी कुछ माने तो रखता ही होगा। ऐसा न भी हो तो भी मुझे सुकून का महसूस तो हो ही रहा है। बदले में यही मेरे लिए बहुत है।’

‘आइंदा क्यों न किसी की छोटी-मोटी मदद की जाए?’ वे मन में सोचते हैं और जवाब सूझता है, ‘हां, हां, क्यों नहीं? गेट पर कोई आए तो उससे पूछा तो जा सकता है।’ – योगेन्द्र जोशी

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सौ मीटर दूर चलना भी गवारा नहीं

          आज के औद्योगिक युग में मनुष्य बेहद आराम-तलब हो चुका है । मुझे लगता है कि कभी-कभी यह आराम-तलबी हास्यास्पद सीमा पार कर जाती है । चंद रोज पहले एक दिलचस्प और अपने किस्म का वाकया मेरे अनुभव में आया – दिलचस्प मेरी नजर में । हो सकता है लोग ऐसा न मानें ।

          इससे पहले कि वाकये का ब्योरा पेश करूं, मैं बताना चाहूंगा कि मेरे शहर बनारस (वाराणसी) की जो भी तारीफें आपने सुनी हों वे किस हद तक सही होंगी इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहता; बस, मेरी अपनी नजर में यह शहर दुर्व्यव्यवस्था के मामले मैं अद्वितीय है । इस शहर में कौन-सी सड़क ठीक-ठाक हालत में है इसे आपको खोजना पड़ेगा । कोई भी सड़क बनने के बाद पहली बरसात झेल जाए तो आश्चर्य होता है । सड़कों पर वाहनों के बेतरतीब आवागमन को देख आपके मन में सहज शंका उठेगी कि यहां यातायात के कोई नियम हैं भी कि नहीं । पुराना शहर होने के कारण सड़कें सब जगह इतनी चौड़ी नहीं हैं कि निरंतर बढ़ते निजी मोटर-वाहनों का बोझ झेल सकें । परिणाम साफ जाहिर है, ट्रैफिक जाम । और कोढ़ में खाज की नौबत आ जाती है जब इन सड़कों पर पाइप-लाइनें बिझाने के लिए खोदाई होने लगती है, जैसा कि आजकल चल रहा है ।

          ‘लंका’ इस शहर के प्रमुख स्थानों में से एक है, जहां बी.एच.यू. (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) का प्रवेश द्वार है और उसके परिसर में अवस्थित चिकित्सा संस्थान के अस्पताल पहुंचने का मार्ग है । इसके आसपास रिहायशी मकान और बहुमंजिली इमारतें हैं, तथा स्थानीय लोगों की जरूरतों की पूर्ति करने वाला बाजार है । शहर के अन्य स्थानों के लिए पैडल-रिक्शे, आटोरिक्शे जैसे साधन भी यहां पर रात-दिन मिलते हैं ।

          वाकत तब का है जब एक दिन मुझे अपनी धर्मपत्नी जी के साथ कार्यवशात् यहां आना पड़ा था । हम घर के पास स्थित सुंदरपुर चौराहे से सवारी आधार पर चलने वाले आटोरिक्शा से लंका के लिए चल दिये । बताता चलूं कि वाराणसी में आटोरिक्शे पांच सवारियां बिठाकर चलते हैं । लंका के निकट पहुंचने पर देखने को मिला कि वहां तो जाम लगा है । हमारे आटोरिक्शे को गंतव्य स्थल, चौराहे, पर पहुंचने के लिए अभी कोई डेड़ सौ या उससे भी कम दूरी तय करनी थी, लेकिन उस जाम को देखते हुए उसने वाहन रोक दिया और सामने के वाहनों के आगे बढ़ने का इंतजार करने लगा । हमने देख रहे थे कि दूर तक खड़े वाहनों में कोई गति नहीं है । स्थिति खराब देख मैंने अपनी सहधर्मिणी से कहा, “क्यों न हम उतर जायें और पैदल चल दें । मुझे तो लगता है जितनी देर में यह आटो चौराहे पर पहुंचेगा उससे कहीं कम समय में हम पैदल वहां पहुंच जाऐंगे ।”

उन्होंने सहमति जताई, और भाड़ा अदा करते हुए हम उतरने लगे । इतने में एक महिला, उम्र से अंदाजन तीस-पैंतीस वर्ष की, आटोरिक्शे के पास पहुंची और बोली, “चौराहे तक ले चलिए तो ।”

          “अरे बहन जी, सामने ही तो चौराहा है, पैदल चले जाइए ।”

          “कौन चले वहां तक पैदल ! आप छोड़ दीजिए ।”

          तब तक हम दोनों उतर चुके थे । वाहन चालक और उस महिला के बीच आगे क्या बातें हुई होंगी मैं बता नहीं सकता, क्योंकि हम जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए बगल की एक गली के रास्ते चौराहे की तरफ चल दिए । बगल की गली का रास्ता हमने इसलिए चुना कि उस जाम में घुसकर पैदल भी आगे निकल पाना नामुमकिन-सा लग रहा था ।

गली से गुजरते हुए पत्नी महोदया बोलीं, “पता नहीं कैसी खबती महिला थी वह कि दस कदम पैदल चलने से भी कतरा रही थी ।”

पर्वतीय क्षेत्र का मूल बाशिंदा होने के कारण मुझे मीलों पैदल चलने की आदत रही है । पहाड़ों पर तो पैदल चलने के अलावा कोई अन्य साधन आम तौर पर उपलब्ध भी नहीं रहता है । लेकिन मैदानी इलाकों में स्थिति कुछ अलग रहती है । तथापि यहां भी लोग पैदल चलते ही हैं या साइकिल चलाते हैं । पता नहीं क्यों अब कुछ लोग कुछ कदम भी पैदल चलने से बचते हैं । ऐसा नहीं कि वह महिला अस्वस्थ हो । अधिकतर लोग उस महिला की तरह बर्ताव करते भी नहीं होंगे । मैं समझता हूं वह अपवाद रही होगी । लेकिन यह दिलचस्प तो है ही कि उस सरीखे लोग भी दुनिया में मिल जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

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बिनु कक्षा परीक्षा बिनु पावहिं ते उपाधि

मैं अपने शैक्षणिक जीवन के एक अनुभव का जिक्र करने जा रहा हूं । इस अनुभव का संबंध दस-बारह वर्ष पहले अपने एक पूर्वछात्र के साथ संपन्न वार्तालाप से है । उस समय वह मेरे विश्वविद्यालय (बीएचयू) के स्नातकोत्तर पूर्वार्ध, अर्थात् एमएससी प्रीवियस, कक्षा में भौतिकी (फिजिक्स) विषय का छात्र था । मेरा अनुमान है कि करीब पचास छात्र-छात्राओं की उस कक्षा में वह पढ़ाई के लिहाज से शीर्ष के दसएक में से एक रहा होगा । कक्षा के अन्य जिज्ञासु छात्रों की भांति वह भी यदाकदा मेरे बैठने-पढ़ने के कमरे में अपनी शंकाएं लेकर आ जाया करता था । मैं उन लोगों से कभी-कभी विषय से हटकर अन्य प्रकार की दो-चार बातें भी कर लिया करता था । एक बार ऐसी ही बातें तनिक अधिक विस्तार से उस छात्र के साथ भी हुई थीं । बातें एक नजरिये से दिलचस्प थीं, तो दूसरे नजरिये से तकलीफदेह और निराशाप्रद । वे बातें मुझे आज भी कुछ हद तक याद हैं । मैं उसी वार्तालाप की चर्चा कर रहा हूं ।

उस दिन संबंधित छात्र से मेरी बातों की शुरुआत निजी सवालों से हुई थी । मैंने उससे जानना चाहा था कि उसका घर किस गांव अथवा शहर में है, और यह भी कि उसने बीएससी की परीक्षा किस विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय से उत्तीर्ण की थी । उसने बताया कि उसका घर मेरठ में है और उसने इलाहाबाद में रहकर वहां के ईविंग क्रिश्चियन कालेज से बीएससी की उपाधि अर्जित की है । उक्त कालेज इलाहाबाद का एक प्रतिष्ठित कालेज हुआ करता है इस बात से मैं सुपरिचित रहा हूं । मैं जानता हूं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तुलना में मेरठ विश्वविद्यालय दोयम दर्जे का माना जाता है । इलाहाबाद सदा से शिक्षा का केंद्र रहा है और 19वीं शताब्दि में वहां अवस्थित विश्वविद्यालय देश के उच्चस्तरीय शिक्षण संस्थाओं में से एक रहा है । अगर कोई उस विश्वविद्यालय में पढ़ने का विचार करे तो यह बात समझ में आती है । किंतु स्थानीय विश्वविद्यालय छोड़ कोई घर से दूर इलाहाबाद के एक कालेज में पढ़ने पहुंचा हो यह बात एक शिक्षक के नाते मेरी समझ से परे थी । मैंने उससे यह जानना चाहा कि मेरठ में विश्वविद्यालय के होते हुए क्यों उसने घर से दूर इलाहाबाद में पढ़ाई की, और वह भी एक कालेज में न कि विश्वविद्यालय में ।

छात्र का उत्तर था, “सर, मेरठ यूनिवर्सिटी बस ऐसी ही है । मेरे पिताजी ने कहा था कि कुछ ढंग की पढ़ाई करनी हो तो इलाहाबाद जाओ । वहां यूनिवर्सिटी में एड्मिशन न हो पाने के कारण मैंने ‘इसीजी’ (ईविंग क्रिश्चियन कालेज का संक्षिप्त नाम) में एड्मिशन लिया । दरअसल मेरे पिताजी ने अपने वक्त में वहीं से ग्रैजुएशन किया था । उनकी राय थी कि मेरठ यूनिवर्सिटी से तो इसीजी बेहतर है ।”

उसका जवाब मेरे लिए कुछ हद तक चौंकाने वाला था । उसका यह कहना कि मेरठ यूनिवर्सिटी बस ऐसी ही है उस विश्वविद्यालय पर एक नकारात्मक टिप्पणी थी । इलाहाबाद, बीएचयू तथा अन्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की तुलना में मेरठ का स्तर कमतर होने की बात से मैं वाकिफ था, किंतु उसके हाल इसीजी से भी बदतर होंगे यह मैं नहीं सोचता था । इस बारे में उसकी धारणा के आधार को समझने की जिज्ञासा मेरे मन में जगी । मैंने उससे पूछा, “क्यों भई ऐसी क्या खराबी है वहां ?”

“सर वहां पढ़ाई-लिखाई तो कुछ होती नहीं है । न स्टूडेंट्स को और न ही टीचर्स को कोई दिलचस्पी रहती है । इम्तहान में नकल का जोर रहता है, और नंबर कैसे दिये जाते हैं यह तो भगवान ही जाने ।” उसने अपने खयालात पेश किए ।

“हो सकता है तुम्हें गलतफहमी हो । ऐसा नहीं होगा, किसी ने तुम्हें गलत बताया होगा । तुम तो वहां पढ़े नहीं, तुम्हारा अपना अनुभव तो है नहीं । सुनी-सुनाई बातें कभी-कभी अतिरंजित भी होती हैं ।” मैंने उसे समझाया ।

“नहीं सर, ऐसी बात नहीं । आप खुद ही समझ सकते हैं ।” उसने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा, “मेरी बहन ने उसी यूनिवर्सिटी से बीए किया । कैसे किया यह मुझे मालूम है । मुश्किल से कभी-कभार क्लास अटेंड की होगी । क्या अटेंड करती, क्लास होती तब न ! आप मानेंगे नहीं, लेकिन उसने खुद इम्तहान नहीं दिया । किसी और ने दिया और उसे डिग्री मिल गयी ।”

मुझे उसकी बातें अविश्वसनीय लग रही थीं । मैं सोच नहीं पा रहा था कि वह सच बाल रहा था या झूठ । भला झूठ बोलने की उसे क्या जरूरत थी, वह भी अपनी बहिन को लेकर । मैं अपनी कक्षा के एक छात्र होने के नाते उसे जितना समझ सकता था उसके अनुसार वह सही बोल रहा था । उन दिनों एमएससी पूर्वार्ध की अधिकतम पीरियडों, सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक, से में संबंद्ध था, अतः छात्रों से सुपरिचित होना मेरे लिए अपेक्षया अधिक मौके थे । उसकी बातें में नकार नहीं पा रहा था । उसके साथ आगे क्या-क्या बातें हुईं इसकी अहमियत नहीं है । मेरी लिए जो बात चिंतनीय थी वह मैं सुन चुका था ।

उसने जो बताया उसमें दम है इसका अहसास मुझे कुछ सालों बाद तब हुआ, जब मेरठ विश्वविद्यालय के परीक्षा घोटालों की खबरें जोरशोर से अखबारों और टीवी चैनलों पर आने लगीं । खबरें आ रही थीं कि कैसे वहां की परीक्षा पुस्तकों का मूल्यांकन परीक्षकगण प्राइमरी से इंटर तक के छात्रों से करवा रहे हैं ।

अपने देश में कदाचार के अनेक रूप हैं । किसी और क्षेत्र में हम कितने ही पिछड़े हों, इस क्षेत्र में शायद ही कोई प्रमुख देश हमें मात दे सकता है । मेरा देश महान । वाकई महान है यह देश । – योगेन्द्र जोशी

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बैंक अधिकारी ने मेरी बात पर विश्वास किया और …

बैंकों एवं इसी प्रकार की अन्य सेवाप्रदाता कंपनियों के कर्मचारियों का अपने ग्राहकों के पति रवैया सभी देशों में एक जैसा नहीं होता है । ब्रिटेन में मिले अनुभव के आधार पर कम से कम मैं तो यही कहूंगा । अपने देश में बैंक कर्मचारियों की कोशिश यह नहीं होती है कि ग्राहकों को नियम-कानूनों के नाम पर कोई असुविधा न पहुंचने पाये । मेरा अनुमान है कि विश्व के कई देशों के बैंक कर्मचारी आम ग्राहक के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, और वे अपनी संस्था की साख बनाये रखने की तमाम कोशिशें करते हैं, भले ही ऐसा करने में बैंक को थोड़ा-बहुत वित्तीय खतरा क्यों न उठाना पड़ रहा हो । इस संदर्भ में मुझे कोई पच्चीस वर्ष पहले का एक अनुभव याद आता है ।
घटना तब की है जब मैं विज्ञान-विषयक उच्चाध्ययन के लिए द्विवर्षीय ब्रितानी प्रवास पर था । वहां के एक विश्वविद्यालय में अपना कार्यकाल पूरा कर चुकने के बाद मुझे सपरिवार स्वदेश लौटना था । अपनी वापसी यात्रा की तैयारी के साथ मुझे अपना बैंक खाता भी बंद करना था । वापसी हवाई यात्रा के एक दिन पूर्व मैं इस कार्य के लिए बैंक की संबंधित शाखा में पहुंचा । मैंने अपनी पास बुक तथा बचे हुए अप्रयुक्त चेकों को काउंटर पर बैठी महिला कर्मचारी को सौंपा और उससे खाता बंद करके बची हुई जमा राशि लौटाने का निवेदन किया । उसने अपने कंप्यूटर पर मेरे खाते और लौटाए गये चेकों की पड़ताल की और मुझसे कहा कि मेरे चेकबुक में ऐसे दो चेक मौजूद नहीं हैं, जिनका भुगतान खाते के ब्योरे के अनुसार तब तक नहीं हुआ था । उस महिला कर्मचारी के अनुसार उन चेकों का अभी भुगतान बचा था, तदनुसार खाता बंद करने में तकनीकी दिक्कत आ रही थी ।
खाता बंद कराने में मुझे दिक्कत आ सकती है इस संभावना को ध्यान में रखते हुए मैं बैंक नहीं पहुंचा था । एक बारगी मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूं । मुझे अपनी गलती का अहसास हो आया और उसके सामने वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए मैंने अपना पक्ष रखा । वह बैंककर्मी अंदर अपने अधिकारी के पास गयी और दो-तीन मिनट में लौटकर मुझसे बोली, “हम आपकी बात पर विश्वास करते हैं, और यह मानते हैं कि बैंक को धोखा देने का आपका कोई इरादा नहीं है।
इतना कहकर उसने शेष औपचारिकताएं पूरी कीं, और मेरा खाता बंद करते हुए उसने शेष जमा राशि लौटा दी । धन्यवाद ज्ञापन के साथ मैं लौट आया । खाता बंद कराने में क्या दिक्कत थी मैं इसका खुलासा कर दूं । दरअसल मुझे मिली चेकबुक का हर चेक 50 पौंड (ब्रितानी मुद्रा) के लिए ‘गारंटीड’ था । गारंटीड का मतलब यह था कि जिस किसी को भी 50 पौंड (आज के करीब 3500 रुपये) तक की रकम का चेक काटकर दिया जाता बैंक उसको उस राशि का भुगतान अवश्य करता, भले ही संबंधित खाते में पर्याप्त धनराशि न हो । ऐसे चेक स्वीकारने में किसी को धोखे का डर नहीं रहता था, क्योंकि उसको भुगतान मिलना सुनिश्चित था । घाटा सहना बैंक का काम होता और ग्राहक से वसूलना उसका सिरदर्द । अतः उन दिनों ब्रितानी बाजारों में अनजान व्यक्ति से भी इस प्रकार के गारंटीड चेक स्वीकारने में किसी को कोई खतरा नहीं दिखता था, और चेकों द्वारा पैसे का लेनदेन एक सामान्य बात थी ।
चूंकि मैं दो चेक बैंक को नहीं लौटा सका था, अतः बैंक यह मान सकता था कि मैंने किसी को वे चेक 50-50 पौंड तक की राशि भरकर दे रखे होंगे, जिनका भुगतान तब तक नहीं हुआ था । ऐसे में बैंक 100 पौंड तक की राशि काटकर मुझे शेष जमा लौटाने की बात कर सकता था । लेकिन बैंक ने ऐसा नहीं किया और मेरे प्रति विश्वास व्यक्त करते हुए पूरी जमा राशि लौटा दी । असल में मैंने किसी को चेक नहीं दिए थे, बल्कि उन्हें पहले कभी कारणवशात् निरस्त करते हुए फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिया था । मुझे उन निरस्त चेकों को रिकार्ड के तौर अपने पास रखना चाहिए था । मेरी गलती यही थी कि मैंने ऐसा नहीं किया था ।
दूसरे दिन मैंने विश्वविद्यालय के एक अध्यापक को पूरा किस्सा सुनाया, और उससे जानना चाहा कि बैंक ने मेरे प्रति जो नरमी दिखाई उसका संभव कारण क्या रहा होगा । उसने जो बात मुझे समझाई उसके अनुसार आम तौर पर बैंक अपने अनुभवों के आधार पर यह मानकर चलते हैं कि अधिकांश ग्राहक ईमानदार होते हैं और बैंक को धोखा देने का उनका कोई इरादा नहीं होता है । वे भूल कर सकते हैं जिसे वे सुधार भी लेते हैं । बैंकों की नीति रहती है कि ग्राहक की ऐसी भूलों को तूल देकर बैंक को उनके प्रति संवेदनाविहीन व्यवहार नहीं दिखाना चाहिए । ग्राहक की बातों पर विश्वास करते हुए उसकी परेशानी हल करना व्यावसायिक कार्यकुशलता एवं व्यवहारपटुता मानी जाती है । अवश्य ही ऐसा करने में बैंक को खतरा उठाना पड़ सकता है । किंतु कभी-कभार – बहुत कम मामलों में – होता है । उन मौकों पर बैंक को जो वित्तीय घाटा हाता है, उसके लिए भी वे प्रस्तुत रहते हैं । किंतु उस संभावित घाटे से बचने के लिए वे सभी ग्र्राहकों पर अविश्वास करने लगें यह नीति उन्हें स्वीकार्य नहीं । ग्राहकों के बीच सद्व्यवहार की साख बनाये रखने के लिए ऐसे खतरे उठाने ही पड़ते हैं ।
मैं समझता हूं कि इस प्रकार की नीति के तहत ही उस बैंक अधिकारी ने मेरी बात मान ली होगी और वांछित कार्य निष्पन्न किया होगा । यदि ऐसी ही किसी स्थिति का सामना मुझे अपने देश में करना पड़ा होता, तो नियम-कानूनों का हवाला देते हुए बैंक ने कार्य-निष्पादन में असमर्थता जताई होती । इस माने में हम शायद पीछे हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

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हिंदी की दुरवस्था का एक अनुभव यह भी

मेरे मोहल्ले में बंदरों का आतंक छाया हुआ है । पहले यहां बंदर नहीं दिखाई थे, लेकिन कोई डेड़ दशक पहले उन्होंने अपने कदम यहां जो रखे तो उसके बाद लौटने का नाम नहीं लिया । तब सुना गया था कि संकटमोचन मंदिर (वाराणसीवासियों की असीम श्रद्धा का प्रतीक प्रख्यात हनुमान् मंदिर) से खदेड़े जाने पर ही उन्होंने इस मोहल्ले में शरण ली थी । कालांतर में वे इस स्थान के स्थाई बाशिंदे हो गये । आप कहेंगे बंदर तो अपने देश के प्रायः सभी शहरी इलाकों में दिखाई दे जाते हैं, आपके मोहल्ले में भी हैं तो आश्चर्य ही क्या है, न होते तब आश्चर्य होता । आप सच कह रहे हैं । जैसे आदमी गांव-देहात छोड़कर शहर में बसने चले आ रहे हैं, ठीक वैसे ही बंदर भी अपना आशियाना शहरों में खोज रहे हैं । कारण दोनों के अलग-अलग भले ही हों । खैर इन बंदरों की मौजूदगी का हिंदी से कोई लेना-देना नहीं । मुझे तो हिंदी से जुड़े एक अनुभव का जिक्र करना है, जिसका मंकी (बंदर) शब्द से संबंध अवश्य है । इसीलिए इतना कह गया । सो सुनिए उसके बारे में ।

बस दो रोज पहले की ही बात है । सुबह-सुबह मैं निकल गया अपने घर के सामने की चालीस-फुटा सड़क पर करीब सौ मीटर चलते हुए पास के मुख्य मार्ग पर दुकान से कुछ सामान लेने । लौटते वक्त आठएक साल का एक बच्चा, जो मेरे मकान के सामने ही रहता है, मुझे मिल गया सड़क के किनारे किसी का इंतिजार-सा करता हुआ । जैसे ही मैं उसके पास से गुजरा, उसने मुझे देखा और दौड़कर मेरे बगल में आ गया । मुझसे लगभग सटते हुए-सा वह मेरे साथ चलने लगा । मैं उस बच्चे को जानता तो था ही, पर कभी राह चलते उससे बात की हो या वह दो कदम भी मेरे साथ चला हो ऐसा याद नहीं पड़ता । सो उसके उस समय के बरताव से मैं कुछ चौंेका । मैंने पूछ डाला, “क्यों भई, क्या हो गया जो मेरे साथ बगल में चल रहे हो ?”

उसने सामने आगे सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, “वहां मंकी हैं, काटते हैं ।”

“मंकी हैं या बंदर ?” मैंने पूछा, जानने के लिए कि देखूं क्या जवाब देता है । सामने कुछ दूरी पर दो-तीन बंदर दिखाई दे रहे थे । मोहल्ले के बंदर कभी-कभी काटने भी दौड़ पड़ते हैं, खासकर तब जब उन्हें छेड़ा जाए । उस बच्चे का डर स्वाभाविक था और वह कदाचित् मेरे साथ खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा था ।

मेरे सवाल का जवाब उसने यों दिया, “बंदर तो हिंदी में कहते हैं, अंगरेजी में तो मंकी कहते हैं ।”

मैंने उसे टोकते हए कहा, “पर तुम तो हिंदी में बोल रहे हो, अंगरेजी में तो नहीं ।”

वह चुप रहा । उसके पास मेरे प्रश्न का शायद कोई उत्तर नहीं था । वयसा आठएक साल के उस बच्चे के पास भला क्या उत्तर हो सकता था ? कह नहीं सकता कि उसके मन में कोई विचार उठे भी होंगे । लेकिन एक चीज मैं महसूस कर रहा था । उस बच्चे के मन में स्कूली पढ़ाई यह विचार भर रही थी कि तुम्हें अंगरेजी सीखना ही नहीं, बल्कि उसे बोलना भी है । और उसकी शुरुआत अपनी रोजमर्रा की बोली में अधिकाधिक अंगरेजी शब्दों को ठूंसने से ही होगी । अंगरेती की श्रेष्ठता एवं अनिवार्यता और हिंदी की निरर्थकता के भाव उसके मन में उपजाये जा रहे होंगे ऐसा मेरा विश्वास है ।

स्थिति का समुचित आकलन करने में उस बच्चे की पृष्ठभूमि पर विचार करना आवश्यक है । बता दूं कि उसके दादा पांच भाइयों में से एक हैं । आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षिक तौर पर पिछड़े वर्ग के पांचों भाई मेरे घर के सामने छोटे तथा अतिसामान्य अलग-अलग मकानों में गुजर-बसर करते हैं । कभी इन भाइयों के बाप-दादा इस मोहल्ले की कृषि योग्य पूरी जमीन पर मालिकाना हक रखते थे । करीब पचास वर्ष पूर्व जब उनकी जमीन पर कालोनी विकसित हुई तो वे लोग जमीन के एक छोटे-से टुकड़े में सिमटकर रह गये । जमीन का जो भी मूल्य तब मिला होगा उसका सदुपयोग उनके बाप-दादा शायद नहीं कर पाये । मौजूदा पांचों भाई निपट निरक्षर हैं, अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तरह । इन भाइयों के बच्चों — जिनकी कुल संख्या बीस-पच्चीस है और जिनमें से केवल तीन-चार ही शादीशुदा तथा बाल-बच्चेदार हैं — तक अब साक्षरता पहुंच चुकी है, लेकिन मात्र प्राथमिक दर्जे की । शायद एक या दो ने हाईस्कूल तक पढ़ भी लिया है, किंतु उसके आगे नहीं । भाइयों के बाद की इस बीच की पीढ़ी के सदस्य अब स्कूली पढ़ाई के प्रति सजग हो चुके हैं । वे स्वयं भले ही अंगरेजी न जानते हों, किंतु अंगरेजी की महत्ता को समझने लगे हैं । और इसी कारण अपनी सीमित आमदनी के भीतर वे अपने बच्चों को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने के बजाय चौराहे-चौराहे पर खुल चुके आजकल के ‘इंग्लिश मीडियम’ निजी विद्यालयों में से किसी एक में भेज रहे हैं । वह बच्चा ऐसे ही किसी स्कूल से ‘बंदर’ के बदले ‘मंकी’ कहना सीख गया है ।

यह वाकया एक कटु सच को उजागर करता है । वह यह कि जैसे-जैसे अपने देश की उम्र बढ़ रही है, वैसे-वैसे अंगरेजी की जड़ें ‘इंडियन सोसाइटी’ में गहरे उतरती जा रही हैं, और हिंदी अपने ही लोगों के मध्य तिरस्कृत होती जा रही है । वाकई विचित्र है इस देश के बाशिंदों का रवैया । – योगेन्द्र जोशी

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दहेज में कार: सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल

अपने देश की विशेषता को कई जन ‘अनेकता में एकता’ जैसे वाक्यांश से व्यक्त करते हैं । वास्तव में विलक्षण है अपना देश । यह विचित्रताओं, विसंगतियों, और विरोधाभासों का धनी है । यहां परस्पर विरोधी बातें एक साथ देखने को मिल जाती हैं और सामाजिक विकृतियों की भरमार है, जिनकी आलोचना विभिन्न मंचों से की जाती रही है । फिर भी वे परंपरा के नाम पर जीवित हैं और लोगों के द्वारा खुलकर अपनाई जाती हैं । ऐसी विकृति में एक है दहेज प्रथा । दहेज लेना तथा देना, दोनों, अनुचित हैं । यदि आप सर्वेक्षण पर निकल पड़ें तो शायद ही दो-चार लोगों को पायेंगे, जो दहेज को स्वीकार्य प्रथा के तौर पर मान्यता देते हों । अधिकांश लोग इसे कुरीति कहेंगे और इसके विपक्ष में बोलेंगे, परंतु जब उनके व्यवहार पर गौर करेंगे तो ठीक इसका उल्टा पायेंगे । उनका तर्क होगा ‘क्या करें जी, इसी समाज में रहना है, जो प्रचलित है उसके हिसाब से ही चलना होगा न !’ मतलब साफ है । किसी बात को सिद्धांततः अनुचित कहना एक बात है, और उस अनुचित बात को अमल में न लाना दूसरी बात । दोनों एक साथ देखने को मिलेंगी आपको अपने हिंदुस्तान में ।

जहां तक दहेज का सवाल है, मैंने अनुभव किया है कि एक ओर इसे निंद्य तथा त्याज्य घोषित किया जाता है तो दूसरी ओर इसे सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक समझा जाता है । अक्सर देखने में आता है कि वर के माता-पिता अधिक से अधिक दहेज मिले इसकी लालसा करते हैं । संपन्न होने पर कन्या के अभिभावक भी दहेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, और ऐसा करके वे अपनी ‘हैसियत’ दिखाने की अघोषित इच्छा पूरी करते हैं । हैसियत न हो तो भी कन्यापक्ष के लोग अपनी ‘इज्जत’ के लिए अच्छे दहेज के प्रबंध में जुट जाते हैं । मतलब यह कि दहेज दोनों ही पक्षों के लिए प्रतिष्ठा की बात होती है

कदाचित् कुछ लोग यह सोचते होंगे कि प्रेम-विवाह के मामलों में दहेज का सवाल और प्रतिष्ठा की बात नहीं उठती होंगी । यदि लड़का-लड़की घर वालों की मरजी के बिना ही विवाह करने पर तुल जायें तो बात अलग है । अन्यथा वहां भी दहेज की बात उठ ही जाती है, प्रतिष्ठा के नाम पर । लेकिन प्रतिष्ठा बचाने के चक्कर में दिलचस्प एवं असामान्य कदम भी कभी-कभी लोग उठाते होंगे, यह मैं कभी सोच नहीं सकता था । लेकिन हाल की एक रोचक घटना ने मेरी धारणा ही बदल दी । उसी का ब्यौरा आगे प्रस्तुत है ।

मेरे पड़ोस में वर्षों पहले एक परिवार रहता था । उस परिवार का दस-बारह साल का एक लड़का यदाकदा मेरे पास आया करता था अपनी पढ़ाई-लिखाई के संबंध में । मैं उसकी मदद कर देता था । तब उसके तथा मेरे बीच अच्छे संबंध स्थापित हो गये थे । बाद में वह परिवार दूसरे शहर चला गया था । उस लड़के का जब कभी मेरे शहर आना होता था तो मुझसे अवश्य मिल लेता था । साल-छः महीनों में कभी फोन वगैरह से भी वह मेरे हाल पूछ लेता था । अब तो वह पच्चीस-तीस साल का नौकरी-पेशा युवक है ।

एक दिन मध्याह्न में अप्रत्याशित रूप से वह मेरे घर पहुंच गया । हमारे बीच सामान्य शिष्टाचार तथा पारिवारिक कुशलक्षेम की बातें हुईं । जिज्ञासावश मैंने उसके आने का कारण भी पूछा । उसने बताया कि वह अपने एक मित्र के विवाहोत्सव में सम्मिलित होने आया है । वैवाहिक कार्य कब और कहां होना है इत्यादि की जानकारी भी मैंने उससे लेनी चाही । बातों-बातों में उसने कहा कि उसके मित्र का विवाह दरअसल प्रेम-विवाह है । मित्र के बताये अनुसार उसके परिवार के सदस्य आरंभ में उस रिश्ते के विरोध में थे । उसकी होने वाली पत्नी के घर वाले भी इच्छुक नहीं थे, क्योंकि दोनों पक्षों में जातीय भेद था ।

मेरे परिचित उस युवक ने विस्तार से बताना आरंभ किया कि पे्रमी युगल की जिद पर कन्यापक्ष तो तैयार हो गया; आखिर लड़की की शादी का सवाल जो था । हमारे हिंदू समाज में लड़की की शादी करना कोई आसान काम तो होता नहीं; कुछ नहीं तो दहेज की समस्या उठ खड़ी हो जाती है; उसी को लेकर बात बनते-बनते अक्सर बिगड़ जाती है । कन्या पक्ष को उम्मींद थी कि हांमी भरने पर दहेज की समस्या शायद न रहे ।

उधर प्रेमासक्त युवक के घर वाले भी जात्यंतर को लेकर विवाह के विरोध में थे । किंतु इससे बड़ी समस्या उनके सामने दहेज को लेकर थी । युवक के बड़े भाई की शादी दो-तीन वर्ष पूर्व बड़े धूमधाम से हुई थी और उसमें अच्छा-खासा दहेज भी परिवार को मिला था । तब संपन्न हुए विवाह को लेकर मित्रों-संबंधियों में प्रशंसात्मक चर्चा रही थी । पर इस बार उन लोगों को डर था कि दहेज से हाथ धोना पड़ेगा और उसके साथ ही उनकी ‘प्रतिष्ठा’ दांव पर लग जाएगी । बड़े भाई के मामले में स्वीकारे गये दहेज के मद्देनजर वे लोग दहेज के विरोधी तथा सादे विवाह के पक्षधर होने का दिखावा नहीं कर सकते थे ।

प्रेमी युगल युवक के परिवार की इच्छा के विरुद्ध अदालत या मंदिर में जाकर दांपत्यसूत्र में बंध सकता था, जैसा कि बहुधा सुनने को मिलता है । लेकिन वे इतना गंभीर कदम भी नहीं उठाना चाहते थे । अतः उनके प्रयास जारी रहे । अंत में वे सफल भी हो गये, लेकिन युवक के परिवार की दहेज की मांग पूरी किए जाने की शर्त पर ।

दहेज को लेकर एक दिलचस्प बात मेरे परिचित युवक को उसके मित्र ने बताई थी । वह यह कि दहेज में एक कार की मांग मित्र के परिवार वालों ने कन्यापक्ष के सामने रख दी, और कार भी ऐसी-वैसी नहीं, बड़ी तथा थोड़ी महंगी, छः-साड़े-छः लाख तक की, उनकी प्रतिष्ठा के अनुकूल । दहेज में कार की मांग आजकल सामान्य बात हो चुकी है इस बात को समझते हुए लड़की वाले कार के लिए राजी तो हो गये, परंतु महंगी कार उनके बजट में ‘फिट’ नहीं हो रही थी । वे अधिक से अधिक चार-साड़े-चार लाख तक खर्च करने को तैयार थे, लेकिन मांग पूरी करने में डेड़-दो लाख अधिक चाहिए थे । मामला कुछ पेचीदा होने जा रहा था । जहां एक पक्ष अपनी आर्थिक सीमा का हवाला देते हुए रियायत की मांग कर रहा था, वहीं दूसरा पक्ष अपनी इज्जत दांव पर लगी देख रहा था ।

जब महंगी कार की बात दूसरे शहर में नौकरी कर रहे उस प्रेमी युवक के कान तक पहुंची तो वह थोड़ा घबड़ाया । बड़े सौभाग्य से तो उसके विवाह का संयोग बन रहा था, और अब डर लग रहा था कि बात फिर कहीं अटक न जाए । उसने लाखएक का जुगाड़ अपनी जेब से किया और अपनी प्रेमिका के माध्यम से उनकी मदद कर दी । आखिर वह उस परिवार का भावी दामाद जो था । उसने सोचा कि विपदा में मदद करने का कर्तव्य उसे विवाह से पूर्व ही निभाना आरंभ करना चाहिए । इस मदद के बारे में किसी को पता न चले यह उसने स्पष्ट कर दिया था ।

उसी दौरान लड़की के पिता द्वारा वरपक्ष को मनाने का प्रयास भी चलता रहा । लड़के के पिता इस बात पर टिके रहे कि कार तो प्रतिष्ठा के अनुरूप ही रहनी है । कुछ सोच-विचार करने के बात समस्या सुलझाने हेतु उन्होंने खुद लाख-एक की मदद करने का प्रस्ताव लड़की के पिता के सामने रख दिया । लड़की वालों को राहत मिल जाये और वरपक्ष की इज्जत भी रह जाये इससे भली बात और क्या हो सकती थी । मेरा परिचित युवक उसी मित्र के पाणिग्रहण संस्कार में शामिल होने आया था इसी बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या हुआ होगा ।

उस विवाह के बारे में इतना सब बताने के बाद उस युवक ने टिप्पणी करते हुए कहा, “चाचाजी, दहेज को लेकर बनते हुए रिश्तों का टूटना अपने समाज में कोई नई बात नहीं है । दहेज के चक्कर में विवाहिताओं के प्रताड़ित किए जाने की घटनाएं भी सुनने में आती रहती हैं । लेकिन कन्यापक्ष से लिए जाने वाले दहेज में वरपक्ष भी अपना योगदान देता हो ऐसा आपने पहले कभी सुना है क्या ?”

मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि उत्तर क्या दूं । मैंने हंसते हुए कहा, “अविश्वसनीय है यह वाकया, पर तुम कह रहे हो तो विश्वास करना ही पड़ेगा । झूठ तो मुझसे बोलोगे नहीं ।”

“विश्वास कीजिए, एकदम सच है ।” कहते हुए वह भी मेरे साथ हंस दिया । – योगेन्द्र जोशी
(अपनी जानकारी में आई एक घटना पर आधारित । यहां पर कुछ घुमा-फिराकर विवरण प्रस्तुत किया गया है, सकारण ।)

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असफल भविष्यवाणी की एक घटना

मेरे एक मित्र हैं, छात्रजीवन के सहपाठी । वैज्ञानिक विषयों में उनकी रूचि बचपन से ही रही है । ज्योतिष में उनका तनिक भी विश्वास नहीं है, यद्यपि उनके पुरखे कभी पौरोहित्य कर्म के साथ ज्योतिष का कार्य भी करते थे । लेकिन अब शायद ही कोई बचा होगा जो इस खानदानी व्यवसाय में रह गया हो । मेरे मित्र ने एक बार मुझसे ज्योतिषिक भविष्यवाणी से संबंधित एक घटना का जिक्र किया था, जो उनके कुटुम्ब में कभी घटी थी और जिसके बारे में उन्होंने अपने पिताश्री के मुख से काफी कुछ सुन रखा था । घटना कोई सौ-सवासौ वर्ष पहले की है, अर्थात् उन्नीसवीं सदी के अंत की । मित्र के पिताजी ने बताया था कि उनके दादाजी (मित्र के परदादा) ने ज्योतिषिक गणना से प्रेरित होकर ही पहले से ही विवाहित पुरुष से अपनी बेटी का विवाह सोच-समझ कर संपन्न किया था । लेकिन वही ज्योतिष उन्हें यह संकेत नहीं दे सका था कि उनकी बेटी जल्दी ही विधवा भी हो जायेगी । मित्र के द्वारा बयान किया गया किस्सा मुझे काफी रोचक लगा । हुआ क्या इसे सुनाता हूं ।

मित्र के कथनानुसार उनके परदादा एक बार अपने एक रिश्तेदार के यहां कन्यापक्ष के निमंत्रण पर वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने गये थे । रिश्तेदार के यहां पहुंची हुई बारात में उनके होने वाले दामाद भी बतौर बाराती पहुंचे थे । बारातियों और घरातियों के बीच भेंट-मुलाकातों और परस्पर परिचय की औपचारिकताओं के दौरान परदाद का अपने भावी दामाद से साक्षात्कार हो गया । भावी दामाद भी स्वयं ज्योतिष में रुचि रखते थे, अतः दोनों को बातचीत के लिए अच्छा विषय मिल गया । वार्तालाप के दौरान भावी दामाद ने अपने होने वाले श्वसुर के सामने अपनी जन्मकुंडली में ग्रहों की क्या स्थिति है इसका पूरा ब्यौरा प्रस्तुत कर दिया । मित्र के परदादा ने कुछएक क्षण की मौखिक ज्योतिषिक गणना और विचार-मंथन के पश्चात् उनको इस अहम ‘तथ्य’ से अवगत कराया कि उनके भाग्य में द्वि-विवाह का योग है । उन्होंने यह भी भविष्यवाणी कर दी कि उनकी पहली पत्नी अपनी एकमात्र संतान के साथ कालांतर में परलोकवासी हो जायेंगी ।

परदादा के भावी दामाद के लिए यह सब सुनना चिंताजनक था । ज्योतिष में गहरी आस्था के कारण वे कही गयी बातों को हंसते हुए नहीं नकार सकते थे । कदाचित् उनके अपने ज्योतिष-ज्ञान क अनुसार कथित बातों में शंका की गुंजाइश नहीं थी । मुद्दा सचमुच में गंभीर लगने लगा । दोनों ने मिलकर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि जब प्रथम पत्नी का मृत्युयोग है ही तो दूसरा विवाह कर लेना ही उचित है । और जब दूसरा विवाह करना ही है तो उसे समय पर कर लेना ही बुद्धिमत्ता होगी । बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा और बात यहां तक पहुंच गयी कि परदादा ने अपनी ही विवाह-योग्य कन्या का प्रस्ताव भावी दामाद के समक्ष रख दिया । इस प्रकार उस दिन के विवाह समारोह के अवसर पर दोनों के बीच काफी कुछ निश्चित हो गया । बाद में विवाह-प्रस्ताव की बात आगे बढ़ी और कालांतर में मित्र के पिताश्री की बुआ का पाणिग्रहण संस्कार भी संपन्न हो गया । बुआ एवं फूफा की उम्र में करीब बीस वर्ष का अंतर रहा होगा । ध्यान रहे कि तत्कालीन हिंदू समाज में प्रायः सर्वत्र कन्याएं कम उम्र में बाह दी जाती थीं, तेरह-चौदह साल या उससे भी कम उम्र में । पुरुषों की उम्र पर विशेष प्रतिबंध नहीं होता था; उनका दूसरा-तीसरा विवाह चालीस-चालीस वर्ष में होना असामान्य बात नहीं होती थी ।

विवाह के पश्चात् दो-चार वर्षों का समय ठीक से बीत गया । और फिर किसी रोग की चपेट में आकर मित्र के पिताश्री के फूफाजी की पहली पत्नी और उनके एकमात्र आत्मज की अकाल मृत्यु हो गयी । परदादा की भविष्यवाणी सच सिद्ध हो गयी । यह ज्योतिष की सफलता का एक उदाहरण था । लेकिन बात यही पर समाप्त नहीं हो गयी । कालांतर में बुआ-फूफा के एक-एककर के तीन संतानों का भी जन्म हुआ । लग रहा था समय उनके अनुकूल बीत रहा था । लेकिन फिर उनके भाग्य ने पलटा खाया और फूफाजी की भी अकाल मृत्यु हो गई । उस समय वे करीब पचास वर्ष के रहे होंगे और बुआ लगभग तीस साल की । विधवा हो चुकने पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने तीन छोटे बच्चों की समुचित परवरिश की । आगे क्या हुआ वह ज्योतिष के संदर्भ में अहमियत नहीं रखता ।

मेरे मित्र को आज तक यह समझ में नहीं आया है कि जिस ज्योतिष ने उनके परदादा को अपनी पुत्री का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न करने हेतु प्रेरित किया वही ज्योतिष उनको धोखा कैसे दे गया कि उनकी बेटी को वैधव्य का दंश झेलना पड़ा । मित्र का कहना है कि यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सही भविष्यवाणी कर पाना संभव ही नहीं है । मनुष्य केवल अनुमान लगा सकता है । अल्पकालिक अनुमान के सही ठहरने की गुंजाइश अधिक होती है, लेकिन दीर्घकालिक अनुमान के सही सिद्ध होने की संभावना अधिक नहीं हो सकती । – योगेन्द्र जोशी

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आरक्षित रात्रिकालीन रेलयात्रा और तिथि-वार का भ्रम

रेलगाड़ी से यात्रा करना कभी-कभी असामान्य अनुभव दे जाता है, ऐसे अनुभव जो कभी आनंदित कर जाता है तो कभी परेशानी में डाल देता है और कभी आपको एक नसीहत दे जातक है । चार-छः रोज पहले की एक ऐसी ही स्मरणीय घटना का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं । बात तब की है जब मैं दिल्ली से वाराणसी की रेलयात्रा शिवगंगा एक्सप्रेस नाम की गाड़ी से कर रहा था, जो संध्याकाल दिल्ली से रवाना होती है और दूसरे दिन प्रातः अपने गंतव्य वाराणसी पहुंचती है । गाड़ी रात के करीब एक बजे कानपुर पहुंचती है, जहां पर कई यात्री चढ़ते-उतरते हैं ।

जैसा आम तौर पर होता है, गाड़ी के किसी बड़े रेलवे स्टेशन पर ठहराव के समय प्लेटफार्म पर ही नहीं आरक्षित डिब्बों के भीतर भी हलचल शुरू हो जाती है । अधिकांश यात्रियों की नींद ऐसे अवसरों पर खुल ही जाती है, भले ही घनघोर निद्रा का अर्धरात्रि से अधिक का समय ही क्यों न हो । डिब्बे के भीतर की चहल-पहल और शोर-शराबे में मेरी भी नींद खुल गयी । तब मैंने देखा की अनुमानतः अधेड़ अथवा उससे कुछ कम उम्र की एक महिला अपनी शायिका (बर्थ) खोज रही हैं । मैंने अक्सर देखा है कि अधिकांश रेलयात्री यह हिसाब नहीं लगा पाते हैं कि डिब्बे के अंदर उनकी आरक्षित शायिका कौन-सी और कहां पर होनी चाहिए । उन्हें शायिका-संख्या के लिए डिब्बे की दीवालों पर लगी चिप्पियों पर गौर से नजर डालनी पड़ती है । सीधे अपनी शायिका तक पहुंचना कोई कठिन काम नहीं है, क्योंकि शायिकाएं सुनियोजित रूप से क्रमांकित रहती हैं । अस्तु, मैंने उनकी शायिका संख्या 49 (निचली) की ओर इशारा किया । उन्होंने अपना सामान वहां फर्श पर रखा और आश्वस्त होकर शायिका पर बैठ गयीं ।

कुछ ही सेकंड या मिनट भर का समय गुजरा होगा कि एक और यात्री वहां पहुंचा, तकरीबन पैंतीस वर्ष का युवक । उसने भी उसी शायिका (संख्या 49) पर अपने आरक्षण का दावा पेश किया । दोनों के पास आरक्षण का टिकट था और दोनों ही का ही दावा था कि उसी शायिका पर उनका आरक्षण है । दोनों भ्रमित थे और अपने-अपने दावे को सही बता रहे थे । यह जरूर था कि महिला का आरंभिक आरक्षण प्रतीक्षा संख्या 1 के साथ हुआ था, और उसके कथनानुसार पहले दिन पूर्व ही शायिका संख्या 49 के आबंटन के साथ ही उसके आरक्षण की पुष्टि (कंफर्मेशन) हो गयी थी । मेरी जानकारी के अनुसार प्रतीक्षा सूची के यात्रियों के आरक्षण की पुष्टि भले ही बाद में हो जाए, किंतु किसको कौन-सी शायिका मिलेगी यह आरक्षण-चार्ट बनते समय ही नियत होता है । तब उस महिला को कैसे यात्रा से एक दिन पहले ही शायिका संख्या की जानकारी मिल गयी यह प्रश्न मेरे लिए अनुत्तरित था । हो सकता है मेरी जानकारी सही न हो । खैर, मैंने उन दोनों के बीच की समस्या में अपने को उलझाने की जरूरत नहीं समझी । गनीमत की बात यह रही कि दोनों आपस में नहीं झगड़े, बल्कि दोनों ने संचालक (कंडक्टर) का इंतजार करना या उसको खोजना ही मुनासिब समझा ।

अब तक गाड़ी कानपुर स्टेशन छोड़ चुकी थी । कुछ ही मिनटों के पश्चात् डिब्बे में नये प्रविष्ट यात्रियों के टिकटों की पड़ताल करते हुए कंडक्टर वहां पहुंचा । दोनों यात्रियों ने शायिका संबंधी समस्या उसके समक्ष रखी । एकबारगी वह भी चकरा गया । उसके पास उपलब्ध आरक्षण सूची में उस महिला का कहीं नाम नहीं था । उसके टिकट पर प्रतीक्षित ही तो लिखित था । फलतः उसने उस युवक को सूची के अनुरूप शायिका सोंप दी । महिला बार-बार जोर डाल रही थी कि रेलवे अंतरजाल (इंटरनेट) पृष्ठों के अनुसार उसे आरक्षण मिल चुका था । कंडक्टर “अच्छा देखते हैं” कहते हुए उस समय आगे बढ़ गया । इस बीच महिला ने अपने घर मोबाइल से भी बात की और वहां से जवाब मिला कि आरक्षण तो होना ही चाहिए । तो गड़बड़ कहां हुई ? महिला की बातों से लग रहा था कि वह झूठ नहीं बोल रही थी । अवश्य उसे और उसके घर वालों को धोखा हो गया था । सच पूछें तो उस मामले से मेरा कोई वास्ता नहीं था, फिर भी मुझे जिज्ञासा हो रही थी कि जानूं माजरा क्या है ।

अंत में घूम-फिरकर कंडक्टर दुबारा वहां पहुंचा । उसने महिला के टिकट पर एक बार फिर से नजर दौड़ाई । पहली नजर में टिकट ठीक ही लग रहा था । तब आरक्षण सूची में उसका नाम क्यों नहीं है इसे शायद वह भी नहीं समझ पा रहा था । उसने टिकट पर की एक-एक प्रविष्टि को दुबारा गौर से देखना आरंभ किया । ‘यात्रा की तिथि’ पर पहुंचते ही माजरा उसके समझ में आ गया । उसने साश्चर्य महिला से कहा, “बहिनजी, आपकी ट्रेन तो कल ही जा चुकी है । इस पर तो 23 की तारीख (शुक्रवार) अंकित है, और आज 24 तारीख (शनिवार) है । यह टिकट तो अब वैलिड ही नहीं है ।” इस जानकारी से महिला चौंक उठी और बोली, “यह भला कैसे हो सकता है ?” कंडक्टर ने पूरी बात महिला को समझाई । आगे क्या हुआ होगा, आप अंदाजा लगा सकते हैं । महिला अब कुछ कर नहीं सकती थी, उसे तो यात्रा पूरी करनी ही थी । हमारे समाज की ‘आदर्श मानवीय’ परंपरानुसार कुछ लेन-देन हुआ, और उसके गंतव्य तक की यात्रा की व्यवस्था कर दी गयी ।

उस पूरे वाकये के दौरान मेरी नींद उचट गयी थी । डिब्बे के बल्बों को बुझा दिये जाने के बाद मैंने फिर से सोने की चेष्टा की । मैं इस पर विचार करने लगा कि क्यों 23 तारीख के आरक्षण के बावजूद वह महिला 24 को यात्रा करने निकल पड़ी । किस भ्रम में वह और उसके घर के सदस्य यात्रा की असल तिथि भूल गये । इसका रोचक कारण मेरे समझ में आ गया । असल बात यह है कि भारतीय परंपरा में नयी तिथि तथा नये दिनवार की शुरुआत सूर्योदय के साथ मानी जाती है । जब मनुष्य रात की नींद के बाद सुबह उठता है तो उसे एक नये दिन के आरंभ होने की स्वाभाविक अनुभूति होती है, और उस नये दिन से वह सहज रूप से नई तिथि भी जोड़ लेता है । लेकिन जिस ‘कलेंडर’ को वैश्विक स्तर पर अब अपनाया जा चुका है, उसके अनुसार अर्धरात्रि के समय (24:00 बजे) अगली तारीख और अगला वार क्रमानुसार आरंभ हो जाते हैं । घड़ी से अर्धरात्रि के आगमन का पता चल जाता है और यदि व्यक्ति सचेत रहे तो एक नये दिन के आरंभ को भी वह मान लेता है । किंतु अर्धरात्रि कोई ऐसा एहसास नहीं दिलाती है जिससे एक नयी तारीख की अनुभूति होवे । वस्तुतः हम पूरे रात की तारीख दिन तथा संध्याकाल की सततता के रूप में देखने के आदी होते हैं । ऐसे में रात्रि के बारह बजने के बाद भी अपरिवर्तित तारीख की भूल कर बैठते हैं । पूरी रात को एक ही तारीख से जोड़कर देखना सामान्य भूल होती है । उस महिला को यह ध्यान ही नहीं रहा होगा कि 23 तारीख का 01:00 बजे का समय वास्तव में 22 तारीख की अर्धरात्रि के 24:00 बजने के घंटे भर बाद आ जाता है, न कि 23 तारीख के पूरे दिन बीतने के बाद की अर्धरात्रि के बाद । रात्रिकालीन तारीख के बारे में भ्रम कई लोगों में देखा जाता है । वास्तव में जो सावधानी बरतने के आदी होते हैं वे उपर्युक्त रात की तारीख को 22-23 की रात्रि कहकर स्पष्ट करते हैं । उस महिला ने गलती यह कर डाली कि 23 तारीख की 01:00 ए.एम. को 23-24 की अर्धरात्रि के बाद का समय मान बैठी ।

उक्त घटना में यह संदेश निहित है कि अर्धरात्रि के बाद की यात्र के समय तथा दिनांक पर सावधानी से विचार करना आवश्यक है, अन्यथा उपरिवर्णित घटना के समान ही बहुत कुछ अनुभव करना पड़ सकता है । – योगेन्द्र जोशी

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परपीड़ाजनित आनंदलाभ

आनंदित अनुभव करने के कई मार्ग हैं इस संसार में । कुछ लोग विभिन्न तरीकों से दूसरों की मदद करके सुखानुभूति प्राप्त करते हैं, तो कुछ अन्य औरों को अड़चन या कष्ट में डालकर खुशी महसूस करते हैं । दूसरों को कष्ट में देखकर जो सुख मिलता है उसे अक्सर सादवाद या सैडिज्म् कहा जाता है । शब्द सादवाद को एक फ्रांसीसी लेखक एवं सैनिक, मार्कस द साद, से जोड़ा जाता है, जिसने खुले तौर पर इस विकृत मानसिकता के साथ अश्लील साहित्य लिखा था । हमारे दैनिक जीवन में यदा-कदा सादवाद की घटनाएं घटती रहती हैं । मुझे एक घटना का स्मरण अक्सर हो आता है ।

बात तब की है जब मैं अपने विश्वविद्यालय में अध्यापक के तौर पर नया-नया नियुक्त हुआ था । मेरे संबंध तब वरिष्ठ सहकर्मियों से कम और हमउम्र शोधछात्रों से अधिक थे । शीघ्र ही मेरी अपने विभाग में प्रायः सभी शोधछात्रों से निकट-परिचय अथवा मित्रता हो गयी थी और उनके साथ ही उठना-बैठना अधिक होने लगा था ।

एक बार उनमें से एक मित्र किसी कार्य से रेलवे-स्टेशन के पास गये थे । लौटते समय उन्होंने स्टेशन के पास जाकर लौटने के लिए बस ली और सीधे विश्वविद्यालय में अपने विभाग आ गये । विभाग में प्रवेश करते समय जब उन्हें मेरे बैठने-पढ़ने का कमरा खुला दिखा तो वे सीधे मेरे कमरे में आ गये । मैंने उनसे अपने सामने की कुर्सी पर बैठने का अनुरोध किया और पूछा “क्यों भई, कहां से आ रहे हो इस समय ?” ।

वे कहां और क्यों गये थे यह सब बताने के बाद उन्होंने कहा, “मजा आ गया आज मियां-बीवी के एक जोड़े को बेवकूफ बनाकर ।”

घटना का विवरण जानने की मेरी उत्सुकता देख उन्होंने आगे बताना आरंभ किया, “हुआ ये कि मैं स्टेशन के पास सिटी-बस में बैठ गया । मेरे बाद उस बस में एक दक्षिण-भारतीय प्रौढ़ दम्पती भी दाखिल हुआ । पति-पत्नी का वह जोड़ा मेरी बगल की सीट पर बैठ गये । वे तीर्थयात्री लग रहे थे और हिंदी नहीं समझ पा रहे थे । मुझे देख उन्हें शायद लगा होगा कि मैं अंग्रेजी में उनसे बात कर सकता हूं । उनके पूछने पर मैंने उन्हें बताया कि मैं विश्वविद्यालय जा रहा हूं । तब उन्होंने मुझे बताया कि वे विश्वविद्यालय परिसर के विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने जा रहे हैं । तत्पश्चात् रास्ते में बीच-बीच में उनसे मेरी दो-चार बातें भी हो गयीं । जब हमारी बस विश्वविद्यालय गेट पर पहुंची तो गेट का ढांचा देख उन्हें लगा कि वे विश्वनाथ मंदिर के पास पहुंच गये हैं । उन्होंने मुझसे अंग्रेजी में पूछा कि क्या मंदिर आ गया है । और मैंने हां कहते हुए उन्हें वहीं उतरने की सलाह दे डाली । अब पैदल रूट-मार्च करते हुए जा रहे होंगे वे मंदिर ।”

मैंने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह उन्होंने ठीक नहीं किया । दरअसल विशाल परिसर वाले विश्वविद्यालय के प्रवेशद्वार से विश्वनाथ मंदिर करीब दो किलोमीटर होता है । उन दिनों स्टेशन से आने वाली बस मंदिर तक जाती थी और वह दम्पती वहां तक सरलता से पहुंच सकता था । अवश्य ही उन्हें परेशानी हुयी होगी, पर मेरे मित्र को उनकी परेशानी की कल्पना से आनंद मिल रहा था । – योगेन्द्र

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