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न जाने उसके क्या हाल होंगे!

हाल ही में मुझे अपने घर के दरवाजों-पल्लों की मरम्मत संबंधी छोटे-मोटे काम करवाने थे । मैंने अपनी कालोनी के आसपास ही रहने वाले एक बढ़ई से संपर्क साधा । वह सुबह-शाम घर पर आकर कार्य संपन्न करने को तैयार हो गया । तदनुसार वह रोज ही दो-एक घंटे काम कर जाता था । अपने साथ वह किसी सहायक को नहीं लाता था, अतः जहां कहीं जरूरत होती मुझे ही उसकी मदद करनी पड़ रही थी । उसके साथ कार्य करते समय मैं उससे आम चर्या की बातें भी कर लेता था ।

इसी दौरान एक दिन मैंने उससे उसके बालबच्चों के बारे में पूछ लिया । उसने बताया, “सा’ब, मेरे तीन बच्चे हैं, दो लड़कियां और सबसे छोटा एक लड़का ।”

बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछे जाने पर उसने कहा, “सा’ब, बड़ी लड़की गूंगी-बहरी है, इसलिए उसके स्कूल जाने का सवाल ही नहीं । दूसरी लड़की +2 में पढ़ रही है । तीसरा स्कूल ही नहीं जाता । क्या करें कहना नहीं मानता और दिन भर मुहल्ले के आवारा लड़कों के साथ अपना समय जाया करता है । मैंने उसे अपने साथ काम पर लगाने की कोशिश की कि कुछ सीख लेगा और अपनी रोजी-रोटी कमाने लगेगा । लेकिन वह किसी की सुनता ही नहीं ।”

बड़ी लड़की के बारे में उसने बताया कि वह कहीं खो गयी है । मेरे यह पूछने पर कि कब और कैसे गायब हुई, उसने बताया, “दो साल पहले इसी विजयादशमी के मौके पर वह मोहल्ले के लोगों के साथ डीएलडब्ल्यू परिसर में रावणदहन देखने चली गयी, जहां उन लोगों का साथ छूट गया । गूंगी बहरी वह किसी को कुछ बता ही नहीं पाई होगी ।”

अपना दुखड़ा सुनाते-सुनाते उसने आगे कहा, “उसको खोजने में मेरे लाख-एक का खर्चा भी हो गया, लेकिन वह मिली नहीं । इधर किसी ने बताया है कि भदोही में एक ज्योतिषी जी रहते हैं, जो खोए हुए आदमी के बारे में सटीक बता देते हैं । कल उनके पास भी जाने की सोच रहा हूं । शायद लड़की का कुछ पता चले ।”

और दूसरे दिन वह भदोही भी हो आया । अगली सुबह मेरे काम पर आने पर उसने कहा, “सा’ब, ज्योतिषी जी ने बताया है कि मेरी लड़की चुनार में किसी भले मानुष के घर पर सकुशल रह रही है । अब एक चक्कर वहां का भी लगाना है ।”

फिर दोएक रोज के बाद वह चुनार भी हो आया । अगले दिन उसने चुनार तक हो आने की बात बताई और कहा कि वहां भी लड़की का कुछ पता नहीं चला । मैंने उससे जानना चाहा, “क्या आपने कभी पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई ? उन्होंने मदद का आश्वासन दिया क्या ?

उसने कहा, “पुलिस कहां हम गरीबों की सुनती है, सा’ब । कह दिया जाकर खुद ही खोजो । हम रोज कमाकर पेट पालने वाले लोग हैं । काम छोड़ कहां-कहां जाएं और कितने-कितने दिन के लिए जाएं ?”

उस दिन उसके चले जाने के बाद मैं सोचने लगा कि भारत वाकई अजीब देश है । यहां पुलिस आम लोगों की मदद के लिए नहीं होती । अगर रसूखदार आदमी का कुत्ता भी गायब हो जाए, तो पूरा पुलिस बल उसे खोजने निकल पड़ता है । किंतु किसी साधारण आदमी के घर का सदस्य खो जाए, तब वह भुक्तभोगी को दुत्कार कर भगा देती है । इस जमाने में तो संचार-प्रसार के सक्षम माध्यम मौजूद हैं, और किसी की भी तस्वीर का प्रसारण करके गुमशुदा व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है । फिर भी पुलिस की उदासीनता और अक्षमता के चलते आम जन को कोई मदद नहीं मिल पाती है ।

उस रात मेरे दिलो-दिमाग में उस लड़की को लेकर एक सवाल रह-रहकर उठने लगा । न जाने क्या हाल होंगे उस लड़की के । वह जिंदा तो होगी ही, क्योंकि मौत आसानी से आती नहीं । आदमी में जिजीविषा की भावना बहुत प्रबल होती है । वह मांग-मूंगकर भी पेट भर लेता है और जिंदा रह पाता है । लेकिन एक लड़की होने के नाते वह बेहद असुरक्षित अवश्य होगी । मुझे लगने लगा कि अब तक उसके साथ कोई न कोई जरूर बलात्कार कर चुका होगा । हो सकता है किसी पुलिस वाले ने ही उसे अपना शिकार बनाया हो । भरोसा नहीं पुलिस का ! आखिर इस संसार में मानव भेड़ियों की कोई कमी थोड़े ही है । और …, और वह गर्भवती भी हो चुकी होगी । अब तो दो साल बीत चुके हैं । क्या पता इस बीच उसने किसी मासूम को जन्म भी दे डाला हो, जिसे गोदी में लेकर वह दर-दर ठोकर खा रही हो । भला उसे किसने शरण दी होगी, किसने उसकी मदद की होगी ? ऐसी तमाम संंभावनाएं मेरे विचारों में छाने लगीं ।

… जिंदगी की वास्तविकता कभी-कभी बड़ी डरावनी लगती है मुझे । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी –
भदोही’ वाराणसी के नजदीक एक छोटी-सी नगरी एवं जिला मुख्यालय है जो कालीन व्यवसाय के लिए विख्यात है । ‘चुनार’ वाराणसी से सटे मिर्जापुर जिले का एक कस्बा है जो सस्ते प्रकार के चाइना क्ले के बने कप-प्लेटों तथा सजावटी सामानों के लिए जाना जाता है । वहां एक किला भी है ।

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हिंदी के जहाज से उतर, अंग्रेजी की नाव पर जा बैठ

अपने लोग कभी-कभी इस बात पर गर्वान्वित-से दिखते हैं कि अपनी भाषा हिंदी – ‘इंडिया दैट इज भारत’ की राजभाषा – विश्व की दूसरी-तीसरी सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है । यह बात शायद सही हो, लेकिन यह तो सच है ही कि यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में सर्वाधिक तिरस्कृत है । कोई भी ‘हिंदीभाषी’ व्यक्ति जो अंग्रेजी पढ़ने-लिखने से परिचित हो चुका हो इसे आम जनों के साथ बोलचाल के लिए मजबूरन प्रयोग में लेता है, अन्यथा उसकी प्राथमिकता तो अंग्रेजी ही रहती है, जो देशवासियों की नजर में श्रेष्ठ एवं उपयोगी भाषा ही नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार एवं द्योतक भी है । आप अंग्रेजी जानते हुए भी हिंदी ही प्राथमिकता के साथ प्रयोग में लेते हों इसकी उम्मीद आम तौर पर नहीं की जा सकती है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही है । मैं ऐसे ही एक ताजे अनुभव की बात करता हूं ।

दो-तीन दिन पूर्व मैं सपत्नीक दो-तीन सप्ताह के नई दिल्ली प्रवास के बाद वापस अपने शहर वाराणसी आ रहा था । मुरादाबाद होकर चलने वाली काशी-विश्वनाथ नाम की गाड़ी के आरक्षित डिब्बे में हमारे बर्थों (शायिकाओं) के पास खिड़की से सटी बर्थ एक युवती के नाम थी । वह युवती गाजियाबाद के किसी तकनीकी संस्थान में अध्ययन कर रही है यह बात बाद में दो-तीन अन्य युवा यात्रिकों, जो स्वयं भी तकनीकी विषयों के छात्र थे, के साथ उसके वार्तालाप से मुझे ज्ञात हो गयी । मतलब यह है कि उनके छात्र होने का अनुमान मैंने उनकी आपसी बातचीत के आधार पर लगाया था ।

हमारे उस डिब्बे में मुरादाबाद स्टेशन पर एक सज्जन भी सवार हुए । उनकी बर्थ हम लोगों के ही अगल-बगल थी । साथी यात्रिकों से उनकी बातों से स्पष्ट हो गया था कि वे बीएचयू (पूर्व में मेरा कार्यस्थल) में अध्यापक हैं और मेरठ में आयोजित एक वैज्ञानिक गोष्ठी में भाग लेकर वाराणसी लौट रहे हैं ।

रेलगाड़ी के मुरादाबाद स्टेशन से आगे बढ़ने के कुछ मिनटों बाद उन अपेक्षया नवागन्तुक यात्री ने उस छात्रा से यह जानना चाहा कि वह क्या करती है और कहां जा रही है । केवल उसी छात्रा में उनकी दिलचस्पी क्यों जगी थी यह मैं समझ नहीं सका । खैर, जैसा कि उम्मीद की जाती है उन दोनों के बीच की आरंभिक बातचीत सामान्य हिंदी में ही हुई । किंतु जैसे ही उन सज्जन को यह अहसास हुआ कि वह युवती तकनीकी विषय की छात्रा है, और तदनुसार अंग्रेजी भाषा के प्रयोग से सुपरिचित है, तो वे हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आये । उन दोनों के बीच चंद मिनटों की बाद की वार्ता अंग्रेजी में ही संपन्न हुई । मुझे याद आता है कि उन्होंने अपनी निकटता दर्शाने के लिए छात्रा को कुछ ‘स्नैक्स’ भी अर्पित किए जिन्हें उसने विनम्र भाव के साथ अस्वीकार कर दिया था ।

मैं उस वार्तालाप में भागीदार नहीं था और अपनी सीट पर बैठे अखबार के पन्ने कुछ यूं उलट-पलट रहा था कि गोया मैं उस वार्तालाप से अनजान, था या उसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी । किंतु बाहरी तौर पर अनभिज्ञ-सा बना मैं वस्तुतः पूरे वाकये पर गौर कर रहा था । मेरे लिए उनकी बातचीत के असली विषय की कोई अहमियत नहीं थी । उस समय जो बात मेरी दृष्टि में अहम थी और जो मुझे खटक रही थी वह थी उनका हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आना । दोनों हिंदी जानते थे, और मुझे पक्का विश्वास है कि दोनों की मातृभाषा – भले ही कहने भर को ही मातृभाषा हो – हिंदी ही रही होगी ।

उस समय मैं सोचने लगा कि आखिर वह कौन-सी मजबूरी रहती है जिसके कारण एक हिंदीभाषी अन्य हिंदीभाषी के साथ भी हिंदी में बात करने से कतराता है, और तुरंत ही अंग्रेजी को वरीयता देते हुए उसमें बतियाने लगता है । कोई व्यक्ति अन्य भाषाभाषियों के साथ भी पहले हिंदी में प्रयास करे और काम न चलने पर ही अंग्रेजी का प्रयोग करे तो यह बात मेरे समझ में आती है । किंतु अपने देश में हाल उल्टे ही लगते हैं । यहां तो अजनबियों के साथ अंग्रेजी में बात करना अंग्रेजी पढ़े-लिखे अनेकों लोगों की प्राथमिकता रहती है । क्या इस मानसिकता से हम भारतीय कभी मुक्त हो पाएंगे यह प्रश्न मेरे मन में शेष यात्रा के दौरान उठता रहा ।

और अपने घर पहुंचने पर मैंने जब खुद की अनुपस्थिति में इकट्ठी हुई डाक पर नजर डाली तो उसमें एक निमंत्रण-पत्र मिला, जिसका विषय था हमारे एक पड़ोसी की पोती का जन्मदिन, जो इस बीच मनाया जा चुका था । निमंत्रण-पत्र था ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले एक पड़ोसी परिवार का, जिससे जुड़े लोगों के लिए – मुझे पूरा विश्वास है – अंग्रेजी आज भी कमोबेश अनजान भाषा होगी । नवजात बच्ची के दादा से पहले की पीढ़ियां अनपढ़ या अल्पशिक्षित रही होंगी ऐसा सोचता हूं मैं । अवश्य ही अब ‘फॉरेन’ अनुभव वाले बच्ची के कंप्यूटर इंजीनियर ‘पापा’ को अब हिंदी से परहेज और अंग्रेजी से लगाव हो गया होगा ।

उपर्युल्लिखित अनुभव मेरे लिए नये नहीं हैं । हिंदी से जुड़े ऐसे अनुभव मुझे आए दिन होते रहते हैं, और हर बार हिंदी को लेकर हिंदीभाषियों में व्याप्त कुंठा मेरे चिंतन का विषय बन जाता है । मुझे लगता है हिंदी एक जहाज की तरह है जिसमें जहां-तहां सुराख हो गये हों, जिनसे रिसता हुआ पानी उसे डुबाए जा रहा हो । लेकिन उस भाषा के प्रति लगाव रखने वाले और उसे बचाए रखने को समर्पित अभिमानी कुछ गिने-चुने देशवासी उस पानी को उलीच कर हटाने और जहाज को बचाने की जुगत में लगे हैं । डुबाने को तत्पर रिसाव और उससे लड़ रही ताकतें परस्पर संघर्षरत हैं । वस्तुस्थिति की गंभीरता को भांपते हुए ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, जो हिंदी के उस जहाज को छोड़ अंग्रेजी की नाव पर चढ़कर सुरक्षित हो चुकने का सुख पा रहे हैं । वर्तमान परिस्थिति में वही बुद्धिमान समझा जा रहा है जो हिंदी का जहाज छोड़ झट-से अंग्रेजी-नाव की ओर लपक रहा हो ।  योगेन्द्र जोशी

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जानते नहीं मैं कौन हूं?

सूर्यास्त हो चुका है, लेकिन अभी काफी रोशनी चारों ओर फैली हुई है । बरसात का मौसम है, फिर भी आसमान साफ है । कहीं-कहीं हल्के नारंगी से गहरी ललाई की ओर बढ़ रहे बादलों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं । इस सांध्य वेला पर मैं दो-एक सब्जियां खरीदने घर के पास के मुख्य मार्ग की दुकानों की ओर चला जाता हूं । प्रायः सभी दुकानें मेरी जानी-पहचानी हैं । वर्षों से वे लोग सड़क के किनारे जमीन पर सब्जियों की ढेरी लगाकर बेचते आ रहे हैं । मैं कभी एक से तो कभी दूसरे से सब्जियां खरीद लेता हूं । मैं यहां अक्सर पूर्वाह्न आठ-नौ बजे आता हूं, जब आसपास के गांवों के किसान अपना माल वहां बेचने आते हैं, किंतु कभी-कभार सायंकाल भी मेरा आना हो जाता है ।

मैं एक दुकान पर आकर रुक जाता हूं । सब्जी-विक्रेता एक किनारे बैठा है । आज उसकी जगह उसका किशोरवय बेटा – मेरे अनुमान में बेटा – काम संभाल रहा है । निकट भविष्य में उसे ही तो रोजी-रोटी के इस ‘खानदानी’ धंधे को संभालना है । लगता है अभी प्रशिक्षण ले रहा है । पहले कभी उसे मैंने नहीं देखा था । अभी वह एक गााहक के लिए सब्जी तौल रहा है । गाहक खुद ही एक किशोर है, बहुत हुआ तो उन्नीस-बीस साल का होगा, अधिक नहीं । वह लड़का चुन-चुनकर टमाटर तराजू पर रखता जाता है और साथ ही उनका विक्रय मूल्य पूछता है, “क्या हिसाब हैं टमाटर ?”

“आठ रुपये पाव, तीस रुपये किलो ।” किनारे बैठे सब्जी वाला जवाब देता है ।

“सात रुपये पाव लगाओ ।”

“नहीं, इतने में हमें पड़ता नहीं । आजकल सभी सब्जियों के दाम चढ़े हैं ।”

अब तक तौले जा चुके उन टमाटरों को वह किशोर गाहक लेने से मना कर देता है, और उठकर वहां से चलने के लिए अपनी साइकिल पर सवार होने लगता है । सब्जी-विक्रेता बड़बड़ाने लगता है, “चले आते है सौदा लेने; लेना-वेना कुछ है नहीं गाहक बने चले आते हैं ।”

वह गाहक लगता है नया ही है । रोजमर्रा का होता तो सब्जी वाला इतनी रुखाई से पेश न आता । उसके शब्द उस लड़के के कान में पड़ते हैं । उससे भी रहा नहीं जाता है । अब तक अपनी साइकिल पर चढ़ चुका वह लड़का ठिठककर रुक जाता है । दोनों के बीच नोक-झोंक शुरु हो जाती है । बात थमती-सी नहीं नजर आती है; लड़के के अहम को ठेस जो लग चुकी होती है । आजकल बात-बात पर लोगों का खून खौलने लगता है, खास तौर पर किशोरों-नौजवानों का । तैश में आकर वह लड़का विक्रेता को चुनौती दे डालता है, “जानते हो मैं कौन हूं ?”

सब्जी वाला भी पीछे नहीं रहता है, “हर आने-जाने वाले को जानने का ठेका नहीं ले रखा है हमने । बहुत देखे हैं तुम्हारे जैसे । क्या समझते हो अपने आप को ?”

“अच्छा तो जानते नहीं हो न मैं कौन हूं ? ठीक है बताता हूं ।”

अभी तक मैं उस तमाशे को देख रहा होता हूं । मैं सब्जी वाले के रूखे व्यवहार को उचित नहीं कह सकता । लेकिन मुझे उस लड़के का रवैया ज्यादा खल रहा था । उसके लिए सब्जी वाला तो एक बुजुर्ग ही था, हो सकता है उसके अपने मां-बाप के उम्र का हो । उसको कुछ तो लिहाज करना चाहिए था । और “जानते नहीं मैं कौन हूं” जैसे शब्दों से मुझे सख्त चिढ़ है । मर्यादाओं-शिष्टाचारों को ताक पर रखते हुए अपनी ताकत जताने का लोगों के बीच आजकल फैशन चल चुका है । मैं उस लड़के को टोक देता हूं, “बेटा, यहां अपने यार-दोस्तों को इकट्ठा करके झगड़ा-फसाद करोगे क्या ? माना कि तुम्हारी पहुंच बहुत ऊपर तक है, तो क्या ऐसा करना ठीक है ?”

वह मेरी बात सुनता है । उसकी कोई अशिष्ट प्रतिक्रिया नहीं होती है । “ठीक है, अंकल जी ।” कहते हुए वह आगे बढ़ जाता है ।

मैं इच्छित सब्जियां खरीदकर लौट अता हूं । रास्ते भर मैं यह प्रश्न स्वयं से पूछता हूं कि हम अपने जीवन में संयत-संयमित व्यवहार क्यों नहीं अपना पाते हैं । मुझे कोई उत्तर नहीं सूझता । – योगेन्द्र जोशी

अंत में एक तस्वीर:

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प्रतिष्ठा का सवाल: खरीदारी महंगी कार की

प्रदर्शन की लालसा या प्रवृत्ति प्रायः हर मनुष्य के व्यक्तित्व का एक खास पहलू होता है । मैं इसे एक हानिकारक कमजोरी के रूप में देखता हूं, क्योंकि मानव समाज की कई समस्याओं का मूल इसी में देखा जा सकता है । उदाहरणार्थ, हमारे समाज में संपन्न व्यक्तियों के यहां तड़क-भड़क के साथ विवाह रचे जाते हैं, दूसरों को अपनी हैसियत और दौलत दिखा-दिखाकर । देखा-देखी में अन्य लोग भी ऐसे ही प्रदर्शन के चक्कर में पड़ जाते हैं, भले ही उनकी हैसियत कमतर हो । ऐसे मौकों पर धन की जो बरबादी होती है उसका समाजोपयोगी कार्यों में निवेश हो सकता है, किंतु ऐसा होता नहीं है ।

कम ही लोग होते हैं, जो इस प्रवृत्ति से मुक्त हों, संस्कारवश अथवा आत्मसंयम के द्वारा । जो लोग ऊपरी तौर पर दिखावे की मानसिकता से मुक्त दिखते हैं उनमें अधिकतर वे होते हैं जिनके पास इतना कुछ नहीं होता है कि प्रदर्शन कर सकें; उनकी मजबूरी होती है । दिखावे की बात में बहुत कुछ शामिल हो सकता है; जो कुछ भी आपके पास हो, और जो सामान्यतः कम ही लोगों के पास हो । जैसे औरतों के मामले में दैहिक सौंदर्य तथा आकर्षक आभूषण । पुरुषों के लिए लंबी-चौढ़ी, गठी हुई काया । गोरापन तो सबके लिए ही आकर्षण की चीज है । जो किसी कला में विशेष रूप से पारंगत होता है, वह मन ही मन यह सोचकर प्रमुदित होता है कि अन्य जन उस कला को ईर्ष्या की दृष्टि से देखते हैं । जिसके पास विशेष बौद्धिक क्षमता होती है वह भी अपनी तेज बुद्धि प्रदर्शित करने के अवसर नहीं छोड़ता है । हर चीज का प्रदर्शन हर समय, हर जगह, संभव नहीं होता है । परंतु एक चीज है जिसके प्रदर्शन के अवसर नहीं खोजने पड़ते हैं, वह है धन-संपदा, दौलत । और यह प्रदर्शन है जिसने आज के जमाने में अन्य सब चीजों को पीछे छोड़ दिया है । आपके रहन-सहन के स्तर पर तो लोगों की दृष्टि न चाहते हुए भी पड़ ही जायेगी । आप सड़क पर ऐसी कार में बैठकर निकलें जिसके टक्कर की पूरे मुहल्ले या इलाके में इक्का-दुक्का ही हो तो भला किसकी नजर आपकी संपन्नता पर नहीं पड़ेगी, कौन आपकी दौलत का कायल नहीं होगा ?

दिलचस्प बात तो यह है कि प्रदर्शन का रोग व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि इसकी चपेट से समाज के विभिन्न समुदाय और राष्ट्र भी नहीं बचे हैं । विश्व के संपन्न एवं सक्षम देश उन मौकों को हाथ से नहीं जाने देते हैं, जब वे दूसरों को मूक शब्दों में कह सकें कि देखा हम तुमसे कितना आगे हैं । ऐसे प्रदर्शनों को स्वस्थ और प्रतिष्ठात्मक माना जाता है । लेकिन जब प्रतिष्ठा के नाम पर प्रदर्शन करने के चक्कर में हम अपनी प्राथमिकताओं को ही भूल जायें, तब उसे क्या बुद्धिमत्ता कहेंगे ? निश्चय ही हम सबका उत्तर एक जैसा नहीं रहेगा; सोच अपनी-अपनी ।

खैर, बहस को लंबा खींचने की आवश्यकता नहीं है । इन बातों के माध्यम से मैं भूमिका बांध रहा था दिखावे के एक वाकये का जिक्र बयान करने के लिए । कोई तीन-चार साल पहले की बात है यह, सुनिए: मेरे एक परिचित हैं, पेशे से बैंक अधिकारी और ऋण लेन-देन के मामलों को जानने-समझने वाले । एक दिन वे मुझसे मिलने आए थे । अन्य बातों के अतिरिक्त पारिवारिक जनों की कुशल-क्षेम की बातें भी हमारी बातचीत का एक हिस्सा थीं । उनके छोटे भाई का जिक्र छिड़ने पर उन्होंने उसके प्रति अपनी नाखुशी और खिन्नता मेरे समक्ष कर व्यक्त कर दीं । उन्होंने बताया कि पेशे से चिकित्सक उनका छोटा भाई अब दिल्ली जैसे महानगर के एक निजी अस्पताल में कार्यरत है । उसका वेतन अच्छा है, किंतु इतना अधिक नहीं है कि बिना सोचे-समझे अनाप-शनाप खर्च करने के लिए पर्याप्त हो । वे बोले कि आजकल डाक्टरी पेशे में सुस्थापित होने में ही कई वर्ष लग जाते हैं । हर आदमी को व्यावसायिक जीवन के आरंभिक वर्षों में अपनी प्राथमिकताओं को सोच-विचार कर तय करना चाहिए और हिसाब-किताब लगाकर ही अपनी आमदनी को विभिन्न मदों पर खर्च करना चाहिए । मैं उनकी बातों से सहमत था ।

समस्या क्या है पूछे जाने पर वे बोले, “मेरे छोटे भाई को निजी वाहन, कार, चाहिए थी । ठीक है, दिल्ली जैसे महानगर में कार की काफी उपयोगिता है इसे मैं स्वीकारता हूं । मेरे वृद्ध हो रहे माता-पिता भी स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उसी के साथ रहते हैं । उन्हें अस्पताल ले-जाने-लाने में, परिवार को सामाजिक समारोहों में ले चलने, अतिथियों की आवभगत करने आदि में कार की उपयोगिता मुझे भी दिखती है ।”

“तो ठीक है, खरीद ले न एक कार । कार रखने की उसकी हैसियत तो अब हो ही रही है । और कारें भी तो अब कितनी सस्ती हो चुकी हैं? ढाई-तीन लाख में !” मैंने अपना मत व्यक्त किया ।

“वह ढाई-तीन लाख की कार से खुश होता तब न ? यही तो समस्या है । उसे छः-सात लाख की कार चाहिए थी । और इतनी महंगी के लिए उसके पास जमा-पूंजी तो थी नहीं । लोन लेकर खरीद ली । मैंने समझाया था कि अभी सस्ती कार से काम चला लो दो-चार साल में जब तुम्हारी आर्थिक स्थिति मजबूत हो जाए तो दूसरी खरीद लेना । मुझे अंदाजा था ही पांच-सात लाख के लोन की अदायगी-किश्तें काफी भारी भरकम पड़ेंगी । बताया भी था कि खामखा उसे अपना बजट ‘टाइट’ करना पड़ेगा । मेरी माना नहीं ।”

मैंने सवाल किया, “आपने पूछा नहीं कि क्यों वह महंगी कार के चक्कर में था ।”

“पूछा, जरूर पूछा । उसका कहना था कि उसके अस्पताल में डाक्टरों के पास एक से एक बढ़िया कारें हैं, कइयों की तो ‘इंपोर्टेड’ । उनके बीच रहकर सस्ती कार ? इज्जत का सवाल था । भला संगी-साथी क्या सोचेंगे – बेचारा ढंग की कार भी नहीं रख सकता ! आप ही बताएं, फिर मैं भला क्या कहता ।”

आगे क्या बातें हुई माने नहीं रखती हैं । अपने अंतिम शब्दों के तौर पर यही कह सकता हूं कि ऐसी घटनाएं समाज में व्याप्त अपनी-अपनी हैसियत दिखाने की मानसिकता के द्योतक होती हैं । – योगेन्द्र जोशी

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टेलीफोन नंबर 911 और पुलिस

इस समय मैं अमेरिका की ‘सांता क्लारा’ नगरी में हूं, करीब एक माह के प्रवास पर । यह स्थान कैलिफोर्निया राज्य की सिलीकॉन वैली में वहां के बड़े शहर ‘सान होजे’ से लगा हुआ और अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के शहर ‘सान फ्रांसिस्को’ के हवाई अड्डे से साठ-पैंसठ किलोमीटर दूर है । मैं पहले भी एक बार यहां आ चुका हूं । मेरे बेटे, जिसके आग्रह पर मैं तब और इस बार दुबारा यहां आया, ने पहली बार के आगमन पर यहां के नियम-कानूनों का एक संक्षिप्त परिचय मुझे दिया था, ताकि मैं कहीं अनजाने में उनका उल्लंघन न कर बैठूं । तब उसने स्पष्ट किया था कि नियमों के उल्लंघन का मामला पुलिस की नजर में आने पर दंडात्मक काररवाही भुगतनी पड़ सकती है, और किसी प्रकार की रियायत की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती है ।

तब उसने दो बातों पर खास जोर डाला था । पहला तो यह कि कार में बैठने पर हर यात्रिक (पैसेंजर) को ‘सीट बेल्ट’ बांधना या पहनना अनिवार्य है, और यह वाहन चलाने वाले की जिम्मेदारी होती है कि वह सभी यात्रिकों द्वारा ऐसा कर लेना सुनिश्चित कर ले । लापरवाही होने पर दो-तीन सौ डालर (दस-बारह हजार रुपये) के अर्थदंड (फाइन) के लिए तैयार रहना पड़ता है । यातायात संबंधी किसी भी नियम के उल्लंघन पर इसी प्रकार का दंड देना पड़ता है । उसने मुद्दे की गंभीरता समझाने के लिए अपने तथा परिचितों के दो चार अनुभव भी मुझे सुनाये थे । उसने दूसरी बात यह बताई कि पैदल चलने वालों को भी सड़क पार करते समय विशेष सावधानी बरतना आवश्यक होता हैं । आम तौर पर सड़क पर चलने की मनाही रहती है । सड़क के किनारे-किनारे बने पैदल मार्ग पर ही चलने की अनुमति रहती है, और जहां ऐसा मार्ग न हो वहां पैदल चलना मना रहता है । नियमों के विरुद्ध चलने पर दो सौ डालर का अर्थदंड । उसने सड़क पार करने के तौर-तरीके भी समझा दिये थे । मेरे लिए यही जानकारी आवश्यक थी, क्योंकि मैं सुबह-शाम नियमित रूप से टहलने के लिए निकला करता था ।

एक बात, जो मेरे बेटे ने शायद मुझे नहीं बताई थी, या कभी बताई हो तो मेरे ध्यान में नहीं है, यह है कि पूरे अमेरिका में आपात्कालीन सेवा के लिए टेलीफोन नंबर 911 नियत किया गया है । इस सेवा के अंतर्गत पुलिस, अग्निशमन तथा आकस्मिक चिकित्सा शामिल रहते हैं । अगर आप टेलीफोन पर यह नंबर घुमा भर दें, ताकि दूसरी तरफ टेलीफोन की घंटी बज उठे, तो ये सेवाएं तुरंत हरकत में आ जाती हैं । यह आवश्यक नहीं कि पुलिस बगैरह आपसे कोई विवरण जानना चाहें । कितनी गंभीरता से आपात्कालीन सेवा ली जाती हैं इसका अनुभव मुझे हाल में चौदह-पंद्रह दिन पहले हुआ ।

मेरे बेटे के घर पर जो टेलीफोन सेवा उपलब्ध है उसमें अमेरिका से बाहर अन्य देश के टेलीफोन पर संपर्क साधने के लिए डायल किये जाने वाले नंबर के प्रथम तीन अंक 011 रहते हैं । तत्पश्चात् संबंधित देश के कोड, जो अमेरिका में भारत के लिए 91 है, के दो अंक डायल करने होते हैं, और उसके बाद देश के भीतर का वांछित टेलीफोन नंबर । एक दिन मैं अपने देश में छोटे बेटे को फोन करने में जुट गया । जैसा कह चुका हूं, मुझे टेलीफोन के ‘नंबर पैड’ पर 01191… इत्यादि टाइप करना था । मुझसे शायद गलती से आरंभिक अंक 0 (शून्य) के बदले 9 (नौ) दब गया और फलतः 91191… आदि अंक टाइप हो गये । टेलीफोन ने इस नंबर के आंरभिक तीन अंकों 911 को स्वीकारते हुए आपात्कालीन सेवा को डायल कर दिया । कुछ ही क्षणों में टेलीफोन सेवा से जवाबी फोन आ गया कि क्या वास्तव में कोई आकस्मिक समस्या हम लोगों के सामने आ गयी है, यदि हां तो किस प्रकार की समस्या है वह । मेरा बेटा माजरा तुरंत समझ गया । उसने मेरे हाथ से टेलीफोन का चोंगा ले लिया और दूसरे पक्ष को नकारात्मक उत्तर देते हुए समझा दिया कि फोन गलती से लग गया था । बात आयी-गयी हो गयी ।

लेकिन कोई पांच-सात मिनट बीते ही होंगे कि घर के प्रवेश-द्वार की घंटी बज उठी । दरवाजा खोला गया तो देखा कि सामने गहरे नीले रंग का परिधान पहने हुए और कंधे/बांह पर पुलिसिया प्रतीकों को धारण किए हुए एक ‘पुलिसमैन’ खड़ा है । एक-दो क्षण तक हम लोग भौंचक्के-से देखते रह गये, और फिर संभलते हुए उसे पूरी घटना समझा दी । पुलिस का वह कर्मचारी जल्दी ही आश्वस्त हो गया कि हम लोगों के साथ कुछ गंभीर नहीं घटा है । लौटते-लौटते उसने खुद ही यह बात कही कि हिंदुस्तानियों के साथ ऐसी घटनाएं अक्सर होती हैं, क्योंकि टेलीफोन पर वे शून्य के स्थान पर गलती से कभी-कभी नौ दबा बैठते हैं (गौर करें कि टेलीफोन के नंबर पैड पर शून्य तथा नौ के अंक एकदम पास-पास होते हैं ), और तब ‘टेलीफोन कॉल’ आपात्कालीन सेवा को पहुंच जाती है । ऐसे अवसर पर पुलिस सबसे पहले हरकत में आती है, क्योंकि उनकी गाड़ियां शहर में लगातार यत्र-तत्र चक्कर लगाती रहती हैं । टेलीफोन करने वाले के पते पर सबसे निकट वाला पुलिसमैन तुरंत ही पहुंच जाता है ।

पुलिस विभाग की त्वरित कार्यवाही में जुट जाने की संस्कृति एक भारतीय के नाते मेरे लिए अकल्पनीय है ।
अमेरिका में किसी दुर्घटना की खबर और उससे संबंधित समस्त जानकारी बिजली की गति से सभी संबंधित पक्षों को सेकंडों या मिनटों में मिल जाती है । खेद होता है यह देखकर कि हमारे देश में टेलीफोन या गाड़ी के नंबर के आधार पर किसी व्यक्ति का पता खोजने में पुलिस विभाग को कई-कई दिन लग जाते हैं । पाठकों को मेरा यह कहना अप्रिय लगेगा (क्षमा करें) कि अगर उपर्युक्त घटना अपने यहां घटी होती और पुलिसमैन अपने दरवाजे पर पहुंचे होते तो वे दो-चार गालियां दे गये होते, या दस-बीस रुपये वसूल कर ले गये होते । हमारे देश में अमेरिका की नकल करने का फैशन चल पड़ा है, लेकिन कार्यसंस्कृति के मामले में उनसे कुछ सीखने का विचार हमारे मन में नहीं आता । इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अमेरिका की भौगोलिक सीमाओं के भीतर कोई आतंकवादी घटना नहीं घटती है, क्योंकि वहां के कभी सरकारी विभाग मुस्तैदी से कार्य करते हैं । अपने यहां ? – योगेन्द्र जोशी

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