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वोट? किसी को भी नहीं !

मेरे पड़ोसी शंकरलालजी संध्याकाल घर पर आ धमके। आम तौर पर उनसे घर के बाहर सड़क पर ही मुलाकात हो जाती है और तभी कुशलक्षेम की दो-चार बातों का आदान-प्रदान हो जाया करता है। लेकिन आज वे घर पर ही पहुंच गए। मैंने अनुमान लगाया कि आज चुनाव में मतदान का दिन था, इसलिए चुनाव संबंधी जिज्ञासा लेकर आए होंगे। किसको वोट दिया, कौन जीतेगा, सरकार किसकी बनेगी, आदि की जिज्ञासा आम तौर पर सभी नागरिकों को रहती है, किंतु शंकरलालजी विशेष रूप से उत्सुक रहते हैं। पड़ोसियों-मित्रों से बातचीत के लिए चुनावी मौसम में यही उनका प्रिय विषय रहता है।

घर के अंदर दाखिल होते ही उच्च स्वर में बोल पड़े, “भाई साहब, किसको वोट देकर आए? किस पार्टी को जिता रहे हैं?”

मैंने कहा, “किसी को नहीं।”

उलाहना के अंदाज में वे बोले, “किसी को नहीं? यह तो गलत बात है। वोट डालना तो सभी नागरिकों का कर्तव्य है।”

“ऐसा नहीं हैं। … वोट डालने तो मैं भी गया, परंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में वोट नहीं डाला। दरअसल मैं ‘नोटा’ का पक्षधर हूं और उसी के अनुसार मैंने नोटा बटन दबाया।”

“नोटा दबाने से क्या फायदा? यह तो अपना वोट बरबाद करना हुआ।”

“नोटा से क्या लाभ-हानि है यह तो लंबी बहस का विषय है। नोटा का विकल्प यों ही नहीं उपलब्ध हुआ है। उसके लिए कुछ उत्साही जनों ने लंबी लड़ाई लड़ी है। … अस्तु, अभी मैं उसकी बहस में पड़ना नहीं चाहता। केवल इतना कहना चाहूंगा कि मेरी नज़र में कोई भी राजनैतिक दल वोट पाने के योग्य नहीं है। लोकतंत्र-लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने भर से क्या विश्वसनीय और फलदायी लोकतंत्र आ जाता है? मेरा तो सभी दलों से मोहभंग हो चुका है। तब किसे वोट दूं? अपने मतदान के अधिकार को छोड़ना भी नहीं चाहता; सो नोटा का प्रयोग करके अपना फर्ज निभा लिया।”

“राजनैतिक दलों से इतनी नाराजगी? सरकारें बनें इसके लिए वोट तो देना ही पड़ेगा न? सभी लोग नोटा दबाने लगेंगे तो सरकारें कैसे बनेंगी?”

मैंने उनको तसल्ली देते हुए जवाब दिया, “अरे भाई, सरकारें बनने की चिंता मत करिए। हर प्रत्याशी के समर्थक तो होते ही हैं वोट डालने के लिए। जिसको एक वोट भी अधिक मिल जाए वह जीतेगा ही, भले ही मतदान पांच-दस प्रतिशत ही क्यों न हो। असल समस्या वह नहीं है। समस्या है लोकतंत्र की गुणत्ता की। समस्या है राजनेताओं के आचरण की। समस्या है दलों और उनके सदस्यों के सिद्धांतों की।”

“मैं समझ नहीं पाया कि आप कहना क्या चाहते हैं?”

मैंने उन्हें संक्षेप में समझाने की कोशिश की, “देश के लोकतंत्र को दशकों तक देखने के बाद मेरी धारणा बन चुकी है कि जिन नेताओं ने लोकतांत्रिक व्यवस्था का ‘ठेका’ ले रखा है वे स्वयं लोकतांत्रिक नही हैं अपने कार्य-व्यापार में। सब जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद सबसे पहले अपने हितों को साधने की कोशिश करते पाये जाते हैं। देश के लिए कायदे-कानून बनाने वाले खुद ही उनका उल्लंघन करते हैं और उल्लंघन करने वाले अपने समर्थकों-चहेतों के बचाव में उतर पड़ते हैं। कितने राजनैतिक दल हैं जिनमें आंतरिक लोकतंत्र है? दल का मुखिया ताउम्र मुखिया बना रहता है या अपने पारिवारिक किसी सदस्य को कमान ऐसे सोंपता है जैसे वारिसों को धन-संपदा सोंपी जाती है। दल के अन्य नेता बंधुआ मजदूरों की तरह मुखिया की हां में हां मिलाते हैं। इतना ही नहीं, सभी दलों में कोई एक-तिहाई से एक-चौथाई नेता आपराधिक पृष्टभूमि के बताए जाते हैं। क्या आम जनता के बीच इसी अनुपात में आपराधिक वृत्ति के लोग मिलते हैं? हरगिज नहीं। तब क्या यह कहना गलत होगा कि देश की राजनीति आपराधिक सोच वालों की शरण्स्थली बन चुकी है? जो बात मुझे सबसे अधिक खलती है वह है इन दलों का समाज को बांटो और राज करो की अलोकतांत्रिक नीति। कोई दलितों की बात करता है तो कोई पिछ्ड़ों की, कोई यादवों की तो कोई जाटों की, कोई हिंदुओं की तो कोई मुस्लिमों की, कोई मराठाओं की तो कोई गैर-मराठाओं की। है कोई जो भारत और भारतीय नागरिकों की बात करता हो? है कोई उन समस्याओं की बात करने वाला जिनका सभी देशवासियों से सरोकार है? जरा ऐसे सवालों पर गहराई से विचार करें तो मेरी बात समझ में आ जाएगी। दिलचस्प है लोग एक तरफ जनप्रतिनिधियों की आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं को वोट देने दौड़े चले आते हैं। चुनाव का बहिष्कार क्यों नहीं करते वे? नोटा बटन क्यों नहीं दबाते वे?”

शंकरलालजी के पास मेरे सवालों का समुचित उत्तर नहीं था। इसलिए उन्होंने बातचीत का विषय बदल देना ही ठीक समझा। – योगेन्द्र जोशी

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