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सवाल “भारत” के वजूद का

वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां हूं। कई अन्य मित्र-संबंधी भी पहुंचे हैं। घर में भावी समारोह की चहल-पहल है। घर के सदस्य आगामी आयोजन की तैयारी में जुटे हैं और कुछएक अतिथि उस कार्य में अपना योगदान भी दे रहे हैं। अधिकांश अन्य प्राप्तवयस्क, प्रौढ़, एवं अपेक्षया वृद्ध अतिथिगण बाहर खुले में दो-दो-तीन-तीन के समूह में परस्पर वार्तालाप में जुटे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफोन की महत्ता कम नहीं है, विशेषतः नवयुवाओं, किशोर-किशोरियों तथा प्राप्तवय बच्चों के लिए। इस मौके पर उक्त अल्पवयस्क वर्ग के कुछएक सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त हैं।

मैं एक कुर्सी पर बैठा हुआ चारों तरफ़ का नजारा देख रहा हूं। लोगों के परिधानों, उनके हावभावों, उठने-बैठने एवं हंसने-बोलने के तौर-तरीकों आदि को बारीकी से देखना मेरे लिए सदा से एक रोचक विषय रहा है। मैं ऐसे वैविध्यपूर्ण वातावरण में शायद ही कभी ऊबता हूं। इस समय भी मैं जिज्ञासु दृष्टि से सभी को देख रहा हूं।

मेरी नजर बगल की कुर्सी पर बैठे आठ-दश-वर्षीय एक बच्चे पर पड़ती है। वह भी एक स्मार्टफोन के साथ खेल रहा है, शायद अपने मित्रों के संदेश किसी “सोशल मीडिया” (सामाजिक संपर्क माध्यम?) पर देख रहा है। उसकी उंगलियां सधे अंदाज में फोन के पर्दे पर चलती हैं। मेरे पास भी स्मार्टफोन है पर उसका प्रयोग मैं वैसी प्रवीणता से नहीं कर पाता जैसी इन आधुनिक बच्चों में देखता हूं। मैं उस बच्चे से पूछना चाहता हूं वह क्या कर रहा है, क्या-क्या कर सकता है, इत्यादि। असमंजस में हूं कि पूछूं या नहीं। बड़ों की भांति बच्चे भी संवेदनशील हो सकते हैं। उस बच्चे की निजता में हस्तक्षेप करूं क्या? करूं तो किस बहाने? आज के युग में निजत्व बहुत माने रखने लगा है।

अंततः मैं उसकी एकाग्रता में खलल डाल ही लेता हूं और पूछता हूं, “क्या आप बताना चाहेंगे कि आप अभी क्या कर रहे हैं?”

आम तौर पर मैं बच्चों को आप कहकर नहीं पुकारता, लेकिन इस समय अनायास ही उसके प्रति औपचारिक हो रहा हूं। वह कहता है, “मैं व्हट्सऐप पर दोस्तों के साथ मैसेजेज़ शेयर कर रहा हूं। उसके पहले मैंने उनको यहां की फोटोज़ भेजीं।”

“अच्छा! फोन पर “गेम” भी खेलते होंगे? और भी बहुत-सी चीजें कर लेते होंगे?” मैं फिर पूछता हूं। मैं गेम कहने के बजाय खेल कहना पसंद करता हूं। लेकिन इस समय गेम शब्द ही मेरे मुख से निकलता है। मध्यम वर्ग के आजकल के बच्चे हिन्दी के शब्द बोलते ही कहां हैं?

वह जवाब देता है, “हां-हां, क्यों नहीं! गेम भी खेलता हूं। ई-मेल पढ़ सकता हूं। फोन रिचार्ज कर सकता हूं। ट्रेन-रेज़र्वेशन कर सकता हूं।”

“क्या आप गूगल-मैप के बारे में भी जानते हैं? अपने फोन पर उसे भी देख सकते हैं क्या?” मैं कुछ और जानना चाहता हूं।

वह भी मेरी बातों में दिलचस्पी लेता है। कदाचित् स्मार्टफोन की अपनी जानकारी से मुझे प्रभावित करना चाहता है। ऐसा करना मनुष्यों के स्वभाव में होता ही है और बहुत-से बच्चों में भी यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। मैं पूछता हूं, “क्या गूगल मैप के सहारे मुझे दिखा सकते हैं कि आप अभी किस जगह पर हैं।”

वह फोन के पर्दे पर जादुई अंदाज में अपना हाथ फेरता है और मुझे वैवाहिक स्थल तथा संबंधित शहर की स्थिति दिखा देता है। मैं फिर पूछता हूं, “क्या मैप में जापान कहां है इसे भी यह बता सकते हैं?”

वह उसी करिस्माई अंदाज से मैप में जापानी द्वीप-समूह की स्थिति दिखाता है और मुझसे कहता है, “आप क्या जापान के शहरों की लोकेशन भी जानना चाहेंगे?”

“नहीं, इतना काफी है। …” कहते हुए मैं प्रशंसात्मक शब्द बोलता हूं, “वाह, आपका फोन ही स्मार्ट नहीं, आप भी स्मार्ट हैं। … अच्छा, अब जरा भारत कहां है यह भी मैप में दिखा दें।”

दो-एक क्षणों तक उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। फिर अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोलता है, “आपका मतलब इंडिया से है क्या? मेरी टीचर ने एक बार बताया था कि इंडिया को भारत भी कहते हैं। लेकिन मुझे थोड़ा कंफ़्यूज़न है। …”

मैं हामी भरता हूं। उसके फोन के पर्दे पर इंडिया नजर आने लगता है।

“चलिए, इतना काफ़ी है। आपको इतनी देर डिस्टर्ब किया। अब आप अपना व्हट्सऐप वाले काम पर लौट चलिए।” कहते हुए मैं पास में काफी-प्यालों की ट्रे लिए घूम रहे व्यक्ति को इशारा करता हूं। वह पास आता है और मैं एक प्याली काफी ले लेता हूं।

सोचने लगता हूं कि क्या “भारत” का वजूद खत्म हो जायेगा? मेरा इशारा भारत देश की ओर नहीं है। मेरा मतलब तो “भारत” शब्द से है जिसे हमारे पुरखे उस भूभाग के संबोधन के तौर पर प्रयोग में लेते रहे हैं जिसे अब लोग इंडिया कहते हैं। क्या देश का “भारत” संबोधन आने वाली पीढ़ियों के लिए अपरिचित हो जायेगा?

शायद हां! – योगेन्द्र जोशी

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