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कक्षा पांच तो पास हो गए, पर अक्षरज्ञान नहीं!

कुछ लोगों का मत है कि अपना देश भगवान भरोसे है । अगर देश सचमुच में भगवान भरोसे है और देश के हालात इतने पतले हैं तो मैं यही कहूंगा कि भगवान भी कितना क्रूर है कि देशवासी उस पर भरोसा करें, किंतु वह है कि उनकी कोई चिंता न करे । कुछ तो उसे रहम करना ही चाहिए । भगवान वास्तव में देश को भूल चुका है इसका अहसास तो मुझे पग-पग पर होता ही रहता है, और इसलिए उस पर मेरा भरोसा सालों पहले ही उठ चुका । किंतु एक ताजा अनुभव ने फिर याद दिला दी कि इस देश के साथ वह कैसे-कैसे मजाक कर डालता है । आप भी सुनिए मेरे हालिया अनुभव के बारे में ।

मेरी धर्मपत्नीजी शिक्षिका रही हैं; अब सेवानिवृत्त हैं । हाल ही में उनका मन हुआ कि शिक्षण के अपने पुराने शौक पर दुबारा हाथ आजमाया जाए, अनौपचारिक रूप से । मेरे सामने उन्होंने अपने इरादे पेश किए, “मैं सोच रही हूं कि पड़ोस में रहने वाले प्राइमरी या जूनियर स्तर के दो-चार गरीब बच्चों को घंटा-दोघंटा पढ़ा दिया जाए । तुम्हारा क्या खयाल है ?”

“नेकी और पूछ-पूछ? भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है? कब, कैसे और कितना समय निकाल पाओगी यह तो तुम्हें सोचना है ।” मेरा जवाब था । किसी का कुछ भला हो जाए तो अच्छा ही होगा यह मेरा भी मानना था । मैं स्वयं यह कार्य नहीं कर रहा था, क्योंकि मैं अपना समय-यापन अन्य प्रकार से करता आ रहा था ।

उनका विचार था कि वे केवल लड़कियों को पढ़ाएंगी । लड़के पढ़ लें यह कोशिश तो प्रायः हर शहरी परिवार करने लगा है, लेकिन लड़कियों के मामले में उनका रवैया ढीलाढाला ही देखने में आता है । उन्होंने पास ही रहने वाली एक लड़की को संदेश भिजवा डाला कि अगर वह पढ़ना चाहे तो घर पर आ जाया करे । सुविधानुसार समय भी निश्चित कर लिया गया । वह सरकारी स्कूल की सातवीं कक्षा में पढ़ती थी, परंतु उसका स्तर कक्षा के अनुरूप नहीं था । खैर, उसकी पढ़ाई आरंभ हो गई और वह नियमित आने लगी ।

तीन-चार दिन बीते होंगे कि उससे छोटी एक लड़की घर पर पहुंची और बोली, “आंटी, आप मुझे भी पढ़ाएंगी क्या ?”

“ठीक है, आ जाना, तुम्हें भी पढ़ा दूंगी ।” पत्नी महोदया ने जवाब दिया । उसे दिन के कितने बजे आना है यह भी बता दिया गया ।

अगले दिन वह अपने साथ अन्य दो-तीन लड़कियों को लेकर पहुंच गयी । वे सभी न तो एक ही विद्यालय में पढ़ती थीं और न ही एक ही कक्षा में । कोई हिंदी माध्यम के सरकारी विद्यालय में पढ़ रही थी तो कोई आसपास के ‘अंग्रेजी मीडियम‘ स्कूल में । यहां पर यह बता दूं कि इन बच्चों में से किसी के भी मां-बाप हाईस्कूल से अधिक शिक्षित नहीं हैं । उनसे एक पीढ़ी पहले के लोग तो निपट अनपढ़ रहे । अवश्य ही यह संतोेष की बात थी कि शिक्षा के प्रति वे जागरूक हो रहे थे ।

खैर, अपनी ‘शिक्षिका’ जी किसी को लेखन-पठन का कार्य सोंपकर तो अन्य को उसकी किताबों के अनुसार हिंदी-अंग्रेजी एवं गणित के पाठ पढ़ाकर कार्य संपादन करने लगीं । कक्षा सात की जिस लड़की से कार्यारंभ हुआ था उसने कालांतर में आना बंद कर दिया । दूसरी तरफ प्राथमिक स्तर की जो बच्चियां आ रही थीं उनके साथ दो लड़के और जुड़ गये । वे भी स्वीकार कर लिए गये, यद्यपि आरंभिक योजना लड़कियों के लिए बनाई गई थी । अस्तु, किसी प्रकार कार्य चलने लगा । तब से अब तक ग्रीष्मकालीन एक महीना बीत चुका है । बच्चों का उत्साह अभी बरकरार है

अभी तक मैंने उक्त प्रकरण के रोचक पहलू का जिक्र नहीं किया है । उसे बताता हूं । इन बच्चों में एक लड़की है जिसको अपने विद्यालय से चंद रोज पहले ही परीक्षा परिणाम प्राप्त हुआ है । पता चला कि उसने कक्षा पांच की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है । क्या सचमुच में ? यह जानने के लिए हमने उससे ‘रिपोर्ट कार्ड’ मंगवाया । अधिकतम 1100 अंकों में से 577 – द्वितीय श्रेणी । हमारा मन विश्वास करने को तैयार तो नहीं था, लेकिन दस्तावेज तो यही बता रहा था ! विश्वास न करने का कारण ? क्योंकि उसे अक्षरज्ञान नहीं के बराबर था । हालत यह थी कि उससे ‘ह’ लिखने को कहें तो कभी सही लिख जाए तो कभी गलत । और अपने ही लिखे अक्षर को पढ़ने के लिए कहें तो कभी सही पढ़ जाए तो कभी गलत । यदि किताब में छपे वाक्यों को हूबहू उतारने में वह माहिर थी । मतलब यह कि नकल तो वह कर लेती थी, पर नकल किए जा रहे पाठ की सही पहचान और उसका उच्चारण उसे मालूम नहीं था ।

मैंने सुना है कि सरकारी प्राइमरी स्कूलों में कक्षा एक से चार तक इम्तहान नहीं होते हैं और सभी को हर कक्षा से प्रोन्नत कर दिया जाता है । किंतु कक्षा पांच की तो परीक्षा होती ही है । और उसकी यह हालत ? मेरी इन बातों पर आप विश्वास नहीं करना चाहेंगे, लेकिन मैं झूठ नहीं कह रहा ।

सचमुच में यह देश भगवान भरोसे है । – योगेन्द्र जोशी

 

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