Tag Archives: bargaining

किसिम-किसिम के गाहक मिलते हैं फल-सब्जी सट्टी मे

मेरे घर के निकट फलों एवं सब्जियों की सट्टी (बाजार) है । वहां तड़के सुबह इन चीजों की थोक तथा फुटकर दुकानें खुल जाती हैं और दोपहर 11-12 बजे तक कारोबार करती हैं । कुछ फुटकर दुकानें दिन भर भी खुली रहती हैं, अतः जरूरत की चीजें लगभग हर समय मिल जाती हैं । आम तौर पर वहां सुबह के समय ही भीड़ रहती है । मैं वहां से प्रायः एक या दो दिन के लिए साग-सब्जी और फल खरीद ले आता हूं ।

अभी जुलाई का महीना समाप्ति पर है और उसी के साथ जामुन का मौसम भी खत्म होने को है । आम का मौसम कुछ दिन और चलेगा । केला तो प्रायः सदा ही उपलब्ध रहता है । पपीता, सेब, अनार आदि भी अक्सर मिल जाते हैं । आजकल कई फलों की उपलब्धता साल भर रहती है; दामों में मौसमी उतार-चढ़ाव होना स्वाभाविक है ।

सब्जी-विक्रेता सामान्यतः जमीन पर सब्जियों की ढेरी लगाकर बेचते हैं, जब कि फल-विक्रेता ठेलों पर फल सजाए रहते हैं । कुछ चुने हुए विक्रताओं का मैं सालों से ग्राहक हूं अतः उनके साथ एक प्रकार की जान-पहचान हो चुकी है । वे जानते हैं कि मैं उनसे आम तौर पर न दाम पूछता हूं और न मोलभाव करता हूं ।

हां तो मैं बताने जा रहा था कि बीते कल मैं कुछ फल और सब्जियां खरीदने सट्टी गया था । सबसे पहले जामुन वाले के पास पहुंचा । जामुन ठीकठाक लग रहे थे । मैंने पूछा, “जामुन मीठे तो हैं न ? … आधा किलो तौल देना । ठीक-से देख लेना कि कोई सड़े-गले न हों ।”

वह मेरे लिए जामुन तौल ही रहा था एक खरीदार ठेले पर पहुंचे और बोले, “जामुन क्या हिसाब दे रहे हो भई ? मीठे तो हैं न ?” सवाल पूछते-पूछते वे दो-तीन दाने हाथ में लेकर मुंह में डालने लगे ।

दुकानदार जवाब देता है, “बाबूजी, बीस रुपये पाव चल रहा है ।”

“यह तो ज्यादा ले रहे हो । पंद्रह का लगाओ न ? आधा किलो लेंगे ।”

“बाबूजी, सीजन खतम हो रहा है । महंगा ही हमें मिल रहा है । पंद्रह का पड़ता ही नहीं ।” फल वाले ने जवाब दिया ।

“नहीं भई, ये तो महंगा है ।” कहते हुए वे सज्जन चल दिये ।

फल-विक्रेता मुझे जामुन की थैली थमाते हुए कहने लगा, “देखा बाबूजी, खरीदना था नहीं । दाम पूछने के बहाने तीन-चार दाने खा गए । कभी-कभी ऐसे भी गाहक आ जाते हैं, क्या करें !”

मैंने शब्दों में कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, बस मुस्कुरा दिया और आगे बढ़ गया । आगे आम वाले के पास पहुंचकर मैंने पके हुए किंतु थोड़े सख्त किस्म के आम छांटना शुरु किया । प्रायः सभी लोग फल-सब्जी छांटकर ही खरीदते हैं । एक सज्जन पहले से ही उस ठेले पर खरीदारी कर रहे थे । वे सेब और अनार खरीद चुके थे । आम खरीदने से पहले उन्होंने कीमत पूछी तो जवाब मिला, “50 रुपये किलो, सर ।”

मेरे ख्याल से आम खरीदने का विचार उनका तत्काल बना होगा । दाम पूछने के बाद ही तो उन्होंने सेब-अनार खरीदे होंगे ।  आजकल सब्जी-सट्टी में कुछ युवा विक्रेता संबोधन हेतु ‘सर’ शब्द का भी प्रयोग करने लगे हैं । वन-टू-थ्री-टेन-फिफ्टी जैसी अगरेजी गिनतियों का प्रयोग भी देखने को मिल जाता है । वस्तुतः अंगरेजी शब्द आम चलन में बोले जाने वाले हिन्दी शब्दों को विस्थापित कर रहे हैं । देश वाकई ‘आधुनिक’ हो चला है । खैर ।

वे जनाब बोले “अरे नहीं, कुछ कम करो । 45 रुपया लगाओ ।”

फल वाले ने दाम घटाने में अपनी असमर्थता जता दी । मेरी उपस्थिति में उन्होंने आधा-एक किलो आम खरीद लिए । फिर फल वाले से पूरा हिसाब पूछा, “कितने का हिसाब बना ?”

“अॅं … आपका किसाब हुआ दो सौ बीस रुपये ।” क्षण भर रुककर फल वाला बोला ।

“मैंने दाम कुछ कम करने को कहा था । … ये लो दो सौ रुपये ।”  जनाब ने पैसे दिए और चलने को उद्यत हुआ ।

“सर, बीस रुपये और दीजिए । इतना नहीं छोड़ पाऊंगा ।”

“अरे ठीक है, रखो इतना । कोई नये खरीदार थोड़े ही हैं तुम्हारे !”

“सो तो ठीक है, सर, लेकिन दो पैसे की कमाई नहीं होगी तो परिवार का पेट कैसे भरेगा !” फल वाले ने लाचारी व्यक्त की ।

“ठीक है, ठीक है, फिर कभी ले लेना । आते तो रहते ही हैं ।” कहते हुए वे चल दिए ।

मैंने खुद के छांटे आम उसके तराजू पर रखे और एक किलो आम खरीद लिए । उसे पचास का नोट पकड़ाते हुए मैं आगे बढ़ने को हुआ । वह पांच का नोट मुझे थमाने लगा तो मैंने पूछा, “ये क्या है ?”

“रख लीजिए । आप सोचेंगे … ।” उसने सफाई पेश करनी चाही ।

“अरे नहीं भई, मैं कुछ नहीं सोचूंगा ।” अपने चेहरे पर मुस्कुराहट लाते हुए मैंने उसे आश्वस्त किया और वहां से चल दिया ।

आगे चलकर मैं रुका सब्जी वालों के पास तीन-चार वक्त की सब्जियां खरीदने । सड़क के किनारे जमीन पर सब्जियां सजाए दो दुकानों में से मैं पहली पर रुका । बगल की दुकान से एक महिला धनिया, मिर्चा, अदरख, परवल बगैरह-बगैरह खरीदकर पौलिथीन के अलग-अलग थैलियों में भरवा रही थी । कुछ देर तक मैं जिज्ञासावश उसी सौदे को देखता रहा । अपेक्षया कम उम्र की सब्जी वाली उन थैलियों को एक-एककर बड़े पौलिथीन थैले मैं डालती जा रहा थी । मैं सोचने लगा कि वे चीजें मिलाकर दो-एक थैलियों में इकट्ठी रखी जा सकती थीं, पर ऐसा नहीं किया जा रहा था । वह महिला शायद उस मेहनत से बचना चाहती होगी जिसके तहत उसे घर पहुंचकर सभी चीजों को छांटते हुए अलग-अलग करना पड़ता ।

प्रायः सभी लोग पौलिथीन-जन्य पर्यावरण समस्या की बात करते हैं, परंतु तात्कालिक सुविधा हेतु उसके प्रयोग से बाज नहीं आते । क्या ही विडंबना है भारतीय समाज में ।

तभी मेरा ध्यान एक अन्य साइकिल सवार युवा ग्राहक की ओर गया जो अधेड़ उम्र की पहली सब्जी वाली से पूछ रहा था, “अरे चाची, ये प्याज क्या हिसाब दे रही हो ?”

“पेंसठ रुपये किलो चल रहा है ।” उसे जवाब मिला ।

“साठ का लगाओ न, सभी जगह तो साठ का बिक रहा है ।”

अनुभवी सब्जी वाली खरा-खरा बोलने में निपुण थी । वह बोली, “ठीक है भैया, जहां साठ का मिल रहा है वहीं से क्यों नहीं खरीद लेते ?”

मोलभाव के चक्कर में लोगबाग किसी चीज के कम दाम में मिलने की बात कर जाते हैं । उनका तीर कभी-कभार निशाने पर लग भी जाता है, किंतु उस ग्राहक के मामले में बात बनी नहीं ।

 “आपके यहां प्याज साफ-सुथरा, अच्छा मिलता है ।” कहते हुए उसने साइकिल एक ओर खड़ी की और पहुंच गया प्याज खरीदने । मैंने भी कुछ सब्जियां खरीद लीं और पकड़ ली घर की राह । राह में मेरा मन इसी विचार पर केंद्रित हो गया कि प्रकृति ने लोगों के व्यवहार को कितना वैविध्यमय बनाया है । किसिम-किसिम के लोग मिल ही जाते हैं हर जगह । – योगेन्द्र जोशी 

Advertisements

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories

मीटर से भाड़ा तय करने वाले ऑटोरिक्शा

मैं यदाकदा दिल्ली एवं मुम्बई जैसे महानगरों का चक्कर लगाता रहता हूं । अभी हाल ही में मैं कुछ दिनों के लिए मुम्बई रहा । तब मुझे अपने पौत्र के जन्म के समय अस्पताल के कई चक्कर लगाने पड़े थे । उस दौरान मेरे गमनागमन का साधन ऑटोरिक्शा ही रहा । जाहिर है कि मेरा सापका अलग-अलग ऑटारिक्शॉ वालों से पड़ा । तब मुझे पता चला कि मुम्बई मे ऑटोरिक्शे बिना मीटर के नहीं चलते । मेरा अनुभव दिल्ली में बिल्कुल उल्टा रहा है । मैंने पाया है कि ऑटोरिक्शों पर मीटर तो अवश्य लगे रहते हैं, लेकिन उनका प्रयोग यात्रियों का भाड़ा तय करने में होता है ऐसा मुझे कभी नहीं लगा । आम तौर पर ऑटारिक्शा वाले के साथ मोलभाव करके भाड़ा तय करना पड़ता है । मैंने अक्सर देखा है कि वे वाजिब से डेड़-दो गुना भाड़ा मांगते हैं और मोलभाव के बाद भी सही भाड़े पर वे तैयार हो गये होंगे इस बात को लेकर अश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । जिसे भाड़े का अंदाजा न हो उसके लिए धोखा खा जाना स्वाभाविक है । ऐसे लोगों को ‘प्रिपेड’ऑटोरिक्शा की शरण में जाना पड़ता है ।

लेकिन इधर चार-छः दिनों के दिल्ली प्रवास के दौरान मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां भी कुछ ऑटोरिक्शा वाले मीटर के अनुसार भाड़ा लेने को तैयार होने लगे हैं । इस बात का प्रथम अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं एक दिन अपने गंतव्य पर ऑटोरिक्शा के माध्यम से गया । मैंने अधिकांश दूरी दिल्ली की मेट्रो रेलसेवा से तय की और शेष भाग के लिए ऑटोरिक्शा भाड़े पर लिया । मेट्रो स्टेशन पर उतरने के बाद प्लेटफॉर्म से बाहर आकर मैंने एक ऑटोरिक्शा वाले से पूछा कि क्या वह अमुक स्थान को चलेगा । वह तैयार हुआ तो भाड़ा पूछा, “कितना पैसा लेंगे ?” उत्तर मिला, “सत्तर रुपया लगेगा ।”

मेरा अगला सवाल था, “इतना तो ज्यादा है । वहां तक का इतना होता नहीं । … अच्छा, आपके ऑटोरिक्शा पर मीटर लगा है क्या ? … और वह काम भी करता है क्या ?”

जवाब था, “मीटर है, सा’ब । मीटर से चलेंगे क्या ? मीटर से भी वही पड़ेगा ।”

मैंने कहा, “ठीक है, मीटर से ही चलिए । जितना भी लगे देखा जाएगा । दिल्ली में मीटर के हिसाब से भाड़ा तय करने का अनुभव भी तो ले लें । पहली बार देख रहा हूं कि कोई मीटर से भी चलने को तैयार है ।”

गंतव्य पर पहुंचने पर मीटर ने उनसठ रुपया – एक कम साठ रुपया! – भाड़े की रीडिंग दिखाई । मैंने ऑटोरिक्शा चालक को साठ रुपया देते हुए कहा, “यह तो साठ भी नहीं हुआ; आप तो सत्तर मांग रहे थे ।”

“इसी इलाके के फलां सिरे तक चले होते तो इतना हो जाता ।” उसने सफाई पेश की ।

बात खत्म हुई और मैं आगे बढ़ गया ।

अगले दिन मुझे कहीं अन्यत्र जाना था । मैं निकटतम चौराहे पर गया और वहां खड़े ऑटोरिक्शा चालकों से पूछा । उनमें से एक मुझे गंतव्य तक पहुंचाने को तैयार हो गया । बीते दिन के अनुभव को ध्यान में रखते हुए मैंने पूछा, “आपके वाहन पर मीटर लगा हुआ दिख रहा है; काम करता है क्या ? मैं मीटर के हिसाब से चलना चाहूंगा ।”

उसने जवाब दिया, “मीटर है और वह चलता भी है । मैं उसी के हिसाब से भाड़ा लूंगा । दरअसल मैं मीटर से ही चलता हूं । ऐसा करने पर पैसेंजर से झक-झक नहीं करनी पड़ती है ।”

“ताज्जुब है । मैं तो देखता आया हूं कि यहां ऑटोरिक्शों पर लगे मीटर अक्सर काम तक नहीं करते और जिनके काम करते भी हैं वे मीटर से चलने को तैयार नहीं होते ।” मैंने प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

उसने उत्तर दिया, “अब माहौल कुछ बदल रहा है । कई पैसेंजर अब मीटर से चलने की बात करते हैं और कई आटो-ड्राइवर उसके हिसाब से चलने भी लगे हैं । बारगेनिंग के मामले में पैसेंजर को शक बन रहता है कि आटो-भाड़ा कहीं अधिक तो नहीं लिया जा रहा है और कभी-कभी वे ड्राइवर से उलझ भी जाते हैं । मैं तो अब मीटर से ही चलता हूं ।”

उसकी बात सुन मुझे भरोसा होने लगा कि मुम्बई की भांति यहां भी देरसबेर ‘मीटर्ड’आटो चलने लगेंगे । – योगेन्द्र जोशी

Tags:  आटोरिक्शा, autorickshaw, आटोरिक्शा भाड़ा, autorickshaw charges, प्रिपेड वाहन, prepaid vehicle,  मोलभाव, bargaining

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories