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भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक – शिक्षकों के वेतन से वसूली

हाल के नोटबंदी के निर्णय के बाबत केंद्र सरकार ने दावा किथा था कि इससे भ्रष्टाचार रोकना संभव होगा। तब से मैं सोच रहा हूं कि जब भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति के आचरण का अभिन्न अंग बन चुका हो तब उससे कैसे मुक्ति मिल सकती है। अवश्य ही उपयुक्त कानून के तहत भ्रष्ट व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है, बशर्ते कि उसका भ्रष्ट कृत्य पकड़ में आ जाए। लेकिन उससे क्या व्यक्ति भ्रष्ट मानसिकता से मुक्त हो जाता है? अपनी भ्रष्ट लिप्सा की पूर्ति के लिए वह उपयुक्त अवसरों की तलाश जारी रखेगा ही ऐसा मेरा मत है। इस विषय पर मेरा चिंतन-मनन चल ही रहा था कि एक दिन संयोगवश मेरी भेंट एक महिला रिश्तेदार से हो गयी। उन्होंने जो कहा उससे मेरा इतना ज्ञानवर्धन तो हो ही गया कि जब भ्रष्टाचार के एक रूप पर रोक लगती है तो वह दूसरे रूप में अवतरित हो जाता है। समाज में जब तक असीमित लोभ-लालच वाले लोगों की सुलभता बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार को उपजाऊ भूमि की कमी नहीं रहेगी। पेश है महिला रिश्तेदार से वार्तालाप एक लघुकथा के रूप में।   

मैं कार्यवशात् उन महिला के शहर गया था। रिश्तेदार होने के नाते मैं मिलने के लिए उनसे घर पहुंच गया था। मैंने उनसे पूछा, “अब तो बच्चे बड़े हो गये होंगे। अपना समय-यापन कैसे करती हैं?”

उन्होंने कहा, “पिछले तीन-चार साल से मैं एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ा रही हूं। मैं काम के लिए घर से अधिक दूर जाने की इच्छुक नहीं थी, इसलिए पास ही के एक विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी कर ली।”

“सरकारी है या निजी आपकी शिक्षण संस्था?” मैंने जानना चाहा।

उनका उत्तर था, “है तो निजी किंतु सरकारी अनुदान मिलता है विद्यालय को।”

“तब तो कई मामलों में सरकारी नियम-कानून लागू होते होंगे और तनख्वाह ठीक-ठाक मिलती होगी।”

“हां, कागजों में तो सब ठीक रहता है लेकिन हकीकत में नहीं।”

“क्या मतलब?” मैंने जिज्ञासा प्रकट की।

“देखिए तनख्वाह तो मुझे लगभग 25000 रुपया मिलती है और वह मेरे बैंक खाते में जमा भी हो जाती है। लेकिन मुझसे करीब आधी वसूल भी ली जाती है। … इस हाथ से दिया और उस हाथ से ले लिया।”

कुछ क्षणों के लिए मैं उनकी ओर जिज्ञासु दृष्टि से देखता रहा; फिर बोला, “मैं आपका कहना ठीक से समझ नहीं पाया। क्या ऐसा आपके ही साथ हो रहा है या …।”

वे बीच में बोल पड़ीं, “न, न; सभी के साथ यही है, क्या शिक्षक-शिक्षिका और क्या चपरासी। दरअसल हमारी प्रधानाध्यापिका के पति ही विद्यालय चलाते हैं और उन्हीं के परिवार के लोग प्रबंधन आदि में शामिल हैं। प्रबंधन कागजों में सब कुछ साफ-सुथरा दिखाता है। इसलिए हम लोगों का वेतन बैंक खातों में पहुंच जाता है। प्रधानाध्यपिका हमसे कहती हैं कि खाते से लगभग आधा वेतन निकालकर उनके हाथ में सौंप दें। उनका कहना होता है कि विद्यालय के विकास-कार्यों के लिए धन जुटाना जरूरी है। यही तरीका उन्होंने अपना रखा है। कितना विकास के लिए है और कितना उनकी जेब के लिए यह बता पाना मुश्किल है।”

“आप लोग शिकायत नहीं करते?” मैंने पूछा।

“किससे शिकायत करें? किसी न किसी बहाने से नौकरी से निकाल देंगी। हरएक की अपनी-अपनी विवशता है। इसलिए सभी चुप रहते हैं।”

इस विषय पर आगे कुछ पूछना निरर्थक था। मेरे लिए उनके अनुभव की जानकारी काफी थी यह समझने के लिए कि भ्रष्टाचारी तो अपना काम किसी न किसी रास्ते निकाल ही लेगा। जिसका अंतकरण ही उसे न रोके उसे कोई क्या रोकेगा। इसलिए देश में भ्रष्टाचार है और आगे भी बना रहेगा। – योगेन्द्र जोशी

 

 

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चोरी और कमिशन का खेल

          गरमी का मौसम और दोपहर के करीब 2 बजे । चोर थानेदार साहब से मिलने पहुंचता है । इस समय बाहर और थाने में अपेक्षया सुनसानी है । साहब से मिलने का यही समय मुकर्रर हुआ है । साहब चोर को एक ओर आड़ में ले जाते हैं । चोर गुड़ी-मुड़ी हालत में कुछ नोट साहब की हथेली पर रखता है । साहब पूछते हैं, “कितना है ?” जवाब मिलता है, “पांच हजार हुजूर ।”

         “कहां और कितने पर हाथ साफ किया ?” साहब रौब से सवाल दागते हैं ।

जवाब में चोर मोहल्ले का नाम लेता है और उसके भीतर मकान की मोटामाटी स्थिति बताता है । लाखएक के करीब का माल रहा होगा यह भी कहता है ।

“इतने से कैसे काम चलेगा ?” सवाल पूछा जाता है ।

“हुजूर अभी देखना होगा बाजार में क्या मिलता है । और फिर रोज-रोज तो मौके मिलते नहीं । इसी में अपना और परिवार का पेट भी पालना होता है । हमारी मजबूरी भी थोड़ा समझिए, हुजूर !”

          “ठीक है, ठीक है”

          “हजूर तो मैं चलूं ?” कहते हुए वह बाहर आकर अपनी साइकिल  पकड़ता है और चल देता है ।

          एक-डेड़ घंटे के बाद एक महिला थाने में पहुंचती है । अपना परिचय देते हुए मोबाइल मिलाती है और कहती है, “सोनी सा’ब, जरा इनसे बात कर लिजिए ।”

          दूसरी ओर से बोले गए हलो और परिचयात्मक शब्दों को सुनने पर साहब बोलते हैं, “अरे लाल साहब, ठीक-ठाक हैं न ? कहां से बोल रहे हैं ?”

          लाल सा’ब फोन पर थानेदार साहब को वाकये के बारे में बताते हुए उनके पास पहुंची अपनी पत्नी की मदद के लिए निवेदन करते हैं । “ठीक है । मैं देख लूंगा, आप परेशान न हों ।”

          लाल साहब की पत्नी अपने घर में हुई चोरी की घटना के बारे में विस्तार से जानकारी देती हैं और तदनुसार एफआईआर दर्ज कराती हैं । मोहल्ले का नाम सुन साहब का माथा ठनकता है । ये तो वही मोहल्ला है जिसके बाबत अभी ‘वह’ आया था । वे आश्वासन देते हुए कहते हैं, “ठीक है हम तुरंत ही आगे की काररवाही करेंगे । आप निश्चिंत होकर लौटिए । चोर पकड़ में आ ही जाएगा ।”

          महिला वापस चली जाती है । थानेदार साहब सोचने लगते हैं, “लगता है यह मामला वही है जिसके लिए कुछ ही समय पहले उन्हें रकम मिली है । … ठीक है, चोरी का सामान तो उससे वापस दिलाना ही पड़ेगा । आखिर अपनी ही बिरादरी का मामला जो है । और पांच हजार की वह रकम ? हाथ में आ चुकी रकम तो लौटाई नहीं जा सकती है । … ठीक है, उससे अगली बार नहीं लेने का वादा करेंगे । … आखिर उसूल का सवाल है ।”

साहब अपने सिपाही को बुलाते हैं और आगे की काररवाही में जुट जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

(यह कथा वास्तविक घटना पर आधारित नहीं है । यह पूर्णतः काल्पनिक है और आज, 20 अप्रैल, के दैनिक जागरण में छपे ‘मडुवाडीह में दारोगा के मकान में चोरी’ शीर्षक वाले समाचार से प्रेरित होकर लिखी गयी है ।यदि कोई आहत महसूस करे तो उससे क्षमा की प्रार्थना है । क्षमा मांगने पर हर पाप धुल जाता है । अपने देश में आजकल माफी मांगने और माफ करने का कर्मकांड काफी लोकप्रिय हो चला है । – योगेन्द्र जोशी)

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असेम्बली बिल्डिंग और डाइनामाइट और …

बीते अगस्त माह के प्रथम सप्ताह मैं सपत्नीक दिल्ली में था । उन दिनों दिल्ली में पर्याप्त वर्षा हो रही थी, लिहाजा वहां की सड़कों के निचले हिस्सों में भारी जलजमाव की स्थिति पैदा हो रही थी । जलजमाव के कारण सड़कों पर यातायात जाम की समस्या तो थी ही, साथ में कुछ जगहों पर वाहनों के पानी में फंस जाने की भी नौबत आ रही थी । यों बरसात के मौसम में इस प्रकार की समस्याएं अपने देश के अधिकांश बड़े शहरों में देखने को मिल जाती हैं ।

दो या तीन तारीख की बात होगी, जब हमें दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में अवस्थित घंटाघर इलाके से पूर्वी छोर पर नौइडा से सटे मयूरबिहार जाना था । इन जगहों के बीच कोई बीस-पच्चीस किलोमीटर की दूरी होगी । लोगबाग आम दिनों यह दूरी बस या आटोरिक्शा से तय करते हैं । हमने भी आटोरिक्शे से जाने का विचार किया, लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी इस लंबी दूरी के लिए तैयार नहीं हुआ । सबको यही डर था कि कहीं फंस गये तो घर वापस लौटना भी मुश्किल हो जाएगा । कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहता था । हार मानकर हमने टैक्सी वाले से संपर्क साधा और उसी से चल पड़े । आटो की तुलना में करीब ढाई गुना किराया देना पड़ा । करते भी क्या, जाना जरूरी जो था । साथ में अटैची-बैग होने के कारण बस-सेवा लेने की भी हिम्मत नहीं थी ।

बताई गयी दूरी को तय करने में डेढ़ घंटे से अधिक समय लग गया । समय बिताने के लिए हमने टैक्सी वाले से ही गपशप शुरू कर दी । हमने दिल्ली की सड़कों, जलजमाव और ट्रैफिक जाम को ही बातचीत का विषय चुना । उसने विस्तार से तकलीफदेह हालातों की जानकारी दी । अपना असंतोष व्यक्त करते-करते वह कहने लगा, “यह सब आज के राजनेताओं की करतूत है जी । सभी भ्रष्टाचार के नाले में डुबकी लगा रहे हैं, उन्हें अपना घर भरने और भाई-भतीजों, यार-दोस्तों को लाभ पहुंचाने से मतलब । खुद ईमानदार होते तो सरकारी आफिसरों पर भी अंकुश रखते । राजनेता-अधिकारी दोनों ही लूट मचाए हैं । इसीलिए न सड़कें टिक पाती हैं, और न ही उनमें जमा पानी की कारगर निकासी हो पाती है । राजनैतिक पार्टियां एक-दूसरे पर कीचड़ उछालती हैं जरूर, लेकिन हैं सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे ।”

मैंने उससे सहमति जताते हुए कहा, “बात तो आप सही कह रहे हैं । इन लोगों को देश की चिंता नहीं; इनकी असली चिंता तो सत्ता हथियाने और उसका भरपूर फायदा उठाने की है । पूरे देश में कमोबेश यही हाल है । इस देश का भगवान ही मालिक है !!”

“एक बात कहूं सा’ब ?”

“जरूर कहिए; आखिर रास्ता जो तय करना है । चुपचाप बैठे रहने से बेहतर है बातचीत चलती रहे ।”

“इधर दिल्ली में एक नयी असेम्बली बिल्डिंग बनने की खबर है … ”

“अच्छा है, एक और मौका मिलेगा धांधली करने का । बिल्डिंग बनेगी तो बनते-बनते गिर भी पड़ेगी ।” मैंने चुटकी ली ।

“वह तो है ही । लेकिन कोई भरोसा नहीं इन लोगों का । हो सकता है मजबूत ही बनवा लें । आखिर उसमें इन्हीं लोगों की बिरादरी बैठेगी न; कोई गरीब जनता के लिए थोड़े ही बनेगी कि जो कमजोर बनने देंगे ।” उसका जवाब था ।

“हां, ये बात भी सही है ।”

“मैं सोचता हूं, सा’ब, कि कोई उस बिल्डिंग के नीचे नींव में डाइनामाइट फिट कर देता । जिस दिन इनॉग्युरेशन (उद्‌घाटन) होता और ढेरों राजनेता उसमें बैठे रहते, उसे उड़ा दिया जाता । अपने आप मरते सब स्सा…”

उसकी बातें सुनकर मैं समझ नहीं पा रहा था कि बदले में मैं क्या बोलूं । इतना मुझे जरूर लग रहा था कि उसके मन में आज के राजनेताओं के प्रति नफरत भरी हुई है । उसकी इस बात पर हम चुप ही रहे । वह अपनी बातें कहते रहा ।

आज राजनेताओं की साख किस कदर गिर चुकी है और लोग उनके प्रति कितना रुष्ट हैं, मुझे इन बातों का अंदाजा उस आदमी की बातों से लग रहा था । – योगेन्द्र जोशी

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“भ्रष्ट आचरण का वाइरस तो हमारे खून में है, सर!”

मैं अपने कंप्यूटर डीलर के आफिस में बैठा हूं । उसके साथ मेरा संबंध कोई अढाई दशक पुराना है – उस काल से जब उसने एक युवा उद्यमी के तौर पर कंप्यूटर के क्षेत्र में कारोबार करना आरंभ किया था, और हम (मैं तथा मेरे अन्य सह-अध्यापक) अपने विश्वविद्यालय (बीएचयू) में कंप्यूटर पाठ्यक्रम की शुरुआत कर रहे थे । देश में तब कंप्यूटर संस्कृति ने कदम रखे भर थे । तब से उस कंप्यूटर विक्रेता के साथ हम लोगों के संबंध बने हुए हैं । ये बातें कहना मुझे प्रासंगिक लगीं इसलिए बता रहा हूं । हां तो हम दोनों वार्तालाप में मग्न हैं । तभी एक भावी खरीददार उनके कार्यालय में पहुंचता है । विक्रेता उस आगंतुक से परिचित है ऐसा मुझे उन दोनों की आपसी बातचीत से लग रहा है ।
वह व्यक्ति विक्रेता से पूछता है, “आप क्या जीरॉक्स मशीन सप्लाइ कर सकेंगे ? ऐसी मशीन जो जीरॉक्स के साथ प्रिंटिंग, स्कैनिंग आदि भी कर सके ?”

“आपका मतलब है ऑल-इन-वन किस्म की मशीन ? हां मिल जाएगी ।” विक्रेता का जवाब है । किस कंपनी की कितने में मिलेगी इसका मोटा हिसाब भी वे बताते हैं । आजकल बाजार में ऐसी मशीनें आ चुकी हैं ।

“दरअसल मेरे फलां अध्यापक ने आपके पास भेजा है जानकारी जुटाने के लिए । उनके पास कुल करीब लाख-एक की रिसर्च ग्रांट है । उसी में जीरॉक्स मशीन के साथ एक डेस्क-टॉप भी लेना है । हो जाएगा न ?”

“हां इतने के भीतर दोनों मिल जाएंगे ।”

“और कुछ कमिशन …।”

“वह… अच्छा… देख लिया जाएगा…, कोशिश करेंगे ।” किंचित् अस्पष्ट-सा जवाब दिया जाता है । दो-चार अन्य बातें भी दोनों के बीच होती हैं । फिर वह आदमी चला जाता है । उसके चले जाने पर कंप्यूटर विक्रेता मुझसे बोलते हैं, “देखा आपने ? खुलकर मांग रखते हैं कमिशन की । विश्वविद्यालय के शिक्षक हैं । आप अंदाजा लगा ही सकते हैं कि अच्छी-खासी तनख्वाह मिलती होगी । फिर भी मांग रखते हैं कि हमारा भी कुछ हिस्सा होना चाहिए … ।” तनिक चुप्पी के बाद वे आगे कहते हैं, “हम भी क्या करें ? आजकल ऐसे खरीदारों की कमी नहीं है । मना करें तो बिजनेस पर असर पड़ता है । मतलब यह कि मैं और मेरे कर्मचारी सभी प्रभावित होते हैं ।”

मैं उनकी मजबूरी समझ रहा हूं । उन्हें तो बिजनेस करते रहना है । जो आदमी अच्छे वेतन, तमाम भत्तों एवं भविष्य की पेंशन के साथ आर्थिक सुरक्षा भोग रहा हो वही जब कदाचरण पर तुल जाए तब वह क्या करे जिसके स्वयं तथा कर्मचारियों के पास सुरक्षित भविष्य की कोई गारंटी नहीं ? मैं जिज्ञासावश पूछ लेता हूं, “कहां के अध्यापक हैं वे जिनका जिक्र हो रहा था ?” ।

“काशी विद्यापीठ ।” जवाब मिलता है ।

विद्यापीठ! यानी वाराणसी के तीन सरकारी विश्वविद्यालयों में से एक । आर्थिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हमारे बीच कुछ देर तक बातचीत चलती है । बीच-बीच में किसी के आने से व्यवधान भी पड़ता रहता है । वार्तालाप के दौरान वे कहते हैं, बीएचयू में आज भी यह सब नहीं चलता है । इक्का-दुक्का कोई मामले हों तो हों । आपके फिजिक्स विभाग के साथ पिछले पच्चीस-एक साल से मेरा बिजनेस चल रहा है, किंतु आजतक किसी के साथ ऐसी बात नहीं हुई ।”

“मुझे बीएचयू (फिजिक्स विभाग) छोड़े तो सात साल हो चुके हैं । इस समय वहां के हाल क्या हैं कह नहीं सकता, लेकिन मेरे कार्यकाल के समय स्थिति ठीक थी । अब तो कुल मिलाकर सभी जगह गिरावट का दौर चल रहा है । कोई चारा नहीं है ऐसा लगता है मुझे । ”

भ्रष्टाचार का वाइरस तो हम लोगों के खून में घुल चुका है, सर! जिनसे इलाज की उम्मींद की जानी चाहिए उनके खून में भी ।”

“हो सकता है ।” कहते हुए मैं उठता हूं और उसके आफिस से लौट आता हूं । सोचने लगता हूं कि समाज की यह बीमारी क्या वाकई में लाइलाज है । जब विश्वविद्यालय का अच्छाखासा खातापीता शिक्षक तक इस मानसिकता पर उतर आया हो तो औरों के क्या हाल होंगे ? – योगेन्द्र जोशी

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आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई

आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई ।
इस नगरी की रीत निराली शासन को नहि देत दिखाई ।।

प्रशंसा के ये शब्द मैंने अपनी विश्वप्रसिद्ध नगरी वाराणसी (वाराणसी) के लिए लिखे हैं । वाराणसी कुछ लोगों के लिए तीर्थस्थली है तो औरों के लिए यह दर्शनीय पर्यटन स्थल है । जहां हिंदू धर्मावलंबी गंगास्नान एवं भोलेबाबा विश्वनाथ के दर्शन करके पुण्यलाभ पाते हैं, वहीं बौद्ध मतावलंबी भगवान् बुद्ध की उपदेशस्थली सारनाथ के दर्शन पाकर स्वयं को कृतार्थ मानते हैं । पर्यटकों के लिए सारनाथ के श्रीलंकाई, चीनी, तिब्बती एवं जापानी आदि मंदिर महत्त्व रखते हैं । उनके लिए उत्तरवाहिनी गंगा के पश्चिमी किनारे के 4-5 किलोमीटर तक विस्तार पाये परस्पर जुड़े घाटों का दृश्य भी आकर्षण का केंद्र रहता है । प्रातःकाल उगते सूर्य की किरणों से नहाए इन घाटों की झलक पाना उनके लिए सौभाग्य की बात होती है । रामनगर का किला, काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विशाल परिसर, और भारत सरकार का रेल इंजन कारखाना भी दर्शनीय स्थल माने जाते हैं । पूरे नगर में यत्रतत्र स्थापित छोटे-बड़े मंदिरों का आकर्षण अपनी जगह पर है ।

जिसने वाराणसी न देखा हो वह जीवन में एक बार इस नगरी का भी दर्शन कर ले ऐसा निवेदन मैं उनसे अवश्य करना चाहूंगा । मेरे निवेदन के कारण सर्वथा भिन्न हैं । मैं तो उनसे कहूंगा कि 18-20 लाख की आबादी वाला पूरी तरह दुर्व्यवस्थित नगर कैसा होता है यह बात इस नगरी के दर्शन से ही समझ में आता है । मेरा मानना है कि मनुष्य को केवल सौन्दर्य के ही दर्शन नहीं करना चाहिए, उसे जीवन की कटु कुरूपता का भी साक्षात्कार करना चाहिए । और उस कार्य के लिए वाराणसी से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता । जितने भी शहर मैंने आज तक देखे हैं उनमें सर्वाधिक दुर्व्यवस्थित मैंने वाराणसी को ही पाया ।

उक्त बातें मैं वाराणसी के बारे में विशद चर्चा के उद्येश्य से नहीं कर रहा हूं । मैं तो ये बातें यहां की दुर्व्यवस्था और उसके कारण-स्वरूप प्रशासनिक भ्रष्टाचार के अपने अनुभव को समझाने के लिए बतौर पृष्ठभूमि के पेश कर रहा हूं । वाकया 5-7 साल पहले का होगा जैसा मुझे याद आता है । उस समय मेरे घर के पास से गुजरने वाले मुख्य मार्ग पर सीवर-पाइप डालने का कार्य चल रहा था । सड़क के एक तरफ गहरे खुदाई करके 6-8 फिट व्यास की सीमेंट-कांक्रीट की पाइपें जमीन में डाली जा रही थीं । बनारस शहर की अति-उन्मुक्त जीवनशैली के अनुकूल सड़क पर चलने वाले काम को ‘फ्री-स्टाइल’ तरीके से अंजाम दिया जाता है । खुदाई में निकली मिट्टी के ढेर को गढ़े के किसी भी तरफ बेतरतीब तरीके से जमा कर दिया जाता है । ठेकेदार और सरकारी अधिकारियों को राहगीर और वाहन कैसे उस मार्ग से गुजरेंगे इस बात की चिंता नहीं रहती है । अधिकारी तो शायद ही कभी कार्यस्थल पर आते होंगे । सरकारी परंपरा के अनुरूप सब कार्य कागज पर ठीक से चल रहा होता है । जमीनी हकीकत से उन्हें कोई मतलब नहीं रहता । यह अपने देश की शासकीय खूबी है ।

हां तो मैं कह रहा था कि सड़क के एक ओर गहरे खोदकर पाइपें डाली जा रही थीं । इस दौरान टहलते हुए एक दिन मैं उस सड़क पर जा रहा था । कुछ दूर पहुंचने पर देखता हूं कि सड़क की मरम्मत का कार्य चल रहा था । दर असल बीती बरसात के समय सड़क उखड़ चुकी थी और उसमें जगह-जगह गड्ढे बन चुके थे । इसलिए रोड़ी-तारकोल का मिश्रण सड़क पर बिछाया जा रहा था । मैं देखकर आ रहा था कि कुछ दूर पर पाइपें डाली जा रही थीं और जान रहा था कि उस स्थान पर भी दो-चार दिन में खुदाई होगी । मेरे दिमाग में सवाल घूमने लगा कि तब इस मरम्मत कार्य का तुक भला क्या है । मैंने रुककर एक श्रमिक से जिज्ञासावश पूछा, “क्यों भई, कोई अधिकारी भी है यहां जो इस काम को करवा रहा हो ?”

दूर खड़े एक सज्जन की ओर इशारा करते हुए वह बोला, “वो देखिए, हमारे जेई (जूनियर इंजीनियर) साहब वहां खड़े हैं ।”

आगे बढ़कर मैं उस सज्जन के पास पहुंचा और बोला, “भाई साहब, आप मरम्मत का कार्य यहां पर करवा रहे हैं । क्या आप देख नहीं रहे हैं कि पीछे से खुदाई करके पाइप डालने का कार्य भी चल रहा है । ऐसे में इस मरम्मत का क्या औचित्य है भला ?”

“आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन … ।” ऐसा कहते हुए एक-दो क्षण को रुक गये ।

अपनी बात पूरी करने से पहले उन्होंने मेरा परिचय जानना चाहा । मैंने अपने बारे में समुचित जानकारी देते हुए फिर पूछा, “लेकिन आप ये काम इस समय करवा क्यों रहे हैं ?”

उनका जवाब था, “ऐसे ही आर्डर मिले हैं । अगला महीना मार्च का है न ? इसलिए सड़क के लिए मिले बजट का पैसा खर्च करना है ।”

मैं उनके उत्तर से अवाक् था । उनसे फिर पूछा “परंतु आपने अपने उच्चाधिकारियों को बताया नहीं कि इस समय पाइप डालने का काम भी चल रहा है ।”

उनका उत्तर निराशा पैदा करने वाला था । मेरे परिचय से वे आश्वस्त थे कि मैं कोई ‘खतरनाक’ व्यक्ति नहीं हूं । अतः मुझ पर भरोसा करते हुए वे बोले, “सा’ब, मेरी कुछ भी सलाह देने की हिम्मत कहां है ? आप जानते ही होंगे कि इस प्रकार के ठेकों के कार्य माफिया तंत्र को मिलते हैं । उनसे पंगा लेकर अपने और अपने परिवार की जान जोखिम में डालने की हिम्मत मुझ जैसे अदने कर्मचारी की कैसे हो सकती है । कुछ कहने का मतलब उनके गुस्से का शिकार होना ।”

मुझे लगा कि वह व्यक्ति झूठ नहीं बोल रहा था । सरकारी ठेके आपराधिक छबि के लोगों को मिलते हैं यह तो समाचारपत्रों में मैं पढ़ता ही आ रहा था । अतः मुझे लगा कि वह जेई सच ही कह रहा होगा ।

मेरे पास अधिक कुछ कहने को नहीं था । चुपचाप आगे बढ़ गया । – योगेन्द्र जोशी


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“सेवा में कुछ मिलेगा?” – जल निगम कर-संग्राहक की मांग

आजकल भ्रष्टाचार की बातें जोर-शोर से की जा रही हैं । महज बातों से कुछ होना नहीं है, फिर भी उन पर बहसें चल रही हैं, बौद्धिक विलास के लिए ही सही । समाज अपने तरीके से चलता आया है और आगे भी चलेगा । बातें करते समय हम भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार तो हमारे खून में घुल चुका है, उसे दूर करेंगे कैसे । हालात कुछ वैसे ही वैसे ही हैं जैसे दूध में नमक घुल गया हो । नमक की डली दूध में घुल जाए उसके पहले ही यदि दूध निथार लिया जाए तो उसकी अशुद्धता स्वीकार्य स्तर पर बनी रह सकती है । लेकिन जब नमक घुल ही चुका हो तो आप कुछ नहीं कर सकते हैं । दूध फेंक सकते हैं, बस । लेकिन दूध फेंकने की हैसियत ही न हो तो आपको उसी से काम चलाना पड़ेगा । हम हिंदुस्तानियों के हाल कुछ ऐसे ही हैं । जिंदगी के दूध में भ्रष्टाचार का नमक घुल चुका है । असल दूध तो आप नाली में उड़ेल सकते हैं, किंतु जिंदगी को तो छोड़ नहीं सकते हैं । उसे जीना ही पड़ेगा, भ्रष्टाचार को सहज भाव से सहते हुए । यही सब चल रहा है । अस्तु ।

मेरा वास्ता सरकारी महकमों से कम ही पड़ता है । इसलिए किसी सरकारी दफ्तर में बैठी भ्रष्टाचार की राक्षसी के दर्शन करने की नौबत लंबे समय से नहीं आई है । लेकिन पिछले हफ्ते वह मुझे घर बैठे ही दर्शन दे गई, भले ही कुछ सेकंडों के लिए । इतने भर से मैं भयभीत नहीं हुआ, किंतु उसका संदेश मेरे सवा लीटर के भेजे में घुस ही गया, “मूर्ख मानुष, इस मुगालते में नहीं रहना कि मैं अब जिंदा नहीं रहूंगी । मैं तो तब तक जीती रहूंगी जब तक तुम्हारी यह मानव जाति घरती पर है । तुम मेरे विरुद्ध जो चाहो बको, मुझे फर्क नहीं पड़ता है । … और सुन लो, उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिंद महासागर के बीच का यह भूखंड तो मुझे खास पसंद है । इसे छोड़ मैं कहीं भी जाने वाली नहीं ।” और यह मूक संदेश देकर वह अंतर्धान हो गयी ।

पिछले हफ्ते हुआ क्या इसकी चर्चा पर लौटता हूं । मेरे शहर वाराणसी में जल निगम के कर-संग्राहक पानी एवं सीवर का टैक्स आम तौर पर संबंधित उपभोक्ताओं के मकानों पर जाकर नगद वसूलते हैं । आप चाहें तो उनके कार्यालय की खिड़की पर जाकर भी टैक्स जमा कर सकते हैं । घर पर आकर उनके टैक्स इकट्ठा करने पर किसी को आपत्ति नहीं होती होगी । शायद निगम के तत्संबंधित कर्मियों को भी वसूली दिखानी पड़ती होगी, इसीलिए वे इतनी दिलचस्पी लेते होंगे । अन्यथा सरकारी कर्मी क्योंकर जहमत मोल लेगा ? हां, तो पिछले सप्ताह एक टैक्स कर्मी घर पहुंचे । शिष्टाचार के नाते मैंने उनका हल्के-फुल्के जलपान के साथ स्वागत किया । ऐसा शिष्टाचार मैं अधिकांश मौकों पर बरतता ही हूं । बीते दो-चार सालों से जो सज्जन आ रहे थे उनसे मेरा सामान्य परिचय हो चुका था । किंतु इस बार का चेहरा नया था । मैंने टैक्स की राशि के बारे में पूछा तो पता चला कि इस बीच कुछ वृद्धि हो चुकी है । उन्होंने दो हजार एक सौ छियानबे का हिसाब समझाते हुए कहा, “दो हजार दो सौ का ही हिसाब समझ लीजिए ।”

मैंने उनको पांच-पांच एवं सौ-सौ के नोटों के माध्यम से बाइस सौ रुपयों की राशि पेश की । ये छियानबे की राशि सौ के बेहद करीब थी, इसलिए मैंने सोचा कि वे चार रुपये लौटा देंगे । लेकिन उनके “… हिसाब समझ लीजिए” कहने पर मुझे अंदेशा तो हो ही गया कि उनकी नियत कुछ ठीक नहीं है । घर के ओने-कोने से बीन-बटोरकर फुटकर छियानबे का इंतजाम शायद हो भी जाता, लेकिन मैंने इसकी कोशिश नहीं की । मैंने सोचा कि वे चार रुपये नहीं भी लौटाएंगे तो बहुत बड़ी बात नहीं । चायपानी के तौर पर पांच-सात रुपये का खर्च तो मैं स्वेच्छया कर ही रहा था, चार रुपये और सही यही विचार मन में आया । उन्होंने टैक्स का पैसा जेब में रखा और उसकी रसीद तैयार कर मुझे सौंप दी । उनके साथ बैठे-बैठे दो-चार बातें इधर-उधर की भी हो गयीं ।

असल कार्य संपन्न हो चुका था और मैं इंतजार कर रहा था कि अब वे उठेंगे और विदा लेंगे । अंत में उठने से पहले वे बोल पड़े “सेवा वगैरह कुछ होगी ?”

मैं चौंका, क्षण भर के लिए सोच में पड़ा कि क्या मतलब । फिर संभला और समझ गया कि वे दान-दक्षिणा की उम्मींद लेकर चल रहे थे । मैं उसके लिए तैयार नहीं था और न उसकी कोई वजह ही थी । वे टैक्स इकट्ठा कर रहे थे तो विभाग का दायित्व निभा रहे थे । मैं उनसे कोई उल्टा-सीधा कार्य करवा रहा होता तो कुछ बात भी होती । मुझे तो उनका चार रुपया न लौटाना ही खल रहा था, जिसके बारे में मैंने कुछ कहा नहीं । मैंने संयत होकर जवाब दिया, “आज तक तो ‘ऐसा’ कुछ किया नहीं, भला आज कोई नयी बात तो हुई नहीं ।”

विचारे किंचित् नैराश्य भाव से बोले “हां, वो तो मालूम है … ।” और अपना झोला उठाकर वे चल दिए ।

उनके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि कुछ सरकारी मुलाजिम पूरी बेशर्मी के साथ भिखमंगों की भांति पैसा मांगने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं । मुझे लगता है कोई भी कानून लोगों में संकोच भाव पैदा नहीं कर सकता । बेहयाई के साथ पैसा वसूलने में कइयों को कोई दिक्कत नहीं होती । तब भला भ्रष्टाचार की राक्षसी इस देश को छोड़ कहीं अन्यत्र  क्यों जाएगी ? – योगेन्द्र जोशी

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