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साफ-सफाई की ध्वस्त नागरिक व्यवस्था

 

 

 

 

 

 

 

 

दैनिक जागरण समाचार-पत्र के २१ अगस्त के अंक में वाराणसी की ध्वस्त सफाई व्यवस्था की कुछ तस्वीरें छपी हैं जिनमें से एक यहां प्रस्तुत है। तस्वीरों के पृष्ठ का लिंक पेश कर रहा हूं:

https://epaper.jagran.com/epaper/21-aug-2019-45-varanasi-city-edition-varanasi-city-page-10.html#

      इन तस्वीरों को देख मेरा मन हुआ कि कचरा निबटारे की अपनी निजी व्यवस्था का और साथ ही घर-घर कूड़ा-उठान से जुड़े अनुभव का जिक्र कर डालूं।

वाराणसी में कूड़े-कचरे के निपटारे की कोई कारगर व्यवस्था पहले कभी नहीं थी। लोग सड़क के किनारे रखे गए बड़े-बड़े कूड़ेदानों अथवा खुले में कूड़ा-कचरा डाल देते थे। नगर-निगम की गाड़ी बीच-बीच में आकर उसे उठा लेती थी। 8-10 वर्ष पूर्व घरों से कूड़ा-उठान की नयी योजना आरंभ की गई थी। मेरे मुहल्ले में इस कार्य का जिम्मा “ए-टु-ज़ेड” नाम की संस्था को मिली थी। संस्था को हर घर से 50 रुपये बतौर शुल्क के इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी दी गयी थी। इस योजना में एक समस्या थी। लोग पैसा देने में टालमटोल करते थे।इसी दौरान कार्यदायी संस्था का नगर निगम के साथ विवाद भी पैदा हो गया और उसने कार्य करना बंद कर दिया। तब मैंने कच्चे (गीले) कचरे को सड़ाकर खाद बनाने का रास्ता अपनाया। इस हेतु मैंने अहाते के एक स्थान पर अपने हाथों से ईंट-सीमेंट आदि से एक “कचरा-दान” बना लिया जिसकी तस्वीर यहां प्रस्तुत है।

 

 

 

 

 

 

सूखे के लिए सड़क वाली व्यवस्था ही रहने दी, जो यथावत बनी रही। दरअसल घर-घर से बटोरे गये कूड़े-कचरे को सफाईकर्मी भी सड़क पर ही डालते हैं, जहां से उसे नगर-निगम की कूड़ागाड़ी उठाती है। कूड़ा-कचरा निस्तारण पर पहले भी मैंने अपने ब्लॉग (12 दिसम्बर 2015)  पर लेख लिखा है।

कुछ महिनों के बाद “ए-टु-ज़ेड” कंपनी फिर से काम पर लौट आई। इस संस्था के क्षेत्रीय पर्यवेक्षक ने मुझे आश्वस्त किया कि कार्य सुचारु चलेगा। डेड़-दो वर्ष तक कार्य चलता रहा। एक दिन संस्था का नगर निगम के साथ फिर से मतभेद पैदा हो गये और उसने स्थाई तौर पर शहर से अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया। मैं वापस अपनी निजी व्यवस्था पर लौट आया।

फिर कुछ महीनों के बाद “कियाना सेर्विसेज़ एंड सॉलुशन्ज़” नामक एक नयी संस्था ने कूड़े-कचरे के निस्तारण की जिम्मेदारी ले ली। घरों से कूड़ा-उठान फिर आरंभ हो गया। मैंने उस संस्था की सेवाएं लेना शुरू कर दिया। जो सफाईकर्मी हमारी गली से कूड़ा उठाता था उसका रवैया संतोषप्रद नहीं रहा।  रविवार तो उसे अवकाश मिलता ही था, लेकिन वह अन्य साप्ताहिक दिनों पर भी किसी न किसी बहाने अक्सर गायब हो जाता था। दिक्कत तब होने लगी जब वह  कभी-कभी लगातार चार-छ: दिनों तक गायब हो जाता था। खीजकर मैंने संस्था की सेवा लेना बंद कर दी।

दो-तीन सप्ताह बाद संस्था का स्थानीय पर्यवेक्षक शुल्क (पहले की तरह 50 रुपया प्रतिमाह) वसूलने आया तो मैंने उससे कहा, “इस गली का सफाईकर्मी अपने काम में अनियमितता बरतता है। किसी वाजिब कारण से यदि वह 4-4 6-6 दिनों अनुपस्थित रहे बात सनझ में आती है, लेकिन तब उस अंतराल के लिए अन्य कर्मी को यहां का कार्य सोंपा जाना चाहिए। अगर ऐसा न हो तो फिर आपकी सेवा लेना बेकार है।”

पर्यवेक्षक ने उत्तर दिया, “आपको अब शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। हम समुचित व्यवस्था करेंगे। आपको मौजूदा व्यवस्था में सहयोग देना चाहिए। आप ही लोग ऐसे मना करेंगे तो व्यवस्था कैसे चल सकेगी? इसलिए हमारी सेवा लेना बंद मत करें।”

मैंने उसकी बात मान ली। स्वयं मेरा मानना था शहर में कूड़ा-निस्तारण की व्यवस्था होनी चाहिए और नागरिकों ने अपने स्तर पर उसमें सहयोग देना चाहिए। सफाईकर्मी तो वही रहा फिर भी कूड़ा उठाने का कार्य सुचारु चलने लगा। वह कभी-कभार 1 या 2 दिन के लिए गायब हो जाता था, जिसकी हम अनदेखी कर देते थे। आवश्यकता होने पर विकल्पतः अन्य कर्मी भी आ जाया करता था। लेकिन यह सब अधिक समय तक नहीं चल पाया।

बीती होली के दूसरे दिन वह आया और घर से “त्योहारी” मांग ले गया। फिर 8-9 दिनों तक गायब रहने के बाद लौटा। अनुपस्थिति पर हमने नाखुशी जताई तो उसने उल्टे हमसे ही रूखेपन से सवाल किया, “आप बाहर नहीं जाते क्या कभी?”

तब हमने उसे कूड़ा उठाने से मना कर दिया। वह चला गया और हम फिर से अपनी व्यव्स्था पर लौट आए।

मैंने संस्था के स्थानीय कार्यालय को फोन किया, “मुहल्ले की मेरे गली में जिस सफाई-कर्मी की ड्यूटी लगी थी वह हफ्ता-दस-दिन गायब रहा। अब हमने उसे मना कर दिया है। यदि इस गली में मौजूदा सफाईकर्मी ही कार्य करेगा तो उसे कूड़ा नहीं सोंपेंगे।”

मुझे प्रत्युत्तर मिला, “हमारा पर्यवेक्षक आपके से मिलेगा और आपकी समस्या को हल करेगा।”

तब से न पर्यवेक्षक आया और न ही कोई और। हमारी तरफ से जो देय शुल्क था उसे वसूलने भी कोई नहीं आया। हाल यह हैं कि गली में 8-10 मकान हैं। उनमें से 3-4 मकान से ही कूड़ा उठता है; शेष ने अपनी व्यवस्था कर रखी है। बनारस स्मार्टसिटी शायद ऐसे ही बनेगा!

जो होना चाहिए वह होता नहीं। बस जिन्दगी यों ही चलती है। – योगेन्द्र जोशी

 

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प्लास्टिक थैलियां इस्तेमाल न करने की बात और पहले आप पहले आप की चिरस्थायी नीति!

चंद रोज पहले की ही बात है । मैं अपने किराने-परचून की दुकान पर गया था घरेलू इस्तेमाल की दो-चार चीजें खरीदने के लिए । मैं अपने साथ सदा ही कपड़े का थैला ले जाया करता हूं उसमें सामान भरकर लाने के लिए । मेरा दुकानदार जानता है कि मैं पतले प्लास्टिक के थैलों के इस्तेमाल का धुर विरोधी हूं । जब कभी उसका सहायक प्लास्टिक के थैले में कोई चीज लाकर देने लगता है तो वह उसे टोक देता है, “देखते नहीं आप थैला लेकर आये हैं ? यह देखना भूल जाते हो कि कौन ग्राहक थैला लेकर आया है और कौन नहीं।”

मैं खुद भी उसके सहायक को अक्सर टोक देता हूं, अरे भई तपाक-से प्लास्टिक में सामान भर के मत थमा दिया करो । खुद भी कभी-कभार अपनी तरफ से ग्राहकों से कह दिया करो कि बाबूजी, थैला लेकर आते तो ज्यादा अच्छा होता । कोई तुम्हें मारने थोड़े ही आएगा । अगर कोई प्लास्टिक की मांग पर अड़ जाए तो दे दिया करो । लेकिन एक बार कह तो सकते हो न ।”

अपने शहर वाराणसी में प्लास्टिक की बहुत पतली थैलियों का दुकानदारी में बेरोक-टोक इस्तेमाल होता है । मेरी जानकारी में ऐसी थैलियों पर काननूी रोक है । लेकिन कानून बेचारा क्या करें ? उसके अपने हाथ-पांव तो होते नहीं कि खुद चलकर कानून के उल्लंघन को रोके । और प्रशासनिक तंत्र के पास काम का इतना बोझ रहता है कि वह हाथ पर हाथ रखकर सब कुछ होते हुए देखने में ही अपनी भलाई पाता है । अतः कानून तो बन जाते हैं, लेकिन उससे वस्तुस्थिति नहीं बदलती । जो अनर्थ लोग करने लगते हैं वह बदस्तूर चलता रहता है । हर कोई इस बात का इंतिजार करता है कि कानून डंडा लेकर दौड़ते हुए उसके पास आये और उसे रोके । कोई मुझे टोके इसका इंतिजार किए बिना ही मैं खुदबखुद कानून का पालन करूंगा ऐसी सोच ऊपर वाले ने उसे शायद दे ही नहीं रखी है ।

मेरे दुकानदार ने एक-दो बार अपने ग्राहकों को कपड़े की थैलियां बांटकर उनसे आग्रह किया था कि वे उन थैलियों को लेकर आएं । लेकिन जब लोगों ने कसम खा रखी हो कि जब तक उनका वश चलेगा वे कोई भला काम नहीं करेंगे, तो भला चीजें कहां सुधरने वाली । लिहाजा दुकानदार ने ही अपनी गलती सुधार ली । यों उसने मुझे बताया था कि प्लास्टिक का इस्तेमाल कुल मिलाकर उसे महंगा ही पड़ता है । लेकिन करे क्या ग्राहकों को नाखुश भी तो नहीं कर सकते !

उस दिन की घटना पर वापस लौटता हूं । मूल्य चुकता करके जब मैं अपना सामान साथ लाए कपड़े के झोले में संभाल रहा था तब दुकानदार का सहायक प्लास्टिक के एक बड़े-से थैले में अन्य ग्राहक का सामान भरकर ले आया । ग्राहक महोदय मेरे ही बगल में खड़े थे । अपरिचित होते हुए भी मैंने विनम्र भाव के साथ मुस्कराते हुए उनसे कहा, “झोला साथ लेकर अगर  आप भी सामान खरीद ले जाया करें तो अच्छा होगा । देखते ही होंगे कितना प्लास्टिक सड़कों-नालियों में पड़ा रहता है । अपने शहर में इसके निस्तारण का कोई प्रबंध तो है नहीं । अपनी तरफ से हम लोग इतना भी कर लें तो कुछ अंतर तो पड़ेगा ही ।”

मैं जब भी खरीद-फरोख्त करता हूं तो प्लास्टिक की थैली के लिए यथासंभव मना कर देता हूं । मेरी पत्नी एवं मैं आम तौर पर अपने साथ थैला आदि लेकर चलते हैं । कभी-कभार दुकानदार भी कपड़े के थैले में सामान भरके दे देता है । मैं अक्सर दुकानदार तथा अगल-बगल खड़े ग्राहकों को भी बिन मांगी सलाह दे बैठता हूं । ऐसी धृष्टता के साथ पेश आना मेरे स्वभाव का हिस्सा बन चुका है । और यही धृष्टता मैं इस बार भी कर बैठा । उक्त ग्राहक मेरी बात पर नाखुशी व्यक्त कर सकते थे, परंतु ऐसा हुआ नहीं । मेरी भावना को स्वीकार करते हुए बोले, “हां, आप ठीक कहते हैं, लेकिन झोला लेकर चलने की आदत ही नहीं बनी । दुकानदार प्लास्टिक के थैले में सामान दे देता है, तो उसी में सुविधा लगती है । दुकानदार ऐसे थैले देना बंद कर दे तो झोला साथ लाना शुरू हो जाए ।”

“लेकिन दुकानदार कहता है कि अनुरोध करने के बावजूद लोग अपने साथ थैला लाते ही नहीं । वे तो प्लास्टिक की थैली में ही सामान मांगते हैं । आप कहते हैं कि दुकानदार बंद करे ऐसी थैली देना, और दुकानदार कहता है कि ग्राहक मांगना बंद करें । पहले अंडा या मुर्गी वाला सवाल यहां खड़ा हो जाता है । इसलिए कुछ हो नहीं पाता ।” मैंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

वे बोले, “आप सही कह रहे हैं, मुझे कोशिश करनी चाहिए ।”

उनके इस कथन को सुनने के बाद मैंने उनसे विदाई ली और घर की राह चल पड़ा । – योगेन्द्र जोशी

 

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