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“आज के जमाने में किसी प्यासे को पानी पिलाने से भी कतराते हैं लोग”

वाकया पांच-छः हफ्तों पहले का है । गर्मियों के दिन, दोपहर का वक्त और ऊपर से तेज धूप । मेरे मकान के गेट पर लगी घंटी घनघनाती है । मैं बाहर आता हूं । गेट पर कूरियर से आई डाक देने एक युवक अपनी साइकिल के साथ खड़ा है । मैं गेट खोलता हूं और वह मकान के अहाते में दाखिल होता है, जहां पर छांव है । मैं उसके द्वारा पेश कागज पर डाक प्राप्ति के संकेत स्वरूप दस्तखत करता हूं, और उससे डाक ले लेता हूं । वह लौटने को गेट की ओर मुड़ने लगता है । मैं उसे रोकते हुए पूछता हूं, “आप धूप में आए हैं, प्यासे होंगे । इस ग्रीष्मकालीन धूप में काफी पानी पीकर चलना चाहिए । पानी पिलाऊं आपको क्या ?”

“अगर एक गिलास पानी पिला सकें तो मेहरबानी होगी ।” वह व्यक्ति पानी पीने की इच्छा जाहिर करते हुए जवाब देता है ।

मैं उस आदमी को दो मिनट रुकने की बात कहते हुए घर के अंदर दाखिल होता हूं । घर में मेरे अतिरिक्त एकमात्र अन्य सदस्य मेरी पत्नी है, बस । मैं पत्नी से एक गिलास शरबत तैयार करने को कहता हूं । फिर एक ट्रे में दो टुकड़े मीठे के साथ शरबत और ठंडे पानी के गिलासों के साथ बाहर आता हूं और बाहर पड़े एक स्टूल पर रखते हुए उस व्यक्ति को पेश करता हूं ।

“अरे…, आप तो …।” उसके मुख से दोएक शब्द निकलते हैं । उसके चेहरे पर किंचित् विस्मय के साथ संतोष के भाव झलकते हैं ।

“कोई बात नहीं, … आप इन्हें लीजिए ।” मैं उसे आश्वस्त करता हूं ।

वह पेश की गयी सामग्री खा-पीकर धन्यवाद देता है, और उसके बाद कहता है, “आप तो बुलाकर पानी पिला रहे हैं । भला कौन करता है ऐसा ! गेट पर खड़े होकर कोई प्यासा एक गिलास पानी मांगे तो उसे देने से भी कतराते हैं लोग । आपकी तरह पानी ही नहीं शरबत भी पिलाए कोई ऐसा शायद ही कहीं देखने को मिले ।”

“नहीं, ऐसा नहीं है । दुनिया में सभी प्रकार के लोग होते हैं । यह तो संयोग की बात है कि कब किस प्रकार के आदमी से भेंट हो जाए ।” मैं प्रतिक्रिया व्यक्त करता हूं । फिर पूछता हूं “आपको तो अभी और जगह भी जाना होगा । देर हो रही होगी ।”

वह आभार व्यक्त करते हुए नमस्कार करता है और गेट के बाहर निकल जाता है । पीछे से मैं भी गेट पर आता हूं और उसे विदा करते हुए गेट बंद कर देता हूं । बात आई-गई हो गयी ।

संयोग से करीब दो-चार दिन पहले वह व्यक्ति फिर एक डाक लेकर मेरे पास पहुंचा । मुझे अक्सर कूरियर से डाक मिलती रहती है, कभी कोई पुस्तक तो कभी किसी स्वयंसेवी संस्था के कागज पत्र, या परिचितों के द्वारा भेजी कोई सामग्री, आदि । आम तौर पर हर बार किसी नये कूरियर-वाहक से साक्षात्कार होता है । लेकिन इस बार दुबारा एक व्यक्ति मेरे पास पहुंचा । गर्मी यथावत् चल रही थी, और उस दिन भी अच्छी-खासी धूप थी । पिछली बार की तरह इस बार भी मैंने शरबत और पानी के साथ उसकी आवभगत की । प्रतिक्रिया में इस बार वह पूछने लगा, “मुझे याद है कि पिछली बार भी आपने ठंडा खिलाया-पिलाया था । लगता है कि आपके पास आने पर कुछ भी खाने-पीने को मिल जाएगा । क्या आप अक्सर ऐसा करते हैं ?”

“कुछ ऐसा ही समझ लीजिए ।” मैंने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया ।

“मैं समझता हूं आम तौर पर ऐसा शायद ही कोई करता है । लेकिन लगता है कि आप कुछ हटकर सोचते हैं । जान सकता हूं कि ऐसा क्यों ?”

मैं हंस देता हूं, “अच्छा लगता है इसलिए ।” मैं क्षण भर के लिए चुप रहता हूं, फिर अपने विचार समझाने के लिए आगे कहता हूं, “गेट पर कोई पहुंचा हो तो उससे अदब-से पेश आना और चाय-पानी के लिए पूछ लेना अच्छा लगता है, खास तौर पर इसलिए कि ऐसा करना मेरी हैसियत में है । गेट पर आया हर व्यक्ति चोर-उचक्का-बदमाश हो ऐसा मानकर नहीं चला जा सकता है । अभी तक मुझे कोई बुरा अनुभव नहीं हुआ है । किसी जरूरतमंद की छोटीमोटी मदद करने पर सुकून का अनुभव होता है । … और अधिक अहम बात तो यह है कि अब जिंदगी में बहुत-कुछ पाने को नहीं है, बहुत कुछ छोड़कर जाने का वक्त आ रहा है । क्या पता ऐसा करने से अपनी ‘ऊपर’ की यात्रा कुछ हद तक आसान रहे ।”

वह मेरा मतलब समझ जाता है । कहने लगता है, “चाहता हूं कि कभी इतना समय मिले कि साथ बैठकर आपसे अधिक बातें सुन सकूं । अभी तो मुझे अपना काम संपन्न करने निकलना ही है ।”

धन्यवाद ज्ञापन और समुचित अभिवादन करते हुए वह गेट के बाहर निकलता है और साइकिल पर चढ़कर आगे बढ़ जाता है । पीछे से मैं गेट बंद करता हूं, और संतोष भाव के साथ घर के अंदर दाखिल हो जाता हूं । – योगेन्द्र जोशी

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