Tag Archives: public place smoking prohibited

सिगरेट का शौक छोड़ना आसान नहीं

मैं आजकल चार-एक हफ्तों के प्रवास पर बेंगलूरु (बंगलौर) के ह्वाइट्फ़ील्ड इलाके में हूं जहां आइ-टी यानी इंफ़र्मेशन टेक्नॉलॉजी (सूचना तकनीकी) तथा अन्य प्रकार के अधिकांश कार्यालय हैं। मैं सुबह-शाम और कभी-कभी दोपहर में बाहर कार्यालयों के आसपास टहलने के लिए निकलता हूं। मुझे यह शहर उतना सुव्यवस्थित नहीं लगा जितने की मैंने कल्पना की थी। सड़कें साफ-सुथरी और यातायात सुव्यस्थित हो ऐसा मैंने नहीं पाया।

एक बात जिस पर मैंने गौर किया वह यह है कि इस शहर में सिगरेट पीने का काफी चलन है। मैं शहर के भीतरी और पुराने इलाकों के बारे में कह नहीं सकता, क्योंकि मेरा घूमना-फिरना तीन-चार किलोमीटर के सीमित दायरे में ही रहा है। ह्वाइटफ़ील्ड के इस इलाके में सड़क के किनारे चलते-फिरते या पान-सिगरेट के स्टॉल के पास सिगरेट पीते हुए कई लोग दिख जाते हैं। सिगरेट का शौक नवयुवतियों-महिलाओं में भी देखने को मिला है मुझे। यह बात भारतीय समाज के संदर्भ में काफी असामान्य कही जाएगी। मेरा मन होता रहा कि उन लोगों से उनकी इस आदत के बारे में दो-चार बातें पूछूं, किंतु किसी के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

कल मैंने हिम्मत जुटा ही ली। सड़क के किनारे चबूतरे की शक्ल की एक जगह पर दो युवतियां बैठी थीं सिगरेट के कश खींचती हुईं। उनके पास जाने से मैंने स्वयं को रोक लिया, क्योंकि उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी इसका अनुमान लगाना कठिन था। लेकिन दो कदम आगे बढ़कर मुझे कुछ युवा दिख गये, उम्र से कदाचित तीस-चालीस साल के। तीन जने तो आपस में बतियाते हुए पान-सिगरेट खरीद रहे थे और दो कदम की दूरी पर अन्य व्यक्ति एक पेड़ के तने के सहारे अकेले खड़े होकर धूम्रपान का आनंद ले रहा था। मैं उसके पास गया और हिन्दी में बात करने लगा। उसके इशारे से मैं समझ गया कि वह हिन्दी में बात नहीं समझ पायेगा। तब मैंने अंग्रेजी में कहा, “आपसे माफी चाहूंगा; क्या मैं निजता (प्राइवेसी) से जुड़ा एक सवाल पूछ सकता हूं?”

“जी, पूछिए।” उसने जवाब दिया।

मैं सीधे अपने सवाल पर आया, “आप सिगरेट पीते हैं। क्या आप जानते हैं कि सार्वजनिक स्थल (पब्लिक प्लेस) में धूम्रपान कानूनी तौर पर प्रतिबंधित है और संबंधित व्यक्ति पर जुर्माना लग सकता है?”

उस व्यक्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। बल्कि वह यह कहते हुए आगे बढ़ गया कि उसे ऑफिस की देरी हो रही है।

दूसरे दिन मैंने इस विषय पर फिर से कुछ ’ज्ञान’ प्राप्त करने का प्रयास किया। जहां मैं ठहरा था उसके प्रवेशद्वार के निकट ’फोरम मल्टिप्लेक्स’ नामक व्यापारिक संस्थान है। उसी के सामने सड़क के दूसरी ओर पटरी या फुटपाथ के किनारे चाय-काफी, पान-सिगरेट, आदि की छोटी-मोटी दुकानें सजी मिलती हैं जहां आसपास के कार्यालय-कर्मी दोपहर के अवकाश के समय चाय-पानी आदि के लिए आते हैं।

उसी पटरी पर घूमते-फिरते मैं एक स्थल पर रुक गया। पास ही युवक-युवती का एक जोड़ा मुझे दिख गया। वे नारियल पानी ख्ररीद रहे थे। जब तक दुकानदार नारियल-फल काटछांट कर तैयार करता, उस युवक ने एक सिगरेट लेकर सुलगा ली। उस युगल में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई। हिम्मत करके मैं उनके निकट पहुंचा और युवक की ओर मुखातिब होकर मैंने अंग्रेजी में पूछा, आपसे एक निजी सवाल पूछना चहता हूं। अगर बुरा न मानें तो पूछूं?”

मैंने प्रथमतः अपना परिचय दिया कि मैं वाराणसी से आया पर्यटक हूं और कहा कि यहां सिगरेट पीने का काफी चलन है। मेरे वाराणसी कहने पर दोनों (युवक-युवती) एक साथ बोल पड़े, “तब तो आप हिन्दी बोलते होंगे?”

मेरे हांमी भरने पर युवक ने बताया कि वह उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। युवती ने खुद को देहरादून (उत्तराखंड) की बताया। उस वार्तालाप में वैयक्तिक स्तर की कुछएक बातें हम लोगों के बीच भी हुईं। इस बीच नारियल पानी भी आ चुका था जिसे वे पीने लगे। उन्होंने मुझे भी पेश किया जिसे मैंने सधन्यवाद मना कर दिया। फिर मैं असल मुद्दे पर लौट आया और युवक से पूछने लगा, “आप सिगरेट पीते हैं। आपको मालूम है …”

मैं अपना सवाल पूरा कर पाता कि उसके पहले ही वह बोल पड़ा, “मालूम है कि यह ’हेल्थ’ (तन्दुरुस्ती ) के लिए नुकसानदेह है। लेकिन काम के बोझ तले तनाव से इससे कुछ राहत मिल जाती है। यों कहें कि अब आदत बन चुकी है।”

मैं बोल पड़ा, “मैं मुद्दे के दूसरे पहलू की बात करना चाहता हूं। वह यह है कि धूम्रपान कानूनी तौर पर सार्वजनिक स्थल पर वर्जित है और इस पर जुर्माना भरना पड़ सकता है।”

यह देख मुझे आश्चर्य हुआ कि वे दोनों संबंधित कानून से अनभिज्ञ थे। कुछ देर बाद लौटने का समय हो गया कहते हुए वे सड़क पार कर अपने संस्थान ’फोरम’ की ओर चल दिए। दस-पंद्रह मिनट की उस बातचीत के दौरान और पिछले दिन की घटना से यह तो मेरे समझ में आ ही गया कि जिन्हें धूम्रपान का शौक लग गया वे अपनी तन्दुरुस्ती के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। इसके अलावा उनमें से कुछ लोग संबंधित कानून से भी परिचित नहीं होते या वे उसकी परवाह नहीं करते। – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories