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नीयत डोल गयी मूंगफली की चंद फलियों पर

मैं घर के पास के मुख्य मार्ग से लौट रहा हूं । रास्ते में सड़क के किनारे कच्ची जमीन पर भट्टी सुलगाए हुए दो भाई मूंगफली भूनकर बेच रहे हैं । बड़े-से कड़ाह में एक भाई भूनने का काम करता है तो दूसरा ग्राहकों को तौलकर बेचता है । मैं इनको करीब दो महीनों से यहां अपना छोटा-सा कारोबार करते हुए देख रहा हूं । पिछले वर्षों तक मैंने इनको यहां कभी नहीं देखा था । पूछे जाने पर बताते हैं कि ये इसी साल पहली बार मेरे शहर में रोजीरोटी की तलाश में पहुंचे हैं । मूंगफली भूनकर बेचने का धंधा उनकी समझ में आया, सो उसी पर लग गये।

उस रास्ते से कभी-कभार आते-जाते मैं भी उनसे मूंगफली खरीद लेता हूं । वे पच्चीस रुपया पाव बेचते हैं, जब कि आम ठेलों पर भुनी मूंगफली बेचने वालों की दर 35 रुपया पाव है । दाम के साथ मूंगफली में अंतर जरूर रहता है । ठेले वाले कच्ची मूंगफली को छानकर-फटककर साफ करते हैं, अपुष्ट या खोखली फलियों को हटाते हैं और तब भूनते हैं, जब कि ये भाई बाजार से बोरों में भरी मूंगफली को जैसा का तैसा ही इस्तेमाल करते हैं ।

इनके पास पहुंचकर मैं ठहर जाता हूं । दो-तीन गाहक पहले से मौजूद हैं । मुझसे ठीक पहले बारी आती है एक दंपती की । महिला बाइक से उतरकर मूंगफली खरीदती हैं, मेरे अनुमान से पाव भर, और उनके पति बाइक पर बैठे प्रतीक्षा करते हैं । महिला मूल्य चुकाते हुए दुकानदार से मूंगफली भरी पॉलिथीन की थैली थाम लेती हैं । जिज्ञासावश मैं उनके हावभाव गौर से देख रहा हूं । चलते-चलते वे मुठ्ठी में कुछ मूंगफली उठा लेती हैं । हो सकता कि उनके मन में बाइक पर बैठे उन्हें ठूंगने का विचार हो । मैं सोचने लगता हूं कि बाइक में बैठकर अपने को संतुलित रखते हुए यह कार्य आसान तो नहीं ही होगा । लेकिन ऐसा कुछ होना नहीं है । वे मुठ्ठी की सामग्री अपनी झोली में डालती हैं, बाइक पर बैठती हैं, और बाइक चल देती हैं । उस समय मैं अकेला गाहक बच जाता हूं ।

मैं विक्रेता से पूछता हूं, “आपके खरीददार ढेरी में से बिना पूछे कुछ मूंगफली उठा लेते हैं क्या ?”

जवाब मिलता है, “हां, कोई-कोई गाहक खरीदते-खरीदते लगे हाथ दो-चार फलियां ठूंग ही लेते हैं । पर सब ऐसा नहीं करते ।”

मैं अपनी साइकिल पर सवार होकर घर की ओर बढ़ जाता हूं । उस महिला की मुठ्ठी में भला कितनी मूंगफली समाई होगी इस बात का मैं रास्ते में अनुमान लगाता हूं । मुझे लगता है कि मुश्किल से बीस-तीस पैसे की रही होगी, या थोड़ा अधिक पचास पैसे की, या उससे कुछ अधिक की ।

जीवन की यह एक विडंबना ही तो है कि कभी-कभी खाते-पीते व्यक्ति की नीयत उतने कम पर भी डोल जाती है । कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे मिला है अंगूर और जामुन के साथ भी । – योगेन्द्र जोशी

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