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सौ मीटर दूर चलना भी गवारा नहीं

          आज के औद्योगिक युग में मनुष्य बेहद आराम-तलब हो चुका है । मुझे लगता है कि कभी-कभी यह आराम-तलबी हास्यास्पद सीमा पार कर जाती है । चंद रोज पहले एक दिलचस्प और अपने किस्म का वाकया मेरे अनुभव में आया – दिलचस्प मेरी नजर में । हो सकता है लोग ऐसा न मानें ।

          इससे पहले कि वाकये का ब्योरा पेश करूं, मैं बताना चाहूंगा कि मेरे शहर बनारस (वाराणसी) की जो भी तारीफें आपने सुनी हों वे किस हद तक सही होंगी इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहता; बस, मेरी अपनी नजर में यह शहर दुर्व्यव्यवस्था के मामले मैं अद्वितीय है । इस शहर में कौन-सी सड़क ठीक-ठाक हालत में है इसे आपको खोजना पड़ेगा । कोई भी सड़क बनने के बाद पहली बरसात झेल जाए तो आश्चर्य होता है । सड़कों पर वाहनों के बेतरतीब आवागमन को देख आपके मन में सहज शंका उठेगी कि यहां यातायात के कोई नियम हैं भी कि नहीं । पुराना शहर होने के कारण सड़कें सब जगह इतनी चौड़ी नहीं हैं कि निरंतर बढ़ते निजी मोटर-वाहनों का बोझ झेल सकें । परिणाम साफ जाहिर है, ट्रैफिक जाम । और कोढ़ में खाज की नौबत आ जाती है जब इन सड़कों पर पाइप-लाइनें बिझाने के लिए खोदाई होने लगती है, जैसा कि आजकल चल रहा है ।

          ‘लंका’ इस शहर के प्रमुख स्थानों में से एक है, जहां बी.एच.यू. (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) का प्रवेश द्वार है और उसके परिसर में अवस्थित चिकित्सा संस्थान के अस्पताल पहुंचने का मार्ग है । इसके आसपास रिहायशी मकान और बहुमंजिली इमारतें हैं, तथा स्थानीय लोगों की जरूरतों की पूर्ति करने वाला बाजार है । शहर के अन्य स्थानों के लिए पैडल-रिक्शे, आटोरिक्शे जैसे साधन भी यहां पर रात-दिन मिलते हैं ।

          वाकत तब का है जब एक दिन मुझे अपनी धर्मपत्नी जी के साथ कार्यवशात् यहां आना पड़ा था । हम घर के पास स्थित सुंदरपुर चौराहे से सवारी आधार पर चलने वाले आटोरिक्शा से लंका के लिए चल दिये । बताता चलूं कि वाराणसी में आटोरिक्शे पांच सवारियां बिठाकर चलते हैं । लंका के निकट पहुंचने पर देखने को मिला कि वहां तो जाम लगा है । हमारे आटोरिक्शे को गंतव्य स्थल, चौराहे, पर पहुंचने के लिए अभी कोई डेड़ सौ या उससे भी कम दूरी तय करनी थी, लेकिन उस जाम को देखते हुए उसने वाहन रोक दिया और सामने के वाहनों के आगे बढ़ने का इंतजार करने लगा । हमने देख रहे थे कि दूर तक खड़े वाहनों में कोई गति नहीं है । स्थिति खराब देख मैंने अपनी सहधर्मिणी से कहा, “क्यों न हम उतर जायें और पैदल चल दें । मुझे तो लगता है जितनी देर में यह आटो चौराहे पर पहुंचेगा उससे कहीं कम समय में हम पैदल वहां पहुंच जाऐंगे ।”

उन्होंने सहमति जताई, और भाड़ा अदा करते हुए हम उतरने लगे । इतने में एक महिला, उम्र से अंदाजन तीस-पैंतीस वर्ष की, आटोरिक्शे के पास पहुंची और बोली, “चौराहे तक ले चलिए तो ।”

          “अरे बहन जी, सामने ही तो चौराहा है, पैदल चले जाइए ।”

          “कौन चले वहां तक पैदल ! आप छोड़ दीजिए ।”

          तब तक हम दोनों उतर चुके थे । वाहन चालक और उस महिला के बीच आगे क्या बातें हुई होंगी मैं बता नहीं सकता, क्योंकि हम जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए बगल की एक गली के रास्ते चौराहे की तरफ चल दिए । बगल की गली का रास्ता हमने इसलिए चुना कि उस जाम में घुसकर पैदल भी आगे निकल पाना नामुमकिन-सा लग रहा था ।

गली से गुजरते हुए पत्नी महोदया बोलीं, “पता नहीं कैसी खबती महिला थी वह कि दस कदम पैदल चलने से भी कतरा रही थी ।”

पर्वतीय क्षेत्र का मूल बाशिंदा होने के कारण मुझे मीलों पैदल चलने की आदत रही है । पहाड़ों पर तो पैदल चलने के अलावा कोई अन्य साधन आम तौर पर उपलब्ध भी नहीं रहता है । लेकिन मैदानी इलाकों में स्थिति कुछ अलग रहती है । तथापि यहां भी लोग पैदल चलते ही हैं या साइकिल चलाते हैं । पता नहीं क्यों अब कुछ लोग कुछ कदम भी पैदल चलने से बचते हैं । ऐसा नहीं कि वह महिला अस्वस्थ हो । अधिकतर लोग उस महिला की तरह बर्ताव करते भी नहीं होंगे । मैं समझता हूं वह अपवाद रही होगी । लेकिन यह दिलचस्प तो है ही कि उस सरीखे लोग भी दुनिया में मिल जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

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न जाने उसके क्या हाल होंगे!

हाल ही में मुझे अपने घर के दरवाजों-पल्लों की मरम्मत संबंधी छोटे-मोटे काम करवाने थे । मैंने अपनी कालोनी के आसपास ही रहने वाले एक बढ़ई से संपर्क साधा । वह सुबह-शाम घर पर आकर कार्य संपन्न करने को तैयार हो गया । तदनुसार वह रोज ही दो-एक घंटे काम कर जाता था । अपने साथ वह किसी सहायक को नहीं लाता था, अतः जहां कहीं जरूरत होती मुझे ही उसकी मदद करनी पड़ रही थी । उसके साथ कार्य करते समय मैं उससे आम चर्या की बातें भी कर लेता था ।

इसी दौरान एक दिन मैंने उससे उसके बालबच्चों के बारे में पूछ लिया । उसने बताया, “सा’ब, मेरे तीन बच्चे हैं, दो लड़कियां और सबसे छोटा एक लड़का ।”

बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछे जाने पर उसने कहा, “सा’ब, बड़ी लड़की गूंगी-बहरी है, इसलिए उसके स्कूल जाने का सवाल ही नहीं । दूसरी लड़की +2 में पढ़ रही है । तीसरा स्कूल ही नहीं जाता । क्या करें कहना नहीं मानता और दिन भर मुहल्ले के आवारा लड़कों के साथ अपना समय जाया करता है । मैंने उसे अपने साथ काम पर लगाने की कोशिश की कि कुछ सीख लेगा और अपनी रोजी-रोटी कमाने लगेगा । लेकिन वह किसी की सुनता ही नहीं ।”

बड़ी लड़की के बारे में उसने बताया कि वह कहीं खो गयी है । मेरे यह पूछने पर कि कब और कैसे गायब हुई, उसने बताया, “दो साल पहले इसी विजयादशमी के मौके पर वह मोहल्ले के लोगों के साथ डीएलडब्ल्यू परिसर में रावणदहन देखने चली गयी, जहां उन लोगों का साथ छूट गया । गूंगी बहरी वह किसी को कुछ बता ही नहीं पाई होगी ।”

अपना दुखड़ा सुनाते-सुनाते उसने आगे कहा, “उसको खोजने में मेरे लाख-एक का खर्चा भी हो गया, लेकिन वह मिली नहीं । इधर किसी ने बताया है कि भदोही में एक ज्योतिषी जी रहते हैं, जो खोए हुए आदमी के बारे में सटीक बता देते हैं । कल उनके पास भी जाने की सोच रहा हूं । शायद लड़की का कुछ पता चले ।”

और दूसरे दिन वह भदोही भी हो आया । अगली सुबह मेरे काम पर आने पर उसने कहा, “सा’ब, ज्योतिषी जी ने बताया है कि मेरी लड़की चुनार में किसी भले मानुष के घर पर सकुशल रह रही है । अब एक चक्कर वहां का भी लगाना है ।”

फिर दोएक रोज के बाद वह चुनार भी हो आया । अगले दिन उसने चुनार तक हो आने की बात बताई और कहा कि वहां भी लड़की का कुछ पता नहीं चला । मैंने उससे जानना चाहा, “क्या आपने कभी पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई ? उन्होंने मदद का आश्वासन दिया क्या ?

उसने कहा, “पुलिस कहां हम गरीबों की सुनती है, सा’ब । कह दिया जाकर खुद ही खोजो । हम रोज कमाकर पेट पालने वाले लोग हैं । काम छोड़ कहां-कहां जाएं और कितने-कितने दिन के लिए जाएं ?”

उस दिन उसके चले जाने के बाद मैं सोचने लगा कि भारत वाकई अजीब देश है । यहां पुलिस आम लोगों की मदद के लिए नहीं होती । अगर रसूखदार आदमी का कुत्ता भी गायब हो जाए, तो पूरा पुलिस बल उसे खोजने निकल पड़ता है । किंतु किसी साधारण आदमी के घर का सदस्य खो जाए, तब वह भुक्तभोगी को दुत्कार कर भगा देती है । इस जमाने में तो संचार-प्रसार के सक्षम माध्यम मौजूद हैं, और किसी की भी तस्वीर का प्रसारण करके गुमशुदा व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है । फिर भी पुलिस की उदासीनता और अक्षमता के चलते आम जन को कोई मदद नहीं मिल पाती है ।

उस रात मेरे दिलो-दिमाग में उस लड़की को लेकर एक सवाल रह-रहकर उठने लगा । न जाने क्या हाल होंगे उस लड़की के । वह जिंदा तो होगी ही, क्योंकि मौत आसानी से आती नहीं । आदमी में जिजीविषा की भावना बहुत प्रबल होती है । वह मांग-मूंगकर भी पेट भर लेता है और जिंदा रह पाता है । लेकिन एक लड़की होने के नाते वह बेहद असुरक्षित अवश्य होगी । मुझे लगने लगा कि अब तक उसके साथ कोई न कोई जरूर बलात्कार कर चुका होगा । हो सकता है किसी पुलिस वाले ने ही उसे अपना शिकार बनाया हो । भरोसा नहीं पुलिस का ! आखिर इस संसार में मानव भेड़ियों की कोई कमी थोड़े ही है । और …, और वह गर्भवती भी हो चुकी होगी । अब तो दो साल बीत चुके हैं । क्या पता इस बीच उसने किसी मासूम को जन्म भी दे डाला हो, जिसे गोदी में लेकर वह दर-दर ठोकर खा रही हो । भला उसे किसने शरण दी होगी, किसने उसकी मदद की होगी ? ऐसी तमाम संंभावनाएं मेरे विचारों में छाने लगीं ।

… जिंदगी की वास्तविकता कभी-कभी बड़ी डरावनी लगती है मुझे । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी –
भदोही’ वाराणसी के नजदीक एक छोटी-सी नगरी एवं जिला मुख्यालय है जो कालीन व्यवसाय के लिए विख्यात है । ‘चुनार’ वाराणसी से सटे मिर्जापुर जिले का एक कस्बा है जो सस्ते प्रकार के चाइना क्ले के बने कप-प्लेटों तथा सजावटी सामानों के लिए जाना जाता है । वहां एक किला भी है ।

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हिंदी के जहाज से उतर, अंग्रेजी की नाव पर जा बैठ

अपने लोग कभी-कभी इस बात पर गर्वान्वित-से दिखते हैं कि अपनी भाषा हिंदी – ‘इंडिया दैट इज भारत’ की राजभाषा – विश्व की दूसरी-तीसरी सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है । यह बात शायद सही हो, लेकिन यह तो सच है ही कि यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में सर्वाधिक तिरस्कृत है । कोई भी ‘हिंदीभाषी’ व्यक्ति जो अंग्रेजी पढ़ने-लिखने से परिचित हो चुका हो इसे आम जनों के साथ बोलचाल के लिए मजबूरन प्रयोग में लेता है, अन्यथा उसकी प्राथमिकता तो अंग्रेजी ही रहती है, जो देशवासियों की नजर में श्रेष्ठ एवं उपयोगी भाषा ही नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार एवं द्योतक भी है । आप अंग्रेजी जानते हुए भी हिंदी ही प्राथमिकता के साथ प्रयोग में लेते हों इसकी उम्मीद आम तौर पर नहीं की जा सकती है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही है । मैं ऐसे ही एक ताजे अनुभव की बात करता हूं ।

दो-तीन दिन पूर्व मैं सपत्नीक दो-तीन सप्ताह के नई दिल्ली प्रवास के बाद वापस अपने शहर वाराणसी आ रहा था । मुरादाबाद होकर चलने वाली काशी-विश्वनाथ नाम की गाड़ी के आरक्षित डिब्बे में हमारे बर्थों (शायिकाओं) के पास खिड़की से सटी बर्थ एक युवती के नाम थी । वह युवती गाजियाबाद के किसी तकनीकी संस्थान में अध्ययन कर रही है यह बात बाद में दो-तीन अन्य युवा यात्रिकों, जो स्वयं भी तकनीकी विषयों के छात्र थे, के साथ उसके वार्तालाप से मुझे ज्ञात हो गयी । मतलब यह है कि उनके छात्र होने का अनुमान मैंने उनकी आपसी बातचीत के आधार पर लगाया था ।

हमारे उस डिब्बे में मुरादाबाद स्टेशन पर एक सज्जन भी सवार हुए । उनकी बर्थ हम लोगों के ही अगल-बगल थी । साथी यात्रिकों से उनकी बातों से स्पष्ट हो गया था कि वे बीएचयू (पूर्व में मेरा कार्यस्थल) में अध्यापक हैं और मेरठ में आयोजित एक वैज्ञानिक गोष्ठी में भाग लेकर वाराणसी लौट रहे हैं ।

रेलगाड़ी के मुरादाबाद स्टेशन से आगे बढ़ने के कुछ मिनटों बाद उन अपेक्षया नवागन्तुक यात्री ने उस छात्रा से यह जानना चाहा कि वह क्या करती है और कहां जा रही है । केवल उसी छात्रा में उनकी दिलचस्पी क्यों जगी थी यह मैं समझ नहीं सका । खैर, जैसा कि उम्मीद की जाती है उन दोनों के बीच की आरंभिक बातचीत सामान्य हिंदी में ही हुई । किंतु जैसे ही उन सज्जन को यह अहसास हुआ कि वह युवती तकनीकी विषय की छात्रा है, और तदनुसार अंग्रेजी भाषा के प्रयोग से सुपरिचित है, तो वे हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आये । उन दोनों के बीच चंद मिनटों की बाद की वार्ता अंग्रेजी में ही संपन्न हुई । मुझे याद आता है कि उन्होंने अपनी निकटता दर्शाने के लिए छात्रा को कुछ ‘स्नैक्स’ भी अर्पित किए जिन्हें उसने विनम्र भाव के साथ अस्वीकार कर दिया था ।

मैं उस वार्तालाप में भागीदार नहीं था और अपनी सीट पर बैठे अखबार के पन्ने कुछ यूं उलट-पलट रहा था कि गोया मैं उस वार्तालाप से अनजान, था या उसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी । किंतु बाहरी तौर पर अनभिज्ञ-सा बना मैं वस्तुतः पूरे वाकये पर गौर कर रहा था । मेरे लिए उनकी बातचीत के असली विषय की कोई अहमियत नहीं थी । उस समय जो बात मेरी दृष्टि में अहम थी और जो मुझे खटक रही थी वह थी उनका हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आना । दोनों हिंदी जानते थे, और मुझे पक्का विश्वास है कि दोनों की मातृभाषा – भले ही कहने भर को ही मातृभाषा हो – हिंदी ही रही होगी ।

उस समय मैं सोचने लगा कि आखिर वह कौन-सी मजबूरी रहती है जिसके कारण एक हिंदीभाषी अन्य हिंदीभाषी के साथ भी हिंदी में बात करने से कतराता है, और तुरंत ही अंग्रेजी को वरीयता देते हुए उसमें बतियाने लगता है । कोई व्यक्ति अन्य भाषाभाषियों के साथ भी पहले हिंदी में प्रयास करे और काम न चलने पर ही अंग्रेजी का प्रयोग करे तो यह बात मेरे समझ में आती है । किंतु अपने देश में हाल उल्टे ही लगते हैं । यहां तो अजनबियों के साथ अंग्रेजी में बात करना अंग्रेजी पढ़े-लिखे अनेकों लोगों की प्राथमिकता रहती है । क्या इस मानसिकता से हम भारतीय कभी मुक्त हो पाएंगे यह प्रश्न मेरे मन में शेष यात्रा के दौरान उठता रहा ।

और अपने घर पहुंचने पर मैंने जब खुद की अनुपस्थिति में इकट्ठी हुई डाक पर नजर डाली तो उसमें एक निमंत्रण-पत्र मिला, जिसका विषय था हमारे एक पड़ोसी की पोती का जन्मदिन, जो इस बीच मनाया जा चुका था । निमंत्रण-पत्र था ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले एक पड़ोसी परिवार का, जिससे जुड़े लोगों के लिए – मुझे पूरा विश्वास है – अंग्रेजी आज भी कमोबेश अनजान भाषा होगी । नवजात बच्ची के दादा से पहले की पीढ़ियां अनपढ़ या अल्पशिक्षित रही होंगी ऐसा सोचता हूं मैं । अवश्य ही अब ‘फॉरेन’ अनुभव वाले बच्ची के कंप्यूटर इंजीनियर ‘पापा’ को अब हिंदी से परहेज और अंग्रेजी से लगाव हो गया होगा ।

उपर्युल्लिखित अनुभव मेरे लिए नये नहीं हैं । हिंदी से जुड़े ऐसे अनुभव मुझे आए दिन होते रहते हैं, और हर बार हिंदी को लेकर हिंदीभाषियों में व्याप्त कुंठा मेरे चिंतन का विषय बन जाता है । मुझे लगता है हिंदी एक जहाज की तरह है जिसमें जहां-तहां सुराख हो गये हों, जिनसे रिसता हुआ पानी उसे डुबाए जा रहा हो । लेकिन उस भाषा के प्रति लगाव रखने वाले और उसे बचाए रखने को समर्पित अभिमानी कुछ गिने-चुने देशवासी उस पानी को उलीच कर हटाने और जहाज को बचाने की जुगत में लगे हैं । डुबाने को तत्पर रिसाव और उससे लड़ रही ताकतें परस्पर संघर्षरत हैं । वस्तुस्थिति की गंभीरता को भांपते हुए ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, जो हिंदी के उस जहाज को छोड़ अंग्रेजी की नाव पर चढ़कर सुरक्षित हो चुकने का सुख पा रहे हैं । वर्तमान परिस्थिति में वही बुद्धिमान समझा जा रहा है जो हिंदी का जहाज छोड़ झट-से अंग्रेजी-नाव की ओर लपक रहा हो ।  योगेन्द्र जोशी

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बैंक अधिकारी ने मेरी बात पर विश्वास किया और …

बैंकों एवं इसी प्रकार की अन्य सेवाप्रदाता कंपनियों के कर्मचारियों का अपने ग्राहकों के पति रवैया सभी देशों में एक जैसा नहीं होता है । ब्रिटेन में मिले अनुभव के आधार पर कम से कम मैं तो यही कहूंगा । अपने देश में बैंक कर्मचारियों की कोशिश यह नहीं होती है कि ग्राहकों को नियम-कानूनों के नाम पर कोई असुविधा न पहुंचने पाये । मेरा अनुमान है कि विश्व के कई देशों के बैंक कर्मचारी आम ग्राहक के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, और वे अपनी संस्था की साख बनाये रखने की तमाम कोशिशें करते हैं, भले ही ऐसा करने में बैंक को थोड़ा-बहुत वित्तीय खतरा क्यों न उठाना पड़ रहा हो । इस संदर्भ में मुझे कोई पच्चीस वर्ष पहले का एक अनुभव याद आता है ।
घटना तब की है जब मैं विज्ञान-विषयक उच्चाध्ययन के लिए द्विवर्षीय ब्रितानी प्रवास पर था । वहां के एक विश्वविद्यालय में अपना कार्यकाल पूरा कर चुकने के बाद मुझे सपरिवार स्वदेश लौटना था । अपनी वापसी यात्रा की तैयारी के साथ मुझे अपना बैंक खाता भी बंद करना था । वापसी हवाई यात्रा के एक दिन पूर्व मैं इस कार्य के लिए बैंक की संबंधित शाखा में पहुंचा । मैंने अपनी पास बुक तथा बचे हुए अप्रयुक्त चेकों को काउंटर पर बैठी महिला कर्मचारी को सौंपा और उससे खाता बंद करके बची हुई जमा राशि लौटाने का निवेदन किया । उसने अपने कंप्यूटर पर मेरे खाते और लौटाए गये चेकों की पड़ताल की और मुझसे कहा कि मेरे चेकबुक में ऐसे दो चेक मौजूद नहीं हैं, जिनका भुगतान खाते के ब्योरे के अनुसार तब तक नहीं हुआ था । उस महिला कर्मचारी के अनुसार उन चेकों का अभी भुगतान बचा था, तदनुसार खाता बंद करने में तकनीकी दिक्कत आ रही थी ।
खाता बंद कराने में मुझे दिक्कत आ सकती है इस संभावना को ध्यान में रखते हुए मैं बैंक नहीं पहुंचा था । एक बारगी मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूं । मुझे अपनी गलती का अहसास हो आया और उसके सामने वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए मैंने अपना पक्ष रखा । वह बैंककर्मी अंदर अपने अधिकारी के पास गयी और दो-तीन मिनट में लौटकर मुझसे बोली, “हम आपकी बात पर विश्वास करते हैं, और यह मानते हैं कि बैंक को धोखा देने का आपका कोई इरादा नहीं है।
इतना कहकर उसने शेष औपचारिकताएं पूरी कीं, और मेरा खाता बंद करते हुए उसने शेष जमा राशि लौटा दी । धन्यवाद ज्ञापन के साथ मैं लौट आया । खाता बंद कराने में क्या दिक्कत थी मैं इसका खुलासा कर दूं । दरअसल मुझे मिली चेकबुक का हर चेक 50 पौंड (ब्रितानी मुद्रा) के लिए ‘गारंटीड’ था । गारंटीड का मतलब यह था कि जिस किसी को भी 50 पौंड (आज के करीब 3500 रुपये) तक की रकम का चेक काटकर दिया जाता बैंक उसको उस राशि का भुगतान अवश्य करता, भले ही संबंधित खाते में पर्याप्त धनराशि न हो । ऐसे चेक स्वीकारने में किसी को धोखे का डर नहीं रहता था, क्योंकि उसको भुगतान मिलना सुनिश्चित था । घाटा सहना बैंक का काम होता और ग्राहक से वसूलना उसका सिरदर्द । अतः उन दिनों ब्रितानी बाजारों में अनजान व्यक्ति से भी इस प्रकार के गारंटीड चेक स्वीकारने में किसी को कोई खतरा नहीं दिखता था, और चेकों द्वारा पैसे का लेनदेन एक सामान्य बात थी ।
चूंकि मैं दो चेक बैंक को नहीं लौटा सका था, अतः बैंक यह मान सकता था कि मैंने किसी को वे चेक 50-50 पौंड तक की राशि भरकर दे रखे होंगे, जिनका भुगतान तब तक नहीं हुआ था । ऐसे में बैंक 100 पौंड तक की राशि काटकर मुझे शेष जमा लौटाने की बात कर सकता था । लेकिन बैंक ने ऐसा नहीं किया और मेरे प्रति विश्वास व्यक्त करते हुए पूरी जमा राशि लौटा दी । असल में मैंने किसी को चेक नहीं दिए थे, बल्कि उन्हें पहले कभी कारणवशात् निरस्त करते हुए फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिया था । मुझे उन निरस्त चेकों को रिकार्ड के तौर अपने पास रखना चाहिए था । मेरी गलती यही थी कि मैंने ऐसा नहीं किया था ।
दूसरे दिन मैंने विश्वविद्यालय के एक अध्यापक को पूरा किस्सा सुनाया, और उससे जानना चाहा कि बैंक ने मेरे प्रति जो नरमी दिखाई उसका संभव कारण क्या रहा होगा । उसने जो बात मुझे समझाई उसके अनुसार आम तौर पर बैंक अपने अनुभवों के आधार पर यह मानकर चलते हैं कि अधिकांश ग्राहक ईमानदार होते हैं और बैंक को धोखा देने का उनका कोई इरादा नहीं होता है । वे भूल कर सकते हैं जिसे वे सुधार भी लेते हैं । बैंकों की नीति रहती है कि ग्राहक की ऐसी भूलों को तूल देकर बैंक को उनके प्रति संवेदनाविहीन व्यवहार नहीं दिखाना चाहिए । ग्राहक की बातों पर विश्वास करते हुए उसकी परेशानी हल करना व्यावसायिक कार्यकुशलता एवं व्यवहारपटुता मानी जाती है । अवश्य ही ऐसा करने में बैंक को खतरा उठाना पड़ सकता है । किंतु कभी-कभार – बहुत कम मामलों में – होता है । उन मौकों पर बैंक को जो वित्तीय घाटा हाता है, उसके लिए भी वे प्रस्तुत रहते हैं । किंतु उस संभावित घाटे से बचने के लिए वे सभी ग्र्राहकों पर अविश्वास करने लगें यह नीति उन्हें स्वीकार्य नहीं । ग्राहकों के बीच सद्व्यवहार की साख बनाये रखने के लिए ऐसे खतरे उठाने ही पड़ते हैं ।
मैं समझता हूं कि इस प्रकार की नीति के तहत ही उस बैंक अधिकारी ने मेरी बात मान ली होगी और वांछित कार्य निष्पन्न किया होगा । यदि ऐसी ही किसी स्थिति का सामना मुझे अपने देश में करना पड़ा होता, तो नियम-कानूनों का हवाला देते हुए बैंक ने कार्य-निष्पादन में असमर्थता जताई होती । इस माने में हम शायद पीछे हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

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जानते नहीं मैं कौन हूं?

सूर्यास्त हो चुका है, लेकिन अभी काफी रोशनी चारों ओर फैली हुई है । बरसात का मौसम है, फिर भी आसमान साफ है । कहीं-कहीं हल्के नारंगी से गहरी ललाई की ओर बढ़ रहे बादलों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं । इस सांध्य वेला पर मैं दो-एक सब्जियां खरीदने घर के पास के मुख्य मार्ग की दुकानों की ओर चला जाता हूं । प्रायः सभी दुकानें मेरी जानी-पहचानी हैं । वर्षों से वे लोग सड़क के किनारे जमीन पर सब्जियों की ढेरी लगाकर बेचते आ रहे हैं । मैं कभी एक से तो कभी दूसरे से सब्जियां खरीद लेता हूं । मैं यहां अक्सर पूर्वाह्न आठ-नौ बजे आता हूं, जब आसपास के गांवों के किसान अपना माल वहां बेचने आते हैं, किंतु कभी-कभार सायंकाल भी मेरा आना हो जाता है ।

मैं एक दुकान पर आकर रुक जाता हूं । सब्जी-विक्रेता एक किनारे बैठा है । आज उसकी जगह उसका किशोरवय बेटा – मेरे अनुमान में बेटा – काम संभाल रहा है । निकट भविष्य में उसे ही तो रोजी-रोटी के इस ‘खानदानी’ धंधे को संभालना है । लगता है अभी प्रशिक्षण ले रहा है । पहले कभी उसे मैंने नहीं देखा था । अभी वह एक गााहक के लिए सब्जी तौल रहा है । गाहक खुद ही एक किशोर है, बहुत हुआ तो उन्नीस-बीस साल का होगा, अधिक नहीं । वह लड़का चुन-चुनकर टमाटर तराजू पर रखता जाता है और साथ ही उनका विक्रय मूल्य पूछता है, “क्या हिसाब हैं टमाटर ?”

“आठ रुपये पाव, तीस रुपये किलो ।” किनारे बैठे सब्जी वाला जवाब देता है ।

“सात रुपये पाव लगाओ ।”

“नहीं, इतने में हमें पड़ता नहीं । आजकल सभी सब्जियों के दाम चढ़े हैं ।”

अब तक तौले जा चुके उन टमाटरों को वह किशोर गाहक लेने से मना कर देता है, और उठकर वहां से चलने के लिए अपनी साइकिल पर सवार होने लगता है । सब्जी-विक्रेता बड़बड़ाने लगता है, “चले आते है सौदा लेने; लेना-वेना कुछ है नहीं गाहक बने चले आते हैं ।”

वह गाहक लगता है नया ही है । रोजमर्रा का होता तो सब्जी वाला इतनी रुखाई से पेश न आता । उसके शब्द उस लड़के के कान में पड़ते हैं । उससे भी रहा नहीं जाता है । अब तक अपनी साइकिल पर चढ़ चुका वह लड़का ठिठककर रुक जाता है । दोनों के बीच नोक-झोंक शुरु हो जाती है । बात थमती-सी नहीं नजर आती है; लड़के के अहम को ठेस जो लग चुकी होती है । आजकल बात-बात पर लोगों का खून खौलने लगता है, खास तौर पर किशोरों-नौजवानों का । तैश में आकर वह लड़का विक्रेता को चुनौती दे डालता है, “जानते हो मैं कौन हूं ?”

सब्जी वाला भी पीछे नहीं रहता है, “हर आने-जाने वाले को जानने का ठेका नहीं ले रखा है हमने । बहुत देखे हैं तुम्हारे जैसे । क्या समझते हो अपने आप को ?”

“अच्छा तो जानते नहीं हो न मैं कौन हूं ? ठीक है बताता हूं ।”

अभी तक मैं उस तमाशे को देख रहा होता हूं । मैं सब्जी वाले के रूखे व्यवहार को उचित नहीं कह सकता । लेकिन मुझे उस लड़के का रवैया ज्यादा खल रहा था । उसके लिए सब्जी वाला तो एक बुजुर्ग ही था, हो सकता है उसके अपने मां-बाप के उम्र का हो । उसको कुछ तो लिहाज करना चाहिए था । और “जानते नहीं मैं कौन हूं” जैसे शब्दों से मुझे सख्त चिढ़ है । मर्यादाओं-शिष्टाचारों को ताक पर रखते हुए अपनी ताकत जताने का लोगों के बीच आजकल फैशन चल चुका है । मैं उस लड़के को टोक देता हूं, “बेटा, यहां अपने यार-दोस्तों को इकट्ठा करके झगड़ा-फसाद करोगे क्या ? माना कि तुम्हारी पहुंच बहुत ऊपर तक है, तो क्या ऐसा करना ठीक है ?”

वह मेरी बात सुनता है । उसकी कोई अशिष्ट प्रतिक्रिया नहीं होती है । “ठीक है, अंकल जी ।” कहते हुए वह आगे बढ़ जाता है ।

मैं इच्छित सब्जियां खरीदकर लौट अता हूं । रास्ते भर मैं यह प्रश्न स्वयं से पूछता हूं कि हम अपने जीवन में संयत-संयमित व्यवहार क्यों नहीं अपना पाते हैं । मुझे कोई उत्तर नहीं सूझता । – योगेन्द्र जोशी

अंत में एक तस्वीर:

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हिंदी की दुरवस्था का एक अनुभव यह भी

मेरे मोहल्ले में बंदरों का आतंक छाया हुआ है । पहले यहां बंदर नहीं दिखाई थे, लेकिन कोई डेड़ दशक पहले उन्होंने अपने कदम यहां जो रखे तो उसके बाद लौटने का नाम नहीं लिया । तब सुना गया था कि संकटमोचन मंदिर (वाराणसीवासियों की असीम श्रद्धा का प्रतीक प्रख्यात हनुमान् मंदिर) से खदेड़े जाने पर ही उन्होंने इस मोहल्ले में शरण ली थी । कालांतर में वे इस स्थान के स्थाई बाशिंदे हो गये । आप कहेंगे बंदर तो अपने देश के प्रायः सभी शहरी इलाकों में दिखाई दे जाते हैं, आपके मोहल्ले में भी हैं तो आश्चर्य ही क्या है, न होते तब आश्चर्य होता । आप सच कह रहे हैं । जैसे आदमी गांव-देहात छोड़कर शहर में बसने चले आ रहे हैं, ठीक वैसे ही बंदर भी अपना आशियाना शहरों में खोज रहे हैं । कारण दोनों के अलग-अलग भले ही हों । खैर इन बंदरों की मौजूदगी का हिंदी से कोई लेना-देना नहीं । मुझे तो हिंदी से जुड़े एक अनुभव का जिक्र करना है, जिसका मंकी (बंदर) शब्द से संबंध अवश्य है । इसीलिए इतना कह गया । सो सुनिए उसके बारे में ।

बस दो रोज पहले की ही बात है । सुबह-सुबह मैं निकल गया अपने घर के सामने की चालीस-फुटा सड़क पर करीब सौ मीटर चलते हुए पास के मुख्य मार्ग पर दुकान से कुछ सामान लेने । लौटते वक्त आठएक साल का एक बच्चा, जो मेरे मकान के सामने ही रहता है, मुझे मिल गया सड़क के किनारे किसी का इंतिजार-सा करता हुआ । जैसे ही मैं उसके पास से गुजरा, उसने मुझे देखा और दौड़कर मेरे बगल में आ गया । मुझसे लगभग सटते हुए-सा वह मेरे साथ चलने लगा । मैं उस बच्चे को जानता तो था ही, पर कभी राह चलते उससे बात की हो या वह दो कदम भी मेरे साथ चला हो ऐसा याद नहीं पड़ता । सो उसके उस समय के बरताव से मैं कुछ चौंेका । मैंने पूछ डाला, “क्यों भई, क्या हो गया जो मेरे साथ बगल में चल रहे हो ?”

उसने सामने आगे सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, “वहां मंकी हैं, काटते हैं ।”

“मंकी हैं या बंदर ?” मैंने पूछा, जानने के लिए कि देखूं क्या जवाब देता है । सामने कुछ दूरी पर दो-तीन बंदर दिखाई दे रहे थे । मोहल्ले के बंदर कभी-कभी काटने भी दौड़ पड़ते हैं, खासकर तब जब उन्हें छेड़ा जाए । उस बच्चे का डर स्वाभाविक था और वह कदाचित् मेरे साथ खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा था ।

मेरे सवाल का जवाब उसने यों दिया, “बंदर तो हिंदी में कहते हैं, अंगरेजी में तो मंकी कहते हैं ।”

मैंने उसे टोकते हए कहा, “पर तुम तो हिंदी में बोल रहे हो, अंगरेजी में तो नहीं ।”

वह चुप रहा । उसके पास मेरे प्रश्न का शायद कोई उत्तर नहीं था । वयसा आठएक साल के उस बच्चे के पास भला क्या उत्तर हो सकता था ? कह नहीं सकता कि उसके मन में कोई विचार उठे भी होंगे । लेकिन एक चीज मैं महसूस कर रहा था । उस बच्चे के मन में स्कूली पढ़ाई यह विचार भर रही थी कि तुम्हें अंगरेजी सीखना ही नहीं, बल्कि उसे बोलना भी है । और उसकी शुरुआत अपनी रोजमर्रा की बोली में अधिकाधिक अंगरेजी शब्दों को ठूंसने से ही होगी । अंगरेती की श्रेष्ठता एवं अनिवार्यता और हिंदी की निरर्थकता के भाव उसके मन में उपजाये जा रहे होंगे ऐसा मेरा विश्वास है ।

स्थिति का समुचित आकलन करने में उस बच्चे की पृष्ठभूमि पर विचार करना आवश्यक है । बता दूं कि उसके दादा पांच भाइयों में से एक हैं । आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षिक तौर पर पिछड़े वर्ग के पांचों भाई मेरे घर के सामने छोटे तथा अतिसामान्य अलग-अलग मकानों में गुजर-बसर करते हैं । कभी इन भाइयों के बाप-दादा इस मोहल्ले की कृषि योग्य पूरी जमीन पर मालिकाना हक रखते थे । करीब पचास वर्ष पूर्व जब उनकी जमीन पर कालोनी विकसित हुई तो वे लोग जमीन के एक छोटे-से टुकड़े में सिमटकर रह गये । जमीन का जो भी मूल्य तब मिला होगा उसका सदुपयोग उनके बाप-दादा शायद नहीं कर पाये । मौजूदा पांचों भाई निपट निरक्षर हैं, अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तरह । इन भाइयों के बच्चों — जिनकी कुल संख्या बीस-पच्चीस है और जिनमें से केवल तीन-चार ही शादीशुदा तथा बाल-बच्चेदार हैं — तक अब साक्षरता पहुंच चुकी है, लेकिन मात्र प्राथमिक दर्जे की । शायद एक या दो ने हाईस्कूल तक पढ़ भी लिया है, किंतु उसके आगे नहीं । भाइयों के बाद की इस बीच की पीढ़ी के सदस्य अब स्कूली पढ़ाई के प्रति सजग हो चुके हैं । वे स्वयं भले ही अंगरेजी न जानते हों, किंतु अंगरेजी की महत्ता को समझने लगे हैं । और इसी कारण अपनी सीमित आमदनी के भीतर वे अपने बच्चों को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने के बजाय चौराहे-चौराहे पर खुल चुके आजकल के ‘इंग्लिश मीडियम’ निजी विद्यालयों में से किसी एक में भेज रहे हैं । वह बच्चा ऐसे ही किसी स्कूल से ‘बंदर’ के बदले ‘मंकी’ कहना सीख गया है ।

यह वाकया एक कटु सच को उजागर करता है । वह यह कि जैसे-जैसे अपने देश की उम्र बढ़ रही है, वैसे-वैसे अंगरेजी की जड़ें ‘इंडियन सोसाइटी’ में गहरे उतरती जा रही हैं, और हिंदी अपने ही लोगों के मध्य तिरस्कृत होती जा रही है । वाकई विचित्र है इस देश के बाशिंदों का रवैया । – योगेन्द्र जोशी

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दहेज में कार: सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल

अपने देश की विशेषता को कई जन ‘अनेकता में एकता’ जैसे वाक्यांश से व्यक्त करते हैं । वास्तव में विलक्षण है अपना देश । यह विचित्रताओं, विसंगतियों, और विरोधाभासों का धनी है । यहां परस्पर विरोधी बातें एक साथ देखने को मिल जाती हैं और सामाजिक विकृतियों की भरमार है, जिनकी आलोचना विभिन्न मंचों से की जाती रही है । फिर भी वे परंपरा के नाम पर जीवित हैं और लोगों के द्वारा खुलकर अपनाई जाती हैं । ऐसी विकृति में एक है दहेज प्रथा । दहेज लेना तथा देना, दोनों, अनुचित हैं । यदि आप सर्वेक्षण पर निकल पड़ें तो शायद ही दो-चार लोगों को पायेंगे, जो दहेज को स्वीकार्य प्रथा के तौर पर मान्यता देते हों । अधिकांश लोग इसे कुरीति कहेंगे और इसके विपक्ष में बोलेंगे, परंतु जब उनके व्यवहार पर गौर करेंगे तो ठीक इसका उल्टा पायेंगे । उनका तर्क होगा ‘क्या करें जी, इसी समाज में रहना है, जो प्रचलित है उसके हिसाब से ही चलना होगा न !’ मतलब साफ है । किसी बात को सिद्धांततः अनुचित कहना एक बात है, और उस अनुचित बात को अमल में न लाना दूसरी बात । दोनों एक साथ देखने को मिलेंगी आपको अपने हिंदुस्तान में ।

जहां तक दहेज का सवाल है, मैंने अनुभव किया है कि एक ओर इसे निंद्य तथा त्याज्य घोषित किया जाता है तो दूसरी ओर इसे सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक समझा जाता है । अक्सर देखने में आता है कि वर के माता-पिता अधिक से अधिक दहेज मिले इसकी लालसा करते हैं । संपन्न होने पर कन्या के अभिभावक भी दहेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, और ऐसा करके वे अपनी ‘हैसियत’ दिखाने की अघोषित इच्छा पूरी करते हैं । हैसियत न हो तो भी कन्यापक्ष के लोग अपनी ‘इज्जत’ के लिए अच्छे दहेज के प्रबंध में जुट जाते हैं । मतलब यह कि दहेज दोनों ही पक्षों के लिए प्रतिष्ठा की बात होती है

कदाचित् कुछ लोग यह सोचते होंगे कि प्रेम-विवाह के मामलों में दहेज का सवाल और प्रतिष्ठा की बात नहीं उठती होंगी । यदि लड़का-लड़की घर वालों की मरजी के बिना ही विवाह करने पर तुल जायें तो बात अलग है । अन्यथा वहां भी दहेज की बात उठ ही जाती है, प्रतिष्ठा के नाम पर । लेकिन प्रतिष्ठा बचाने के चक्कर में दिलचस्प एवं असामान्य कदम भी कभी-कभी लोग उठाते होंगे, यह मैं कभी सोच नहीं सकता था । लेकिन हाल की एक रोचक घटना ने मेरी धारणा ही बदल दी । उसी का ब्यौरा आगे प्रस्तुत है ।

मेरे पड़ोस में वर्षों पहले एक परिवार रहता था । उस परिवार का दस-बारह साल का एक लड़का यदाकदा मेरे पास आया करता था अपनी पढ़ाई-लिखाई के संबंध में । मैं उसकी मदद कर देता था । तब उसके तथा मेरे बीच अच्छे संबंध स्थापित हो गये थे । बाद में वह परिवार दूसरे शहर चला गया था । उस लड़के का जब कभी मेरे शहर आना होता था तो मुझसे अवश्य मिल लेता था । साल-छः महीनों में कभी फोन वगैरह से भी वह मेरे हाल पूछ लेता था । अब तो वह पच्चीस-तीस साल का नौकरी-पेशा युवक है ।

एक दिन मध्याह्न में अप्रत्याशित रूप से वह मेरे घर पहुंच गया । हमारे बीच सामान्य शिष्टाचार तथा पारिवारिक कुशलक्षेम की बातें हुईं । जिज्ञासावश मैंने उसके आने का कारण भी पूछा । उसने बताया कि वह अपने एक मित्र के विवाहोत्सव में सम्मिलित होने आया है । वैवाहिक कार्य कब और कहां होना है इत्यादि की जानकारी भी मैंने उससे लेनी चाही । बातों-बातों में उसने कहा कि उसके मित्र का विवाह दरअसल प्रेम-विवाह है । मित्र के बताये अनुसार उसके परिवार के सदस्य आरंभ में उस रिश्ते के विरोध में थे । उसकी होने वाली पत्नी के घर वाले भी इच्छुक नहीं थे, क्योंकि दोनों पक्षों में जातीय भेद था ।

मेरे परिचित उस युवक ने विस्तार से बताना आरंभ किया कि पे्रमी युगल की जिद पर कन्यापक्ष तो तैयार हो गया; आखिर लड़की की शादी का सवाल जो था । हमारे हिंदू समाज में लड़की की शादी करना कोई आसान काम तो होता नहीं; कुछ नहीं तो दहेज की समस्या उठ खड़ी हो जाती है; उसी को लेकर बात बनते-बनते अक्सर बिगड़ जाती है । कन्या पक्ष को उम्मींद थी कि हांमी भरने पर दहेज की समस्या शायद न रहे ।

उधर प्रेमासक्त युवक के घर वाले भी जात्यंतर को लेकर विवाह के विरोध में थे । किंतु इससे बड़ी समस्या उनके सामने दहेज को लेकर थी । युवक के बड़े भाई की शादी दो-तीन वर्ष पूर्व बड़े धूमधाम से हुई थी और उसमें अच्छा-खासा दहेज भी परिवार को मिला था । तब संपन्न हुए विवाह को लेकर मित्रों-संबंधियों में प्रशंसात्मक चर्चा रही थी । पर इस बार उन लोगों को डर था कि दहेज से हाथ धोना पड़ेगा और उसके साथ ही उनकी ‘प्रतिष्ठा’ दांव पर लग जाएगी । बड़े भाई के मामले में स्वीकारे गये दहेज के मद्देनजर वे लोग दहेज के विरोधी तथा सादे विवाह के पक्षधर होने का दिखावा नहीं कर सकते थे ।

प्रेमी युगल युवक के परिवार की इच्छा के विरुद्ध अदालत या मंदिर में जाकर दांपत्यसूत्र में बंध सकता था, जैसा कि बहुधा सुनने को मिलता है । लेकिन वे इतना गंभीर कदम भी नहीं उठाना चाहते थे । अतः उनके प्रयास जारी रहे । अंत में वे सफल भी हो गये, लेकिन युवक के परिवार की दहेज की मांग पूरी किए जाने की शर्त पर ।

दहेज को लेकर एक दिलचस्प बात मेरे परिचित युवक को उसके मित्र ने बताई थी । वह यह कि दहेज में एक कार की मांग मित्र के परिवार वालों ने कन्यापक्ष के सामने रख दी, और कार भी ऐसी-वैसी नहीं, बड़ी तथा थोड़ी महंगी, छः-साड़े-छः लाख तक की, उनकी प्रतिष्ठा के अनुकूल । दहेज में कार की मांग आजकल सामान्य बात हो चुकी है इस बात को समझते हुए लड़की वाले कार के लिए राजी तो हो गये, परंतु महंगी कार उनके बजट में ‘फिट’ नहीं हो रही थी । वे अधिक से अधिक चार-साड़े-चार लाख तक खर्च करने को तैयार थे, लेकिन मांग पूरी करने में डेड़-दो लाख अधिक चाहिए थे । मामला कुछ पेचीदा होने जा रहा था । जहां एक पक्ष अपनी आर्थिक सीमा का हवाला देते हुए रियायत की मांग कर रहा था, वहीं दूसरा पक्ष अपनी इज्जत दांव पर लगी देख रहा था ।

जब महंगी कार की बात दूसरे शहर में नौकरी कर रहे उस प्रेमी युवक के कान तक पहुंची तो वह थोड़ा घबड़ाया । बड़े सौभाग्य से तो उसके विवाह का संयोग बन रहा था, और अब डर लग रहा था कि बात फिर कहीं अटक न जाए । उसने लाखएक का जुगाड़ अपनी जेब से किया और अपनी प्रेमिका के माध्यम से उनकी मदद कर दी । आखिर वह उस परिवार का भावी दामाद जो था । उसने सोचा कि विपदा में मदद करने का कर्तव्य उसे विवाह से पूर्व ही निभाना आरंभ करना चाहिए । इस मदद के बारे में किसी को पता न चले यह उसने स्पष्ट कर दिया था ।

उसी दौरान लड़की के पिता द्वारा वरपक्ष को मनाने का प्रयास भी चलता रहा । लड़के के पिता इस बात पर टिके रहे कि कार तो प्रतिष्ठा के अनुरूप ही रहनी है । कुछ सोच-विचार करने के बात समस्या सुलझाने हेतु उन्होंने खुद लाख-एक की मदद करने का प्रस्ताव लड़की के पिता के सामने रख दिया । लड़की वालों को राहत मिल जाये और वरपक्ष की इज्जत भी रह जाये इससे भली बात और क्या हो सकती थी । मेरा परिचित युवक उसी मित्र के पाणिग्रहण संस्कार में शामिल होने आया था इसी बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या हुआ होगा ।

उस विवाह के बारे में इतना सब बताने के बाद उस युवक ने टिप्पणी करते हुए कहा, “चाचाजी, दहेज को लेकर बनते हुए रिश्तों का टूटना अपने समाज में कोई नई बात नहीं है । दहेज के चक्कर में विवाहिताओं के प्रताड़ित किए जाने की घटनाएं भी सुनने में आती रहती हैं । लेकिन कन्यापक्ष से लिए जाने वाले दहेज में वरपक्ष भी अपना योगदान देता हो ऐसा आपने पहले कभी सुना है क्या ?”

मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि उत्तर क्या दूं । मैंने हंसते हुए कहा, “अविश्वसनीय है यह वाकया, पर तुम कह रहे हो तो विश्वास करना ही पड़ेगा । झूठ तो मुझसे बोलोगे नहीं ।”

“विश्वास कीजिए, एकदम सच है ।” कहते हुए वह भी मेरे साथ हंस दिया । – योगेन्द्र जोशी
(अपनी जानकारी में आई एक घटना पर आधारित । यहां पर कुछ घुमा-फिराकर विवरण प्रस्तुत किया गया है, सकारण ।)

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असफल भविष्यवाणी की एक घटना

मेरे एक मित्र हैं, छात्रजीवन के सहपाठी । वैज्ञानिक विषयों में उनकी रूचि बचपन से ही रही है । ज्योतिष में उनका तनिक भी विश्वास नहीं है, यद्यपि उनके पुरखे कभी पौरोहित्य कर्म के साथ ज्योतिष का कार्य भी करते थे । लेकिन अब शायद ही कोई बचा होगा जो इस खानदानी व्यवसाय में रह गया हो । मेरे मित्र ने एक बार मुझसे ज्योतिषिक भविष्यवाणी से संबंधित एक घटना का जिक्र किया था, जो उनके कुटुम्ब में कभी घटी थी और जिसके बारे में उन्होंने अपने पिताश्री के मुख से काफी कुछ सुन रखा था । घटना कोई सौ-सवासौ वर्ष पहले की है, अर्थात् उन्नीसवीं सदी के अंत की । मित्र के पिताजी ने बताया था कि उनके दादाजी (मित्र के परदादा) ने ज्योतिषिक गणना से प्रेरित होकर ही पहले से ही विवाहित पुरुष से अपनी बेटी का विवाह सोच-समझ कर संपन्न किया था । लेकिन वही ज्योतिष उन्हें यह संकेत नहीं दे सका था कि उनकी बेटी जल्दी ही विधवा भी हो जायेगी । मित्र के द्वारा बयान किया गया किस्सा मुझे काफी रोचक लगा । हुआ क्या इसे सुनाता हूं ।

मित्र के कथनानुसार उनके परदादा एक बार अपने एक रिश्तेदार के यहां कन्यापक्ष के निमंत्रण पर वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने गये थे । रिश्तेदार के यहां पहुंची हुई बारात में उनके होने वाले दामाद भी बतौर बाराती पहुंचे थे । बारातियों और घरातियों के बीच भेंट-मुलाकातों और परस्पर परिचय की औपचारिकताओं के दौरान परदाद का अपने भावी दामाद से साक्षात्कार हो गया । भावी दामाद भी स्वयं ज्योतिष में रुचि रखते थे, अतः दोनों को बातचीत के लिए अच्छा विषय मिल गया । वार्तालाप के दौरान भावी दामाद ने अपने होने वाले श्वसुर के सामने अपनी जन्मकुंडली में ग्रहों की क्या स्थिति है इसका पूरा ब्यौरा प्रस्तुत कर दिया । मित्र के परदादा ने कुछएक क्षण की मौखिक ज्योतिषिक गणना और विचार-मंथन के पश्चात् उनको इस अहम ‘तथ्य’ से अवगत कराया कि उनके भाग्य में द्वि-विवाह का योग है । उन्होंने यह भी भविष्यवाणी कर दी कि उनकी पहली पत्नी अपनी एकमात्र संतान के साथ कालांतर में परलोकवासी हो जायेंगी ।

परदादा के भावी दामाद के लिए यह सब सुनना चिंताजनक था । ज्योतिष में गहरी आस्था के कारण वे कही गयी बातों को हंसते हुए नहीं नकार सकते थे । कदाचित् उनके अपने ज्योतिष-ज्ञान क अनुसार कथित बातों में शंका की गुंजाइश नहीं थी । मुद्दा सचमुच में गंभीर लगने लगा । दोनों ने मिलकर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि जब प्रथम पत्नी का मृत्युयोग है ही तो दूसरा विवाह कर लेना ही उचित है । और जब दूसरा विवाह करना ही है तो उसे समय पर कर लेना ही बुद्धिमत्ता होगी । बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा और बात यहां तक पहुंच गयी कि परदादा ने अपनी ही विवाह-योग्य कन्या का प्रस्ताव भावी दामाद के समक्ष रख दिया । इस प्रकार उस दिन के विवाह समारोह के अवसर पर दोनों के बीच काफी कुछ निश्चित हो गया । बाद में विवाह-प्रस्ताव की बात आगे बढ़ी और कालांतर में मित्र के पिताश्री की बुआ का पाणिग्रहण संस्कार भी संपन्न हो गया । बुआ एवं फूफा की उम्र में करीब बीस वर्ष का अंतर रहा होगा । ध्यान रहे कि तत्कालीन हिंदू समाज में प्रायः सर्वत्र कन्याएं कम उम्र में बाह दी जाती थीं, तेरह-चौदह साल या उससे भी कम उम्र में । पुरुषों की उम्र पर विशेष प्रतिबंध नहीं होता था; उनका दूसरा-तीसरा विवाह चालीस-चालीस वर्ष में होना असामान्य बात नहीं होती थी ।

विवाह के पश्चात् दो-चार वर्षों का समय ठीक से बीत गया । और फिर किसी रोग की चपेट में आकर मित्र के पिताश्री के फूफाजी की पहली पत्नी और उनके एकमात्र आत्मज की अकाल मृत्यु हो गयी । परदादा की भविष्यवाणी सच सिद्ध हो गयी । यह ज्योतिष की सफलता का एक उदाहरण था । लेकिन बात यही पर समाप्त नहीं हो गयी । कालांतर में बुआ-फूफा के एक-एककर के तीन संतानों का भी जन्म हुआ । लग रहा था समय उनके अनुकूल बीत रहा था । लेकिन फिर उनके भाग्य ने पलटा खाया और फूफाजी की भी अकाल मृत्यु हो गई । उस समय वे करीब पचास वर्ष के रहे होंगे और बुआ लगभग तीस साल की । विधवा हो चुकने पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने तीन छोटे बच्चों की समुचित परवरिश की । आगे क्या हुआ वह ज्योतिष के संदर्भ में अहमियत नहीं रखता ।

मेरे मित्र को आज तक यह समझ में नहीं आया है कि जिस ज्योतिष ने उनके परदादा को अपनी पुत्री का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न करने हेतु प्रेरित किया वही ज्योतिष उनको धोखा कैसे दे गया कि उनकी बेटी को वैधव्य का दंश झेलना पड़ा । मित्र का कहना है कि यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सही भविष्यवाणी कर पाना संभव ही नहीं है । मनुष्य केवल अनुमान लगा सकता है । अल्पकालिक अनुमान के सही ठहरने की गुंजाइश अधिक होती है, लेकिन दीर्घकालिक अनुमान के सही सिद्ध होने की संभावना अधिक नहीं हो सकती । – योगेन्द्र जोशी

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प्रतिष्ठा का सवाल: खरीदारी महंगी कार की

प्रदर्शन की लालसा या प्रवृत्ति प्रायः हर मनुष्य के व्यक्तित्व का एक खास पहलू होता है । मैं इसे एक हानिकारक कमजोरी के रूप में देखता हूं, क्योंकि मानव समाज की कई समस्याओं का मूल इसी में देखा जा सकता है । उदाहरणार्थ, हमारे समाज में संपन्न व्यक्तियों के यहां तड़क-भड़क के साथ विवाह रचे जाते हैं, दूसरों को अपनी हैसियत और दौलत दिखा-दिखाकर । देखा-देखी में अन्य लोग भी ऐसे ही प्रदर्शन के चक्कर में पड़ जाते हैं, भले ही उनकी हैसियत कमतर हो । ऐसे मौकों पर धन की जो बरबादी होती है उसका समाजोपयोगी कार्यों में निवेश हो सकता है, किंतु ऐसा होता नहीं है ।

कम ही लोग होते हैं, जो इस प्रवृत्ति से मुक्त हों, संस्कारवश अथवा आत्मसंयम के द्वारा । जो लोग ऊपरी तौर पर दिखावे की मानसिकता से मुक्त दिखते हैं उनमें अधिकतर वे होते हैं जिनके पास इतना कुछ नहीं होता है कि प्रदर्शन कर सकें; उनकी मजबूरी होती है । दिखावे की बात में बहुत कुछ शामिल हो सकता है; जो कुछ भी आपके पास हो, और जो सामान्यतः कम ही लोगों के पास हो । जैसे औरतों के मामले में दैहिक सौंदर्य तथा आकर्षक आभूषण । पुरुषों के लिए लंबी-चौढ़ी, गठी हुई काया । गोरापन तो सबके लिए ही आकर्षण की चीज है । जो किसी कला में विशेष रूप से पारंगत होता है, वह मन ही मन यह सोचकर प्रमुदित होता है कि अन्य जन उस कला को ईर्ष्या की दृष्टि से देखते हैं । जिसके पास विशेष बौद्धिक क्षमता होती है वह भी अपनी तेज बुद्धि प्रदर्शित करने के अवसर नहीं छोड़ता है । हर चीज का प्रदर्शन हर समय, हर जगह, संभव नहीं होता है । परंतु एक चीज है जिसके प्रदर्शन के अवसर नहीं खोजने पड़ते हैं, वह है धन-संपदा, दौलत । और यह प्रदर्शन है जिसने आज के जमाने में अन्य सब चीजों को पीछे छोड़ दिया है । आपके रहन-सहन के स्तर पर तो लोगों की दृष्टि न चाहते हुए भी पड़ ही जायेगी । आप सड़क पर ऐसी कार में बैठकर निकलें जिसके टक्कर की पूरे मुहल्ले या इलाके में इक्का-दुक्का ही हो तो भला किसकी नजर आपकी संपन्नता पर नहीं पड़ेगी, कौन आपकी दौलत का कायल नहीं होगा ?

दिलचस्प बात तो यह है कि प्रदर्शन का रोग व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि इसकी चपेट से समाज के विभिन्न समुदाय और राष्ट्र भी नहीं बचे हैं । विश्व के संपन्न एवं सक्षम देश उन मौकों को हाथ से नहीं जाने देते हैं, जब वे दूसरों को मूक शब्दों में कह सकें कि देखा हम तुमसे कितना आगे हैं । ऐसे प्रदर्शनों को स्वस्थ और प्रतिष्ठात्मक माना जाता है । लेकिन जब प्रतिष्ठा के नाम पर प्रदर्शन करने के चक्कर में हम अपनी प्राथमिकताओं को ही भूल जायें, तब उसे क्या बुद्धिमत्ता कहेंगे ? निश्चय ही हम सबका उत्तर एक जैसा नहीं रहेगा; सोच अपनी-अपनी ।

खैर, बहस को लंबा खींचने की आवश्यकता नहीं है । इन बातों के माध्यम से मैं भूमिका बांध रहा था दिखावे के एक वाकये का जिक्र बयान करने के लिए । कोई तीन-चार साल पहले की बात है यह, सुनिए: मेरे एक परिचित हैं, पेशे से बैंक अधिकारी और ऋण लेन-देन के मामलों को जानने-समझने वाले । एक दिन वे मुझसे मिलने आए थे । अन्य बातों के अतिरिक्त पारिवारिक जनों की कुशल-क्षेम की बातें भी हमारी बातचीत का एक हिस्सा थीं । उनके छोटे भाई का जिक्र छिड़ने पर उन्होंने उसके प्रति अपनी नाखुशी और खिन्नता मेरे समक्ष कर व्यक्त कर दीं । उन्होंने बताया कि पेशे से चिकित्सक उनका छोटा भाई अब दिल्ली जैसे महानगर के एक निजी अस्पताल में कार्यरत है । उसका वेतन अच्छा है, किंतु इतना अधिक नहीं है कि बिना सोचे-समझे अनाप-शनाप खर्च करने के लिए पर्याप्त हो । वे बोले कि आजकल डाक्टरी पेशे में सुस्थापित होने में ही कई वर्ष लग जाते हैं । हर आदमी को व्यावसायिक जीवन के आरंभिक वर्षों में अपनी प्राथमिकताओं को सोच-विचार कर तय करना चाहिए और हिसाब-किताब लगाकर ही अपनी आमदनी को विभिन्न मदों पर खर्च करना चाहिए । मैं उनकी बातों से सहमत था ।

समस्या क्या है पूछे जाने पर वे बोले, “मेरे छोटे भाई को निजी वाहन, कार, चाहिए थी । ठीक है, दिल्ली जैसे महानगर में कार की काफी उपयोगिता है इसे मैं स्वीकारता हूं । मेरे वृद्ध हो रहे माता-पिता भी स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उसी के साथ रहते हैं । उन्हें अस्पताल ले-जाने-लाने में, परिवार को सामाजिक समारोहों में ले चलने, अतिथियों की आवभगत करने आदि में कार की उपयोगिता मुझे भी दिखती है ।”

“तो ठीक है, खरीद ले न एक कार । कार रखने की उसकी हैसियत तो अब हो ही रही है । और कारें भी तो अब कितनी सस्ती हो चुकी हैं? ढाई-तीन लाख में !” मैंने अपना मत व्यक्त किया ।

“वह ढाई-तीन लाख की कार से खुश होता तब न ? यही तो समस्या है । उसे छः-सात लाख की कार चाहिए थी । और इतनी महंगी के लिए उसके पास जमा-पूंजी तो थी नहीं । लोन लेकर खरीद ली । मैंने समझाया था कि अभी सस्ती कार से काम चला लो दो-चार साल में जब तुम्हारी आर्थिक स्थिति मजबूत हो जाए तो दूसरी खरीद लेना । मुझे अंदाजा था ही पांच-सात लाख के लोन की अदायगी-किश्तें काफी भारी भरकम पड़ेंगी । बताया भी था कि खामखा उसे अपना बजट ‘टाइट’ करना पड़ेगा । मेरी माना नहीं ।”

मैंने सवाल किया, “आपने पूछा नहीं कि क्यों वह महंगी कार के चक्कर में था ।”

“पूछा, जरूर पूछा । उसका कहना था कि उसके अस्पताल में डाक्टरों के पास एक से एक बढ़िया कारें हैं, कइयों की तो ‘इंपोर्टेड’ । उनके बीच रहकर सस्ती कार ? इज्जत का सवाल था । भला संगी-साथी क्या सोचेंगे – बेचारा ढंग की कार भी नहीं रख सकता ! आप ही बताएं, फिर मैं भला क्या कहता ।”

आगे क्या बातें हुई माने नहीं रखती हैं । अपने अंतिम शब्दों के तौर पर यही कह सकता हूं कि ऐसी घटनाएं समाज में व्याप्त अपनी-अपनी हैसियत दिखाने की मानसिकता के द्योतक होती हैं । – योगेन्द्र जोशी

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आरक्षित रात्रिकालीन रेलयात्रा और तिथि-वार का भ्रम

रेलगाड़ी से यात्रा करना कभी-कभी असामान्य अनुभव दे जाता है, ऐसे अनुभव जो कभी आनंदित कर जाता है तो कभी परेशानी में डाल देता है और कभी आपको एक नसीहत दे जातक है । चार-छः रोज पहले की एक ऐसी ही स्मरणीय घटना का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं । बात तब की है जब मैं दिल्ली से वाराणसी की रेलयात्रा शिवगंगा एक्सप्रेस नाम की गाड़ी से कर रहा था, जो संध्याकाल दिल्ली से रवाना होती है और दूसरे दिन प्रातः अपने गंतव्य वाराणसी पहुंचती है । गाड़ी रात के करीब एक बजे कानपुर पहुंचती है, जहां पर कई यात्री चढ़ते-उतरते हैं ।

जैसा आम तौर पर होता है, गाड़ी के किसी बड़े रेलवे स्टेशन पर ठहराव के समय प्लेटफार्म पर ही नहीं आरक्षित डिब्बों के भीतर भी हलचल शुरू हो जाती है । अधिकांश यात्रियों की नींद ऐसे अवसरों पर खुल ही जाती है, भले ही घनघोर निद्रा का अर्धरात्रि से अधिक का समय ही क्यों न हो । डिब्बे के भीतर की चहल-पहल और शोर-शराबे में मेरी भी नींद खुल गयी । तब मैंने देखा की अनुमानतः अधेड़ अथवा उससे कुछ कम उम्र की एक महिला अपनी शायिका (बर्थ) खोज रही हैं । मैंने अक्सर देखा है कि अधिकांश रेलयात्री यह हिसाब नहीं लगा पाते हैं कि डिब्बे के अंदर उनकी आरक्षित शायिका कौन-सी और कहां पर होनी चाहिए । उन्हें शायिका-संख्या के लिए डिब्बे की दीवालों पर लगी चिप्पियों पर गौर से नजर डालनी पड़ती है । सीधे अपनी शायिका तक पहुंचना कोई कठिन काम नहीं है, क्योंकि शायिकाएं सुनियोजित रूप से क्रमांकित रहती हैं । अस्तु, मैंने उनकी शायिका संख्या 49 (निचली) की ओर इशारा किया । उन्होंने अपना सामान वहां फर्श पर रखा और आश्वस्त होकर शायिका पर बैठ गयीं ।

कुछ ही सेकंड या मिनट भर का समय गुजरा होगा कि एक और यात्री वहां पहुंचा, तकरीबन पैंतीस वर्ष का युवक । उसने भी उसी शायिका (संख्या 49) पर अपने आरक्षण का दावा पेश किया । दोनों के पास आरक्षण का टिकट था और दोनों ही का ही दावा था कि उसी शायिका पर उनका आरक्षण है । दोनों भ्रमित थे और अपने-अपने दावे को सही बता रहे थे । यह जरूर था कि महिला का आरंभिक आरक्षण प्रतीक्षा संख्या 1 के साथ हुआ था, और उसके कथनानुसार पहले दिन पूर्व ही शायिका संख्या 49 के आबंटन के साथ ही उसके आरक्षण की पुष्टि (कंफर्मेशन) हो गयी थी । मेरी जानकारी के अनुसार प्रतीक्षा सूची के यात्रियों के आरक्षण की पुष्टि भले ही बाद में हो जाए, किंतु किसको कौन-सी शायिका मिलेगी यह आरक्षण-चार्ट बनते समय ही नियत होता है । तब उस महिला को कैसे यात्रा से एक दिन पहले ही शायिका संख्या की जानकारी मिल गयी यह प्रश्न मेरे लिए अनुत्तरित था । हो सकता है मेरी जानकारी सही न हो । खैर, मैंने उन दोनों के बीच की समस्या में अपने को उलझाने की जरूरत नहीं समझी । गनीमत की बात यह रही कि दोनों आपस में नहीं झगड़े, बल्कि दोनों ने संचालक (कंडक्टर) का इंतजार करना या उसको खोजना ही मुनासिब समझा ।

अब तक गाड़ी कानपुर स्टेशन छोड़ चुकी थी । कुछ ही मिनटों के पश्चात् डिब्बे में नये प्रविष्ट यात्रियों के टिकटों की पड़ताल करते हुए कंडक्टर वहां पहुंचा । दोनों यात्रियों ने शायिका संबंधी समस्या उसके समक्ष रखी । एकबारगी वह भी चकरा गया । उसके पास उपलब्ध आरक्षण सूची में उस महिला का कहीं नाम नहीं था । उसके टिकट पर प्रतीक्षित ही तो लिखित था । फलतः उसने उस युवक को सूची के अनुरूप शायिका सोंप दी । महिला बार-बार जोर डाल रही थी कि रेलवे अंतरजाल (इंटरनेट) पृष्ठों के अनुसार उसे आरक्षण मिल चुका था । कंडक्टर “अच्छा देखते हैं” कहते हुए उस समय आगे बढ़ गया । इस बीच महिला ने अपने घर मोबाइल से भी बात की और वहां से जवाब मिला कि आरक्षण तो होना ही चाहिए । तो गड़बड़ कहां हुई ? महिला की बातों से लग रहा था कि वह झूठ नहीं बोल रही थी । अवश्य उसे और उसके घर वालों को धोखा हो गया था । सच पूछें तो उस मामले से मेरा कोई वास्ता नहीं था, फिर भी मुझे जिज्ञासा हो रही थी कि जानूं माजरा क्या है ।

अंत में घूम-फिरकर कंडक्टर दुबारा वहां पहुंचा । उसने महिला के टिकट पर एक बार फिर से नजर दौड़ाई । पहली नजर में टिकट ठीक ही लग रहा था । तब आरक्षण सूची में उसका नाम क्यों नहीं है इसे शायद वह भी नहीं समझ पा रहा था । उसने टिकट पर की एक-एक प्रविष्टि को दुबारा गौर से देखना आरंभ किया । ‘यात्रा की तिथि’ पर पहुंचते ही माजरा उसके समझ में आ गया । उसने साश्चर्य महिला से कहा, “बहिनजी, आपकी ट्रेन तो कल ही जा चुकी है । इस पर तो 23 की तारीख (शुक्रवार) अंकित है, और आज 24 तारीख (शनिवार) है । यह टिकट तो अब वैलिड ही नहीं है ।” इस जानकारी से महिला चौंक उठी और बोली, “यह भला कैसे हो सकता है ?” कंडक्टर ने पूरी बात महिला को समझाई । आगे क्या हुआ होगा, आप अंदाजा लगा सकते हैं । महिला अब कुछ कर नहीं सकती थी, उसे तो यात्रा पूरी करनी ही थी । हमारे समाज की ‘आदर्श मानवीय’ परंपरानुसार कुछ लेन-देन हुआ, और उसके गंतव्य तक की यात्रा की व्यवस्था कर दी गयी ।

उस पूरे वाकये के दौरान मेरी नींद उचट गयी थी । डिब्बे के बल्बों को बुझा दिये जाने के बाद मैंने फिर से सोने की चेष्टा की । मैं इस पर विचार करने लगा कि क्यों 23 तारीख के आरक्षण के बावजूद वह महिला 24 को यात्रा करने निकल पड़ी । किस भ्रम में वह और उसके घर के सदस्य यात्रा की असल तिथि भूल गये । इसका रोचक कारण मेरे समझ में आ गया । असल बात यह है कि भारतीय परंपरा में नयी तिथि तथा नये दिनवार की शुरुआत सूर्योदय के साथ मानी जाती है । जब मनुष्य रात की नींद के बाद सुबह उठता है तो उसे एक नये दिन के आरंभ होने की स्वाभाविक अनुभूति होती है, और उस नये दिन से वह सहज रूप से नई तिथि भी जोड़ लेता है । लेकिन जिस ‘कलेंडर’ को वैश्विक स्तर पर अब अपनाया जा चुका है, उसके अनुसार अर्धरात्रि के समय (24:00 बजे) अगली तारीख और अगला वार क्रमानुसार आरंभ हो जाते हैं । घड़ी से अर्धरात्रि के आगमन का पता चल जाता है और यदि व्यक्ति सचेत रहे तो एक नये दिन के आरंभ को भी वह मान लेता है । किंतु अर्धरात्रि कोई ऐसा एहसास नहीं दिलाती है जिससे एक नयी तारीख की अनुभूति होवे । वस्तुतः हम पूरे रात की तारीख दिन तथा संध्याकाल की सततता के रूप में देखने के आदी होते हैं । ऐसे में रात्रि के बारह बजने के बाद भी अपरिवर्तित तारीख की भूल कर बैठते हैं । पूरी रात को एक ही तारीख से जोड़कर देखना सामान्य भूल होती है । उस महिला को यह ध्यान ही नहीं रहा होगा कि 23 तारीख का 01:00 बजे का समय वास्तव में 22 तारीख की अर्धरात्रि के 24:00 बजने के घंटे भर बाद आ जाता है, न कि 23 तारीख के पूरे दिन बीतने के बाद की अर्धरात्रि के बाद । रात्रिकालीन तारीख के बारे में भ्रम कई लोगों में देखा जाता है । वास्तव में जो सावधानी बरतने के आदी होते हैं वे उपर्युक्त रात की तारीख को 22-23 की रात्रि कहकर स्पष्ट करते हैं । उस महिला ने गलती यह कर डाली कि 23 तारीख की 01:00 ए.एम. को 23-24 की अर्धरात्रि के बाद का समय मान बैठी ।

उक्त घटना में यह संदेश निहित है कि अर्धरात्रि के बाद की यात्र के समय तथा दिनांक पर सावधानी से विचार करना आवश्यक है, अन्यथा उपरिवर्णित घटना के समान ही बहुत कुछ अनुभव करना पड़ सकता है । – योगेन्द्र जोशी

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