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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों में ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं (2)

बीते ग्रीष्मकाल के दौरान करीब डेड़ माह के लिए मैं कनाडा के लंदन शहर में था, अपने बहू-बेटे के पास। यह शहर अंग्रेजों के द्वारा कनाडा के पूर्वी इलाके में बसाया गया था, जब कनाडा उनका उपनिवेश हुआ करता था। शहर का नाम ब्रितानी महानगर लंडन (लंदन?) के नाम पर ही रखा गया और उस नदी का नाम भी टेम्स रखा गया जिसके किनारे यह शहर बसा है। टेम्स इंग्लैंड के लंडन में बहने वाली नदी का नाम है।

कनाडा उन विकसित देशों में से एक हैं जहां लगभग हर परिवार के पास कार रहती है। किसी-किसी परिवार में अधिक कारें भी हो सकती हैं जो उसकी हैसियत एवं आवश्यकता पर निर्भर करता है। मैंने तो सड़कों पर मरम्मत करने या साफ-सफाई करने वालों (श्रमिकों) को देखा है, जो अपनी कार अथवा उसके तुल्य बहु-उद्येशीय चौपहिया वाहन से आते हैं और उनको निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने के बाद अपने काम में जुट जाते हैं। अवश्य ही वहां यातायत की नागरिक सुविधाओं, जैसे नगरीय बस-प्रणाली, की व्यवस्था है और जरूरत के हिसाब से टैक्सी-सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं। लेकिन स्वयं की कार से आवागमन की तुलना में ये महंगी पड़ती हैं। इसलिए अपने पास कार हो तो किफ़ायत तथा सुविधा दोनों ही होती हैं।

अभी मेरे बहू-बेटे के पास कार नहीं है। दरअसल उन दोनों को कार चलानी आती भी नहीं है, यद्यपि वे वहां 4-5 साल से रह रहे हैं। आरंभ में वे जब वहां पढ़ रहे थे तो उन्हें कार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। किंतु बाद में नौकरी-पेशे में आने के बाद बेटे ने प्रशिक्षकों से कार चलाना सीखा और उनकी देखरेख में कई-कई घंटे उसे चलाने का अभ्यास भी किया। प्रशिक्षक की फ़ीस एवं कार का किराया उसे महंगा पड़ता था। अपनी कार होती तो उसे प्रशिक्षण कुछ सस्ता पड़ता। अभी तक वह 50-60 हजार रुपये के तुल्य (डालर) धनराशि या उससे भी अधिक खर्च कर चुका होगा। उसने बताया कि वह तब तक कार नहीं खरीद सकता जब तक उसके पास वाहन-चालन का लाइसेंस न हो। उसकी जानकारी में यह वहां का नियम है। इस नियम के कुछ अपवाद अवश्य होंगे।

पिछली गरमियों में जब मैं उसके पास था तो उसने ड्राइविंग लाइसेंस (वाहन-चालन अनुज्ञापत्र/अनुमतिपत्र) पाने के लिए तत्संबंधित परीक्षा दी। जैसा कि सभी विकसित देशों की व्यवस्था है परीक्षा दो चरणों में होती है। पहले चरण में लिखित परीक्षा “ऑन-लाइन” संपन्न होती है, जिसमें वाहन-चालन से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देना होता है। यह चरण अपेक्षया सरल होता है। दूसरे चरण में परीक्षार्थी को वाहन चलाकर दिखाना होता है। करीब एक घंटे की इस परीक्षा में शहर की सड़कों, चौराहों, पार्किंग स्थलों आदि से होते हुए वाहन चलाने की योग्यता की जांच होती है। परीक्षार्थी को वाहन निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने, उसे पीछे चलाकर निकालने, चौराहे पर “ट्रैफ़िक लाइट” के अनुसार रुकने, आदि का कार्य बिना गलती के संपन्न करना होता है।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इन विकसित देशों में सड़कें “लेनों” में विभक्त रहती हैं और चालक को निर्धारित लेन के भीतर बने रहना होता है। लेन बदलने के लिए पीछे के वाहनों को पर्याप्त समय पहले “इंडिकेटर लाइट” से संकेत देना होता है। सड़्कों पर सफ़ेद, पीली, लाल लाइनें खिंची रहती हैं, कहीं ठोस (solid,  ————), तो कहीं खंडित (broken या  dashed,  —  —  —) और कहीं अन्य प्रकार की। इन सबके सुनिश्चित प्रयोजन होते हैं जिसकी जानकारी परीक्षार्थी को होना आवश्यक है, और उसे इन बातों को ध्यान में रखते हुए वाहन चलाना या रोकना होता है। वस्तुतः यातायात के सुस्पष्ट एवं कठोर नियम होते हैं, जिनके उल्लंघन पर परीक्षार्थी को लाइसेंस नहीं मिल सकता है। उन नियमों का यहां पर विवरण देना न संभव है और न वैसा करना मेरा उद्येश्य है।

वापस अपने बेटे की परीक्षा की बात पर। वाहन-चालन की परीक्षा का परिणाम उसके परीक्षक ने तत्काल सौंप दी। उसकी कमियों का उल्लेख करते हुए उसे अनुत्तीर्ण (फ़ेल) घोषित कर दिया। वह घर निराश होकर लौटा। पूछने पर उसने कहा, “परीक्षा में दो प्रकार के दोष देखे जाते हैं। पहले वे दोष जो गंभीर श्रेणी में गिने जाते हैं और उनके आधार पर परीक्षा के दौरान ही अभ्यर्थी को लाइसेंस के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। दूसरे वे दोष या गलतियां जो स्वयं में गंभीर नहीं मानी जाती हैं लेकिन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी गलतियों के लिए 5-5, 10-10 के नकारात्मक (निगेटिव) अंक नियत होते हैं।”

बेटे ने मुझसे आगे कहा, “उसके परीक्षक ने उसे नकारात्मक 40 (यानी -40) अंक दिये। अगर नकारात्मक 30 अंक या उससे कम होते तो गलतियों को अजरअंदाज करते हुए मुझे लाइसेंस के लिए योग्य मान लिया जाता। चूंकि 40 (30 से अधिक) नकारात्मक अंक मिले इसलिए मैं अनुत्तीर्ण मान लिया गया।”

मैंने उससे पूछा,“किस प्रकार की चूक हुई थीं तुमसे?”

उसने परीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट दिखाई जिसमें कहां-कैसी गलती उसने की थी इसका क्रमबद्ध संक्षिप्त विवरण था। उसने एक उदाहरण से बात स्पष्ट की, “मुझे एक जगह कार पार्क करने के लिए कहा गया। मेरी कार का अगला हिस्सा पार्किंग के लिए खिंची गई सीमारेखा से 3-4 इंच आगे बढ़ गयी। यह होना नहीं चाहिए था। समझ लिजिए ऐसी ही 3-4 गलतियां हुई थीं।”

इस वाकये पर मुझे उस महिला का स्मरण हो आया जिससे मेरी पत्नी का परिचय हमारे इंग्लैंड प्रवास (1983-85) के दौरान हुआ था। वह विवाह के बाद अपने ब्रितानी नागरिकता वाले पति के पास पंजाब से आ गयी थीं। मेरी पत्नी की उनके साथ किंचित्‍ निकटता हो गयी थी। उस काल में उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस के तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिल सकी थी। हमारे भारत वापसी के बाद एक दिन उनका पत्र मिला कि चौथे प्रयास में उनको लाइसेंस मिल गया। वे बहुत खुश थीं।

कनाडा के उसी लंडन शहर में हमारा एक पूर्व-परिचित युवक भी अपने परिवार के साथ रहता है। उससे मेरे बेटे के पारिवारिक संबंध हैं। बेटे ने हमें यह बताया कि उसकी पत्नी भी लाइसेंस पाने में अपने पहले प्रयास में सफल नहीं हो पाई हैं।

जाहिर है कि कनाडा में (उसी प्रकार अन्य विकसित देशों में) ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं होता है। अपने देश में ड्राइविंग-लाइसेंस प्रदान करने के कोई सुस्थापित कायदे-कानून हैं कि नहीं मुझे नहीं मालूम। अगर होंगे तो केवल कागजों में होंगे क्योंकि व्यवहार में मुझे वे कभी दिखे नहीं।

मैंने स्कूटर-चालन का लाइसेंस अपने शहर वाराणसी में सन् 1981 में लिया था। तब वाहन-चालन संबंधी मेरा कोई परीक्षण नहीं हुआ था। दो-तीन सवाल पूछे गये और वहीं बैठे एक डाक्टर ने आंख-कान एवं शारीरिक रोगों के बारे में कुछ सवाल किए जिनका समुचित उत्तर मैंने दे दिए। उसने भी “ओके” कर दिया और दूसरे दिन मुझे लाइसेंस मिल गया। उसके बाद 2-3 बार नवीनीकरण कराया; वह भी बिना अधिक सवाल-जवाब के हो गया। अब तो मैंने स्कूटर चलाना ही छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जैसे उम्रदराज लोगों के लिए यहां की यातायात व्यवस्था में स्कूटर चलाना जोखिम का काम है।

मेरी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके मामले में वाहन-चालन का परीक्षण “ढंग-से” हुआ हो। जब मैंने लाइसेंस लिया था तब मुझे लगा था कि लाइसेंस तो लूले-लंगड़े, अंधे-बहरे भी ले सकते हैं। परिवहन कार्यालयों में ऐसे दलाल आपको मिल जायेंगे जो लाइसेंस का “प्रबंध” करने का धंधा करते हैं। घर बैठे आप लाइसेंस पा सकते हैं। सच पूछिये तो लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफ़िक हुआ करता था। “पैसा खर्च करो और लाइसेंस पाओ।” आज स्थिति कितनी बदली है मैं बता नहीं सकता। सुना है कि अब बहुत कुछ कंप्यूटरीकृत हो चुका है। और आवेदनकर्ता के हाथ की अंगुलियों की छाप ली जाती है। किंतु सही तरीके से वाहन-चालन की योग्यता का परीक्षण होता है या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है। मुझे आशंका है कि अभी भी लाइसेंस पैसे के लेनदेन से मिलता होगा बिना परीक्षण के।

विकसित देशों में नागरिकों के सुरक्षा सर्वोपरि होती है, इसलिए वे व्यवस्था की उस खामी को बर्दास्त नहीं करते जो सुरक्षा के लिए खतरा हो। सुरक्षा की इस भावना से संबंधित एक वाकये का जिक्र मैंने पहले की एक ब्लॉग-पोस्ट  में भी किया है।

हम भारतीय विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं, परंतु अपने तौर-तरीकों को बदलना नहीं चाहते हैं। याद रहे कि सफल लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग से पहले जिम्मेदारी की भावना की जरूरत होती है, जो अपने देशवासियों में बहुत कम है। – योगेन्द्र जोशी

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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों से कितना पीछे हैं हम (1)

अपना देश विकसित बनने की आकांक्षा लेकर चल रहा है। किन्तु इस बात को समझने की कोशिश देशवासी, विशेषतः देश के कर्णधार राजनेता, नहीं करते हैं कि विकसित देशों के नागरिक नियमों का पालन करते हैं। यह कहना अतिरंजित नहीं होगा कि नागरिक नियमों का पालन उनकी जीवन-पद्धति का हिस्सा बन चुका है। हो सकता है चार-पांच पीढ़ियों पहले उनकी स्थिति बहुत संतोषप्रद न रही हो, किंतु जब हर आने वाली पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी को बहुधा नियमों से बंधे देखती होगी तो वह स्वयं उसके अनुसार ढलती गयी होगी। मनुष्य को अपनी बाल्यावस्था में अपने परिवेश में जो देखने तथा अनुभव करने को मिलता है उसी के अनुसर उसकी सोच बनती है। मैंने अनुभव किया है कि विकसित देशों के नागरिक स्वयं अपने एवं उन लोगों, जिनके बीच वे रहते हैं, के हितों के प्रति काफी हद तक सचेत रहते हैं। मेरा काम कैसे बने केवल यह सोचकर चलना शायद उनकी सोच में नहीं रहता। ऐसा नहीं कि वहां कायदे-कानूनों का उल्लंघन कोई भी नहीं करता, किंतु वैसे लोग कमोबेश अपवाद के तौर पर पाये जाते हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि विकसित देशों में कायदे-कानूनों को तोड़ने वाले को बचाने के लिए नेता-वेता और आम आदमियों की भीड़ जमा नहीं होती है जैसा कि हमारे देश में अक्सर होता है।

मुझे विकसित देश का अनुभव कोई 30 वर्ष पहले तब हुआ था जब मैं उच्चाध्ययन एवं शोधकार्य के लिए विलायत गया हुआ था। तब अपने देश एवं उस देश की व्यवस्थाओं का अंतर मुझे साक्षात्‍ देखने का अवसर मिला था। किंतु अपने निर्धारित उद्येश्य की पूर्ति करने की व्यस्तता में मैंने उस समय वहां की नागरिक व्यवस्था की बारिकियों पर कोई चिंतन-मनन नहीं किया था। परंतु बीते ग्रीष्मकाल में एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ भारतीय पर्यटक की हैसियत से कनाडा में अपने बेटे-बहू के पास सात-आठ सप्ताह के प्रवास का जब मुझे अवसर मिला तो वहां की नागरिक व्यवस्था को समझने की कोशिश भी मैंने की थी।

सभी विकसित देशों में एक बात सामान्यतः देखने को मिलती है और वह है नागरिक सुरक्षा। ये बात मैंने कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन तथा इटली में अनुभव की है, और अन्य देशों के बारे में तत्संबंधित जानकारी परोक्षतः प्राप्त की है। नागरिक सुरक्षा से मतलब है किसी व्यक्ति के जानमाल की सुरक्षा, और उसमें भी ‘जान’ की सुरक्षा पहले फिर ‘माल’ की। जो लोग ऐसे कार्यों में लगे हों जिनमें जान खोने का जोखिम हो उनके लिए भी सुरक्षा के यथासंभव प्रयास किए जाते हैं।

सुरक्षा की उक्त नीति के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को जानबूझकर अपनी अथवा किसी अन्य व्यक्ति की सुरक्षा से खिलवाड़ करने की छूट नहीं मिलती है। इस हेतु कड़े नियम हैं और आम तौर पर सभी नागरिक उन नियमों से वाकिफ रहते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मैं समझता हूं ऐसा वे स्वेच्छया करते हैं। अवश्य ही कुछ इस भय से भी करते होंगे कि नियमों का उल्लंघन करते पकड़े जाने पर दंडित होना पड़ेगा। विकसित देशों में नेताओं एवं उच्चाधिकारियों के परिजनों को भी नहीं बख़्शा जाता है।

अपने देश में ये सब कल्पना से परे है। सुरक्षा भगवान भरोसे रहती है और जब भी दुर्घटना होती है तो उससे कोई सीख नहीं ली जाती है; न आम नागरिक सीख लेता है और न ही शासकीय तंत्र।

अब मैं कनाडा के अपने प्रवास के दौरान अनुभव में आयी एक घटना का जिक्र करता हूं। मेरे बेटे-बहू एक 11-मंजिली इमारत की 10वीं मजिल में स्थित अपार्ट्मेंट में रहते हैं। इमारत में कुल करीब 100 अपार्ट्मेंट हैं। एक दिन रसोई के बिजली के “हॉट-प्लेट” (चूल्हा) पर रोटी सेंकने अथवा पापड़ भूनने में कुछ धुंआ उठने लगा। यों तो धुंआ कुछ हद तक चूल्हे के ऊपर लगे पंखे-चिमनी के माध्यम से बाहर निकल जाता है, किंतु अधिक मात्रा होने पर उसका कुछ हिस्सा कमरों में फैल जाता है। उस समय धुंए की मात्रा कुछ अधिक हो गयी थी। फलतः रसोई से सटे कमरे में “स्मोक-सेंसर” का अलार्म (चेतावनी ध्वनि) बज गया। घबराहट में चूल्हे एवं रोटी/पापड़ का काम बंद करके हम लोगों ने स्नानगृह का “एग्जास्ट फैन” चलाते हुए सभी दरवाजे-खिड़कियां खोल दीं ताकि धुंआ निकल जाये। उस समय बेटे को छोड़कर हम तीन – बहू, मेरी पत्नी और मैं – घर में थे।

बाद में जब बेटा घर आया तो उसको हमने घटना के बारे में बताया। तब उसने घर में लगे “अलार्म बटन” के बारे में बताया कि उसे दबाने पर अलार्म बंद हो जाता है। लेकिन “स्मोक-सेंसर” अपना कार्य करता रहता है। बहू को भी उस “बटन” की जानकारी नहीं थी। बेटे ने यह भी बताया कि यदि धुंए की स्थिति नहीं बदली तो पच्चीस-तीस सेंकंड बाद फिर अलार्म बजता है। लेकिन इस बार वह पूरी इमारत में तथा हर अपार्टमेंट में बजता है और परिसर के कार्यालय में भी बज उठता है। उसकी सूचना अग्निशमन-दल को भी तुरंत पहुंच जाती है।

बेटे ने यह भी बताया कि अपार्टमेंट के नियमानुसार उस “सामुदायिक” चेतावनी (अलार्म) के बाद हर व्यक्ति का दायित्व होता है वह तुरंत अपने कमरे/अपार्टमेंट से बाहर खुले में निकल आवे। यदि संयोग से बड़ी दुर्घटना न घटी और यह पाया जाये कि अमुक व्यक्ति अपार्टमेंट में ही रह गया था। तो उसे 500 कनाडाई डॉलर का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

“आपने अपना जीवन जोखिम में डालने का अपराध क्यों किया?” यह सवाल वहां पूछा जाता है। वस्तुतः यह वैसा ही अपराध है जैसा कि आत्महत्या करना। क्या अपने देश में ऐसा सोचा जा सकता है? यहां तो दुर्घटनाओं के पीछे जिसका हाथ हो उसे तक सजा नहीं मिलती! मामला अक्सर कोर्ट में चला जाता है और फिर वर्षों तक मामला चलता रहता है। तब तक बहुत कुछ बदल चुकता है और शायद ही कोई दंडित होता है! – योगेन्द्र जोशी

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