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वे छोटी-छोटी बातें जिनके बारे में सोचते नहीं लोग

मेरे गृह-परिसर के प्रवेशद्वार पर आकर एक गाय अक्सर लेट जाती थी। अपने शहर वाराणसी में छुट्टा कुत्ते-गाय-सांड़ सड़कों पर इधर-उधर घूमते ही रहते हैं। इतना ही नहीं बंदरों का आतंक भी झेलना पड़ता है। ऐसी ही एक छुट्टा गाय कुछ दिन पहले मुहल्ले की मेरी गली में भूले भटके आ टपकी, और उसने आराम फरमाने के लिए मेरे घर के प्रवेशद्वार को चुन लिया। उसके कारण आने-जाने में असुविधा तो होती ही थी, अलावा उसके वह गोबर-मूत्र की गंदगी भी उस स्थल पर फैला जाती थी। हर रोज घर की खिड़की से बीच-बीच में प्रवेशद्वार की ओर नजर डालना और उसे हटाना हमारा रोज का नियम-सा बन गया। कुछ दिन तक यह सिलसिला चलता रहा और फिर एक दिन उसने अपना ठिकाना बदल दिया। उसने मोहल्ले की दूसरी गली को चुन लिया।

उसके ‘स्थाई’ तौर पर चले जाने के बाद एक सवाल मेरे मन में उठा कि क्या गाय ने यह सोचा होगा कि अमुक जगह छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि यहां से उसे बार-बार भगा दिया जाता है? उसने क्या यह सोचा होगा कि मेरी वजह से इन लोगों को परेशानी होती है, इसलिए मुझे कहीं अन्यत्र चले जाना चाहिए? या कुछ और उसके दिमाग में आया होगा? अथवा घटना की वारंवारता से प्रेरित हो उसकी नैसर्गिक सहज वृत्ति ने उसका व्यवहार बदल दिया? पशुओं के प्रशिक्षण में इसी वारंवारता का ही तो महत्व होता है। आम धारणा यही है कि कोई भी पशु सोच-समझकर खास तरीके से व्यवहार नहीं करता, बल्कि वह वारंवारता से वैसा करने के लिए प्रकृतितः ढल जाता है।

क्या पशुओं में सोचने-समझने की क्षमता बिल्कुल नहीं होती है? वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जंगलों में रहने वाला गोरिल्ला दरिया पार करते समय उसकी गहराई का अनुमान लगाने के लिए पेड़ की टहनी का इस्तेमाल करता है। वह अलग-अलग जगहों पर टहनी डुबोकर पता लगाता है कि किस स्थल पर दरिया अधिक छिछला है। इसी प्रकार कड़े खोल वाले गिरीदार (खाद्य बीज वाले) फलों को तोड़ने के लिए पत्थर का प्रयोग करते हुए चिंपाजियों को देखा गया है। प्रयोगशाला में किए गए अध्ययनों में वयस्क चिंपाजियों की औसत बुद्धि 2-3 वर्ष के सामान्य बच्चे के बराबर पाई गई है। कौवों पर किए गये अध्ययन भी रोचक पाए गये हैं। ऐसा लगता है कि अत्यल्प मात्रा में ही सही सोचने-समझने जैसी कुछ क्षमता मानवेतर उन्नत पशु-पक्षियों में भी होती है।

 मनुष्यों का एकसमान तरीके से न सोच-समझ पाने की क्षमता का अनुभव मैं लंबे अरसे से करते आ रहा हूं। अर्थात्‍ कुछ लोग वस्तुस्थिति की बारीकी से निरीक्षण करने में समर्थ और उस सामर्थ्य के इस्तेमाल के आदी होते हैं। लेकिन सब इतने सचेत नहीं होते। कदाचित् पशुओं में भी इसी प्रकार का भेद होता होगा ऐसा मेरा मानना है। एक ही प्रजाति के सभी पशु समान प्रशिक्षण के बावजूद एकसमान क्षमता हासिल नहीं करते हैं।

     मनुष्य को बुद्धिमान प्राणी कहा जाता है। कहने को तो वह सोच-समझ सकता है, निर्णय ले सकता है और निर्णय का कार्यान्वयन कर सकता है। पर क्या सभी मनुष्य विभिन्न मुद्दों पर विचार करने की पर्याप्त सामर्थ्य रखते हैं? विचार करने का भाव भी क्या सबके मन में उठता है? मुझे लगता है कि वह भी बहुधा एक पशु या निम्न-स्तर के रोबोट की भांति प्रचलित ढर्रे पर चलता है, आगे-पीछे सोचे बिना और विकल्पों पर विचार किए बिना। मैं अपना मंतव्य एक दृष्टांत से स्पष्ट करता हूं।

     मेरे पड़ोस में एक सज्जन रहते हैं। हाल ही में वे बतौर किराएदार आए हैं। वे घर से बाहर निकलते समय मुख्य द्वार की अर्गला (सिटकनी) बंद करके ताला चढ़ा जाते हैं। ऐसा करते समय वे अर्गला की बेलनाकार छड़ दायें-बांये घुमा-घुमाकर सरकाते हैं। चिकनाहट न होने एवं किंचित जंग लगे होने के कारण छड़ आसानी से नहीं सरक पाती है। फलतः उसकी चूं-चां की कर्कश ध्वनि पड़ोस में हमारे कानों तक पहुंचती है। अवश्य ही उन सज्जन को भी मेहनत करनी पड़ती होगी। हमें वह आवाज खलती है, लेकिन अभी तक परिचय न हो पाने तथा एक प्रकार की हिचक की वजह से हम उन्हें यह सुझाव नहीं दे पाए हैं कि उस पर मोबाइल या ‘ग्रीज’ का लेपन कर लें, ताकि उस पर चिकनाहट आ जाए। सरसों या नारियाल आदि के तेल से भी वे काम चला सकते हैं

    मेरी समस्या उस कर्कश ध्वनि तक सीमित नहीं है। वह आवाज मुझे खलती जरूर है, लेकिन मेरे लिए उससे भी अधिक अहमियत इन सवालों का है कि वह आवाज खुद पड़ोसी सज्जन को क्यों नहीं खलती होगी? और यह भी कि उस पर चिकनाई चढ़ाकर अर्गला बंद करना सरल हो जाएगा यह विचार उनको क्यों नहीं आता होगा? कोई घटना एक-दो बार हो तो उसकी अनदेखी हो सकती है, लेकिन जिसका सामना रोज करना पड़े उस पर तनिक विचार तो होना ही चाहिए न? मुझे लगता है कि कई बातें लोगों के दिमाग में स्वयमेव नहीं आती हैं। यह मानव समाज से जुड़ा एक रोचक तथ्य है। इसे में “विचारशून्यता” कहता हूं।

     मैंने आरंभ में गाय का जो उदाहरण दिया वह अपनी इसी धारणा को व्यक्त करने के लिए है। निःसंदेह मैं स्वयं भी इस तुलना को अतिरंजनायुक्त (अतिशयता वाला) कहूंगा, लेकिन ऐसा अपनी इस बात पर जोर डालने के लिए कर रहा हूं कि सामान्य जीवन में बहुत-से कार्य होते हैं जिनके संदर्भ में “मैं इसे करूं या न?”; “अगर करूं तो कैसे?”; “क्या कोई विकल्प बेहतर होगा?”; “मेरे कार्य से निकटवर्ती लोग प्रभावित तो नहीं होंगे?” जैसे तमाम सवाल मनुष्य होने के नाते हमारे मस्तिष्क में उठने चाहिए। परंतु ऐसा अकसर नहीं होता। मैं उस स्थिति में सोचने लगता हूं कि हमारा व्यवहार पशुओं से एकदम भिन्न सदैव नहीं होता है।

     विचारशून्यता के अनेक उदाहरण रोजमर्रा की जिंदगी में देखने को मिल जाते हैं, जैसे अपना वाहन दूसरे के मकान के प्रवेश द्वार पर खड़ा कर देना, वाहन से चलते हुए पान की पीक पिच्चकर थूक देना, खाते-खाते केले का छिलका सड़क पर फेंक देना, सार्वजनिक पानी-टोंटी से लापरवाही से पानी बहने देना, सड़क पर दुधारू गाय-भेंस बांध के रखना। मेरे शहर वाराणसी में ऐसी बातें आम हैं। – योगेन्द्र जोशी

 

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कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा

मुझे एक गाय मुहल्ले की अपनी गली के नुक्कड़ पर घास चरती हुई मिल गयी । आजकल बरसात का मौसम है । बारिस के नाम पर इस मौसम में अपेक्षा से बहुत कम पानी बरसा है अपने इलाके में, फिर भी जमीन में इतनी नमी तो आ ही गई है कि सड़कों-गलियों की कच्ची जमीन पर मौसमी घास उग सके । बस वही घास वह गाय चर रही थी । मैं पास से गुजरने लगा तो उसने मुझे गौर से देखा । उसे शायद मेरा चेहरा देखा-पहचाना-सा लग रहा था ।

Stray Cow

मैंने उसकी ओर मुखातिब होकर पूछा, “क्यों भई गैया माई, आज इधर कैसे ? आजतक तो आपको ऐसे चरते हुए नहीं देखा; कम से कम अपनी इस गली में तो कभी नहीं ।”

“बस यों ही, समझ लें तफरी लेने निकल पड़ी मैं भी । कभी-कभी जिन्दगी में कुछ चेंज भी तो होना चाहिए ।” उसका जवाब था ।
उसकी बात मैं समझ नहीं पाया । अधिक कुछ और पूछे बिना मैं आगे बढ़ गया ।

मैंने उसे सुबह-शाम जब भी देखा घर के नजदीक की मुख्य सड़क के किनारे के एक मकान के सामने ही बंधा देखा था दो-तीन अन्य गायों के साथ । जरूर उस मकान के मालिक ने पाल रखा होगा उन सबको । उस दुमंजिले मकान के भूतल पर किराने की दुकान है उसी मकान मालिक की; और साथ में चलता है गाय-भैंसों के चारे का कारोबार । एक आटा-चक्की भी चलती है वहां; मैं कभी-कभार आटा खरीद ले आता हूं वहां से । ऐसे ही मौकों पर अथवा वहां से सड़क पर पैदल गुजरते हुए मैंने उस गाय को खूंटे से बंधे और नांद से चारा-पानी खाते हुए देखा है । लेकिन कभी भी शहर के आम छुट्टा जानवरों की तरह उसे इधर-उधर घूमते-चरते नहीं देखा । वह पालतू जो थी ।

मुझे जिज्ञासा हुई देखूं कि माजरा क्या है । मैंने सड़क पर आते-जाते उस खूंटे पर गौर करना शुरू किया । अब वह गाय उस खूंटे से बंधी नहीं दिखाई देती, कभी नहीं । मैं समझ गया वह अब बेकार हो चुकी है; वह बूढ़ी हो रही होगी और बछड़े-बछिया जनकर दूध देने की क्षमता खो चुकी होगी । इसलिए उसके मालिक ने उसे अपने हाल पर छोड़ दिया है । अब वह छुट्टा गाय बन गई है दूसरे कई अन्य गायों की तरह ।

मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के पचास-पचपन साल पहले के वे दिन याद आते हैं जब हमारे घरों में गायें पहली थीं । बारह-चौदह साल तक दूध देने के बाद वे इस कार्य से निवृत्त हो जाती थीं । उन्हें तब खदेड़कर जंगल में नहीं छोड़ दिया जाता था, बल्कि अन्य गाय-भेंसों के साथ वे भी पलती रहती थीं । लेकिन वे अधिक दिन नहीं जी पाती थीं और दो-तीन साल में दम तोड़ देती थीं । अवश्य ही तब उनके शवों को जंगल में डाल दिया जाता था । उनका मांस गिद्धों एवं जानवरों का भोजन बनता था । लेकिन यहां वह सब नहीं था ।

लंबे अर्से के बाद एक दिन वह मोहल्ले की ही किसी गली में मुझे मिल गयी लंगड़ाते हुए । मैंने उससे पूछा, “ये पैर में चोट कैसे लगी ?”

जवाब था, “क्या बताऊं, सड़क पार करते वक्त एक कार से टकरा गई ।”

“देखकर चला करिए, अपने शहर में सड़कें पार करना इतना आसान थोड़े ही है ।” मैंने सलाह दी ।

“देखकर ही चल रही थी, कारवाले को ही शायद नहीं दिखाई दिया ।”

“यानी कि कारवाला आपसे टकराया । यही न ?”

“यह मैं कैसे कहूं ? कारवाला बड़ा आदमी होता है, उसको भला कैसे दोष दिया जा सकता है । दोषी तो सदा कमजोर ही माना जाएगा न । यही तो इस दुनिया का उसूल है ।”

उसकी इस टिप्पणी का क्या जवाब दूं मैं सोच नहीं पा रहा रहा था । “चलिए, कुछ दिन में आपका पांव ठीक हो जाए यही प्रार्थना है मेरी ।” कहते हुए मैं वहां से चल दिया ।

यह मेरी उससे अंतिम मुलाकात थी । उसके बाद मैंने उसे कभी नहीं देखा । वह शायद दिवंगत हो गई होगी । या फिर कुछ और …। मैं स्वयं से पूछता हूं कि गोसेवा का दंभ भरने वाले भारतीय समाज में क्या कोई वाकई गोसेवक होता हैं या गोशोषक । – योगेन्द्र जोशी

 

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