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आवश्यकता के अनुसार भूलने की बिमारी

पिछले 2-3 सालों से 2जी स्पेक्ट्रम नाम के बहुचर्चित घोटाले के मामले की अदालती कार्यवाही चल रही है । मामले का हस्र तो वही होना है जो ऐसे मामलों में सदा से होता आया है । लेकिन सीबीआई उर्फ ‘तोता’ नाम की सरकारी संस्था को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने के लिए छानबीन का नाटक करते ही रहना पड़ता है । वही इस दफा भी हो रहा होगा । मामले में बतौर सरकारी गवाह के अनिल अंबानी नाम के लब्धप्रसिद्ध कारोबारी से भी पूछताछ हुई है ।

समाचार माध्यम बताते हैं कि अदालत में अधिकांश सवालों के जवाब अंबानीजी ने “मुझे याद नहीं है” कह कर दिया । अदालत ने उनसे पूछा, “क्या आप जानते हैं कि आपकी बातें अगर झूठी सिद्ध हुईं तो सजा भी हो सकती है ?” उन्होंने हामी भरते हुए बताया कि उन्हें इस संभावना की जानकारी है । दूसरे दिन जब श्रीमती टीना (मुनीम) अंबानी की बारी गवाही के लिए आई तो उन्होंने भी मुझे कुछ याद नहीं की बात दोहराई ।

मैं समझता हूं अंबानी जी ने मन ही मन कहा होगा, “क्या-क्या हो सकता है यह माने नहीं रखता । माने तो यह रखता है कि असल में क्या होता है । होगा वह जो आज तक होता आया है, यानी कि कुछ नहीं होगा । आप पहाड़ खोदेंगे और उसमें से चुहिया निकलेंगी, और वह भी पकड़ में नहीं आएगी ।”

श्रीमान अंबानी जी ने ऐसा सोचा होगा यह मेरे अपने खयाल हैं । उनके मन में क्या रहा होगा यह तो वही बता सकते हैं । लेकिन वे क्योंकर किसी को बताएंगे ?

मैं अंबानी जी पर कोई लेख लिखने नहीं जा रहा हूं । उनका जिक्र तो मैं इसलिए कर रहा हूं कि कई लोगों को सुविधा एवं आवश्यकता के अनुसार भूल जाने का रोग होता है । जहां याद रहना घाटे का सौदा हो वहां भूल जाना, और जहां काम निकालना हो वहां याद रखना कई जनों के स्वभाव में शामिल रहता है । शायद ही कोई मनुष्य हो जो यह दावा कर सके कि उसको यह रोग जिंदगी में कभी नहीं हुआ । कभी-कभार इस रोग का दौरा पड़ना आम बात है, किंतु कुछ लोग इससे इतना ग्रस्त होते हैं कि पता चल जाता है कि मामला उतना सीधा नहीं है । मैं अपने ऐसे ही एक अनुभव का जिक्र यहां पर कर रहा हूं ।

मेरे शिक्षण संस्थान के मेरे विषय के एम.एससी. की एक प्रयोगशाला यानी लैब में दो-तीन शिक्षकों को साथ-साथ कार्य करना पड़ता था । कोई ढाई-तीन घंटे की प्रायोगिक कक्षाएं वहां चलती थीं । विश्वविद्यालयों-कालेजों में शिक्षकों का लैब की कक्षा में किंचित् विलंब से आना और छात्रों की हाजिरी दर्ज करते हुए समय से कुछ पहले ही खिसक लेना कोई असामान्य बात नहीं होती । परंतु मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ऐसे थे जो इस आदत के कुछ अधिक ही धनी थे । वे अक्सर जरूरत से ज्यादा देर से पहुंचते थे । एक बार वे तब पहुंचे जब लैब का समय लगभग खत्म होने को था । वरिष्ठ होने के नाते उनसे मैं कुछ कहता नहीं था, पर मुझे खीज जरूर होती थी । इस मौके पर एक बात कहूं ? हम भारतीय लिहाज बरतने के मामले में काफी उदार होते हैं । मैं समझता हूं कि कोई गलत-सलत कार्य करे तो टोकने के बजाय चुप्पी साध लेना हमारे ‘जीन्स’ (जैविक गुणधर्म का आधार) में निहित है । खैर, वे हांफते-हूंफते पहुंचे और बोले, “अरे, मैं तो भूल ही गया कि मेरी क्लास है ।”

मेरे पास कहने को कुछ था नहीं । क्या कहता भला ? कह ही चुका हूं कि अपने जीन्स के अनुकूल व्यवहार करना स्वाभाविक था । “अच्छा ! … छोड़िए भी, कभी-कभी अति व्यस्तता के कारण जरूरी काम भी दिमाग से उतर जाते हैं ।” मैंने औपचारिक प्रतिक्रिया पेश की ।

बात आई-गई हो गई । मैं जब कभी अपने कुछएक हमउम्र सहयोगियों के साथ उनके सान्निध्य के अनुभवों को साझा करता तो पता चलता कि ऐसा तो उनके साथ चलता ही रहता था । हम इसे जानबूझकर भूलने की बिमारी कहते थे । आधुनिक ‘समझदार’ लोग इस रोग से स्वेच्छया ग्रस्त हो जाते हैं । यह ठीक वैसा ही है जैसा कि आपराधिक बारदात में पकड़े जाने पर सफेदपोश लोगों के सीने में दर्द उठ जाता है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होने का बहाना मिल जाता है ।

मेरे मत में अधिकांश भारतीयों की मानसिकता इस दोष से ग्रस्त रहती है कि वे अपने पेशे के दायित्वों की तुलना में वैयक्तिक हितों को प्राथमिकता देते हैं । समस्या तब होती है जब वे अपने निजी कार्य उस समय निबटाने चल पड़ते हैं जब उनसे पेशे के कार्य में लगे होने की अपेक्षा की जाती है । मेरे पूर्व सहयोगी बैंक, अस्पताल अथवा अन्यत्र उस समय निकल पड़ते थे जब उन्हें कक्षा में होना चाहिए था । हम अपने दायित्वों के प्रति कितने सचेत रहते हैं यह हमारे राजनेता और प्रशासनिक कर्मियों में व्याप्त लापरवाही स्पष्ट करती है । – योगेन्द्र जोशी

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“भ्रष्ट आचरण का वाइरस तो हमारे खून में है, सर!”

मैं अपने कंप्यूटर डीलर के आफिस में बैठा हूं । उसके साथ मेरा संबंध कोई अढाई दशक पुराना है – उस काल से जब उसने एक युवा उद्यमी के तौर पर कंप्यूटर के क्षेत्र में कारोबार करना आरंभ किया था, और हम (मैं तथा मेरे अन्य सह-अध्यापक) अपने विश्वविद्यालय (बीएचयू) में कंप्यूटर पाठ्यक्रम की शुरुआत कर रहे थे । देश में तब कंप्यूटर संस्कृति ने कदम रखे भर थे । तब से उस कंप्यूटर विक्रेता के साथ हम लोगों के संबंध बने हुए हैं । ये बातें कहना मुझे प्रासंगिक लगीं इसलिए बता रहा हूं । हां तो हम दोनों वार्तालाप में मग्न हैं । तभी एक भावी खरीददार उनके कार्यालय में पहुंचता है । विक्रेता उस आगंतुक से परिचित है ऐसा मुझे उन दोनों की आपसी बातचीत से लग रहा है ।
वह व्यक्ति विक्रेता से पूछता है, “आप क्या जीरॉक्स मशीन सप्लाइ कर सकेंगे ? ऐसी मशीन जो जीरॉक्स के साथ प्रिंटिंग, स्कैनिंग आदि भी कर सके ?”

“आपका मतलब है ऑल-इन-वन किस्म की मशीन ? हां मिल जाएगी ।” विक्रेता का जवाब है । किस कंपनी की कितने में मिलेगी इसका मोटा हिसाब भी वे बताते हैं । आजकल बाजार में ऐसी मशीनें आ चुकी हैं ।

“दरअसल मेरे फलां अध्यापक ने आपके पास भेजा है जानकारी जुटाने के लिए । उनके पास कुल करीब लाख-एक की रिसर्च ग्रांट है । उसी में जीरॉक्स मशीन के साथ एक डेस्क-टॉप भी लेना है । हो जाएगा न ?”

“हां इतने के भीतर दोनों मिल जाएंगे ।”

“और कुछ कमिशन …।”

“वह… अच्छा… देख लिया जाएगा…, कोशिश करेंगे ।” किंचित् अस्पष्ट-सा जवाब दिया जाता है । दो-चार अन्य बातें भी दोनों के बीच होती हैं । फिर वह आदमी चला जाता है । उसके चले जाने पर कंप्यूटर विक्रेता मुझसे बोलते हैं, “देखा आपने ? खुलकर मांग रखते हैं कमिशन की । विश्वविद्यालय के शिक्षक हैं । आप अंदाजा लगा ही सकते हैं कि अच्छी-खासी तनख्वाह मिलती होगी । फिर भी मांग रखते हैं कि हमारा भी कुछ हिस्सा होना चाहिए … ।” तनिक चुप्पी के बाद वे आगे कहते हैं, “हम भी क्या करें ? आजकल ऐसे खरीदारों की कमी नहीं है । मना करें तो बिजनेस पर असर पड़ता है । मतलब यह कि मैं और मेरे कर्मचारी सभी प्रभावित होते हैं ।”

मैं उनकी मजबूरी समझ रहा हूं । उन्हें तो बिजनेस करते रहना है । जो आदमी अच्छे वेतन, तमाम भत्तों एवं भविष्य की पेंशन के साथ आर्थिक सुरक्षा भोग रहा हो वही जब कदाचरण पर तुल जाए तब वह क्या करे जिसके स्वयं तथा कर्मचारियों के पास सुरक्षित भविष्य की कोई गारंटी नहीं ? मैं जिज्ञासावश पूछ लेता हूं, “कहां के अध्यापक हैं वे जिनका जिक्र हो रहा था ?” ।

“काशी विद्यापीठ ।” जवाब मिलता है ।

विद्यापीठ! यानी वाराणसी के तीन सरकारी विश्वविद्यालयों में से एक । आर्थिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हमारे बीच कुछ देर तक बातचीत चलती है । बीच-बीच में किसी के आने से व्यवधान भी पड़ता रहता है । वार्तालाप के दौरान वे कहते हैं, बीएचयू में आज भी यह सब नहीं चलता है । इक्का-दुक्का कोई मामले हों तो हों । आपके फिजिक्स विभाग के साथ पिछले पच्चीस-एक साल से मेरा बिजनेस चल रहा है, किंतु आजतक किसी के साथ ऐसी बात नहीं हुई ।”

“मुझे बीएचयू (फिजिक्स विभाग) छोड़े तो सात साल हो चुके हैं । इस समय वहां के हाल क्या हैं कह नहीं सकता, लेकिन मेरे कार्यकाल के समय स्थिति ठीक थी । अब तो कुल मिलाकर सभी जगह गिरावट का दौर चल रहा है । कोई चारा नहीं है ऐसा लगता है मुझे । ”

भ्रष्टाचार का वाइरस तो हम लोगों के खून में घुल चुका है, सर! जिनसे इलाज की उम्मींद की जानी चाहिए उनके खून में भी ।”

“हो सकता है ।” कहते हुए मैं उठता हूं और उसके आफिस से लौट आता हूं । सोचने लगता हूं कि समाज की यह बीमारी क्या वाकई में लाइलाज है । जब विश्वविद्यालय का अच्छाखासा खातापीता शिक्षक तक इस मानसिकता पर उतर आया हो तो औरों के क्या हाल होंगे ? – योगेन्द्र जोशी

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