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“हे भगवन्, अगला जनम मोहे अमरीका में दीजो ।”

सोमबार, 15 अक्टूबर, का दिन है और अभी संध्याकाल का समय है । मैं घर के पास की दवा की दुकान पर पहुंचा हूं । परिचित होने के नाते दवा-विक्रेता से दो-चार मिनट बतियाते हुए काउंटर के एक तरफ खड़ा रहता हूं । तभी एक युवक तेजी से दुकान पर पहुंचता है । दवाविक्रेता से वांछित दवा मांगते हुए वह समाचार देता है, “जानते हो, गोदौलिया और उसके आसपास कर्फ्यू लग गया है ।”

दवाविक्रेता पूछता है, “क्यों ? क्या हो गया वहां ?”

युवक बताता है, “मालूम नहीं है क्या ? आज साधु-संतों  ने प्रतिकार दिवस मनाने का कार्यक्रम रखा था । गोदौलिया क्षेत्र में उनका विरोध-प्रदर्शन चल रहा था । जुलूस लेकर शहर के अन्य जगहों पर पहुंचने का इरादा रहा होगा प्रदर्शनकारियों का । पुलिस ने उनको आगे बढ़ने से रोकना चाहा । बस, क्या था, भगदड़ मच गयी । उपद्रवी लोगों को मौका मिल गया और उतर गये आगजनी और लूटपाट पर ।”

“अभी एक-दो घंटा हो रहा होगा घटना हुए । यहां गोदौलिया से दूर हम लोगों को तुरंत खबर कहां लगती है, वह भी दुकानदारी की व्यस्तता के समय । शहर की ओर से कोई आ रहा हो तो उसी के मुख से सुनने को मिलता है ।” दुकानदार घटना के बारे में अनभिज्ञता जताता है ।

अन्य नगरवासियों की भांति मुझे भी तथाकथित साधु-संतों के प्रतिकार दिवस की पृष्ठभूमि का अंदाजा है । बीते 22 सितंबर को ये साधु-संन्यासी इस मांग को लेकर आंदोलन पर उतर आए थे कि उन्हें गंगाजी में ही मूर्ति-विसर्जन की इजाजत दी जाए । कुछ दिनों पहले गणेशोत्सव मनाया गया था । उस समय गणेश-प्रतिमाओं को गंगाजी में विसर्जित करने पर रोक लगाई गयी थी । गंगाजी में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण के मद्देनजर प्रशासन ने उसके जल में मूर्ति-विसर्जन को प्रतिबंधित कर रखा है । आस्था के नाम पर इन साधु-संन्यासियों को वैकल्पिक व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है । शायद उस समय की कुछ प्रतिमाएं अभी विसर्जित होनी हैं । चंद रोज बाद दशहरा-पूजा पर देवी-प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित होंगी, तब उनके विसर्जन की भी समस्या होगी । उस 22 सितंबर को इन लोगों के आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था और पुलिस ने भीड़ नियंत्रित करने का वही पुराना तरीका अपनाया था । साधु-संतों पर लाठियां बरसीं थीं और कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे । आज की प्रतिकार रैली उस दिन की लाठीचार्ज की घटना के प्रति विरोध दर्ज करने के उद्येश्य से आयोजित थी । प्रायः हर ऐसे मौके पर बात अंत में बिगड़ ही जाती है । मतलब कि इस बार फिर से लाठीचार्ज हुआ ।

मैं उस अपरिचित युवक की ओर मुखातिब होकर पूछता हूं । “भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस ने लाठियां भांजी होंगी । बेचारी पुलिस करे भी क्या ! भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उसके पास सदा लाठी का ही तो एकमात्र सहारा होता है । और जनता है कि ढेलेबाजी से जवाब देना वह भी नहीं भूलती है ।”

मेरी बात पर सहमत होते हुए युवक कहता है, “पता नहीं इस देश को क्या हो गया है । जब देखो जहां देखो कुछ न कुछ अनिष्ट घटित होता दिख जाएगा । कहीं गोमांस को लेकर लोग आपस में लड़ रहे हैं । कहीं सड़क पर मामूली विवाद पर लोगों का कत्ल हो जा रहा है । कहीं किसी युवती या बच्ची के साथ दुष्कर्म हो रहा है । कही पुलिस अपनी हिरासत में ही आरोपी को मार डालती है । कभी बात-बात पर रेलगाड़ियां रोक दी जाती हैं, तो कभी सड़क पर वाहनों को आग लगा दी जाती है, और कभी बाजार में लूटपाट शुरू हो जाती है । यह सब उस देश में हो रहा है जहां के लोग अपनी सभ्यता, संस्कृति और धर्मनिष्ठा का ढिंडोरा पीटने से नहीं अघाते हैं ।”

“अपनी बात में इतना और जोड़ लीजिए कि जनता की सेवा का ढोंग रचने वाले हमारे राजनेताओं ने तो संयत और शिष्ट भाषा न बोलने की कसम खा रखी है । दो-चार दिन में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं । अपने चुनाव अभियान में नेतागण कैसी भाषा बोल रहे हैं ? वे अपने विपक्षियों के विरुद्ध गाली-गलौज की भाषा में आरोप-प्रत्यारोप में जुटे हैं । लोकतंत्र में शालीनता होनी चाहिए कि नहीं ? समाज के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण पेश करते देखा है आपने कभी उनको ?” मैं भी दो शब्द उसकी बातों में जोड़ देता हूं ।

“यही सब देखकर तो मन खिन्न हो जाता है, अंकलजी । समझ में नहीं आता है कि देश के हालात कभी बेहतर भी होंगे ।” उसने मेरी ओर देखकर कहता है । वह मेरी उम्र देखते हुए मुझे ‘अंकलजी’ कहकर संबोधित करता है । पिछले कुछएक दशकों से उम्रदराज आदमियों को अंकल शब्द से पुकारने की परिपाटी समाज में चल चुकी है ।

उसकी खिन्नता मुझे वास्तविक लगती है । मैं खुद भी देश के हालात को निराशाप्रद पाता हूं । मैं उसके कहता हूं, “यह देश सुधरने वाला नहीं है । मैं पचास-एक सालों से देश के हालातों को देखते आ रहा हूं । अवश्य ही देश भौतिक उपलब्धियों के नजरिये से आगे बढ़ा है; लोगों की संपन्नता बढ़ी है, सुख-सुविधा और ऐशो-आराम के साधन बढ़े हैं । लेकिन सामाजिक स्तर पर गिरावट आती गई है । ईमानदारी घटी है, संवेदनशीलता में कमी आई है, आपसी विश्वास पहले जैसा नहीं रहा, लोभ-लालच बहुत बढ़ गया है, असहिष्णुता बढ़ी है, लोग अधिक हिंसक हो चले हैं, और भी बहुत कुछ मेरे देखने में आया है । क्या-क्या बताऊं ?”

“अंकलजी, कभी-कभी मेरा मन होता है कि भगवान से प्रार्थना करूं, ‘हे भगवान, अगले जनम में मुझे अमेरिका में पैदा करना ।’” कहते हुए वह युवक अपनी दवा उठाकर चल देता है । – योगेन्द्र जोशी

 

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आम रिक्शावालों से कुछ अलग था वह

दो रोज पहले की बात है जब मेरी मुलाकात एक ऐसे रिक्शा वाले से हुई जिसका व्यवहार आम रिक्शाचालकों से कुछ हटकर था, जिसकी सोच आम आदमी से भिन्न थी, और जिससे बात करना दिलचस्प था । हुआ यह कि कल मैं सपत्नीक घर से गोदौलिया कार्यवशात गया था । गोदौलिया मेरे शहर वाराणसी का पुराना और घनी बस्ती वाला व्यापारिक स्थान है, जिसके निकट ही सुचर्चित बाबा विश्वनाथ मंदिर और गंगातट का दशाश्वमेध घाट हैं । बेहद भीड़भाड़ वाले इस जगह के ‘गोदौलिया चौराहे’ पर आवागमन हेतु सामान्यतः रिक्शा ही उपलब्ध हो पाते हैं । थ्रीह्वीलर आटोरिक्शे करीब आधा-पौन किलोमीटर दूर मिलते हैं । वहां से हम रिक्शा से लौटे थे ।

संध्या का समय था । गौदौलिया से लौटते समय जब हम लंका तक के लिए रिक्शा खोज रहे थे तो संयोग से एक नौजवान रिक्शावाला बगल में आ खड़ा हुआ और बोला, “लंका चलना है न ? आइए, बैठिए ।” और आगे रिक्शाभाड़े के बाबत खुद ही कहने लगा, “वैसे तो लंका तक का किराया चालीस रुपया होता है, लेकिन चूंकि मुझे उसी तरफ जााना है, इसलिए केवल तीस रुपया दे दीजिएगा ।” (बताता चलूं कि लंका हमारे घर के निकट है और वहीं पर सुविख्यात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का प्रवेशद्वार है ।)

भाड़े पर हामी भरते हुए हम रिक्शे पर बैठ गये, और वह चल पड़ा । नौजवान होने के कारण रिक्शा चलाने में उसे खास मशक्कत नहीं करनी पड़ रही थी ऐसा मुझे लगा । मार्ग में वह रामभक्ति के गीत/भजन गाने लगा । बीच रास्ते हमने उससे कहा, “बेटा, हमें लंका के अगले चौराहे यूनिवर्सिटी गेट वाले से पास छोड़ देना ।”

“आप जहां कहें वहां छोड़ दूं ।” उसका जवाब था ।

“तो क्या तुम सुंदरपुर तक चलोगे ?” हमने उससे पूछा ।

“छोड़ तो देता लेकिन अब रिक्शा जमा करने का समय हो रहा है ।”

“यह रिक्शा किराये पर लिए हो क्या ? कितना किराया भरना पड़ता है इसका ? और लंका के पास ही रहते हो क्या ?”

“चालीस रुपया रोज पडता है । लंका से सामनेघाट की ओर कुछ दूरी पर है मालिक की दुकान । गंगा पार रामनगर में मेरा घर है; वहीं से निकल जाऊंगा घर के लिए ।” उसने उत्तर दिया ।

रास्ते भर मुक्त भाव से उसे भजन गुनगुनाते देख मैंने पत्नी से कहा कि लगता है यह व्यक्ति तनाव में नहीं रहता होगा । जिज्ञासावश मैंने उससे पूछा, “लगता है भजन-कीर्तन की पुस्तकें पढ़ने का शौक है । कितने तक पढ़े हो भई ।”

“बाबूजी, स्कूल गये तो थे लेकिन हमें कुछ आता नहीं था । बस टीचर लोग हर साल अगली कक्षा में बढ़ा देते थे । क्या बताऊं ?”

“फिर भी पढ़ना-लिखना तो आता ही होगा ।”

“हां, थोड़ा-बहुत पढ़-लिख लेता हूं काम भर का, ज्यादा नहीं ।”

तब तक हम लंका पहुंच चुके थे । मैंने पत्नी से इशारे से कहा, क्यों न चालीस रुपया भाड़ा दे दें । पत्नी ने सहमति जताई और उसे मैंने यह धनराशि चुका दी । वह बोला, “लेकिन बाबूजी मैंने तो आपसे तीस ही रुपये मांगे थे । चूंकि मुझे इधर आना था तो सोचा कि जो भी मिल जाए अच्छा ।”

“ठीक है, हम अपनी मरजी से दे रहे हैं ।” कहते हुए हम रिक्शे से उतरने लगे तो उसने रिक्शे के हत्थे पर लटक रहे अपने झोले से कागज के कुछ पन्ने निकाले और हमें सोंपते हुए बोला, “आपको याद होगा, अभी दो-चार पहले राहुल गांधी शहर के रिक्शाचालकों से मिले थे । मैं भी उनसे मिला था; उन्हें एक पत्र भी सोंपा था । यह उसी की कापी है । मैंने उन्हें एक गीत भी सुनाया ।”

उसने भोजपुरी में शब्दबद्ध एवं भारतमाता को संबोधित वही गीत, “माई, माई …” हमें सुना डाला । उस गीत के बोल हमें याद नहीं हैं, लेकिन इतना ध्यान है कि उसमें देश की गरीब जनता की व्यथा का जिक्र करते हुए भारत मां से उनके कष्ट मिटेंगे यह प्रश्न पूछा गया था । मेरे इस सवाल पर कि वह गीत किसका लिखा है, उसने बताया कि गीत स्वयं उसी का लिखा है । मैंने पूछा, “क्या इसकी लिखित प्रति भी रखे हो ? अगर हो तो वह भी दे दो ।”

उसका उत्तर था, “गीत की प्रति तो मेरे पास नहीं है, लेकिन आपको यह इंटरनेट पर मिल जाएगा । बनारस के रिक्शा वालों से आप राहुल जी की बातचीत उनकी जिस साइट पर मिलेगी वहीं यह भी मिल जाएगा ।”

उक्त वार्तालाप के पश्चात हमने उसकी रुचियों पर उसे बधाई के साथ शुभकामनाएं दीं और घर लौट आए । दरअसल धन-दौलत और ऐशो-आराम के बाबत भी उसने अपने खयालात हमारे सामने पेश किए थे । हम दोनों उसकी बातों से प्रभावित थे, क्योंकि वह हमें आम रिक्शावाले से कुछ हटकर लगा । बाद में मैंने इंटरनेट पर उस गीत को खोजने का प्रयास किया, किंतु मुझे वह मिल नहीं सका । गीत तो नहीं परंतु उसके द्वारा लिखित उपर्युक्त पत्र की प्रति वाकये के इस विवरण के साथ संलग्न है । – योगेन्द्र जोशी

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आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई

आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई ।
इस नगरी की रीत निराली शासन को नहि देत दिखाई ।।

प्रशंसा के ये शब्द मैंने अपनी विश्वप्रसिद्ध नगरी वाराणसी (वाराणसी) के लिए लिखे हैं । वाराणसी कुछ लोगों के लिए तीर्थस्थली है तो औरों के लिए यह दर्शनीय पर्यटन स्थल है । जहां हिंदू धर्मावलंबी गंगास्नान एवं भोलेबाबा विश्वनाथ के दर्शन करके पुण्यलाभ पाते हैं, वहीं बौद्ध मतावलंबी भगवान् बुद्ध की उपदेशस्थली सारनाथ के दर्शन पाकर स्वयं को कृतार्थ मानते हैं । पर्यटकों के लिए सारनाथ के श्रीलंकाई, चीनी, तिब्बती एवं जापानी आदि मंदिर महत्त्व रखते हैं । उनके लिए उत्तरवाहिनी गंगा के पश्चिमी किनारे के 4-5 किलोमीटर तक विस्तार पाये परस्पर जुड़े घाटों का दृश्य भी आकर्षण का केंद्र रहता है । प्रातःकाल उगते सूर्य की किरणों से नहाए इन घाटों की झलक पाना उनके लिए सौभाग्य की बात होती है । रामनगर का किला, काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विशाल परिसर, और भारत सरकार का रेल इंजन कारखाना भी दर्शनीय स्थल माने जाते हैं । पूरे नगर में यत्रतत्र स्थापित छोटे-बड़े मंदिरों का आकर्षण अपनी जगह पर है ।

जिसने वाराणसी न देखा हो वह जीवन में एक बार इस नगरी का भी दर्शन कर ले ऐसा निवेदन मैं उनसे अवश्य करना चाहूंगा । मेरे निवेदन के कारण सर्वथा भिन्न हैं । मैं तो उनसे कहूंगा कि 18-20 लाख की आबादी वाला पूरी तरह दुर्व्यवस्थित नगर कैसा होता है यह बात इस नगरी के दर्शन से ही समझ में आता है । मेरा मानना है कि मनुष्य को केवल सौन्दर्य के ही दर्शन नहीं करना चाहिए, उसे जीवन की कटु कुरूपता का भी साक्षात्कार करना चाहिए । और उस कार्य के लिए वाराणसी से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता । जितने भी शहर मैंने आज तक देखे हैं उनमें सर्वाधिक दुर्व्यवस्थित मैंने वाराणसी को ही पाया ।

उक्त बातें मैं वाराणसी के बारे में विशद चर्चा के उद्येश्य से नहीं कर रहा हूं । मैं तो ये बातें यहां की दुर्व्यवस्था और उसके कारण-स्वरूप प्रशासनिक भ्रष्टाचार के अपने अनुभव को समझाने के लिए बतौर पृष्ठभूमि के पेश कर रहा हूं । वाकया 5-7 साल पहले का होगा जैसा मुझे याद आता है । उस समय मेरे घर के पास से गुजरने वाले मुख्य मार्ग पर सीवर-पाइप डालने का कार्य चल रहा था । सड़क के एक तरफ गहरे खुदाई करके 6-8 फिट व्यास की सीमेंट-कांक्रीट की पाइपें जमीन में डाली जा रही थीं । बनारस शहर की अति-उन्मुक्त जीवनशैली के अनुकूल सड़क पर चलने वाले काम को ‘फ्री-स्टाइल’ तरीके से अंजाम दिया जाता है । खुदाई में निकली मिट्टी के ढेर को गढ़े के किसी भी तरफ बेतरतीब तरीके से जमा कर दिया जाता है । ठेकेदार और सरकारी अधिकारियों को राहगीर और वाहन कैसे उस मार्ग से गुजरेंगे इस बात की चिंता नहीं रहती है । अधिकारी तो शायद ही कभी कार्यस्थल पर आते होंगे । सरकारी परंपरा के अनुरूप सब कार्य कागज पर ठीक से चल रहा होता है । जमीनी हकीकत से उन्हें कोई मतलब नहीं रहता । यह अपने देश की शासकीय खूबी है ।

हां तो मैं कह रहा था कि सड़क के एक ओर गहरे खोदकर पाइपें डाली जा रही थीं । इस दौरान टहलते हुए एक दिन मैं उस सड़क पर जा रहा था । कुछ दूर पहुंचने पर देखता हूं कि सड़क की मरम्मत का कार्य चल रहा था । दर असल बीती बरसात के समय सड़क उखड़ चुकी थी और उसमें जगह-जगह गड्ढे बन चुके थे । इसलिए रोड़ी-तारकोल का मिश्रण सड़क पर बिछाया जा रहा था । मैं देखकर आ रहा था कि कुछ दूर पर पाइपें डाली जा रही थीं और जान रहा था कि उस स्थान पर भी दो-चार दिन में खुदाई होगी । मेरे दिमाग में सवाल घूमने लगा कि तब इस मरम्मत कार्य का तुक भला क्या है । मैंने रुककर एक श्रमिक से जिज्ञासावश पूछा, “क्यों भई, कोई अधिकारी भी है यहां जो इस काम को करवा रहा हो ?”

दूर खड़े एक सज्जन की ओर इशारा करते हुए वह बोला, “वो देखिए, हमारे जेई (जूनियर इंजीनियर) साहब वहां खड़े हैं ।”

आगे बढ़कर मैं उस सज्जन के पास पहुंचा और बोला, “भाई साहब, आप मरम्मत का कार्य यहां पर करवा रहे हैं । क्या आप देख नहीं रहे हैं कि पीछे से खुदाई करके पाइप डालने का कार्य भी चल रहा है । ऐसे में इस मरम्मत का क्या औचित्य है भला ?”

“आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन … ।” ऐसा कहते हुए एक-दो क्षण को रुक गये ।

अपनी बात पूरी करने से पहले उन्होंने मेरा परिचय जानना चाहा । मैंने अपने बारे में समुचित जानकारी देते हुए फिर पूछा, “लेकिन आप ये काम इस समय करवा क्यों रहे हैं ?”

उनका जवाब था, “ऐसे ही आर्डर मिले हैं । अगला महीना मार्च का है न ? इसलिए सड़क के लिए मिले बजट का पैसा खर्च करना है ।”

मैं उनके उत्तर से अवाक् था । उनसे फिर पूछा “परंतु आपने अपने उच्चाधिकारियों को बताया नहीं कि इस समय पाइप डालने का काम भी चल रहा है ।”

उनका उत्तर निराशा पैदा करने वाला था । मेरे परिचय से वे आश्वस्त थे कि मैं कोई ‘खतरनाक’ व्यक्ति नहीं हूं । अतः मुझ पर भरोसा करते हुए वे बोले, “सा’ब, मेरी कुछ भी सलाह देने की हिम्मत कहां है ? आप जानते ही होंगे कि इस प्रकार के ठेकों के कार्य माफिया तंत्र को मिलते हैं । उनसे पंगा लेकर अपने और अपने परिवार की जान जोखिम में डालने की हिम्मत मुझ जैसे अदने कर्मचारी की कैसे हो सकती है । कुछ कहने का मतलब उनके गुस्से का शिकार होना ।”

मुझे लगा कि वह व्यक्ति झूठ नहीं बोल रहा था । सरकारी ठेके आपराधिक छबि के लोगों को मिलते हैं यह तो समाचारपत्रों में मैं पढ़ता ही आ रहा था । अतः मुझे लगा कि वह जेई सच ही कह रहा होगा ।

मेरे पास अधिक कुछ कहने को नहीं था । चुपचाप आगे बढ़ गया । – योगेन्द्र जोशी


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