आरक्षित रात्रिकालीन रेलयात्रा और तिथि-वार का भ्रम

October 30, 2009 by योगेन्द्र जोशी

रेलगाड़ी से यात्रा करना कभी-कभी असामान्य अनुभव दे जाता है, ऐसे अनुभव जो कभी आनंदित कर जाता है तो कभी परेशानी में डाल देता है और कभी आपको एक नसीहत दे जातक है । चार-छः रोज पहले की एक ऐसी ही स्मरणीय घटना का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं । बात तब की है जब मैं दिल्ली से वाराणसी की रेलयात्रा शिवगंगा एक्सप्रेस नाम की गाड़ी से कर रहा था, जो संध्याकाल दिल्ली से रवाना होती है और दूसरे दिन प्रातः अपने गंतव्य वाराणसी पहुंचती है । गाड़ी रात के करीब एक बजे कानपुर पहुंचती है, जहां पर कई यात्री चढ़ते-उतरते हैं ।

जैसा आम तौर पर होता है, गाड़ी के किसी बड़े रेलवे स्टेशन पर ठहराव के समय प्लेटफार्म पर ही नहीं आरक्षित डिब्बों के भीतर भी हलचल शुरू हो जाती है । अधिकांश यात्रियों की नींद ऐसे अवसरों पर खुल ही जाती है, भले ही घनघोर निद्रा का अर्धरात्रि से अधिक का समय ही क्यों न हो । डिब्बे के भीतर की चहल-पहल और शोर-शराबे में मेरी भी नींद खुल गयी । तब मैंने देखा की अनुमानतः अधेड़ अथवा उससे कुछ कम उम्र की एक महिला अपनी शायिका (बर्थ) खोज रही हैं । मैंने अक्सर देखा है कि अधिकांश रेलयात्री यह हिसाब नहीं लगा पाते हैं कि डिब्बे के अंदर उनकी आरक्षित शायिका कौन-सी और कहां पर होनी चाहिए । उन्हें शायिका-संख्या के लिए डिब्बे की दीवालों पर लगी चिप्पियों पर गौर से नजर डालनी पड़ती है । सीधे अपनी शायिका तक पहुंचना कोई कठिन काम नहीं है, क्योंकि शायिकाएं सुनियोजित रूप से क्रमांकित रहती हैं । अस्तु, मैंने उनकी शायिका संख्या 49 (निचली) की ओर इशारा किया । उन्होंने अपना सामान वहां फर्श पर रखा और आश्वस्त होकर शायिका पर बैठ गयीं ।

कुछ ही सेकंड या मिनट भर का समय गुजरा होगा कि एक और यात्री वहां पहुंचा, तकरीबन पैंतीस वर्ष का युवक । उसने भी उसी शायिका (संख्या 49) पर अपने आरक्षण का दावा पेश किया । दोनों के पास आरक्षण का टिकट था और दोनों ही का ही दावा था कि उसी शायिका पर उनका आरक्षण है । दोनों भ्रमित थे और अपने-अपने दावे को सही बता रहे थे । यह जरूर था कि महिला का आरंभिक आरक्षण प्रतीक्षा संख्या 1 के साथ हुआ था, और उसके कथनानुसार पहले दिन पूर्व ही शायिका संख्या 49 के आबंटन के साथ ही उसके आरक्षण की पुष्टि (कंफर्मेशन) हो गयी थी । मेरी जानकारी के अनुसार प्रतीक्षा सूची के यात्रियों के आरक्षण की पुष्टि भले ही बाद में हो जाए, किंतु किसको कौन-सी शायिका मिलेगी यह आरक्षण-चार्ट बनते समय ही नियत होता है । तब उस महिला को कैसे यात्रा से एक दिन पहले ही शायिका संख्या की जानकारी मिल गयी यह प्रश्न मेरे लिए अनुत्तरित था । हो सकता है मेरी जानकारी सही न हो । खैर, मैंने उन दोनों के बीच की समस्या में अपने को उलझाने की जरूरत नहीं समझी । गनीमत की बात यह रही कि दोनों आपस में नहीं झगड़े, बल्कि दोनों ने संचालक (कंडक्टर) का इंतजार करना या उसको खोजना ही मुनासिब समझा ।

अब तक गाड़ी कानपुर स्टेशन छोड़ चुकी थी । कुछ ही मिनटों के पश्चात् डिब्बे में नये प्रविष्ट यात्रियों के टिकटों की पड़ताल करते हुए कंडक्टर वहां पहुंचा । दोनों यात्रियों ने शायिका संबंधी समस्या उसके समक्ष रखी । एकबारगी वह भी चकरा गया । उसके पास उपलब्ध आरक्षण सूची में उस महिला का कहीं नाम नहीं था । उसके टिकट पर प्रतीक्षित ही तो लिखित था । फलतः उसने उस युवक को सूची के अनुरूप शायिका सोंप दी । महिला बार-बार जोर डाल रही थी कि रेलवे अंतरजाल (इंटरनेट) पृष्ठों के अनुसार उसे आरक्षण मिल चुका था । कंडक्टर “अच्छा देखते हैं” कहते हुए उस समय आगे बढ़ गया । इस बीच महिला ने अपने घर मोबाइल से भी बात की और वहां से जवाब मिला कि आरक्षण तो होना ही चाहिए । तो गड़बड़ कहां हुई ? महिला की बातों से लग रहा था कि वह झूठ नहीं बोल रही थी । अवश्य उसे और उसके घर वालों को धोखा हो गया था । सच पूछें तो उस मामले से मेरा कोई वास्ता नहीं था, फिर भी मुझे जिज्ञासा हो रही थी कि जानूं माजरा क्या है ।

अंत में घूम-फिरकर कंडक्टर दुबारा वहां पहुंचा । उसने महिला के टिकट पर एक बार फिर से नजर दौड़ाई । पहली नजर में टिकट ठीक ही लग रहा था । तब आरक्षण सूची में उसका नाम क्यों नहीं है इसे शायद वह भी नहीं समझ पा रहा था । उसने टिकट पर की एक-एक प्रविष्टि को दुबारा गौर से देखना आरंभ किया । ‘यात्रा की तिथि’ पर पहुंचते ही माजरा उसके समझ में आ गया । उसने साश्चर्य महिला से कहा, “बहिनजी, आपकी ट्रेन तो कल ही जा चुकी है । इस पर तो 23 की तारीख (शुक्रवार) अंकित है, और आज 24 तारीख (शनिवार) है । यह टिकट तो अब वैलिड ही नहीं है ।” इस जानकारी से महिला चौंक उठी और बोली, “यह भला कैसे हो सकता है ?” कंडक्टर ने पूरी बात महिला को समझाई । आगे क्या हुआ होगा, आप अंदाजा लगा सकते हैं । महिला अब कुछ कर नहीं सकती थी, उसे तो यात्रा पूरी करनी ही थी । हमारे समाज की ‘आदर्श मानवीय’ परंपरानुसार कुछ लेन-देन हुआ, और उसके गंतव्य तक की यात्रा की व्यवस्था कर दी गयी ।

उस पूरे वाकये के दौरान मेरी नींद उचट गयी थी । डिब्बे के बल्बों को बुझा दिये जाने के बाद मैंने फिर से सोने की चेष्टा की । मैं इस पर विचार करने लगा कि क्यों 23 तारीख के आरक्षण के बावजूद वह महिला 24 को यात्रा करने निकल पड़ी । किस भ्रम में वह और उसके घर के सदस्य यात्रा की असल तिथि भूल गये । इसका रोचक कारण मेरे समझ में आ गया । असल बात यह है कि भारतीय परंपरा में नयी तिथि तथा नये दिनवार की शुरुआत सूर्योदय के साथ मानी जाती है । जब मनुष्य रात की नींद के बाद सुबह उठता है तो उसे एक नये दिन के आरंभ होने की स्वाभाविक अनुभूति होती है, और उस नये दिन से वह सहज रूप से नई तिथि भी जोड़ लेता है । लेकिन जिस ‘कलेंडर’ को वैश्विक स्तर पर अब अपनाया जा चुका है, उसके अनुसार अर्धरात्रि के समय (24:00 बजे) अगली तारीख और अगला वार क्रमानुसार आरंभ हो जाते हैं । घड़ी से अर्धरात्रि के आगमन का पता चल जाता है और यदि व्यक्ति सचेत रहे तो एक नये दिन के आरंभ को भी वह मान लेता है । किंतु अर्धरात्रि कोई ऐसा एहसास नहीं दिलाती है जिससे एक नयी तारीख की अनुभूति होवे । वस्तुतः हम पूरे रात की तारीख दिन तथा संध्याकाल की सततता के रूप में देखने के आदी होते हैं । ऐसे में रात्रि के बारह बजने के बाद भी अपरिवर्तित तारीख की भूल कर बैठते हैं । पूरी रात को एक ही तारीख से जोड़कर देखना सामान्य भूल होती है । उस महिला को यह ध्यान ही नहीं रहा होगा कि 23 तारीख का 01:00 बजे का समय वास्तव में 22 तारीख की अर्धरात्रि के 24:00 बजने के घंटे भर बाद आ जाता है, न कि 23 तारीख के पूरे दिन बीतने के बाद की अर्धरात्रि के बाद । रात्रिकालीन तारीख के बारे में भ्रम कई लोगों में देखा जाता है । वास्तव में जो सावधानी बरतने के आदी होते हैं वे उपर्युक्त रात की तारीख को 22-23 की रात्रि कहकर स्पष्ट करते हैं । उस महिला ने गलती यह कर डाली कि 23 तारीख की 01:00 ए.एम. को 23-24 की अर्धरात्रि के बाद का समय मान बैठी ।

उक्त घटना में यह संदेश निहित है कि अर्धरात्रि के बाद की यात्र के समय तथा दिनांक पर सावधानी से विचार करना आवश्यक है, अन्यथा उपरिवर्णित घटना के समान ही बहुत कुछ अनुभव करना पड़ सकता है । – योगेन्द्र जोशी

टेलीफोन नंबर 911 और पुलिस

October 21, 2009 by योगेन्द्र जोशी

इस समय मैं अमेरिका की ‘सांता क्लारा’ नगरी में हूं, करीब एक माह के प्रवास पर । यह स्थान कैलिफोर्निया राज्य की सिलीकॉन वैली में वहां के बड़े शहर ‘सान होजे’ से लगा हुआ और अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के शहर ‘सान फ्रांसिस्को’ के हवाई अड्डे से साठ-पैंसठ किलोमीटर दूर है । मैं पहले भी एक बार यहां आ चुका हूं । मेरे बेटे, जिसके आग्रह पर मैं तब और इस बार दुबारा यहां आया, ने पहली बार के आगमन पर यहां के नियम-कानूनों का एक संक्षिप्त परिचय मुझे दिया था, ताकि मैं कहीं अनजाने में उनका उल्लंघन न कर बैठूं । तब उसने स्पष्ट किया था कि नियमों के उल्लंघन का मामला पुलिस की नजर में आने पर दंडात्मक काररवाही भुगतनी पड़ सकती है, और किसी प्रकार की रियायत की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती है ।

तब उसने दो बातों पर खास जोर डाला था । पहला तो यह कि कार में बैठने पर हर यात्रिक (पैसेंजर) को ‘सीट बेल्ट’ बांधना या पहनना अनिवार्य है, और यह वाहन चलाने वाले की जिम्मेदारी होती है कि वह सभी यात्रिकों द्वारा ऐसा कर लेना सुनिश्चित कर ले । लापरवाही होने पर दो-तीन सौ डालर (दस-बारह हजार रुपये) के अर्थदंड (फाइन) के लिए तैयार रहना पड़ता है । यातायात संबंधी किसी भी नियम के उल्लंघन पर इसी प्रकार का दंड देना पड़ता है । उसने मुद्दे की गंभीरता समझाने के लिए अपने तथा परिचितों के दो चार अनुभव भी मुझे सुनाये थे । उसने दूसरी बात यह बताई कि पैदल चलने वालों को भी सड़क पार करते समय विशेष सावधानी बरतना आवश्यक होता हैं । आम तौर पर सड़क पर चलने की मनाही रहती है । सड़क के किनारे-किनारे बने पैदल मार्ग पर ही चलने की अनुमति रहती है, और जहां ऐसा मार्ग न हो वहां पैदल चलना मना रहता है । नियमों के विरुद्ध चलने पर दो सौ डालर का अर्थदंड । उसने सड़क पार करने के तौर-तरीके भी समझा दिये थे । मेरे लिए यही जानकारी आवश्यक थी, क्योंकि मैं सुबह-शाम नियमित रूप से टहलने के लिए निकला करता था ।

एक बात, जो मेरे बेटे ने शायद मुझे नहीं बताई थी, या कभी बताई हो तो मेरे ध्यान में नहीं है, यह है कि पूरे अमेरिका में आपात्कालीन सेवा के लिए टेलीफोन नंबर 911 नियत किया गया है । इस सेवा के अंतर्गत पुलिस, अग्निशमन तथा आकस्मिक चिकित्सा शामिल रहते हैं । अगर आप टेलीफोन पर यह नंबर घुमा भर दें, ताकि दूसरी तरफ टेलीफोन की घंटी बज उठे, तो ये सेवाएं तुरंत हरकत में आ जाती हैं । यह आवश्यक नहीं कि पुलिस बगैरह आपसे कोई विवरण जानना चाहें । कितनी गंभीरता से आपात्कालीन सेवा ली जाती हैं इसका अनुभव मुझे हाल में चौदह-पंद्रह दिन पहले हुआ ।

मेरे बेटे के घर पर जो टेलीफोन सेवा उपलब्ध है उसमें अमेरिका से बाहर अन्य देश के टेलीफोन पर संपर्क साधने के लिए डायल किये जाने वाले नंबर के प्रथम तीन अंक 011 रहते हैं । तत्पश्चात् संबंधित देश के कोड, जो अमेरिका में भारत के लिए 91 है, के दो अंक डायल करने होते हैं, और उसके बाद देश के भीतर का वांछित टेलीफोन नंबर । एक दिन मैं अपने देश में छोटे बेटे को फोन करने में जुट गया । जैसा कह चुका हूं, मुझे टेलीफोन के ‘नंबर पैड’ पर 01191… इत्यादि टाइप करना था । मुझसे शायद गलती से आरंभिक अंक 0 (शून्य) के बदले 9 (नौ) दब गया और फलतः 91191… आदि अंक टाइप हो गये । टेलीफोन ने इस नंबर के आंरभिक तीन अंकों 911 को स्वीकारते हुए आपात्कालीन सेवा को डायल कर दिया । कुछ ही क्षणों में टेलीफोन सेवा से जवाबी फोन आ गया कि क्या वास्तव में कोई आकस्मिक समस्या हम लोगों के सामने आ गयी है, यदि हां तो किस प्रकार की समस्या है वह । मेरा बेटा माजरा तुरंत समझ गया । उसने मेरे हाथ से टेलीफोन का चोंगा ले लिया और दूसरे पक्ष को नकारात्मक उत्तर देते हुए समझा दिया कि फोन गलती से लग गया था । बात आयी-गयी हो गयी ।

लेकिन कोई पांच-सात मिनट बीते ही होंगे कि घर के प्रवेश-द्वार की घंटी बज उठी । दरवाजा खोला गया तो देखा कि सामने गहरे नीले रंग का परिधान पहने हुए और कंधे/बांह पर पुलिसिया प्रतीकों को धारण किए हुए एक ‘पुलिसमैन’ खड़ा है । एक-दो क्षण तक हम लोग भौंचक्के-से देखते रह गये, और फिर संभलते हुए उसे पूरी घटना समझा दी । पुलिस का वह कर्मचारी जल्दी ही आश्वस्त हो गया कि हम लोगों के साथ कुछ गंभीर नहीं घटा है । लौटते-लौटते उसने खुद ही यह बात कही कि हिंदुस्तानियों के साथ ऐसी घटनाएं अक्सर होती हैं, क्योंकि टेलीफोन पर वे शून्य के स्थान पर गलती से कभी-कभी नौ दबा बैठते हैं (गौर करें कि टेलीफोन के नंबर पैड पर शून्य तथा नौ के अंक एकदम पास-पास होते हैं ), और तब ‘टेलीफोन कॉल’ आपात्कालीन सेवा को पहुंच जाती है । ऐसे अवसर पर पुलिस सबसे पहले हरकत में आती है, क्योंकि उनकी गाड़ियां शहर में लगातार यत्र-तत्र चक्कर लगाती रहती हैं । टेलीफोन करने वाले के पते पर सबसे निकट वाला पुलिसमैन तुरंत ही पहुंच जाता है ।

पुलिस विभाग की त्वरित कार्यवाही में जुट जाने की संस्कृति एक भारतीय के नाते मेरे लिए अकल्पनीय है ।
अमेरिका में किसी दुर्घटना की खबर और उससे संबंधित समस्त जानकारी बिजली की गति से सभी संबंधित पक्षों को सेकंडों या मिनटों में मिल जाती है । खेद होता है यह देखकर कि हमारे देश में टेलीफोन या गाड़ी के नंबर के आधार पर किसी व्यक्ति का पता खोजने में पुलिस विभाग को कई-कई दिन लग जाते हैं । पाठकों को मेरा यह कहना अप्रिय लगेगा (क्षमा करें) कि अगर उपर्युक्त घटना अपने यहां घटी होती और पुलिसमैन अपने दरवाजे पर पहुंचे होते तो वे दो-चार गालियां दे गये होते, या दस-बीस रुपये वसूल कर ले गये होते । हमारे देश में अमेरिका की नकल करने का फैशन चल पड़ा है, लेकिन कार्यसंस्कृति के मामले में उनसे कुछ सीखने का विचार हमारे मन में नहीं आता । इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अमेरिका की भौगोलिक सीमाओं के भीतर कोई आतंकवादी घटना नहीं घटती है, क्योंकि वहां के कभी सरकारी विभाग मुस्तैदी से कार्य करते हैं । अपने यहां ? – योगेन्द्र जोशी

जातीय अभिमान का एक उदाहरण

September 26, 2009 by योगेन्द्र जोशी

जातीय मानसिकता हमारे हिंदू समाज की विशेषता कही जाती है, एक ऐसी विशेषता जिस पर गर्व नहीं किया जा सकता है और न ही जिसे उचित ठहराया जा सकता है । जातीय व्यवस्था को प्राचीन काल की वर्णाश्रम व्यवस्था का विकृत रूप माना जा सकता है । वर्णाश्रम को स्वयं में कोई दोषपूर्ण सामाजिक व्यवस्था कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि उसके सैद्धान्तिक आधार में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है । किंतु क्या प्राचीन काल में उन सिद्धांतों का पालन समुचित रूप से समाज में हो रहा था इस प्रश्न का उत्तर असंदिग्ध हां में दे पाना कठिन है । कदाचित् आरंभ में व्यवस्था ठीक चली हो, परंतु कालांतर में वर्णभेद सामाजिक भेदभाव और ऊंचनीच का आधार बन गया हो, जिसने अंततः आज के जातिगत भेदभाव का रूप ले लिया हो ।

क्या यह जातीय मानसिकता हिंदू समाज तक ही सीमित है ? मुझे लगता है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की विशेषता है और इस क्षेत्र के अन्य धर्मावलंबियों में भी व्याप्त है, भले ही वह खुलकर देखने को न मिले । मैंने सुना है कि अपने देश में मुस्लिमों और सिखों में भी ऊंचनीच की बातें प्रचलित हैं । यह एक तथ्य है कि आज के हिंदुस्तानी गैरहिंदुओं के पूर्वज प्रायः हिंदू ही थे, जिन्होंने परिस्थितिवश अन्य धर्म स्वीकार तो कर लिया, लेकिन जो जातीय दृष्टि से ऊंचे या नीचे होने के भाव से मुक्त नहीं हो सके । जिनके पूर्वज पहले कभी बतौर हिंदू के तथाकथित उच्च जाति में थे, वे धर्मांतरण के बाद भी अपने को ऊंचा समझते रहे । पीढ़ियों पहले की हिंदू पृष्ठभूमि से जुड़े ऐसे विचार वास्तविक हैं इस बात का अनुभव मुझे अपने इंग्लैंड प्रवास में हुआ था, जिसका उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं । (जातीय मानसिकता का एक किस्सा मैं पहले भी अन्य पोस्ट (क्लिक करें) में बयान कर चुका हूं ।)

कोई ढाई दशक पहले मैं दक्षिणी इंग्लैंड के साउथहैम्पटन विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक उच्चानुशीलन के लिए गया हुआ था । अपने वहां के प्रवास के समय मेरा परिचय एक पाकिस्तानी शोधछात्र से हुआ था, लगभग मेरा हमउम्र और इस्लाम-धर्मावलंबी । मुझे उसका नाम अब ठीक-ठीक याद नहीं है; इतना ही अब याद आता है कि उसका पारिवारिक नाम (सर्नेम) रफीक था । हम दोनों की भेंट यदाकदा हो जाया करती थी । हमारी परस्पर बातचीत हिंदुस्तानी में ही हुआ करती थी । भेंट होने पर रफीक ‘नमस्ते’ कहकर मेरा अभिवादन करता था । वह जानता था कि कई हिंदीभाषी हिंदू अभिवादन के तौर पर ‘नमस्ते’ का प्रयोग करते हैं । यहां पर इतना बता दूं कि हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी अपने-अपने घरों, यानी देशों, में रहकर एक-दूसरे को जितना भी भला-बुरा कहें, इंग्लैंड प्रवास के दौरान उनके संबंध पर्याप्त मैत्रीपूर्ण और घनिष्ठ रहते हैं । यह बात उत्तरभारतीय हिंदीभाषियों पर खास तौर पर लागू होती है । इसका कारण उनके खान-पान और बोली में पर्याप्त समानता का होना कहा जायेगा । अस्तु, जातीयता संबंधी अपनी आंरभिक बात पर लौटता हूं ।

एक बार रफीक और मेरे बीच की बातचीत में संयोगवश जातीयता का जिक्र आ गया । प्रसंग क्या रहा होगा अब ध्यान में नहीं आता है, किंतु उसके दो-चार शब्द मेरे स्मरण में आज भी हैं । रफीक बोला “भाई साहब, आपको बताऊं, हम राजपूत यानी क्षत्रिय मुसलमान हैं ।”

मेरे यह पूछने पर कि राजपूत मुसलमान होने का मतलब क्या है, उसका जवाब था “असल में हमारे पुरखे राजस्थान के रजवाड़े या उनके खानदान से थे । धर्मांतरण के बाद वे मुसलमान हो गये, लेकिन हमारी जाति अन्य मुस्लिमों से ऊपर रही है । हम ऐसे-वैसे मुसलमान नहीं हैं; हम तो अपने को औरों से ऊंचा मानते हैं ।”

उसकी बात में जातीय गर्वानुभूति की झलक मुझे मिल रही थी । इस संबंध में रफीक से अन्य क्या बातें हुईं अब याद नहीं, लेकिन उसके राजपूत मुस्लिम होने के गर्व का खयाल मुझे आज भी आ जाता है । मुझे लगता है कि वंशानुगत श्रेष्ठता की भावना सभी समाजों में कमोबेश मौजूद रहती है । - योगेन्द्र

एक अनुभव यह भी, सब्जीसट्टी में

August 25, 2009 by योगेन्द्र जोशी

पूर्वाह्न का समय है । मैं सागभाजी खरीदने निकल पड़ता हूं घर से । मेरे घर से कोई तीनएक सौ मीटर की दूरी पर सब्जीसट्टी है, जहां सागसब्जी का कारोबार प्रातः करीब छः बजे आरंभ हो जाता है और दोपहर तक चलता है । शहर के पास के गांवों से किसान ताजा सब्जी ले आते हैं और वहां सब्जी कारोबारियों को बेच जाते हैं । थोक कारोबारियों के साथ-साथ फुटकर विक्रेताओं की भी दुकानें वहां सज जाती हैं ।

मैं सागसब्जी खरीद चुकने के बाद एक भुट्टा-विक्रेता (यानी मक्के की बाल बेचने वाले) के पास पहुंचता हूं । पूछता हूं, “क्या हिसाब है भई भुट्टा ?”

जवाब मिलता है, “सोलह रुपये ।”

“सोलह रुपये ? सोलह रुपये दर्जन (गिनती के दर्जन भर बालें सोलह रुपये में) या …?”

“सोलह रुपये किलो, बाबू जी ।”

“सही हैं दाम ?” मैं यूं ही पूछ लेता हूं । मोलभाव का कोई इरादा नहीं मेरा, फिर भी देखना चाहता हूं कि क्या कहता है वह ।

“अरे बाबूजी बाजार में देख लीजिए न, कम में कहां मिल रहा है । आप तो रोज के खरीददार हैं, आपसे अधिक दाम वसूलेंगे क्या ?”

उसका अंतिम वाक्य सुनकर मैं मन ही मन मुसकराता हूं । ‘मैं रोज का गाहक हूं’ वह कहता है, क्या वाकई ? हर किसी से यही रटा-रटाया वाक्य बोलना बेचारे का ‘धर्म’ बन चुका है । इस बार के मौसम में मैंने मुश्किल से तीन या चार बार ही भुट्टा खरीदा होगा और वह भी कभी किसी से तो कभी किसी और से । इस व्यक्ति से तो पहली बार । याद नही आता कि पहले कभी उससे खरीदा भी है । हाल-फिलहाल तो नहीं । मैं उससे एक किलो बालें तौलने को कहता हूं । मैं छांटकर उसे सौंपता हूं, गिनती की कुल छः बालें तराजू पर चढ़ती हैं ।

इस बीच चढ़ती उम्र के एक सज्जन वहां पहुंचते हैं और भुट्टे वाले से विक्री दर के बारे में पूछते हैं । विक्रेता कहता है, “अरे साहब यही सोलह-बीस रुपया किलो चल रहा है ।”

“अरे भई हम तो रोज के हैं न, ठीक-ठीक लगाओ ।” इतना कहते हुए वे बालें छांटने लगते हैं । तब तक भुट्टे वाला मेरे लिए तौल चुका होता है । गिनती की छः बालें मैं अपने झोले में भर लेता हूं । जब तक जेब से पैसा निकालकर उसे दूं तब तक वह उन सज्जन द्वारा छांटी गयीं बालें तराजू पर रख तौलने लगता है । मेरी नजर उनकी गिनती करने लगती है, जिज्ञासावश । छः बालें, वही संख्या जो खरीद में मुझे मिलीं और लगभग वैसी ही, उन्नीस-बीस । दूसरे पलड़े पर देखता हूं कि एक किलो के साथ सौ ग्राम (शायद; या पचास का हो) का बांट रखा है । वह एक बाल हटाने की कोशिश करता है । वह सज्जन रोकते हुए कहते हैं, “अरे रखो, रखो उसे भी । रोज के गाहक हैं हम और तब भी सोने के माफिक तौलोगे क्या ?”

भुट्टे वाला उनकी बात रख लेता है । मैं उसे पैसा देता हूं और घर लौट चलता हूं । रास्ते में सोचता हूं कि क्या उस बेचने वाले ने उन्हें कुछ सस्ता दिया होगा ? मुझे शंका होती है । कहीं ऐसा तो नहीं कि वह उनके मोलभाव के तरीकों से परिचित हो और अपने मुनाफे को बनाये रखने के लिए कोई तरीका अपनाता हो अन्यथा उनके तौलते समय भी लगभग उतनी ही बालें चढ़ी जितना मेरी खरीद के समय । और बांट ? एक किलो के ऊपर । उसने कही उन्हें दिखाने भर के लिए सौ-पचास का अतिरिक्त बांट तो नहीं रखा था ?

यह तो रहा घटना का एक पहलू, दूकानदार से संबंधित । दूसरा पहलू देखिए: मेरा उन सज्जन से औपचारिक परिचय नहीं है, किंतु मुझे मालूम है कि वे हिंदू विश्वविद्यालय में हैं, जहां पहले कभी मैं भी कार्यरत था । मेरे अनुमान में वे कृषि संकाय में अध्यापक हैं । अब तक काफी वरिष्ठता पा चुके होंगे । आज के दिन साठ-सत्तर हजार रुपये से कम की माहवारी तनख्वाह नहीं होनी चाहिए उनकी । तब एक अदने दुकानदार से खरीद-फरोख्त में एक-दो रुपये उनके लिए कोई माने रखते हैं क्या ? उसके विपरीत अगर दो-एक रुपये अतिरिक्त उस आदमी को मिल ही जाते तो उसके लिए अवश्य माने रखता । इतनी उदारता तो उनके सामर्थ्य में है ही !

पर आम जिंदगी में उदारता कम ही देखने को मिलती है । मेरे जीवन का अनुभव है कि सामान्यतः हर व्यक्ति कम से कम खोते हुए अधिकाधिक लाभ प्राप्त करना चाहता है । वह ऐसा चिंतन-मनन के बाद लिए गये निर्णय के आधार पर नहीं करता है, बल्कि ऐसा उसके स्वभाव में निहित रहता है । जब तक सागसब्जी वाले से मोलभाव न कर लें कुछ लोगों को तसल्ली नहीं होती है । और सब्जी वाले भी इस बात को बखूबी समझते हैं और अपने भाव उसी के अनुरूप बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं । असल में हमारी सामुदायिक जिंदगी कुछ यूं ही चलती है । – योगेन्द्र

कितना अंतर है उनमें और हममें ! – किस्सा ड्राइविंग लाइसेंस का

August 17, 2009 by योगेन्द्र जोशी

यह वाकया करीब पच्चीस वर्ष पुराना है । तब मैं सपरिवार द्विवर्षीय उच्चानुशीलन (हायर स्टडीज) हेतु इंग्लैंड गया हुआ था । मेरा कार्यस्थल लंदन से एक सौ बारह  किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित साउथहैम्पटन विश्वविद्यालय था ।

ब्रिटेन में भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या काफी है । लंदन के साउथहॉल इलाके के प्रायः सभी बाशिंदे तो भारतीय ही हैं । वहां पहुंचने पर आपको लगेगा ही नहीं कि आप इंग्लैंड में हैं । अन्य प्रमुख शहरों में भी उनकी संख्या पर्याप्त है । अतः भारतीय भोजन की सामग्री तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं आपको सरलता से इन सभी जगहों पर मिल जायेंगी । साउथहैम्पटन में भी भारतीय मूल के लोगों की संख्या कम नहीं है ।

साउथहैम्पटन में हमारा किराए का आवास ‘बिटर्न’ नामक इलाके में था । आवास से सौ-डेड़-सौ मीटर की दूरी पर ही पंजाबी मूल का एक परिवार रहता था । मेरी पत्नी का उस परिवार से अच्छा-खासा परिचय हो गया था । परिवार के सदस्यों में एक बुजुर्ग महिला, उनका एकमात्र पुत्र, उसकी पत्नी, और उनके दो छोटे बच्चे शामिल थे । उन बुजुर्ग महिला को इंग्लैंड में रहते हुए वर्षों गुजर चुके थे, लेकिन वे अंगरेजी सीख नहीं पाईं । वे केवल पंजाबी ही बोल पाती थीं, हिंदी भी नहीं । उनके पुत्र का जन्म इंग्लैंड में ही हुआ था, अतः वह अंगरेजी तो जानता था, किंतु पंजाबी न के बराबर । उसकी पत्नी पंजाब की थी और शादी के बाद वहां पहुंची थी । वह पंजाबी और हिंदी के अतिरिक्त अंगरेजी भी जानती थी । मेरी पत्नी उनसे तो हिंदी में बातें कर लेती थीं, लेकिन उनकी सास की ठेठ पंजाबी मुश्किल से समझ पाती थीं ।

पंजाबी महिला (बहू) ने मेरी पत्नी को एक बार बताया कि वे तीन या चार दफे कार-चालन के लाइसेंस के लिए आवेदन कर चुकी हैं, किंतु हर बार वे परीक्षण में असफल हो जाती हैं । लाइसेंस के अभाव में कभी-कभी उन्हें परेशानी होती है, क्योंकि वे कार से कहीं अकेले आ-जा नहीं सकती हैं । बारबार की असफलता से उनका आत्मविश्वास डगमगा गया था । इस घटना के कुछ महीनों के बाद हम स्वदेश लौट आये । लौटने पर मेरी पत्नी का उनसे कुछ समय तक संपर्क बना रहा । अपने देश में उन दिनों टेलीफोन सुविधा मुश्किल से आम आदमी को उपलब्ध थी । अतः संपर्क का माध्यम चिट्ठी-पत्री ही थी । एक दिन अनायास उस महिला की चिट्ठी हम लोगों को मिली, जिसमें उन्होंने इस ‘खुशखबरी’ का जिक्र किया था कि उनको अंततोगत्वा वाहन-चालन का लाइसेंस मिल ही गया । यह लाइसेंस उनको संबंधित परीक्षण उत्तीर्ण करने के चौथे या पांचवें प्रयास के बाद मिल पाया था । हमने भी प्रत्युत्तर में उन्हें बधाई संदेश भेज दिया ।

इस किस्से का जिक्र मैं यह बताने के लिए कर रहा हूं कि ब्रिटेन में किसी आवेदक को वाहन-चालन का लाइसेंस तभी दिया जाता है जब वह तत्संबंधित अर्हता की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेता है । परीक्षण की प्रक्रिया गंभीर रहती है और वाहन-चालन के विभिन्न पहलुओं की उसकी जानकारी का मूल्यांकन कर लिया जाता है । कुछ ऐसी ही प्रक्रिया विश्व के सभी प्रमुख देशों में अपनाई जाती है । लेकिन हमारे देश में क्या होता है ? सब खानापूरी के तौर पर होता है । अपने यहां यह लाइसेंस किसी व्यक्ति की वाहन-चालन की योग्यता का प्रमाण नहीं है । वस्तुतः कभी जरूरत पड़ जाने पर यह महज कानूनी पचड़े से बचने के लिए मददगार एक दस्तावेज है, जिसका इंतजाम संबंधित कार्यालय जाकर आवेदन करके तथा आवश्यकता पड़ने पर सुविधा-शुल्क देकर, अथवा किसी दलाल की सहायता लेकर बखूबी किया जा सकता है ।

मैं उन भाग्यशाली व्यक्तियों में नहीं हूं जो ऐसे लोगों को जानते हों जिन्होंने वाहन-चालन के किसी सार्थक परीक्षण के बाद लाइसेंस प्राप्त किया हो । एक बार आंध्र प्रदेश निवासी मेरे एक छात्र ने अवश्य बताया था कि परिवहन कार्यालय के एक कर्मी ने उसके साथ स्कूटर में बैठकर कुछ दूरी तक उसे चलवाया था । लेकिन अन्य मामलों में किसी ने परीक्षण से गुजरने की बात नहीं कही । मेरा अनुमान है कि अपने शहर वाराणसी में वाहन-चालन का लाइसेंस किसी भी व्यक्ति को मिल सकता है – लूला-लंगड़ा-बहरा – किसी को भी । यह पुराने अनुभवों के आधार पर कह रहा हूं । अब चीजों में सुधार हो गया हो तो मुझे अवश्य आश्चर्य होगा । और तब मुझे क्षमा मांगनी होगी । – योगेन्द्र जोशी

मेरे घर के सामने रहते हैं जो

July 20, 2009 by योगेन्द्र जोशी

मेरे घर के सामने सड़क के उस पार पांच सगे भाइयों के अपने-अपने परिवार रहते हैं । सुनने में आता है कि पैंतालीस-पचास वर्ष पहले जब अपनी कॉलोनी की नींव डाली गयी थी तब उसके लिए खरीदे गये भूखंड के मालिकों में से एक इन भाइयों के पिता भी थे । उन बुजुर्ग महोदय को मैंने भी देखा है । कोई दसएक साल हो गये होंगे उन्हें गुजरे हुए । मुझे नहीं मालूम कि इन भाइयों की बहिनें कितनी थीं । जानने की कोशिश मैंने कभी नहीं की और संयोग से उन्हें कभी मैंने देखा भी नहीं । अवश्य ही वे सभी अपने-अपने गार्हस्थ जीवन में व्यस्त होंगी । इन भाइयों और आकार में बेरोक-टोक बढ़ते उनके परिवारों को मैं अवश्य ही करीब दो दशकों से देख रहा हूं । संख्या में परिवार कैसे तेजी से बढ़ते हैं इसका एक दृष्टांत ये परिवार प्रस्तुत करते हैं

ये पांच भाई सड़क से लगे सत्तर-पचहत्तर फुट चौड़े भूखंड पर अपने-अपने मकान बनवाकर रह रहे हैं । भूखंड की सड़क से लंबवत् गहराई नब्बे फुट तक होगी ऐसा मेरा अनुमान है । इस भूखंड को इन भाइयों ने चौढ़ाई में पांच बराबर हिस्सों में बांटकर अपने-अपने आशियाने बसाये हैं । हर आशियाना भूखंड की गहराई तक एक लंबी पट्टी के माफिक बना है जिसमें कमरों की कतार समाई है ।

इन सभी भाइयों में हरएक के औसतन आधा दर्जन संतानें हैं, कुछ लड़के तो कुछ लड़कियां । अवश्य ही एक के केवल दो बेटे और दो बेटियां हैं । शेष भाई संतानों के मामले में अधिक ‘भाग्यशाली’ हैं । औरों के मामले में मैं आजतक ठीक से हिसाब नहीं लगा सका कि किसके कितने बच्चे हैं । सामने छोटे-बड़े तमाम लड़के-लड़कियां नजर आते हैं, परंतु मैं भरोसे के साथ यह नहीं कह सकता कि कौन किस भाई की संतान है । सबसे छोटे भाई के घर में तो बस कुछएक महीने पूर्व ही पांचवीं या छटी संतान ने जन्म लिया है । मेरी जानकारी में पांचों भाई निरक्षर हैं और साग-सब्जी के कारोबार जैसे उद्यम से जीवनयापन करते हैं । लेकिन नई पीढ़ी के बच्चे थोड़ा-बहुत पढ़-लिख गये हैं या पढ़-लिख रहे हैं । उनमें से शायद केवल एक हाई-स्कूल भी पास कर चुका है ।

पिछले कुछ समय से मैं बड़े जिज्ञासु भाव से यह जानने और समझने की कोशिश करता आ रहा हूं कि क्या इन परिवारों की नई पीढ़ी, यानी इन पांच भाइयों की संतानों, में भी ‘परिवार वृद्धि’ के प्रति वही पुराने ढर्रे की सोच विद्यमान है ? या इनकी सोच कुछ हद तक बदली और ‘समझदारी’ भरी है ? उनके वयस्क हो चुके बच्चों से मैंने कभी पूछा नहीं । दरअसल हिम्मत ही नहीं होती है; पता नहीं क्या प्रतिक्रिया हो; कहीं बुरा न मान जायें ऐसे संवेदनशील मुद्दे को लेकर । लेकिन कुछ बातें हैं जिनसे मुझे लगता है कि बात कुछ बदल जरूर रही है ।

सबसे बड़े भाई के खुद के पांच लड़कों में से दो की शादी अंदाजन सात-आठ साल पहले हुई होगी । दोनों के पांच-पांच छः-छः साल के दो-दो बच्चे हैं जो अब स्कूल जाते हैं । इन लोगों के जिन लड़कियों की शादी वर्षों पहले हुई स्वयं उनके बच्चे भी स्कूल जाते हैं, जैसा उनमें से किसी एक ने कभी मुझे बताया था । लेकिन बीते सात-आठ सालों में इन चाचा-ताऊओं के अन्य लड़के-लड़कियों में से किसी की भी शादी नहीं हुई । कुल पच्चीस-तीस की संख्या वाले इन लड़के-लड़कियों की उम्र में परस्पर क्रमशः एक-एक साल या ऐसा ही अंतर होना चाहिए, अधिक नहीं । इस लिहाज से चार-पांच अन्य जनों की भी शादी हो ही जानी चाहिए थी, खासकर तब जब कि ये लोग पुरानी रूढ़ियों से बंधे हों और कम उम्र में विवाह की परंपरा निभाते आ रहे हों । फिर अन्य वयस्क संतानों का विवाह क्यों रुका होगा ? मेरी जिज्ञासा का यही विषय है ।

मुझे लगता है कि ये बच्चे आज की दुनिया देख रहे हैं, और वे भी संपन्न लोगों की तरह की जिंदगी जीना चाहते हैं । इसीलिए जिनकी शादी हो चुकी उनकी अपने बाप-दादों की तरह अधिक संतानें नहीं हैं । और जो अभी अविवाहित हैं वे कदाचित् जल्दी विवाह के पक्ष में नहीं हैं । वे चाहते होंगे कि अपनी आर्थिक स्थिति पहले कुछ सुधार लें । मेरे दिमाग में यह बात तब आई जब एक दिन इनमें से एक (हाई-स्कूल पास) ने मुझसे कहा था “अंकलजी, काश! हम भी आपके यहां पैदा हुए होते । तब हम भी कुछ कर पाये होते ।” उस समय मैंने यह कहते हुए बात टाल दी थी कि सभी लोग टाटा-बिड़ला के घरों में थोड़े ही पैदा होते । पर उसकी बात के अवश्य ही कुछ गहरे अर्थ थे ऐसा मैं सोचता हूं । नई पीढ़ी के ये बच्चे शायद पुराने ढर्रे पर नहीं जीना चाहते हैं । और अगर ऐसा है तो देश की बढ़ती आबादी के संदर्भ में यह शुभ संकेत होगा । – योगेन्द्र

नस्ली भेदभाव का एक छोटा-सा अनुभव

June 24, 2009 by योगेन्द्र जोशी

मानव समाज में भेदभाव की भावना सर्वव्यापी है । भेदभाव का आधार सभी समाजों में एक ही हो ऐसा नहीं है । अपने देश में जातीय भेदभाव सामान्य बात है और दुनिया के प्रमुख देशों में शायद ही कोई अन्य हो जहां हमारी तरह का जातिवाद देखने को मिले । इसके विपरीत नस्ली दुर्भावना, जो कई देशों में आम बात है, अपने देश में कदाचित् है ही नहीं । इसका कारण यह हो सकता है कि नस्ल की दृष्टि से हम भारतीय मिश्रित माने जा सकते हैं । शारीरिक बनावट और रंगरूप के आधार पर हम किसी नस्ल के नहीं कहे जा सकते हैं । विदेशियों के साथ अगर कभी कोई दुर्व्यवहार की बात अपने यहां घटती है तो वह नस्ली आधार पर नहीं बल्कि किसी अन्य कारण से होता है । परंतु पश्चिम के देशों, जहां के मूल बाशिंदे गोरे कहे जाते हैं, में नस्लभेद कोई नई बात नहीं रही है । विश्व के जिन भूक्षेत्रों में वे उपनिवेश स्थापित करके और बहुसंख्यक बनके बस गये, वहां भी नस्ली भेद की आशंका की जा सकती है ।

यह अवश्य है कि सामान्यतः नस्लवाद की मौजूदगी हिंसक वारदातों के रूप में बहुत कम देखने को मिले । अपने यहां ही देखिए, जातिवाद की जड़ें गहरी हैं, किंतु खुलेआम जातिगत दुर्व्यवहार के मामले गिनेचुने ही होते हैं । भावना रहती है, लेकिन उजागर नहीं होती है । काले-गोरे, देशी-विदेशी, मुस्लिम-ईसाई, आदि की भावनाओं से मानव समाज कहीं भी मुक्त नहीं है, बस ये प्रायः सर्वत्र नियंत्रण में रहती हैं । फिर भी कभी-कभार कुछ कमजोर प्रकृति के लोग अपनी वैमनस्य की अथवा किसी प्रकार की असुरक्षा की भावना से प्रेरित होकर उल्टा-सीधा करने निकल पड़ते हैं, जैसा कि आजकल आस्ट्रेलिया में भारतीयों के विरुद्ध कुछएक घटनाओं में हुआ है । पश्चिमी देशों में विदेशियों या विदेशी मूल के नागरिकों की मौजूदगी कइयों को नागवार लगती है ऐसा मैंने खुद अनुभव किया है, अपने इंग्लैंड प्रवास के दौरान ।

मेरे अनुभव पिछली शताब्दि के नौवें दशक के मध्य के हैं । तब से अब तक इंग्लैंड में माहौल बहुत कुछ बदल चुका होगा । मैं तब वहां साउथ्हैम्टन विश्वविद्यालय में उच्चाध्ययन के लिए गया था दो वर्ष के प्रवास पर । एक बात का खुलासा मैं आरंभ में ही कर दूं कि हम हिंदुस्तानियों की अंग्रेजी प्रायः किताबी होती है, अर्थात् पुस्तकों से पढ़-पढ़कर सीखी हुई । इस भाषा के व्याकरण के ज्ञान में हम औसत अंगरेज से बेहतर हो सकते हैं, लेकिन हमारे बोलने-चालने में नैसर्गिक प्रवाह कम ही रहता है । रोजमर्रा के बोलचाल में हम में से कम ही लोग उसका व्यवहार करते हैं । हम हिंदुस्तानियों का लहजा एक ठेठ अंगरेज से भिन्न रहता है और ‘एक्सेंट’ के मामले में तो हम काफी पीछे माने जायेंगे । कहने का मतलब यह है कि यदि किसी हिंदुस्तानी को अचानक इंग्लैंड में आम अंगरेजों के बीच में बिठा दिया जाये, तो उसे अपना अंगरेजी ज्ञान अपर्याप्त ही लगेगा । कम से कम मुझे तो आंरभ में यही लगा था । तब मुझे विश्वविद्यालय में खास दिक्कत नहीं हुई थी, क्योंकि वहां के पढ़े-लिखे लोगों के मुख से ‘मानक’ साफ-सुथरी अंगरेजी सुनने और समझने को मिल जाती थी । लेकिन सड़कों और बाजारों में सभी प्रकार के लोग मिल जाते थे, जिनमें से किसी-किसी की अंगरेजी मुझे कभी-कभी समझ से परे लगती थी ।

हां, तो मैं अपने अनुभव की चर्चा पर लौटता हूं । वहां के मेरे प्रवास के आरंभिक दिनों की बात है । तब मैं उस नये वातावरण से परिचित होने की प्रक्रिया में था । हर सायंकाल शहर के किसी न किसी कोने पर पहुंच जाता था । शाम के दो-तीन घंटे वहां के बाजारों, दुकानों, सड़कों, पार्कों, और लोगों के तौर-तरीकों की जानकारी हासिल करने में निकल जाते थे । एक दिन मैं ‘सिटी सेंटर’ की ओर निकल गया, और एक सड़क के किनारे खड़े होकर वहां का नजारा देखने लगा । तभी एक उम्रदराज व्यक्ति मेरे बगल में आ खड़ा हुआ और मुझसे सटते हुए-सा कुछ बोलने लगा । वह कद-काठी में सामान्य था और उसके पहनावे तथा हावभाव से मुझे यही लगा कि वह वहां के संपन्न वर्ग का अंगरेज नहीं था । मैं उसकी बातों को समझने की कोशिश करने लगा, लेकिन समझ में ठीक-से कुछ आ नहीं रहा था । उसके चेहरे पर उभरे नाखुशी या असंतोष के भावों को मैं अनुभव कर रहा था । असहज महसूस करने पर कुछ सेकंडों के बाद मैं एक-दो कदम बगल की ओर में खिसक लिया । वह फिर मेरे बगल में सटकर खड़ा हो गया और कुछ बोलता रहा । मुझे लगा कि उसे मेरी मौजूदगी ठीक नहीं लग रही थी । ऐसा लग रहा था कि उसे मुझसे चिड़-सी हो रही है और वह शायद मेरे प्रति अपशब्द बोल रहा था, परंतु क्यों इस बात को मैं समझ नहीं पा रहा था । उस क्षण नस्लभेद जैसी बात का विचार भी मेरे मन में नहीं आया था । मुझे लगा कि वहां से हट जाना ही ठीक रहेगा । और मैं तेज कदमों से आगे बढ़ गया । बाद में रात्रि विश्राम के समय मेरा ध्यान दिन की उस घटना की ओर गया । तब मुझे लगा कि बात कुछ ‘वैसी’ ही है ।

बात कुछ ‘वैसी’ ही रही होगी इस बात का एहसास मुझे बाद में अपने कार्यस्थल (विश्वविद्यालय) के एक कर्मचारी के रवैये से भी लगा । मैं अपने विभाग के भंडार (स्टोर) से कागज-कलम, पेंसिल-इरेजर आदि सामग्री यदाकदा आवश्यकतानुसार लेने जाया करता था । वहां मेरा सामना कभी-कभी एक अधेड़ उम्र के कर्मचारी से हो जाया करता था । वह व्यक्ति गाहे-बगाहे मुझसे अप्रासंगिक सवाल पूछ बैठता था, जैसे ‘इंडिया से यहां क्यों आये हो ?’, ‘इंडिया कब लौट रहे हो ?’, ‘अभी तुम इंडिया लौटे नहीं ?’, इत्यादि । मैं सोचता कि यह आदमी हर बार ऐसे ही सवाल क्यों पूछता है । आंरभ में तो मुझे ऐसे प्रश्न सहज जिज्ञासा से प्रेरित लगे थे, किंतु बाद में मुझे ये दुर्भावना-जनित लगने लगे ।

इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि उक्त प्रकार की घटनाएं अपवाद रूप में ही घटीं और वह भी विशेष गंभीर नहीं थीं । किंतु उनमें छिपा संदेश स्पष्ट था । अन्यथा यह सुयोग ही रहा कि मेरे दो वर्ष के प्रवास में वहां के आम बाशिंदों के व्यवहार में शायद ही कभी कोई कमी मैंने पाई । – योगेन्द्र

परेशानी का सबब ‘टाइट जींस-टीशर्ट’ पहनना

June 12, 2009 by योगेन्द्र जोशी

दो रोज पहले किसी टीवी चैनल पर खबर सुनने को मिली कि कानपुर शहर के एक महिला डिग्री कालेज में प्राचार्या ने छात्राओं के जींस तथा टीशर्ट (टॉप?) पहनकर कालेज परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है । साथ ही उन्हें हिदायत दी गयी है कि वे सेलफोन लेकर परिसर में न आवें । रेडियो बीबीसी के सांध्यकालीन हिंदी कार्यक्रम में इसी आशय के समाचार को यह कहकर प्रसारित किया गया था कि उत्तर प्रदेश के ‘कुछ’ कालेजों में छात्राओं के जींस-टीशर्ट पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । मुझे नहीं मालूम कि इस प्रकार के आदेश कहां-कहां पारित हुए हैं । पिछले कुछ वर्षों से स्कूल-कालेजों में ‘ड्रेस कोड’ संबंधी निर्देशों की बातें सुनने को अवश्य मिलती रही हैं । ऐसे निर्देशों का विरोध भी हर बार देखने-सुनने को मिलता रहा है । स्त्री स्वतंत्रता के हिमायती संगठन ‘तालीबानी’ फरमान कहते हुए इनके विरुद्ध आवाज उठाते आ रहे हैं ।

उक्त समाचार सुनने पर मुझे एक घटना का स्मरण हो आया । कोई चार साल पहले मैं सपत्नीक मैसुरु (मैसूर, कर्नाटक) गया था । वहीं से हम दिन भर के एक ‘कंडक्टेड बस टूर’ पर तमिलनाडु राज्य की पर्यटक नगरी उदगमंडलम (यह उसका आधिकारिक नाम है, अन्यथा उसे ऊटी या ऊटकमंड ही अधिक पुकारा जाता है) भी चले गये थे । यह नगरी नीलगिरि पर्वतशृंखला की एक चोटी पर करीब 7200 फुट की ऊंचाई पर बसी है और मेरे अनुमान से इसकी आबादी लाख-एक से अधिक नहीं होगी । सदाबहार हरियाली, हल्की ग्रीष्मकालीन ठंड, झील, विभिन्न पेड़-पौधों और फूलों वाला विस्तृत उद्यान, और निकट का संरक्षित वन क्षेत्र इसे एक आकर्षक पर्यटक स्थल बनाते हैं । 20-25 यात्रियों से भरी हमारी बस में युवक-युवती का एक जोड़ा में बैठा था । उनकी उम्र तथा हाव-भाव से हमें अनुमान हो चला था कि वह एक नवविवाहित जोड़ा था, जो कदाचित् दो-चार दिन के सैर (या हनीमून) पर ऊटी जा रहा था । बाद में हमें पता चल भी गया कि वे वास्तव में परस्पर विवाहित थे । उस शाम हम जैसे अन्य यात्रियों की तरह वे उस बस से मैसुरु लौटे भी नहीं ।

नीलगिरि पर्वत की संबंधित चोटी पर सर्पिल राजमार्ग पर चढ़ते हुए दिन के बारह-एक बजे के करीब हमारी बस सीधे उदगमंडलम या ऊटी झील के किनारे पहुंची । वहां पर घंटे भर के लिए हम लोगों को चायपान अथवा भोजन करने और झील का आनंद लेने के लिए छोड़ दिया गया । उसी के बाद उस नगरी के अन्य स्थलों का दर्शन कराया गया ।

हम दोनों, यानी मेरी पत्नी और मैं, थोड़ा घूमफिर चुकने के बाद वहीं बस के पास लौट आये । झील में नौकायन का हमारा इरादा था नहीं और आजूबाजू में दर्शनीय अधिक चीजें थीं भी नहीं । आसपास की दुकानों से छोटी-मोटी सजावटी या उपहार में देने योग्य कलात्मक सामान खरीदकर अपने लिए बोझा बढ़ाने का विचार भी हमारे मन में नहीं था । अतः हम चेहलकदमी करते हुए और चाय-काफी पीते हुए बस के इर्दगिर्द ही उसके चलने की प्रतीक्षा में समय बिताने लगे ।

वहां पर उस नवविवाहित जोड़े को थोड़ी परेशानी झेलनी पड़ी थी । हुआ यह था कि युवती ‘टाइट जींस-टीशर्ट’ धारण किये हुए थी जो उसकी देह पर लगभग चिपके हुए से लग रहे थे । आजकल ‘आधुनिक(?)’ तथा पाश्चात्य-से लगने वाले परिधानों का शौक किशोरियों-नवयुवतियों में काफी बढ़ चुका है, खासकर महानगरों में । उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण में ऐसे नये तौर-तरीके अभी भी कम दिखाई देते हैं । उदगमंडलम में स्थानीय युवतियां दक्षिण की पारंपरिक वेशभूषा अथवा सलवार-सूट या साड़ी-ब्लाउज में ही नजर आ रही थीं । वैसे उनकी उपस्थिति विशेष नहीं थी । जिस युवती की मैं बात कर रहा हूं वह हिन्दीभाषी थी और मैं समझता हूं कि वह अवश्य ही उत्तर भारतीय रही होगी । उस स्थान पर शायद जींस-टीशर्ट पहने हुए वह कदाचित् अकेली युवती थी । हो सकता है वहां पहुंचे अन्य पर्यटकों में इस परिधान के साथ इक्का-दुक्का और भी कहीं हों, किंतु हमें आसपास में कोई नजर नहीं आया ।

टाइट जींस-टीशर्ट पहने वह युवती वहां चेहलकदमी करते हुए स्थानीय मनचले युवकों के आकर्षण का केंद्र बन गयी थी । सड़कों, गलियों, चौराहों, तथा पार्कों आदि जगहों पर फालतू घूमते-फिरते युवकों का दिखाई देना अपने देश में आम बात है । ऐसे युवक ‘आधुनिक-सी’ दिखने वाली युवतियों को घूरते हुए देखने के शौकीन होते हैं । वे अक्सर आसपास मंडराते रहते हैं, फब्तियां कसने से बाज नहीं आते हैं और दैहिक निकटता का मौका खोजते हुए छूने-छेड़ने का साहस भी कर जाते हैं । गनीमत है कि ऐसे फालतू इधर-उधर टहलने की आदत अभी युवतियों में नहीं पैदा हुई है । हां, तो तीन-चार युवक उस युवती के आसपास मंडराते हुए हमें भी दिखाई दिये । हरकतें खास गंभीर नहीं थीं, लेकिन उस जोड़े को बेचैन या परेशान करने के लिए काफी थीं । कुछ देर में उस जोड़े का पुरुष सदस्य मेरी पत्नी के पास पहुंचा और उसने अपनी परेशानी हमें समझाते हुए कहा कि हम उसकी पत्नी का जरा ध्यान रखें कि लोग परेशान न करें । मेरी पत्नी ने जिम्मेदारी ले ली । उस समय उसे कुछ भोज्य पदार्थों आदि का इंतजाम करना था । वह अपनी विवाहिता को साथ लेकर जा सकता था । लेकिन मेरा अनुमान है कि उसे शायद यह लगा होगा कि हम जैसे बुजुर्गों के सान्निध्य में वे युवक अधिक संयमित रहेंगे । अन्यथा वे भी उनके पीछे-पीछे हो लेते, सीटी बजाते या कुछ और करते । गनीमत रही कि हमारी उपस्थिति में उन युवकों ने आसपास खड़े होकर समय काटने के अतिरिक्त कोई आपत्तिजनक हरकत नहीं की । बाद में नवविवाहित युवक लौट आया और अपनी पत्नी के साथ बस में बैठ गया । किंचित् समय के बाद एक-एक कर अन्य यात्री भी लौटकर बस में सवार हो गये । अंत में बस ने हमें बाजार एवं होटलों वाले इलाके में पहुंचा दिया । वहीं वह नवदंपती बस से उतर कर अपने गंतव्य होटल की ओर चल दिया ।

उदगमंडलम घूमफिर लेने के बाद संध्याकाल जब हम अपनी बस से मैसुरु लौटने लगे तो उस नवदंपती को लेकर मिले कुछ मिनटों के अनुभव पर हम परस्पर बातचीत करते रहे । मेरी पत्नी की एक अहम टिप्पणी थी कि न जाने आज की इन नवयुवतियों के सामने टाइट जींस-टीशर्ट पहनने की मजबूरी क्यों आ पड़ती है । वे अपेक्षया सरल और हमारे समाज में प्रचलित परिधान पहनें तो कुछ लोगों के अवांछित आकर्षण से बच सकती हैं । उन्हें ऐसे पहनावे से बचना चाहिए जो आज के नवयुवकों को भड़काऊ या उत्तेजक लगें । क्योंकर अपने लिए आफत मोल लेती हैं ? मेरी पत्नी के ये विचार एक स्त्री के नाते थे । मैं तो ऐसा सोचता ही हूं । – योगेन्द्र

एक दुःस्वप्न – राजनीति में सत्ता, सत्ता पर कब्जा, कब्जे की राजनीति

May 22, 2009 by योगेन्द्र जोशी

पूरे एक माह के लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया का आज अंतिम दिन है । सायं पांच बजे पंचम चरण का मतदान भी संपन्न हो चुका है । मतों की गिनती दो रोज बाद होनी है । राजनेताओं को तो परिणामों का बेसब्री से इंतजार है ही, जनता की भी उत्सुकता कोई कम नहीं । उसके लिए यह नयी सरकार चुनने का मौका ही नहीं है बल्कि एक मनोरंजक खेल भी है । यह तो हर कोई समझता है कि कोई दल सरकार बनाये, आम आदमी की जिंदगी वैसी ही चलनी है जैसे अभी तक चलती आ रही है । वही बिजली-पानी की किल्लत, अस्पतालों में लगती मरीजों की लंबी कतारें, बच्चों के एड्मिशन के लिए एक स्कूल से दूसरे, तीसरे, चौथे तक की दौड़ और उस पर बढ़ती फीस के जुगाड़ की चिंता, रेलगाड़ियों के डिब्बों में ठुंसकर सफर करने की मजबूरी । और भी न जाने क्या-क्या देखना-सहना पड़ता है । बस, रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाते-सुलझाते जिंदगी गुजारना सबकी नहीं तो कइयों की नियति है, जिससे निजात नहीं मिलनी है, चाहे कोई राजकाज संभाले ।

रात का वक्त है । भोजन कर चुका हूं । सोचता हूं टेलीविजन चैनलों पर चुनाव संबंधी समाचार, परिचर्चाएं तथा समीक्षाएं देख-सुन लिये जायें । रिमोट कंट्रोल का बटन दबा-दबाकर एक चैनल से दूसरे-तीसरे पर भटकता हूं । खबरें कमोबेश वही हैं, बातें भी वही । मतदान का प्रतिशत क्या है, जहां कम है तो क्यों है । किस दल को कितनी सीटें मिलनी हैं और कैसे किसी भी मोरचे को बहुमत नहीं मिलना है । वे गठबंधनों के टूटने और दलों के बीच नये रिश्तों के बनने की बात करते हैं । जोड़तोड़ की राजनीति आरंभ हो चुकी है यह मुझे सुनने को मिल रहा है । जो कल तक एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी थे अब साथ आने की फिराक में हैं, और जिनके बीच दोस्ती थी वे अब साथ छोड़ रहे हैं । सत्ता कैसे हाथ लगेगी यह चिंता सबको सता रही है । देश कहां जायेगा, आम आदमी की समस्याएं कैसे सुलझेंगी जैसी बातें नदारद हैं । ऐसा लगता है कि बस सत्ता पाना एकमेव उद्येश्य है सबका । सत्ता हथियाने की बात खुलकर कही जा रही है । टीवी पर्दे पर नजर गड़ाये और उसके स्पीकरों पर कान दिये हुए तीन-एक घंटे का अंतराल बीत जाता है । अर्धरात्रि होने को है । देश की राजनीति को लेकर मन नैराश्य भाव से भर जाता है । टीवी ऑफ कर देता हूं और चला जाता हूं अपने बिस्तर पर लेटने । कुछ देर के लिए देश की भावी तस्वीर के मंसूबों में खो जाता हूं, और फिर कब आंख लग जाती है पता नहीं ।

नींद में एक सपना देखता हूं । किसी गांव का एक परिवार मेरे सपने में आ पहुंचता है । एक परिवार जिसमें कई पीढ़ियों से एक ही वारिस पैदा होता आ रहा है । मौजूदा वारिस के बाप, दादा, परदादा, सभी अपने-अपने मां-बाप की इकलौती संतानें रहीं । बिरादरी लंबी-चौढ़ी है, लेकिन उसमें कोई नजदीकी रिश्तेदार नहीं उस परिवार का । समय बीतता है और फिर एक हादसा घटता है जिसमें उस परिवार का अस्तित्व मिट जाता है, बिना किसी वारिस को अपने पीछे छोड़ते हुए ।

बिरादरी के लोगों की नजर आ टिकती है उस जमीन-जायदाद पर जो वह परिवार छोड़ गया है । कौन हो सकता है सही दावेदार । सभी अपने-अपने दावे करने लगते हैं । वह संपदा अशांति का कारण बन बैठती है । गांव खेमों में बंट जाता है उसे कब्जियाने के लिए । गाली-गलौज, मारपीट की नौबत आ जाती है । लाठी-डंडे चलने लगते है । लोगों का एक दल जमीन-जायदाद हथियाने में सफल रहता है । उनमें से जो जितनी ताकत दिखाता है वह उतना ही बड़ा हिस्सा पा जाता है । लेकिन दूसरे दलों के लोग शांत नहीं बैठते हैं । वे एकजुट हो आगे की योजना बनाते हैं । पहले दल के लोगों को तोड़ते हैं, उन्हें बेहतर हिस्सेदारी का भरोसा दिलाते हैं । और दो-चार साल में तस्वीर बदल जाती है । गांव के दूसरे लोग जमीन हथियाने में सफल हो जाते हैं । हार खा चुके लोग हार मानते नहीं । वे चुप नहीं बैठते । उनकी कोशिशें होती हैं दुबारा कब्जा पाने की । गाली-गलौज, लाठी-डंडे अपनी भूमिका निभाते हैं । कालांतर में वे उसे वापस पा जाते हैं । कुल मिलाकर एक-दूसरे से कब्जा छीनने का एक खेल गांव में चल निकलता है, अमन-चैन की कीमत पर ।

अचानक मेरी नींद खुलती है । बाहर चिड़ियों के चहचहाने का शोर सुनाई देता है । संकेत है कि सुबह हो चुकी है । मैं बिस्तर से उठ खड़ा होता हूं । सपने की याद अभी ताजा है । दो-चार दिन में भूल जाऊंगा । शायद अगले चुनाव के मौके पर फिर ऐसा ही एक सपना दिखे, कौन जाने ! – योगेन्द्र

किस्सा मृत्यु की विफल भविष्यवाणी का

May 9, 2009 by योगेन्द्र जोशी

मैं भविष्यवाणी करने की किसी भी विधा को स्वीकार नहीं कर पाता । इसके कारण हैं । भौतिकीविद् की हैसियत से एक लंबा व्यावसायिक जीवन बीता है मेरा । उस काल के शैक्षिक अध्ययन तथा अनुसंधान के फलस्वरूप भौतिकी (Physics) के स्थापित नियमों के प्रति एक आस्था भाव मेरे मन में घर कर गया है, जिनके अनुसार भविष्य का अनुमान लगाना संभव नहीं । आधुनिक भौतिकी की निर्भरता उसकी क्वांटम शाखा पर आधारित है । आधुनिक समस्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की कार्य प्रणाली के मूल में क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) के ही नियमों की भूमिका रहती है । अतः उन नियमों को मिथ्या कहना उचित नहीं हो सकता है । क्वांटम भौतिकी के अनुसार कई भौतिक प्रक्रियाएं ऐसी होती हैं जो एक से अधिक वैकल्पिक घटनाओं में से किसी एक को जन्म दे सकती हैं, परंतु किसे इसे पूर्वतः कह पाना संभव नहीं । उन स्थितियों में यह निश्चय कर पाना संभव नहीं है कि कौन सी घटना वस्तुतः घटेगी । जब उस घटना के बारे में ही अनिश्चितता हो तो उसके पश्चात् क्या-क्या क्रमशः घटेगा कैसे कहा जा सकता है ? और संयोग से ऐसी घटनाएं प्रकृति में निरंतर होती रहती हैं जिनसे हम अछूते नहीं रह सकते हैं । अतः हमारा भविष्य क्या होगा कहा नहीं जा सकता

यह तो संक्षिप्त वक्तव्य था मेरे अविश्वास के पीछे के कारण का । इस विषय में भौतिकी पर आधारित व्यापक विवेचना प्रस्तुत करने का मेरा कोई इरादा नहीं और न ही ऐसा कर पाना यहां पर संभव है । मैं यहां अविश्वास के सैद्धांतिक आधार से आगे बढ़कर इस बात पर जोर डालने की आवश्यकता समझता हूं कि भविष्यवाणी के असफलता के अनेकों मामले हमें देखने को मिलते हैं । फिर भी श्रद्धावान का विश्वास बना रहता है । मैं एक घटना का जिक्र करता हूं ।

घटना वर्ष २००५ के अक्टूबर माह की तारीख २० (गुरुवार) की है । हिंदू तिथि-मास गणना-पद्धति के अनुसार उस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी थी । देश के कई भागों में अपने पतियों के आयुष्य के लिए महिलाओं के द्वारा परंपरागत रूप से मनाये जाने वाले करवा-चौथ व्रत की तिथि भी उसी दिन थी । घटना मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के एक गांव में घटी थी, जहां पर एक प्राप्तवय ज्योतिषी महोदय से संबंधित है । जितना मुझे स्मरण है उनका नाम श्री कुंजीलाल था । उन्होंने भविष्यवाणी कर रखी थी कि उस दिन अपराह्न में ३-४ बजे उनकी इहलीला समाप्त हो जायेगी । उनकी विद्या के प्रति पर्याप्त श्रद्धा रखने वाले अधिसंख्य स्थानीय लोग उस दिन प्रातः से ही उनके आवास पर एकत्रित हो गये । उनके दीर्घायु बने रहने के लिए भजन-कीर्तन तथा पूजा-पाठ का दौर चलने लगा । ज्योतिषी महोदय स्वयं मंत्र-जाप में संलग्न होकर अपनी ‘अवश्यंभावी’ मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे । वाकये का दिलचस्प पहलू यह था कि दो-एक खबरिया इलेक्ट्रॉनिक चैनल भी उस घटना के जीवंत प्रसारण में लग गये । वस्तुतः उन्हीं के माध्यम से मुझे घटना का ‘आंखों देखा हाल’ टेलीविजन पर देखने-सुनने को मिला था । एक-दो चिकित्सकों की भी व्यवस्था वहां पर की गयी थी । जांच-पड़ताल के बाद उन्होंने ज्योतिषीजी के पूर्णतः स्वस्थ होने की बात तो कही पर उनकी भविष्यवाणी पर टिप्पणी करने से बचे रहे ।

मैं भी जिज्ञासावश टीवी के सामने बैठा रहा । लेकिन अपराह्न में मुझे सपत्नीक कहीं कार्यवशात् निकल जाना पड़ा । बाद में लौटने पर घर में प्रवेश करते ही मैंने सबसे पहले टीवी चालू किया, और संबंधित चैनल पर उक्त भविष्यवाणी के संदर्भ में क्या कुछ इस बीच घट चुका यह जानने बैठ गया । पता चला कि उस दिन के अनिष्ट का कथित संभावित काल बीत भी गया और कुछ भी अनहोनी नहीं हुयी । ज्योतिषीजी ने सहज भाव से घटना के न घटने का कारण लोगों के द्वारा की गयी प्रार्थना आदि को बताया जिसने मृत्युयोग को निष्प्रभावी कर दिया ।

उक्त घटना हमारे सामने दो प्रश्न खड़े करती है । पहला यह कि क्या वह भविष्यवाणी स्वयं में गलत थी और तदनुसार वैसा कुछ भी होना ही नहीं था ? कहा जायेगा कि इस विशेष मौके पर भविष्यवाणी त्रुटिपूर्ण थी, अतः गलत सिद्ध हुई, अन्यथा सही भविष्यवाणियां कर पाना संभव है । त्रुटि की बात कहकर किसी भी असफल भविष्यवाणी का बचाव किया जा सकता है, और ऐसा अमूमन किया भी जाता है । दूसरा यह कि क्या भविष्यवाणियां टाली भी जा सकती हैं और वस्तुतः क्या वही इस मामले में हुआ भी ? लोग कहेंगे कि पूजा आदि यदि न किये गये होते तो अनिष्ट घट गया होता । चूंकि अमुक घटना वैज्ञानिक अध्ययन में प्रयुक्त नियंत्रित विधि से संपन्न प्रयोग नहीं था, अतः निर्विवाद रूप से कुछ कह पाना सरल नहीं है । परंतु एक शंका उत्पन्न अवश्य होती है कि घटनाओं को होने से यदि किसी न किसी उपक्रम से रोकना संभव है तब भविष्यवाणी का अर्थ ही क्या रह जाता है । जो चीज अंततः होनी ही नहीं, कारण चाहे कुछ भी हो, तब उसके होने की भविष्यवाणी की सार्थकता ही क्या रह जाती है ? यह विषय गंभीर चिंतन-मनन का है । – योगेन्द्र