दो रोज पहले की बात है जब मेरी मुलाकात एक ऐसे रिक्शा वाले से हुई जिसका व्यवहार आम रिक्शाचालकों से कुछ हटकर था, जिसकी सोच आम आदमी से भिन्न थी, और जिससे बात करना दिलचस्प था । हुआ यह कि कल मैं सपत्नीक घर से गोदौलिया कार्यवशात गया था । गोदौलिया मेरे शहर वाराणसी का पुराना और घनी बस्ती वाला व्यापारिक स्थान है, जिसके निकट ही सुचर्चित बाबा विश्वनाथ मंदिर और गंगातट का दशाश्वमेध घाट हैं । बेहद भीड़भाड़ वाले इस जगह के ‘गोदौलिया चौराहे’ पर आवागमन हेतु सामान्यतः रिक्शा ही उपलब्ध हो पाते हैं । थ्रीह्वीलर आटोरिक्शे करीब आधा-पौन किलोमीटर दूर मिलते हैं । वहां से हम रिक्शा से लौटे थे ।

संध्या का समय था । गौदौलिया से लौटते समय जब हम लंका तक के लिए रिक्शा खोज रहे थे तो संयोग से एक नौजवान रिक्शावाला बगल में आ खड़ा हुआ और बोला, “लंका चलना है न ? आइए, बैठिए ।” और आगे रिक्शाभाड़े के बाबत खुद ही कहने लगा, “वैसे तो लंका तक का किराया चालीस रुपया होता है, लेकिन चूंकि मुझे उसी तरफ जााना है, इसलिए केवल तीस रुपया दे दीजिएगा ।” (बताता चलूं कि लंका हमारे घर के निकट है और वहीं पर सुविख्यात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का प्रवेशद्वार है ।)

भाड़े पर हामी भरते हुए हम रिक्शे पर बैठ गये, और वह चल पड़ा । नौजवान होने के कारण रिक्शा चलाने में उसे खास मशक्कत नहीं करनी पड़ रही थी ऐसा मुझे लगा । मार्ग में वह रामभक्ति के गीत/भजन गाने लगा । बीच रास्ते हमने उससे कहा, “बेटा, हमें लंका के अगले चौराहे यूनिवर्सिटी गेट वाले से पास छोड़ देना ।”

“आप जहां कहें वहां छोड़ दूं ।” उसका जवाब था ।

“तो क्या तुम सुंदरपुर तक चलोगे ?” हमने उससे पूछा ।

“छोड़ तो देता लेकिन अब रिक्शा जमा करने का समय हो रहा है ।”

“यह रिक्शा किराये पर लिए हो क्या ? कितना किराया भरना पड़ता है इसका ? और लंका के पास ही रहते हो क्या ?”

“चालीस रुपया रोज पडता है । लंका से सामनेघाट की ओर कुछ दूरी पर है मालिक की दुकान । गंगा पार रामनगर में मेरा घर है; वहीं से निकल जाऊंगा घर के लिए ।” उसने उत्तर दिया ।

रास्ते भर मुक्त भाव से उसे भजन गुनगुनाते देख मैंने पत्नी से कहा कि लगता है यह व्यक्ति तनाव में नहीं रहता होगा । जिज्ञासावश मैंने उससे पूछा, “लगता है भजन-कीर्तन की पुस्तकें पढ़ने का शौक है । कितने तक पढ़े हो भई ।”

“बाबूजी, स्कूल गये तो थे लेकिन हमें कुछ आता नहीं था । बस टीचर लोग हर साल अगली कक्षा में बढ़ा देते थे । क्या बताऊं ?”

“फिर भी पढ़ना-लिखना तो आता ही होगा ।”

“हां, थोड़ा-बहुत पढ़-लिख लेता हूं काम भर का, ज्यादा नहीं ।”

तब तक हम लंका पहुंच चुके थे । मैंने पत्नी से इशारे से कहा, क्यों न चालीस रुपया भाड़ा दे दें । पत्नी ने सहमति जताई और उसे मैंने यह धनराशि चुका दी । वह बोला, “लेकिन बाबूजी मैंने तो आपसे तीस ही रुपये मांगे थे । चूंकि मुझे इधर आना था तो सोचा कि जो भी मिल जाए अच्छा ।”

“ठीक है, हम अपनी मरजी से दे रहे हैं ।” कहते हुए हम रिक्शे से उतरने लगे तो उसने रिक्शे के हत्थे पर लटक रहे अपने झोले से कागज के कुछ पन्ने निकाले और हमें सोंपते हुए बोला, “आपको याद होगा, अभी दो-चार पहले राहुल गांधी शहर के रिक्शाचालकों से मिले थे । मैं भी उनसे मिला था; उन्हें एक पत्र भी सोंपा था । यह उसी की कापी है । मैंने उन्हें एक गीत भी सुनाया ।”

उसने भोजपुरी में शब्दबद्ध एवं भारतमाता को संबोधित वही गीत, “माई, माई …” हमें सुना डाला । उस गीत के बोल हमें याद नहीं हैं, लेकिन इतना ध्यान है कि उसमें देश की गरीब जनता की व्यथा का जिक्र करते हुए भारत मां से उनके कष्ट मिटेंगे यह प्रश्न पूछा गया था । मेरे इस सवाल पर कि वह गीत किसका लिखा है, उसने बताया कि गीत स्वयं उसी का लिखा है । मैंने पूछा, “क्या इसकी लिखित प्रति भी रखे हो ? अगर हो तो वह भी दे दो ।”

उसका उत्तर था, “गीत की प्रति तो मेरे पास नहीं है, लेकिन आपको यह इंटरनेट पर मिल जाएगा । बनारस के रिक्शा वालों से आप राहुल जी की बातचीत उनकी जिस साइट पर मिलेगी वहीं यह भी मिल जाएगा ।”

उक्त वार्तालाप के पश्चात हमने उसकी रुचियों पर उसे बधाई के साथ शुभकामनाएं दीं और घर लौट आए । दरअसल धन-दौलत और ऐशो-आराम के बाबत भी उसने अपने खयालात हमारे सामने पेश किए थे । हम दोनों उसकी बातों से प्रभावित थे, क्योंकि वह हमें आम रिक्शावाले से कुछ हटकर लगा । बाद में मैंने इंटरनेट पर उस गीत को खोजने का प्रयास किया, किंतु मुझे वह मिल नहीं सका । गीत तो नहीं परंतु उसके द्वारा लिखित उपर्युक्त पत्र की प्रति वाकये के इस विवरण के साथ संलग्न है । – योगेन्द्र जोशी

Rickshawmans let2Rahul

रेलगाड़ी एवं बसों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए बैठने के स्थान बहुधा आरक्षित रहते हैं । वरिष्ठ का मतलब उस व्यक्ति से है जो वयसा साठ साल या अधिक का हो चुका हो । बसों/रेलगाड़ियों के संदर्भ में तो यह परिभाषा काफी पहले से प्रचलन में रही है । इसके विपरीत आयकर विभाग कुछ वर्ष पहले तक पैंसठ अथवा उससे अधिक की उम्र ले चुके व्यक्ति को ही वरिष्ठ मानता था । परंतु अब उस विभाग में भी उक्त परिभाषा लागू हो चुकी है । वरिष्ठ नागरिकों को वहां भी आयकर की किंचित छूट प्राप्त हो जाती है । अन्य कई क्षेत्रों में भी वरिष्ठों को सिद्धांततः किसी न किसी प्रकार की रियायत देने के नियम हैं, जैसे अस्पतालों में । सभी वरिष्ठ नागरिकों को उन रियायतों की जानकारी हो ही यह आवश्यक नहीं है । जहां सुविधाएं आरक्षित हों वहां भी उसका लाभ मिल ही जाए जरूरी नहीं । संबंधित अन्य लोग इन प्रावधानों की परवाह करते ही हों यह आवश्यक नहीं ।

मेरी पत्नी एवं मैं वरिष्ठ नागरिक हैं । मुझे वरिष्ठ दिखना एवं कहलाना सम्मानजनक लगता है मैंने सुना है कि कुछ लोग उम्र छिपाने के इच्छुक होते हैं और वे उम्रदराज न लगें इसके लिए सिर के बालों को खिजाब से रंगते भी हैं । लेकिन मुझे उम्र के साथ बालों का सफेद होना स्वाभाविक लगता है । मेरे बालों में अभी सफेदी कम ही है, लेकिन मैं चाहता हूं कि वे हिमवत श्वेताभ हों । आखिर उम्र का सयानापन भी तो कहीं झलके । सयानापन न भी हो तो कम से कम उसका भ्रम तो पैदा हो । बुजुर्ग लगने वाले को लोग कुछ तो सम्मान देते ही हैं ऐसा मैं समझता हूं । कभी-कभी ऐसा स्पष्टतः अनुभव में आता भी है । इस संबंध में मुम्बई की एक हालिया घटना मेरे स्मरण में आती है, जिसका जिक्र मैं यहां पर करना चाहता हूं ।

हाल ही में कभी हम पति-पत्नी कुछ दिनों के प्रवास पर मुम्बई में थे । एक दिन हम उस महानगर के समुद्र तट पर स्थित ख्यातिप्राप्त “गेटवे-आफ-इंडिया” के आसपास भ्रमणार्थ निकले । वापसी के लिए हमने स्थानीय रेलगाड़ी यानी लोकल ट्रेन चुनी जो “चर्च-गेट रेलवे टर्मिनस” से लेनी थी । गेटवे-आफ-इंडिया से चर्च-गेट तक की दूरी हमने महानगर की स्थानीय बस सेवा से तय की । संबंधित नगरीय बस इन्हीं दो स्थानों के बीच चलती है । मेरे अनुमान में दोनों स्थानों के बीच की दूरी पांच-एक किलोमीटर से अधिक नहीं होगी ।

हमें जो बस मिली वह सवारियों से पहले ही भर चुकी थी, और तुरंत ही चलने को तैयार थी । अगली बस का इंतिजार करने के बजाय हमने उसी से गंतव्य तक जाने का विचार किया । बस के अंदर सभी सीटें भरी हुई थीं, अतः हम चालक के पास के प्रवेशद्वार के निकट खड़े हो लिए । उस भीड़ में हमारे लिए यह पता करना कठिन था कि कहीं आसपास की दो-एक सीटें वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित हैं या नहीं । दरअसल नगरीय बसों से चलने के आदी न होने के कारण हमें इस संभावना का ख्याल तक नहीं था । मेरा सोचना है कि अन्य सवारियां भी उस आरक्षण के प्रति सामान्यतः सचेत नहीं रहती होंगी । वरिष्ठ नागरिकों का आवागमन भी इन बसों के माध्यम से शायद कम ही होता होगा, जिसके कारण ये सीटें अक्सर खाली रहती होंगी और उन पर अन्य सवारियां बैठ जाती होंगी ।

बस के चल चुकने के एक-दो मिनट पश्चात एक युवती अपनी सीट से उठी और मेरी ओर मुखातिब होकर बोली, “आप इस सीट पर बैठ जाइए ।

मैंने पत्नी को इशारा किया कि वह अमुक सीट ग्रहण कर लें । उनके बैठ जाने पर बगल में बैठी पुरुष सवारी भी उठ खड़ी हुई, मुझे उस स्थान पर बैठने का संकेत करते हुए । शायद उसको भी लगा होगा कि बैठने का वह स्थान हम वरिष्ठों के लिए छोड़ देना चाहिए । इस प्रकार सौभाग्य से हमें बैठने की जगह मिल गई, वरिष्ठ नागरिक होने के नाते । हमने इस बात पर गौर नहीं किया कि वे सीटें वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित थीं अथवा नहीं । यह भी हो सकता है कि उन दो सवारियों ने मात्र सदाशयता के नाते हमारे लिए बैठने का स्थान छोड़ा हो । जो भी हुआ हो, ऐसे अवसरों पर एक प्रकार का संतोष-भाव मन में अवश्य उपजता है । – योगेन्द्र जोशी

          रेलगाड़ी से लंबी यात्रा करना बहुतों को उबाऊ लगता है, लेकिन मेरे लिए वह अधिकांश मौकों पर काफी दिलचस्प सिद्ध होता है । मैं अपने साथ यात्रा के दौरान विविध प्रकार की पढ़ने की सामग्री लेकर चलता हूं । बीच-बीच में बदलाव के लिए खिड़की के बाहर के दृश्य भी देख लेता हूं । चाय-कॉफी जैसे पेय अगर मिलते रहें तो यात्रा का आनंद बढ़ जाता है, और ऊब का सवाल नहीं के बराबर रह जाता है । अगर रेलगाड़ी के डिब्बे में उछल-कूद मचाने, हंसने-रोने में लगे छोटे-बड़े बच्चे मौजूद हों, अथवा ऐसे यात्री हों जो किंचित असामान्य हरकतों में लगे दिखें या रोचक वार्तालाप के नजारे पेश कर रहे हों, तो यात्रा का समय कैसे कट जाता है पता नहीं चलता । मैंने पाया है कि कुछ लोग अपनी निजी जानकारी भी साथी यात्रिकों के साथ साझा कर बैठते हैं, अन्यथा आम तौर पर समसामयिक राजनैतिक घटनाएं उनके बीच बहस का अच्छा-खासा विषय बन जाता है, जिसमें कब कौन भाग ले ले कहा नहीं जा सकता । और भी यात्रा के दौरान बहुत-कुछ देखने-सुनने को मिल जाता है । आगे मैं ऐसी ही एक घटना का जिक्र कर रहा हूं ।

चंद रोज पहले मैं अपनी सहधर्मिणी के साथ वाराणसी से मुंबई की एसी 2-टियर डिब्बे में बैठकर यात्रा कर रहा था । खिड़की से सटी ऊपर-नीचे की आरक्षित शायिकाएं (बर्थ) हमें मिलीं हुई थीं । सामने की चार बर्थों (ऊपर-नीचे मिलाकर) में से तीन पर एक ही परिवार के पति-पत्नी एवं उनकी युवा बेटी यात्रा कर रहे थे । उस परिवार की प्रौढ़ महिला नीचे की एक शायिका पर लेटकर झपकी ले रही थीं, जब कि सामने की शायिका उस समय कदाचित खाली थी । डिब्बे में अन्यत्र आरक्षित शायिकाओं वाली दो महिलाएं उस खाली शायिका पर बैठकर गपशप में मशगूल हो गई थीं । उन यात्रिकों ने हमारी ओर के पर्दे खींचकर थोड़ा फैला दिए थे । हम दोनों खिड़की के पास बैठे हुए पत्रिकाएं पढ़ने में व्यस्त हो गए थे ।

उस ओर से आने वाली आवाजें हमारे कानों पर पड़ तो रही थीं, किंतु हम उन पर खास ध्यान नहीं दे रहे थे । फिर कुछ समय बाद अनायास उधर से जोर-जोर से बोलने की आवाज आने लगी । हम समझ नहीं पाये कि माजरा क्या है, लेकिन तुरंत ही अंदाजा लग गया कि उस तरफ बैठे दोनों पक्षों के बीच पहले गरमागरम बहस और फिर उससे आगे बढ़कर तू-तू-मैं-मैं शुरू हो चुकी है । हुआ क्या यह जानने की इच्छा हमारे मन में भी जगी । मामले के बारे में हम अनुमान ही लगा सकते थे, क्योंकि उन लोगों से सीधे-सीधे पूछना किसी को भी उचित या अस्वीकार्य लग सकता था । उनकी आपसी बहस पर ध्यान देने पर हमें समझ में आया कि वहां बैठे परिवार की युवती ने अन्य दोनों महिलाओं से शायद यह कहा, “आप लोग हौले-से बातें करते तो मेहरबानी होती; देखिए इधर मेरी मां भी सो रही हैं ।”

उसका यह निवेदन उन महिलाओं को शायद पसंद नहीं आया । उन्होंने प्रतिक्रिया में शायद यह कहा, “आप पहले अपनी मां के खर्राटे बंद क्यों नहीं करवा रही हैं ? क्या दूसरों को उससे परेशानी नहीं होती ?”

 “देखिए सोते हुए व्यक्ति का अपने खर्राटों पर कोई वश नहीं चलता, लेकिन हौले से बातें करना तो आपके वश में है न ? दोनों बातों की तुलना ठीक नहीं ।”

हमारी नजर में मामला बहुत गंभीर नहीं था । परंतु मामला तब बिगड़ ही जाता है जब लोगों के अहम को चोट लगती है । “सामने वाले की यह हिम्मत कि हमें टोके !” का भाव बहस के दौरान लोगों के मन में अक्सर पैदा हो जाता है और एक-दूसरे की बात समझने से वे इंकार कर बैठते हैं । शायद ऐसा ही कुछ तब हुआ होगा और बात तू-तू-मैं-मैं तक जा पहुची ।

उस ‘झगड़े’ का दिलचस्प पहलू यह रहा कि दोनों ही पक्ष जल्दी ही अंगरेजी पर उतर आए, यानी तू-तू-मैं-मैं तुरंत ही अंगरेजी में होने लगी । एक पक्ष की आवाज सुनाई दी, “यू लैक मैनेरिज्म; लर्न दैम ।”

दूसरे पक्ष के शब्द सुनाई दिये, “फर्स्ट यू योअरसेल्फ लर्न मैनेरिज्म बिफोर टेलिंग अदर्स ।”

कुछ देर ऐसे ही चलता रहा । मुझे मन ही मन हंसी आ रही थी । हम भारतीयों की खासियत यह है कि जब कभी हमें दूसरों पर गुस्सा आता है तो हम अपनी भावना व्यक्त करने में भी अंगरेजी की मदद लेते हैं । अंगरेजी में गुस्से का इजहार अधिक प्रभावी होता है इस विचार से शायद अधिकतर ‘शिक्षित’ भारतीय ग्रस्त रहते हैं । मैं समझता हूं कि कई लोगों के लिए अंगरेजी बोलना दूसरे पर रॉब झाड़ने या उसे स्वयं को हीन अनुभव कराने में मददगार होता है । या हो सकता है वे अनजाने ही अंगरेजी पर उतर आते हों ।

उस घटना के अगले दो-चार मिनट मुझे और भी अधिक रोचक लगे । उन दो महिलाओं के साथ का एक किशोर भी अगल-बगल के किसी शायिका से अवतरित होकर उस कांड में शामिल हो गया । वह बीच-बीच में “यू शट अप !” के शब्द बोलकर दूसरे पक्ष को चेतावनी देने लगा । ऐसा करते समय वह हर बार अपने दांये हाथ के अंगूठे तथा मध्यमा अंगुली से चुटकी बजाता और तर्जनी को दूसरे पक्ष की ओर तान देता । उसका मुख भी तमतमा उठता । उसके हावभाव देख हम मन ही मन खूब हंसे ।

कुछ देर तक इस तमासे को देखने के बाद अपनी श्रीमतीजी अधीर हो बैठीं और उठकर सामने के पर्दे के पास चली गईं । उन लोगों की ओर मुखातिब हो वे बोलीं, “देखिए, आप दोनों ही को मैनरिज्म सीखने की जरूरत है । एक छोटी-सी बात को लेकर झगड़ना कौन-सा मैनरिज्म है ? कंपार्टमेंट में और यात्री भी बैठे हैं, उनके सामने तमासा खड़ा करना बुद्धिमानी नहीं है । अरे भई, यात्रा में कई प्रकार की दिक्कतें हो सकती हैं । अक्सर थोड़ा-बहुत एड्जस्ट करना पड़ जाता है ।”

संयोग से उन्होंने उक्त बातों पर आपत्ति नहीं जताई । बहुत संभव है कि हमारी बढ़ी उम्र का लिहाज किया हो । कारण जो भी हो, दोनों पक्ष शांत जरूर हो गए । – योगेन्द्र जोशी

          जिस घटना का जिक्र मैं इस स्थल पर करने जा रहा हूं वह मुझसे सीधे तौर पर नहीं जुड़ी है, बल्कि वह दो-तीन रोज पहले के अखबार में प्रकाशित एक समाचार पर आधारित है । “मुर्गी से इश्क लड़ाने पर मुर्गे को मार दिया तीर” शीर्षक के साथ छपी घटना का विवरण हिंदी दैनिक जागरण के 26 दिसंबर के अंक में देखा जा सकता है । मामला अलीराजपुर का है । ये स्थान कहां है इसका अंदाजा मुझे नहीं, किंतु घटना के विवरण से यही लगता है यह किसी आदिवासी क्षेत्र में है, जहां तीर-कमान प्रचलन में हैं ।

अखबारों में तो तमाम प्रकार की घटनाएं छपती रहती हैं, जो प्रायः राजनैतिक उथल-पुथल, आरोप-प्रत्यारोप, और प्रशासनिक संवेदनहीनता एवं लापरवाही से लेकर हत्या-डकैती-दुष्कर्म आदि जैसी विचलित करने वाली खबरों से जुड़ी रहती हैं । खबरें सभी प्रकार की प्रकाशित होती हैं, जिनमें कुछएक का विशेष सामाजिक महत्व होता है तो अधिकांश अन्य पढ़कर आई-गई के तौर पर भुला दी जाती हैं । किंतु कभी-कभी कोई घटना ऊपरी तौर पर  महत्वहीन होते हुए भी अपने पीछे विचारणीय सवाल छोड़ जाती है । कम से कम मुझे तो अक्सर ऐसा लगता है । उक्त घटना की खबर पढ़ने पर मेरे मन में सवाल उठा कि कुछ मनुष्य गुस्से में विवेकशून्य होकर तुरंत ही आत्म-संयम क्यों खो बैठते हैं ? क्यों वे कुछ क्षण ठहरकर अपनी प्रतिक्रिया के घातक परिणामों पर विचार नहीं कर पाते हैं ? अस्तु, मैं घटना की बात करता हूं ।

खबर यह थी कि दो भाई – कदाचित सगे, जिसका स्पष्ट उल्लेख खबर में नहीं – पड़ोसी थे और हैं । एक के घर में मुर्गी पली थी तो दूसरे के घर में संयोग से मुर्गा । हो सकता है उनके पास और भी मुर्गे-मुर्गियां रही हों, लेकिन घटना में किरदार निभाने वाले एक मुर्गी ओर एक मुर्गा बताए गये हैं । ये दोनों रहे तो पक्षी जाति के, उन्हें क्या मालूम कि उनके मालिकों के बीच अच्छे संबंध नहीं हैं । उन्हें यह समझ नहीं रही कि उन्हें भी मालिकों की भांति आपस में दूरी रखनी चाहिए । उनमें से कोई एक दूसरे के पास पहुंच गया । बहुत संभव है कि मुर्गा ही मुर्गी के पास पहुंचा हो । अपनी प्रजाति का कोई सदस्य आसपास टहल रहा है यह देख दूसरे मन में उससे नजदीकी बढ़ाने की इच्छा स्वभावतः जगी हो । विपरीत लिंग के सदस्यों के बीच ऐसा आकर्षण खास तौर पर देखा जाता है । खबर के अनुसार मुर्गा मुर्गी से ‘इश्क लड़ाने’ पहुंचा था । इश्क का इजहार कैसे किया जा रहा होगा यह अनुमान लगाने की बात है ।

बहरहाल मुर्गी के मालिक को वह इश्कबाजी नागवार लगी । उसे गुस्सा आया और चल दिया घर के भीतर अपना तीर-कमान लेने । हो सकता है उसने मुर्गे को दो-एक बार भगाया हो, लेकिन ढीठ मुर्गा माना न हो जिससे तीरंदाज मुर्गी-मालिक का गुस्सा और भड़क गया हो । घर से बाहर आकर उसने मुर्गे पर निशाना साधा और उस पर तीर छोड़ दिया । बेचारे मुर्गे को अपनी हरकत की सजा मिल गयी; तीर उसके शरीर के आर से पार निकल गया । यह तो गनीमत रही कि उसके मालिक (दूसरा भाई) को पता चल गया और ले गया उसे पशु-चिकित्सक के पास जिसने संभव उपचार आरंभ कर दिया । उसकी जान बच गई और वह स्वास्थ्यलाभ करने लगा । उसके मालिक ने घटना के बाबत पुलिस में रिपोर्ट कर दी । उधर मुर्गी का मालिक गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हो गया ।

मनुष्य को ऊपर वाले ने सोचने-विचारने की क्षमता दे रखी है । तब भी वह उल्टी-सीधी हरकतों से बाज नहीं आता है । लाख समझाया जाए तो भी कई मनुष्य गलत-सलत कार्य से बचने की कोशिश नहीं करते । बेचारे पशु-पक्षी तो ऐसी समझ पाये नहीं हैं । उन पर ‘सभ्य मानव समाज’ के नियम-कानून तो लागू होते नहीं हैं । तब उन पर क्या गुस्सा करें ? हां, यदि वे असुविधा पैदा कर रहे हों या किसी प्रकार की हानि पहुंचा रहे हों तो उन्हें डराया-भगाया जा सकता है । नियंत्रित रखने के लिए न्यूनाधिक ताड़ना भी की जा सकती है । लेकिन गुस्से में उनकी जान तक लेने का विचार विवेकहीनता का ही द्योतक कहलाएगा ।

तीर चलाने वाले उस व्यक्ति को यह तो मालूम रहा ही होगा कि वह जो कार्य करने जा रहा है वह अनुचित हैा । इसीलिए तो वह बाद में फरार हो गया । जाहिर है गुस्से के अधीन की गई करतूत की कीमत चुकानी ही पड़ी । दरअसल पूरी घटना की कुछ न कुछ कीमत दोनों ही पक्षों को चुकानी पड़ी । मिला क्या ? केवल तसल्ली इस बात की कि मैंने जो हुआ उसे सहा नहीं और मुर्गे को ‘सबक’ सिखा दिया, गोया कि मुर्गा यह समझ सकता हो कि उसे भविष्य में ऐसी नासमझी नहीं करनी चाहिए!

इस प्रकार की घटनाएं हमें अक्सर देखने-सुनने को मिलती हैं । मैंने महसूस किया है कि अनेकों मनुष्य बात-बात पर क्रोधित हो जाते हैं, अपना आपा खो बैठते हैं, और गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त कर बैठते हैं । अवांछित एवं हानिप्रद व्यवहार किसी एक व्यक्ति तक सीमित हो ऐसा नहीं होता, अपितु पूरा जनसमूह ऐसी हरकत पर उतर आता है । कहीं कोई नहीं रह जाता जो कहे कि जरा ठंडे दिमाग से घटना के बारे में सोचा जाना चाहिए और संयमित प्रतिक्रिया क्या हो इस पर विचार करना चाहिए । कहीं किसी वाहन से दुर्घटनावश किसी की जान निकल गयी तो वहां से गुजरने वाले वाहनों की तोड़फोड़ या उनकी आगजनी पर लोग उतर आते हैं । अस्पताल में गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु पर भी इसी प्रकार की प्रतिक्रिया देखने को मिलती है । ऐसी खबर भी सुनने को मिल जाती है जिसमें किसी बात पर गुस्सा होने पर परिवार का कोई सदस्य साल-छः महीने के बच्चे की पटककर जान ले लेता है, अथवा अपनी ही जान गंवा देता है ।

मुझे लगता है कि अनेक जन प्रतिकूल एवं खिन्न करने वाली परिस्थितियों में आत्मसंयम एवं विवेक खो बैठते हैं, और फलतः अनर्थ कर बैठते हैं । हम चाहें या न, यही इस जीवन का कटु एवं अपरिहार्य सत्य है । - योगेन्द्र जोशी

हाल ही में मैं अपनी पत्नी के साथ नवी मुंबई गया था अपने बेटे के पास । मैं नवी मुंबई को बृहन्मुंबई का ही हिस्सा समझता था । वहां जाने पर पता चला कि यह एक अलग और नया शहर है, जिसकी अपनी स्वतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था है । इस शहर में मैंने पहली बार कदम रखे । अस्तु, इस शहर की चर्चा करना मेरे द्वारा प्रस्तुत विषय का हिस्सा नहीं है । इसका जिक्र तो मैंने यों ही कर दिया चलते-चलाते । असल बात जो मुझे बतानी है वह यह है कि नवी मुंबई में ही मेरा मौसेरा भाई भी रहता है, जिससे मिलना वहां के मेरे प्रवास की कार्यसूची में था ।

मेरा मौसेरा भाई मुझसे 10-12 साल छोटा होगा । उसके तीन बच्चे हैं जिनमें सबसे बड़ा 20-21 साल का होगा । उन बच्चों से मैं पहले कभी मिला था या नहीं मुझे याद नहीं । जब वे बहुत छोटे रहे हों तब हो सकता है उन्हें देखा हो । इतना जरूर है कि हाल के कई सालों से अपने उस भाई के परिवार से मेरा मिलना नहीं हुआ । इसलिए उसके बच्चों को पहचान सकना मेरे लिए संभव नहीं था, और न ही मुझे पहचान पाना उन बच्चों के लिए मुमकिन । दरअसल आज की हकीकत यह है कि कई लोग अपने गांव-घरों को छोड़कर शहरों में जा बसे हैं और उनमें से कुछ तो एक-दूसरे से छिटककर दूरदराज तक जा पहुंचे हैं । ऐसे में उनके परस्पर मिलने-जुलने की संभावना आज की व्यस्त जिंदगी के मद्देनजर बहुत कम हो जाती है ।

एक दिन हम लोग मौसेरे भाई और उसके परिवार से मिलने पहुंच गये । हम अंदाजन डेड़-दो घंटे उसके घर ठहरे होंगे । कुशलक्षेम के अलावा अन्य तमाम बातें इस बीच परस्पर होती रहीं । साथ में चायपानी का भी दौर चला । भाई के दो बच्चे तो हम लोगों से मिलने आ गये, किंतु बड़ा बेटा बगल के कमरे में किसी काम में व्यस्त रहा । बाद में मैं खुद ही उसके पास चला गया । बातचीत के दौरान उसने कहा, “अंकल, आप बी.एच.यू. में पढ़ाते थे न ? क्या पढ़ाते थे आप वहां ?”

अंकल ! अंकल और आंटी संबोधनों को सुनना मुझे अच्छा नहीं लगता, लेकिन भारतीय समाज में ये इतना प्रचलित हो चुके हैं कि न चाहते हुए भी सुनना ही पड़ता है । ये संबोधन अब उन व्यक्तियों के लिये प्रायः प्रयुक्त होते हैं जिनकी उम्र वक्ता से पर्याप्त अधिक हो । लेकिन जब परिवार से निकटता से जुड़े व्यक्तियों के लिए भी अंकल-आंटी के संबोधन इस्तेमाल होते हैं तो मुझे अटपटा ही नहीं लगता बल्कि अनभिव्यक्त रोष मेरे मन में उपजता है । खैर, मैंने टोकने के अंदाज में उससे कहा, “मैं तुम्हारा अंकल नहीं, ताऊ हूं ताऊ । … ताऊ, समझे ?”

मेरी बात सुनने पर उसके चेहरे पर आश्चर्य-मिश्रित जिज्ञासा के भाव उभर आए । शायद वह समझना चाहता था कि मैं उसका ताऊ कैसे हो गया । वह कदाचित् सोच रहा था कि उसके पिता तो केवल दो भाई हैं, जिनमें बड़े उत्तराखंड के अपने पैतृक घर में ही रहते हैं । यानी उसके ताऊ तो वह हैं फिर यह ताऊ कहां से आ गए ।

मैं उसकी दुविधा समझ गया । मैंने उससे कहा, “देखो तुम्हारे पिता, यानी पापा, मेरे मौसेरे भाई हैं । या यों कहो कि मेरी मां तुम्हारी दादी की बड़ी बहन थीं । उस नाते उनके और मेरे बीच छोटे-बड़े भाइयों का रिश्ता बनता है; मैं उनसे 10-12 साल बड़ा हूं । … समझ में आया ?”

मैंने महसूस किया कि दादी की बड़ी बहन की संतानों से रिश्ता जोड़ पाने में उसे परेशानी हो रही थी । मैंने स्पष्ट करने के मकसद से उससे कहा, “देखो, तुम्हारी दो मौसियां हैं, हैं न ? दोनों तुम्हारी मां से छोटी हैं, ठीक ? बताओ, उनके बच्चे जो तुमसे छोटे हैं तुम्हें, दद्दा या दाज्यू (बड़ा भाई, कुमाउंनी बोली में) कहते हैं न ? क्यों कहते हैं ? तुम्हारी मां और उसकी बहनों के बच्चों के बीच जो रिश्ता है वही मेरे और तुम्हारे पापा के बीच है । … समझ में आया ?

उसने अपना सिर हिलाकर हां का भाव व्यक्त तो कर दिया, किंतु मैं निश्चित तौर पर कह नहीं सकता कि वह वास्तव में वस्तुस्थिति को समझ ही गया होगा । यह अनुभव मेरे लिए नितांत नया नहीं था । कुछएक अन्य मौकों पर भी मुझे इसी प्रकार अनुभव हुआ है । आज के समय में कई परिवार अपने कुटुंब के अन्य परिवारों से इस हद तक कट चुके हैं कि उन परिवारों के बच्चों के लिए रिश्तों को समझ पाना कठिन होता है । सगे चाचा-मामा बुआ-मौसी तक के रिश्ते तो वे समझ लेते हैं, क्योंकि वे कभी-कभार उनके संपर्क में आ जाते हैं । किंतु दो-तीन पीढ़ी पहले या उससे भी पहले के, जैसे दादा-दादी या नाना-नानी के स्तर के, पूर्वजों से विरासत में मिले रिश्तों को वे समझ नहीं पाते । इस समय कई युवा एकल-संतान की नीति अपनाकर चल रहे हैं । मुझे लगता है कि उनकी आने वाली पीढ़ियां मामा-बुआ क्या होते हैं यह नहीं जान पाएंगे ।

बचपन में मैं अपने छोटे-से गांव में रहता था । उस काल में दूर अथवा निकट के नाते-रिश्तेदार जब गांव में आते थे तब वे प्रायः प्रत्येक परिवार से मिल लेते थे । मेरी मां या भाई-बहन मुझे समझाते थे कि फ़लां व्यक्ति तुम्हारे मामा लगते हैं, और अमुक महिला तुम्हारी बुआ, इत्यादि । शादी-ब्याह जैसे मौके पर ऐसे संबंधियों का आना सामान्य बात हुआ करती थी । परस्पर मिलना-जुलना इतना हो जाता था कि संबंधों को समझना और उनसे जुड़े संबोधनों से परिचित होना कठिन नहीं होता था । हमारे लिए यह सब इतना सहज और स्वाभाविक होता था कि जिससे कभी न मिले हों उसके साथ हमारा क्या रिश्ता होगा यह खोज लेते थे । वह समय था जब पारिवारिक रिश्तों में पर्याप्त प्रगाढ़ता होती थी । किंतु अब वह सब गायब होता जा रहा है ।

समाज में कितना परिवर्तन हो चुका है मेरे ही जीवनकाल में ! - योगेन्द्र जोशी

          मैं सपत्नीक रेलगाड़ी से यात्रा पर हूं, भोपाल से मुंबई तक । मेरी बर्थ (शायिका) के सामने की बर्थ पर बीसएक साल की एक युवती यात्रा कर रही है । हम अपने साथ लाए गए अखवार-पत्रिकाओं के साथ समय बिता रहे हैं । यों तो मोबाइल फोन लेकर हम भी चलते हैं, किंतु उसका प्रयोग कम ही करते हैं, केवल जरूरी होने पर । किंतु देख रहा हूं कि वह युवती फोन पर जुट गई है । आजकल की युवा पीढ़ी का मोबाइल प्रेम देखने लायक है । वे कभी इस दोस्त के तो कभी उस दोस्त के साथ मोबाइल से वार्तालाप में जुट जाती है । मुझे नहीं लगता कि युवक-युवतियां सदैव सार्थक बातें करते होंगे । यात्रा के दौरान समय काटने के लिए ही शायद वे मोबाइल पर व्यस्त रहते होंगे । और जब मोबाइल पर उस युवती का काफी समय निकल चुकता है तो उसे बंद करके नींद लेने लेट जाती है । यात्रा के दौरान पत्र-पत्रिकाएं पढ़कर समय विताने का शौक कम ही लोगों को होता है ऐसा मेरा अनुभव रहा है ।

          रात्रि के साड़े-सात बज चुके हैं । वह युवती अपना खाना खत्म करके पर्स में रखी शीशी से एक तरल पदार्थ निकालती है और अपने हाथों पर चुपड़ती है । शायद ऐसा करना भोजन पश्चात् हाथ-मुंह धोने का आधुनिक विकल्प है । हम भी आठ बजते-बजते अपना खाना खा लेते हैं और हाथमुंह धोकर अपनी बर्थ पर बैठ जाते हैं । थोड़ी देर बाद वह युवती अपने वर्थ पर से उठती है और मेरी ओर मुखातिब होते हुए कहती है, “अंकल, जरा मेरा पर्स देखते रहिएगा ।” उसे शायद शौचालय (टॉयलेट) जाना है ।

          “अंकल …”, अपने समाज में यह शब्द आम संबोधन हो चुका है, अपनी तुलना में उम्रदराज लोगों को संबोधित करने के लिए । खैर, उसके “देखते रहिएगा” कहने पर मैं उसके पर्स की पर नजर डालते हुए कल्पना करने लगता हूं । एक निरर्थक कल्पना, लेकिन उसके लौटने तक उस कल्पना में मग्न हो जाता हूं । कल्पना करता हूं एक आदमी उस बर्थ के पास आता है । वह उस पर्स पर नजर डालता है और उसे हौले से उठा लेता है । फिर धीरे-से वहां से चल देता है और रेलगाड़ी के उस डिब्बे के दरवाजे पर पहुंच जाता है । अपनी कल्पना में मैं स्वयं भी उसके पीछे-पीछे चल देता हूं, उस पर्स पर नजर गढ़ाए हुए, उस युवती ने पर्स को देखते रहने का अनुरोध जो किया है । रेलगाड़ी की रफ्तार धीमी पड़ती है और वह व्यक्ति उतर जाता है । मैं चिंतित् हो जाता हूं, क्योंकि वह मेरी आंखों से ओझल होने लगता है और उसके साथ ही वह पर्स भी । उस पर्स को देखते रहने का काम अब मैं नहीं कर पा रहा हूं ।

          तभी उस युवती की आवाज मेरे कानों में पड़ती है, “थैंक्यू, अंकल ।” मेरी कल्पना का तारतम्य टूट जाता है, और मैं देखता हूं कि पर्स अपने स्थान पर यथावत पड़ा है । युवती लौट आई है और अपनी बर्थ पर चादर बिछाकर निद्रामग्न होने का उपक्रम करने लगती है । – योगेन्द्र जोशी

पिछले 2-3 सालों से 2जी स्पेक्ट्रम नाम के बहुचर्चित घोटाले के मामले की अदालती कार्यवाही चल रही है । मामले का हस्र तो वही होना है जो ऐसे मामलों में सदा से होता आया है । लेकिन सीबीआई उर्फ ‘तोता’ नाम की सरकारी संस्था को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने के लिए छानबीन का नाटक करते ही रहना पड़ता है । वही इस दफा भी हो रहा होगा । मामले में बतौर सरकारी गवाह के अनिल अंबानी नाम के लब्धप्रसिद्ध कारोबारी से भी पूछताछ हुई है ।

समाचार माध्यम बताते हैं कि अदालत में अधिकांश सवालों के जवाब अंबानीजी ने “मुझे याद नहीं है” कह कर दिया । अदालत ने उनसे पूछा, “क्या आप जानते हैं कि आपकी बातें अगर झूठी सिद्ध हुईं तो सजा भी हो सकती है ?” उन्होंने हामी भरते हुए बताया कि उन्हें इस संभावना की जानकारी है । दूसरे दिन जब श्रीमती टीना (मुनीम) अंबानी की बारी गवाही के लिए आई तो उन्होंने भी मुझे कुछ याद नहीं की बात दोहराई ।

मैं समझता हूं अंबानी जी ने मन ही मन कहा होगा, “क्या-क्या हो सकता है यह माने नहीं रखता । माने तो यह रखता है कि असल में क्या होता है । होगा वह जो आज तक होता आया है, यानी कि कुछ नहीं होगा । आप पहाड़ खोदेंगे और उसमें से चुहिया निकलेंगी, और वह भी पकड़ में नहीं आएगी ।”

श्रीमान अंबानी जी ने ऐसा सोचा होगा यह मेरे अपने खयाल हैं । उनके मन में क्या रहा होगा यह तो वही बता सकते हैं । लेकिन वे क्योंकर किसी को बताएंगे ?

मैं अंबानी जी पर कोई लेख लिखने नहीं जा रहा हूं । उनका जिक्र तो मैं इसलिए कर रहा हूं कि कई लोगों को सुविधा एवं आवश्यकता के अनुसार भूल जाने का रोग होता है । जहां याद रहना घाटे का सौदा हो वहां भूल जाना, और जहां काम निकालना हो वहां याद रखना कई जनों के स्वभाव में शामिल रहता है । शायद ही कोई मनुष्य हो जो यह दावा कर सके कि उसको यह रोग जिंदगी में कभी नहीं हुआ । कभी-कभार इस रोग का दौरा पड़ना आम बात है, किंतु कुछ लोग इससे इतना ग्रस्त होते हैं कि पता चल जाता है कि मामला उतना सीधा नहीं है । मैं अपने ऐसे ही एक अनुभव का जिक्र यहां पर कर रहा हूं ।

मेरे शिक्षण संस्थान के मेरे विषय के एम.एससी. की एक प्रयोगशाला यानी लैब में दो-तीन शिक्षकों को साथ-साथ कार्य करना पड़ता था । कोई ढाई-तीन घंटे की प्रायोगिक कक्षाएं वहां चलती थीं । विश्वविद्यालयों-कालेजों में शिक्षकों का लैब की कक्षा में किंचित् विलंब से आना और छात्रों की हाजिरी दर्ज करते हुए समय से कुछ पहले ही खिसक लेना कोई असामान्य बात नहीं होती । परंतु मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ऐसे थे जो इस आदत के कुछ अधिक ही धनी थे । वे अक्सर जरूरत से ज्यादा देर से पहुंचते थे । एक बार वे तब पहुंचे जब लैब का समय लगभग खत्म होने को था । वरिष्ठ होने के नाते उनसे मैं कुछ कहता नहीं था, पर मुझे खीज जरूर होती थी । इस मौके पर एक बात कहूं ? हम भारतीय लिहाज बरतने के मामले में काफी उदार होते हैं । मैं समझता हूं कि कोई गलत-सलत कार्य करे तो टोकने के बजाय चुप्पी साध लेना हमारे ‘जीन्स’ (जैविक गुणधर्म का आधार) में निहित है । खैर, वे हांफते-हूंफते पहुंचे और बोले, “अरे, मैं तो भूल ही गया कि मेरी क्लास है ।”

मेरे पास कहने को कुछ था नहीं । क्या कहता भला ? कह ही चुका हूं कि अपने जीन्स के अनुकूल व्यवहार करना स्वाभाविक था । “अच्छा ! … छोड़िए भी, कभी-कभी अति व्यस्तता के कारण जरूरी काम भी दिमाग से उतर जाते हैं ।” मैंने औपचारिक प्रतिक्रिया पेश की ।

बात आई-गई हो गई । मैं जब कभी अपने कुछएक हमउम्र सहयोगियों के साथ उनके सान्निध्य के अनुभवों को साझा करता तो पता चलता कि ऐसा तो उनके साथ चलता ही रहता था । हम इसे जानबूझकर भूलने की बिमारी कहते थे । आधुनिक ‘समझदार’ लोग इस रोग से स्वेच्छया ग्रस्त हो जाते हैं । यह ठीक वैसा ही है जैसा कि आपराधिक बारदात में पकड़े जाने पर सफेदपोश लोगों के सीने में दर्द उठ जाता है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होने का बहाना मिल जाता है ।

मेरे मत में अधिकांश भारतीयों की मानसिकता इस दोष से ग्रस्त रहती है कि वे अपने पेशे के दायित्वों की तुलना में वैयक्तिक हितों को प्राथमिकता देते हैं । समस्या तब होती है जब वे अपने निजी कार्य उस समय निबटाने चल पड़ते हैं जब उनसे पेशे के कार्य में लगे होने की अपेक्षा की जाती है । मेरे पूर्व सहयोगी बैंक, अस्पताल अथवा अन्यत्र उस समय निकल पड़ते थे जब उन्हें कक्षा में होना चाहिए था । हम अपने दायित्वों के प्रति कितने सचेत रहते हैं यह हमारे राजनेता और प्रशासनिक कर्मियों में व्याप्त लापरवाही स्पष्ट करती है । – योगेन्द्र जोशी