हाल ही में मुझे अपने घर के दरवाजों-पल्लों की मरम्मत संबंधी छोटे-मोटे काम करवाने थे । मैंने अपनी कालोनी के आसपास ही रहने वाले एक बढ़ई से संपर्क साधा । वह सुबह-शाम घर पर आकर कार्य संपन्न करने को तैयार हो गया । तदनुसार वह रोज ही दो-एक घंटे काम कर जाता था । अपने साथ वह किसी सहायक को नहीं लाता था, अतः जहां कहीं जरूरत होती मुझे ही उसकी मदद करनी पड़ रही थी । उसके साथ कार्य करते समय मैं उससे आम चर्या की बातें भी कर लेता था ।

इसी दौरान एक दिन मैंने उससे उसके बालबच्चों के बारे में पूछ लिया । उसने बताया, “सा’ब, मेरे तीन बच्चे हैं, दो लड़कियां और सबसे छोटा एक लड़का ।”

बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछे जाने पर उसने कहा, “सा’ब, बड़ी लड़की गूंगी-बहरी है, इसलिए उसके स्कूल जाने का सवाल ही नहीं । दूसरी लड़की +2 में पढ़ रही है । तीसरा स्कूल ही नहीं जाता । क्या करें कहना नहीं मानता और दिन भर मुहल्ले के आवारा लड़कों के साथ अपना समय जाया करता है । मैंने उसे अपने साथ काम पर लगाने की कोशिश की कि कुछ सीख लेगा और अपनी रोजी-रोटी कमाने लगेगा । लेकिन वह किसी की सुनता ही नहीं ।”

बड़ी लड़की के बारे में उसने बताया कि वह कहीं खो गयी है । मेरे यह पूछने पर कि कब और कैसे गायब हुई, उसने बताया, “दो साल पहले इसी विजयादशमी के मौके पर वह मोहल्ले के लोगों के साथ डीएलडब्ल्यू परिसर में रावणदहन देखने चली गयी, जहां उन लोगों का साथ छूट गया । गूंगी बहरी वह किसी को कुछ बता ही नहीं पाई होगी ।”

अपना दुखड़ा सुनाते-सुनाते उसने आगे कहा, “उसको खोजने में मेरे लाख-एक का खर्चा भी हो गया, लेकिन वह मिली नहीं । इधर किसी ने बताया है कि भदोही में एक ज्योतिषी जी रहते हैं, जो खोए हुए आदमी के बारे में सटीक बता देते हैं । कल उनके पास भी जाने की सोच रहा हूं । शायद लड़की का कुछ पता चले ।”

और दूसरे दिन वह भदोही भी हो आया । अगली सुबह मेरे काम पर आने पर उसने कहा, “सा’ब, ज्योतिषी जी ने बताया है कि मेरी लड़की चुनार में किसी भले मानुष के घर पर सकुशल रह रही है । अब एक चक्कर वहां का भी लगाना है ।”

फिर दोएक रोज के बाद वह चुनार भी हो आया । अगले दिन उसने चुनार तक हो आने की बात बताई और कहा कि वहां भी लड़की का कुछ पता नहीं चला । मैंने उससे जानना चाहा, “क्या आपने कभी पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई ? उन्होंने मदद का आश्वासन दिया क्या ?

उसने कहा, “पुलिस कहां हम गरीबों की सुनती है, सा’ब । कह दिया जाकर खुद ही खोजो । हम रोज कमाकर पेट पालने वाले लोग हैं । काम छोड़ कहां-कहां जाएं और कितने-कितने दिन के लिए जाएं ?”

उस दिन उसके चले जाने के बाद मैं सोचने लगा कि भारत वाकई अजीब देश है । यहां पुलिस आम लोगों की मदद के लिए नहीं होती । अगर रसूखदार आदमी का कुत्ता भी गायब हो जाए, तो पूरा पुलिस बल उसे खोजने निकल पड़ता है । किंतु किसी साधारण आदमी के घर का सदस्य खो जाए, तब वह भुक्तभोगी को दुत्कार कर भगा देती है । इस जमाने में तो संचार-प्रसार के सक्षम माध्यम मौजूद हैं, और किसी की भी तस्वीर का प्रसारण करके गुमशुदा व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है । फिर भी पुलिस की उदासीनता और अक्षमता के चलते आम जन को कोई मदद नहीं मिल पाती है ।

उस रात मेरे दिलो-दिमाग में उस लड़की को लेकर एक सवाल रह-रहकर उठने लगा । न जाने क्या हाल होंगे उस लड़की के । वह जिंदा तो होगी ही, क्योंकि मौत आसानी से आती नहीं । आदमी में जिजीविषा की भावना बहुत प्रबल होती है । वह मांग-मूंगकर भी पेट भर लेता है और जिंदा रह पाता है । लेकिन एक लड़की होने के नाते वह बेहद असुरक्षित अवश्य होगी । मुझे लगने लगा कि अब तक उसके साथ कोई न कोई जरूर बलात्कार कर चुका होगा । हो सकता है किसी पुलिस वाले ने ही उसे अपना शिकार बनाया हो । भरोसा नहीं पुलिस का ! आखिर इस संसार में मानव भेड़ियों की कोई कमी थोड़े ही है । और …, और वह गर्भवती भी हो चुकी होगी । अब तो दो साल बीत चुके हैं । क्या पता इस बीच उसने किसी मासूम को जन्म भी दे डाला हो, जिसे गोदी में लेकर वह दर-दर ठोकर खा रही हो । भला उसे किसने शरण दी होगी, किसने उसकी मदद की होगी ? ऐसी तमाम संंभावनाएं मेरे विचारों में छाने लगीं ।

… जिंदगी की वास्तविकता कभी-कभी बड़ी डरावनी लगती है मुझे । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी -
भदोही’ वाराणसी के नजदीक एक छोटी-सी नगरी एवं जिला मुख्यालय है जो कालीन व्यवसाय के लिए विख्यात है । ‘चुनार’ वाराणसी से सटे मिर्जापुर जिले का एक कस्बा है जो सस्ते प्रकार के चाइना क्ले के बने कप-प्लेटों तथा सजावटी सामानों के लिए जाना जाता है । वहां एक किला भी है ।

आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई ।
इस नगरी की रीत निराली शासन को नहि देत दिखाई ।।

प्रशंसा के ये शब्द मैंने अपनी विश्वप्रसिद्ध नगरी वाराणसी (वाराणसी) के लिए लिखे हैं । वाराणसी कुछ लोगों के लिए तीर्थस्थली है तो औरों के लिए यह दर्शनीय पर्यटन स्थल है । जहां हिंदू धर्मावलंबी गंगास्नान एवं भोलेबाबा विश्वनाथ के दर्शन करके पुण्यलाभ पाते हैं, वहीं बौद्ध मतावलंबी भगवान् बुद्ध की उपदेशस्थली सारनाथ के दर्शन पाकर स्वयं को कृतार्थ मानते हैं । पर्यटकों के लिए सारनाथ के श्रीलंकाई, चीनी, तिब्बती एवं जापानी आदि मंदिर महत्त्व रखते हैं । उनके लिए उत्तरवाहिनी गंगा के पश्चिमी किनारे के 4-5 किलोमीटर तक विस्तार पाये परस्पर जुड़े घाटों का दृश्य भी आकर्षण का केंद्र रहता है । प्रातःकाल उगते सूर्य की किरणों से नहाए इन घाटों की झलक पाना उनके लिए सौभाग्य की बात होती है । रामनगर का किला, काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विशाल परिसर, और भारत सरकार का रेल इंजन कारखाना भी दर्शनीय स्थल माने जाते हैं । पूरे नगर में यत्रतत्र स्थापित छोटे-बड़े मंदिरों का आकर्षण अपनी जगह पर है ।

जिसने वाराणसी न देखा हो वह जीवन में एक बार इस नगरी का भी दर्शन कर ले ऐसा निवेदन मैं उनसे अवश्य करना चाहूंगा । मेरे निवेदन के कारण सर्वथा भिन्न हैं । मैं तो उनसे कहूंगा कि 18-20 लाख की आबादी वाला पूरी तरह दुर्व्यवस्थित नगर कैसा होता है यह बात इस नगरी के दर्शन से ही समझ में आता है । मेरा मानना है कि मनुष्य को केवल सौन्दर्य के ही दर्शन नहीं करना चाहिए, उसे जीवन की कटु कुरूपता का भी साक्षात्कार करना चाहिए । और उस कार्य के लिए वाराणसी से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता । जितने भी शहर मैंने आज तक देखे हैं उनमें सर्वाधिक दुर्व्यवस्थित मैंने वाराणसी को ही पाया ।

उक्त बातें मैं वाराणसी के बारे में विशद चर्चा के उद्येश्य से नहीं कर रहा हूं । मैं तो ये बातें यहां की दुर्व्यवस्था और उसके कारण-स्वरूप प्रशासनिक भ्रष्टाचार के अपने अनुभव को समझाने के लिए बतौर पृष्ठभूमि के पेश कर रहा हूं । वाकया 5-7 साल पहले का होगा जैसा मुझे याद आता है । उस समय मेरे घर के पास से गुजरने वाले मुख्य मार्ग पर सीवर-पाइप डालने का कार्य चल रहा था । सड़क के एक तरफ गहरे खुदाई करके 6-8 फिट व्यास की सीमेंट-कांक्रीट की पाइपें जमीन में डाली जा रही थीं । बनारस शहर की अति-उन्मुक्त जीवनशैली के अनुकूल सड़क पर चलने वाले काम को ‘फ्री-स्टाइल’ तरीके से अंजाम दिया जाता है । खुदाई में निकली मिट्टी के ढेर को गढ़े के किसी भी तरफ बेतरतीब तरीके से जमा कर दिया जाता है । ठेकेदार और सरकारी अधिकारियों को राहगीर और वाहन कैसे उस मार्ग से गुजरेंगे इस बात की चिंता नहीं रहती है । अधिकारी तो शायद ही कभी कार्यस्थल पर आते होंगे । सरकारी परंपरा के अनुरूप सब कार्य कागज पर ठीक से चल रहा होता है । जमीनी हकीकत से उन्हें कोई मतलब नहीं रहता । यह अपने देश की शासकीय खूबी है ।

हां तो मैं कह रहा था कि सड़क के एक ओर गहरे खोदकर पाइपें डाली जा रही थीं । इस दौरान टहलते हुए एक दिन मैं उस सड़क पर जा रहा था । कुछ दूर पहुंचने पर देखता हूं कि सड़क की मरम्मत का कार्य चल रहा था । दर असल बीती बरसात के समय सड़क उखड़ चुकी थी और उसमें जगह-जगह गड्ढे बन चुके थे । इसलिए रोड़ी-तारकोल का मिश्रण सड़क पर बिछाया जा रहा था । मैं देखकर आ रहा था कि कुछ दूर पर पाइपें डाली जा रही थीं और जान रहा था कि उस स्थान पर भी दो-चार दिन में खुदाई होगी । मेरे दिमाग में सवाल घूमने लगा कि तब इस मरम्मत कार्य का तुक भला क्या है । मैंने रुककर एक श्रमिक से जिज्ञासावश पूछा, “क्यों भई, कोई अधिकारी भी है यहां जो इस काम को करवा रहा हो ?”

दूर खड़े एक सज्जन की ओर इशारा करते हुए वह बोला, “वो देखिए, हमारे जेई (जूनियर इंजीनियर) साहब वहां खड़े हैं ।”

आगे बढ़कर मैं उस सज्जन के पास पहुंचा और बोला, “भाई साहब, आप मरम्मत का कार्य यहां पर करवा रहे हैं । क्या आप देख नहीं रहे हैं कि पीछे से खुदाई करके पाइप डालने का कार्य भी चल रहा है । ऐसे में इस मरम्मत का क्या औचित्य है भला ?”

“आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन … ।” ऐसा कहते हुए एक-दो क्षण को रुक गये ।

अपनी बात पूरी करने से पहले उन्होंने मेरा परिचय जानना चाहा । मैंने अपने बारे में समुचित जानकारी देते हुए फिर पूछा, “लेकिन आप ये काम इस समय करवा क्यों रहे हैं ?”

उनका जवाब था, “ऐसे ही आर्डर मिले हैं । अगला महीना मार्च का है न ? इसलिए सड़क के लिए मिले बजट का पैसा खर्च करना है ।”

मैं उनके उत्तर से अवाक् था । उनसे फिर पूछा “परंतु आपने अपने उच्चाधिकारियों को बताया नहीं कि इस समय पाइप डालने का काम भी चल रहा है ।”

उनका उत्तर निराशा पैदा करने वाला था । मेरे परिचय से वे आश्वस्त थे कि मैं कोई ‘खतरनाक’ व्यक्ति नहीं हूं । अतः मुझ पर भरोसा करते हुए वे बोले, “सा’ब, मेरी कुछ भी सलाह देने की हिम्मत कहां है ? आप जानते ही होंगे कि इस प्रकार के ठेकों के कार्य माफिया तंत्र को मिलते हैं । उनसे पंगा लेकर अपने और अपने परिवार की जान जोखिम में डालने की हिम्मत मुझ जैसे अदने कर्मचारी की कैसे हो सकती है । कुछ कहने का मतलब उनके गुस्से का शिकार होना ।”

मुझे लगा कि वह व्यक्ति झूठ नहीं बोल रहा था । सरकारी ठेके आपराधिक छबि के लोगों को मिलते हैं यह तो समाचारपत्रों में मैं पढ़ता ही आ रहा था । अतः मुझे लगा कि वह जेई सच ही कह रहा होगा ।

मेरे पास अधिक कुछ कहने को नहीं था । चुपचाप आगे बढ़ गया । - योगेन्द्र जोशी


वाकया पांच-छः हफ्तों पहले का है । गर्मियों के दिन, दोपहर का वक्त और ऊपर से तेज धूप । मेरे मकान के गेट पर लगी घंटी घनघनाती है । मैं बाहर आता हूं । गेट पर कूरियर से आई डाक देने एक युवक अपनी साइकिल के साथ खड़ा है । मैं गेट खोलता हूं और वह मकान के अहाते में दाखिल होता है, जहां पर छांव है । मैं उसके द्वारा पेश कागज पर डाक प्राप्ति के संकेत स्वरूप दस्तखत करता हूं, और उससे डाक ले लेता हूं । वह लौटने को गेट की ओर मुड़ने लगता है । मैं उसे रोकते हुए पूछता हूं, “आप धूप में आए हैं, प्यासे होंगे । इस ग्रीष्मकालीन धूप में काफी पानी पीकर चलना चाहिए । पानी पिलाऊं आपको क्या ?”

“अगर एक गिलास पानी पिला सकें तो मेहरबानी होगी ।” वह व्यक्ति पानी पीने की इच्छा जाहिर करते हुए जवाब देता है ।

मैं उस आदमी को दो मिनट रुकने की बात कहते हुए घर के अंदर दाखिल होता हूं । घर में मेरे अतिरिक्त एकमात्र अन्य सदस्य मेरी पत्नी है, बस । मैं पत्नी से एक गिलास शरबत तैयार करने को कहता हूं । फिर एक ट्रे में दो टुकड़े मीठे के साथ शरबत और ठंडे पानी के गिलासों के साथ बाहर आता हूं और बाहर पड़े एक स्टूल पर रखते हुए उस व्यक्ति को पेश करता हूं ।

“अरे…, आप तो …।” उसके मुख से दोएक शब्द निकलते हैं । उसके चेहरे पर किंचित् विस्मय के साथ संतोष के भाव झलकते हैं ।

“कोई बात नहीं, … आप इन्हें लीजिए ।” मैं उसे आश्वस्त करता हूं ।

वह पेश की गयी सामग्री खा-पीकर धन्यवाद देता है, और उसके बाद कहता है, “आप तो बुलाकर पानी पिला रहे हैं । भला कौन करता है ऐसा ! गेट पर खड़े होकर कोई प्यासा एक गिलास पानी मांगे तो उसे देने से भी कतराते हैं लोग । आपकी तरह पानी ही नहीं शरबत भी पिलाए कोई ऐसा शायद ही कहीं देखने को मिले ।”

“नहीं, ऐसा नहीं है । दुनिया में सभी प्रकार के लोग होते हैं । यह तो संयोग की बात है कि कब किस प्रकार के आदमी से भेंट हो जाए ।” मैं प्रतिक्रिया व्यक्त करता हूं । फिर पूछता हूं “आपको तो अभी और जगह भी जाना होगा । देर हो रही होगी ।”

वह आभार व्यक्त करते हुए नमस्कार करता है और गेट के बाहर निकल जाता है । पीछे से मैं भी गेट पर आता हूं और उसे विदा करते हुए गेट बंद कर देता हूं । बात आई-गई हो गयी ।

संयोग से करीब दो-चार दिन पहले वह व्यक्ति फिर एक डाक लेकर मेरे पास पहुंचा । मुझे अक्सर कूरियर से डाक मिलती रहती है, कभी कोई पुस्तक तो कभी किसी स्वयंसेवी संस्था के कागज पत्र, या परिचितों के द्वारा भेजी कोई सामग्री, आदि । आम तौर पर हर बार किसी नये कूरियर-वाहक से साक्षात्कार होता है । लेकिन इस बार दुबारा एक व्यक्ति मेरे पास पहुंचा । गर्मी यथावत् चल रही थी, और उस दिन भी अच्छी-खासी धूप थी । पिछली बार की तरह इस बार भी मैंने शरबत और पानी के साथ उसकी आवभगत की । प्रतिक्रिया में इस बार वह पूछने लगा, “मुझे याद है कि पिछली बार भी आपने ठंडा खिलाया-पिलाया था । लगता है कि आपके पास आने पर कुछ भी खाने-पीने को मिल जाएगा । क्या आप अक्सर ऐसा करते हैं ?”

“कुछ ऐसा ही समझ लीजिए ।” मैंने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया ।

“मैं समझता हूं आम तौर पर ऐसा शायद ही कोई करता है । लेकिन लगता है कि आप कुछ हटकर सोचते हैं । जान सकता हूं कि ऐसा क्यों ?”

मैं हंस देता हूं, “अच्छा लगता है इसलिए ।” मैं क्षण भर के लिए चुप रहता हूं, फिर अपने विचार समझाने के लिए आगे कहता हूं, “गेट पर कोई पहुंचा हो तो उससे अदब-से पेश आना और चाय-पानी के लिए पूछ लेना अच्छा लगता है, खास तौर पर इसलिए कि ऐसा करना मेरी हैसियत में है । गेट पर आया हर व्यक्ति चोर-उचक्का-बदमाश हो ऐसा मानकर नहीं चला जा सकता है । अभी तक मुझे कोई बुरा अनुभव नहीं हुआ है । किसी जरूरतमंद की छोटीमोटी मदद करने पर सुकून का अनुभव होता है । … और अधिक अहम बात तो यह है कि अब जिंदगी में बहुत-कुछ पाने को नहीं है, बहुत कुछ छोड़कर जाने का वक्त आ रहा है । क्या पता ऐसा करने से अपनी ‘ऊपर’ की यात्रा कुछ हद तक आसान रहे ।”

वह मेरा मतलब समझ जाता है । कहने लगता है, “चाहता हूं कि कभी इतना समय मिले कि साथ बैठकर आपसे अधिक बातें सुन सकूं । अभी तो मुझे अपना काम संपन्न करने निकलना ही है ।”

धन्यवाद ज्ञापन और समुचित अभिवादन करते हुए वह गेट के बाहर निकलता है और साइकिल पर चढ़कर आगे बढ़ जाता है । पीछे से मैं गेट बंद करता हूं, और संतोष भाव के साथ घर के अंदर दाखिल हो जाता हूं । – योगेन्द्र जोशी

आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस (World no Tobacco Day) – 31 मई – है । आम जनों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस दिन किसी भी रूप में तंबाकू का सेवन न करने का संकल्प लें । कोई चार दशक पहले मैं भी सिगरेट पीता था, बहुत नहीं फिर भी करीब एक डिब्बी प्रतिदिन, 10 बत्तियों वाली । तब किसी दिन एक झटके के साथ मैंने उसे छोड़ दिया था । उस घटना के बारे में मैंने इसी ब्लाग में अन्यत्र (20 अप्रैल 2009) लिखा है । धूम्रपान छोड़ना सरल नहीं होता है, लेकिन इतना कठिन भी नहीं होता कि ऐसा करने का इरादा ही न बने । इस अवसर पर मुझे दो घटनाओं का स्मरण हो आता है ।

पहली घटना इंग्लैंड की है करीब 25-26 साल पहले की । मैं तब वहां एक शिक्षा-संस्थान में उच्चानुशीलन के लिए गया हुआ था । जिस प्रोफेसर के साथ मैं अनुसंधान-कार्य में संलग्न था उसकी पत्नी काफी सिगरेट पीती थी, वह शायद चेनस्मोकर थी । वह स्वयं सिगार-सिगरेट का शौकीन नहीं था । (यूरोप में महिलाओं में सिगरेट एवं पुरुषों में सिगार लोकप्रिय है ।) उसने मेरे समक्ष अपनी पत्नी की इस आदत का जिक्र किया था ।

एक दिन मैं प्रोफेसर के घर पर भोजन पर आमंत्रित था । भोजनोपरांत उसकी पत्नी ने सिगरेट सुलगाकर पीना आरंभ किया, तो मुझे सिगरेट पर बहस छेड़ने का मौका मिल गया । मैंने जब उससे जानना चाहा कि वह सिगरेट क्यों पीती है तो उसका सीधा और सपाट उत्तर था कि उसे अच्छा लगता है । यों मेरा प्रश्न बेमानी ही था क्योंकि सिगरेट पीने वाला हर व्यक्ति उसका लुत्फ उठाने के लिए ही ऐसा करता है । लेकिन इस बाबत बात शुरू करने के लिए कुछ तो पूछना ही था । सिगरेट पर बहस छिड़ गयी तो सभी ने अपने-अपने मत किए । प्रोफेसर और मैंने उसे यह समझाने की कोशिश की कि सिगरेट स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है । मैंने कहना चाहा कि सिगरेट तो कैंसर रोग तक पैदा कर सकती है । कम से कम इसे ध्यान में रखते हुए तो उसे सिगरेट छोड़ ही देनी चाहिए ।

सिद्धांततः वह हमसे सहमत थी । लेकिन उसने मुझसे पूछा, “क्या सिगरेट ही कैंसर जैसे रोग पैदा करती है? क्या रोजमर्रा की जिंदगी में तमाम ऐसी बातों का सामना नहीं करना पड़ता है जो आपके शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं? क्या सड़क पर वाहन चलाने पर दुर्घटना नहीं घट सकती है? तो क्या कोई वाहन चलाना बंद कर दे? इस प्रकार के अनेकों प्रश्न मेरे समक्ष रखते हुढ उसने इस बात पर जोर डाला कि निःसंदेह अकाल मृत्यु के संभव कारणों में से एक सिगरेट भी है । किंतु सवाल यह था कि सिगरेट का अपना योगदान कितना होगा, आधा फीसदी, एक फीसदी? यों सुरक्षित अनुभव करने के लिए एक-एक करके अनेकों चीजें छोड़नी पड़ जाएंगी । ऐसे में तो जिंदगी ही बेमजा हो जाए । नीरस जीवन जीने से अच्छा है कि मौत के पास पहुंच लिया जाए ।”

मैंने अनुभव किया कि जिंदगी के प्रति हर व्यक्ति का अपना दर्शन होता है । बिना मजे के जिंदगी बिताने का कोई मतलब नहीं । मजे के लिए कुछ हद तक जोखिम उठाना ही पड़ता है । सवालों का उस महिला को स्वीकार्य उत्तर प्रस्तुत कर पाना उस समय मेरे लिए संभव नहीं हो सका ।

कुछ इसी प्रकार का दूसरा अनुभव मुझे अपने ही नगर वाराणसी में हुआ था । वह घटना भी लगभग तभी की है, शायद बीसएक वर्ष पहले की । मेरे एक रिश्तेदार एवं मित्र मेरे विश्वविद्यालय के ‘रेडियोथेरपी’ विभाग के वरिष्ठतम अध्यापक-चिकित्सक थे । बता दूं कि उक्त विभाग में कैंसर-पीड़ित रोगियों की चिकित्सा होती है । ‘नाभिकीय विकिरण’ यानी ‘न्यूक्लियर रेडिएशन’ से इलाज की व्यवस्था भी वहां थी, जिसे आम बोलचाल में ‘सेंकना’ कहा जाता है । यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि एक चिकित्सक के नाते वे कैंसर का निदान और उपचार करते थे । उम्र में वे मुझसे बारह-चौदह वर्ष बड़े थे । उनसे मेरी मुलाकातें यदाकदा होती रहती थीं, लेकिन किसी भी मुलाकात में मैंने उन्हें सिगरेट पीते नहीं देखा था । वे सिगरेट भी पीते हैं यह बात मेरी जानकारी में नहीं थी, और न ही कभी उनके सिगरेट पीने की संभावना का विचार मेरे मन में आया था ।

एक दिन दोपहर के आसपास कार्यवशात् मैं उनसे मिलने रेडियोथेरपी विभाग पहुंचा । रोगीगण तब तक बहिरंग विभाग छोड़ चुके थे और वे अंदर के अन्य कमरे में आराम करने जा चुके थे । बाहर एक कर्मचारी से मैंने उनसे मिलने की बात कही तो वह अंदर संदेश दे आया । प्रत्युत्तर में डाक्टर साहब ने मुझे कमरे ही बुलवा लिया । अंदर पहुंचने पर मैंने देखा कि वे सिगरेट के कस ले रहे हैं । मेरे लिए यह अप्रत्याशित दृश्य था । सामान्य शिष्टाचार प्रदर्शन के बाद मैंने उनसे पूछ डाला, “आप सिगरेट भी पीते हैं? मैंने पहले कभी सिगरेट पीते नहीं देखा आपको, और न ही किसी के मुख से इस बारे में सुना ।”

मेरी बात पर वे मुस्कुरा दिए और बोले, “अकेले में पीता हूं । बहुत कम लोगों को इस बारे में जानकारी होगी ।”

“लेकिन आप तो अपने मरीजों को सिगरेट छोड़ने की सलाह देते होंगे? और खुद सिगरेट पीते हैं?” मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा ।

वे हंसते हुए बोले, “इसीलिए तो छिपकर पीता हूं । खुद सिगरेट पियूं और दूसरों को न पीने की सलाह दूं, कुछ अजीब नहीं लगता है?”

“इसीलिए तो मैं भी चकित हूं । डाक्टर होने के बावजूद आप सिगरेट पीते हैं यह मेरी समझ से परे है । जानते हैं कि पीना नहीं चाहिए, फिर भी पीते हैं । ऐसा क्यों?”

“अरे यार जोशीजी, आखिर सिगरेट अकेले तो कैंसर का कारण नहीं है । सिगरेट पीने वाला भी बचा रहता है और न पीने वाला भी कैंसर का रोगी हो जाता है । वास्तव में अनेकों कारक हैं रोगों के पीछे । कोई नहीं जानता किसका कितना योगदान है । किस-किस चीज से बचा जाए? मरीजों को सलाह देना पेशे की एक मजबूरी है, और व्यक्तिगत स्तर पर जिंदगी का अपने तरीके से मजा लेना दूसरी मजबूरी है । इसलिए देखा जाएगा ।”

मैंने उनकी बात सुनी और टिप्पणी किए बिना वार्तालाप का विषय बदल दिया ।

दुर्योग देखिए कि इस घटना के करीब दसएक साल बाद वे स्वयं कैंसरयुक्त अर्बुद (ट्यूमर) के रोगी हो गये । समुचित चिकित्सा की गयी, लेकिन वे मृत्यु से बच नहीं सके । – योगेन्द्र जोशी

 

वाकया पिछले सप्ताह का है । मैं अपने नजदीकी रिश्तेदार के परिवार में आयोजित कन्या-विवाह में सम्मिलित होने हल्द्वानी पहुंचा । हल्द्वानी देश के अपेक्षया छोटे राज्य उत्तराखंड का व्यापारिक महत्त्व का शहर है । उत्तराखंड में बिजली व्यवस्था पहले बेहतर हुआ करती थी, परंतु अब स्थिति पहले जैसी अच्छी नहीं है । हर दिन एक-दो घंटे की बिजली कटौती होती ही है, जो अधिक नहीं खलती है । चूंकि उक्त वैवाहिक कार्यक्रम की व्यवस्था रिश्तेदार के घर से कुछ दूर तदुद्येश्य बने स्थल पर की गयी थी और घर पर मुझ सरीखे चार-छः मेहमानों को ही ठहरना था, अतः बिजली जनरेटर जैसी व्यवस्था नहीं की गयी थी । यह उम्मीद की गयी थी दो-एक घंटे की कटौती हो भी जाए तो इंवर्टर से ही काम चल जाएगा । आजकल तो यह आम बात हो चुकी है कि अधिकतर मेहमान शादी-व्याह के अवसर पर उपस्थित होने के लिए मुश्किल से समय निकाल पाते हैं । बारात के चंद घंटे पहले मौजूदगी दर्ज करना और उसके बाद यथाशीघ्र लौट जाना आम चलन बन चुके हैं । इस तथ्य के मद्देनजर मेहमानों की दो-तीन दिनों की आवभगत की विशेष व्यवस्था की जरूरत अब कम ही रह गयी है । मतलब यह है कि उस घर पर जनरेटर का इंतजाम नहीं किया गया था ।

संयोग कभी भी पहले से इत्तिला देकर नहीं आते हैं । उक्त अवसर पर कार्यक्रम के ठीक पहले दिन रात्रि प्रथम प्रहर दुर्योग से बिजली चली गयी । पता चला कि ट्रांसफॉर्मर पर घटित हुयी गंभीर गड़बड़ी के कारण पूरा मोहल्ला अंधकार में डूब गया । बिजली कर्मचारियों ने विवशता दिखाई कि वे उस गड़बड़ी को दूसरे दिन पूर्वाह्न प्रथम प्रहर से पहले ठीक नहीं कर सकेंगे । खैर किसी तरह रात बीती और तत्पश्चात् प्रातःकाल बिजली आपूर्ति की बहाली की प्रतीक्षा होने लगी । मरम्मत के लिए कर्मचारी पहुंचे और कार्य होने लगा । लेकिन यह क्या हुआ ! दुर्घटना घटी और काम पर लगा लाइनमैन बिजली खंभे की चोटी से धड़ाम से नीचे गिर पड़ा । उसे बिजली का झटका लगा था और गिरने पर अविलंब उसकी मौत हो गयी । मरम्मत का काम रुक गया । कर्मचारी के शव की पोस्टमॉर्टम आदि की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद शवदाह किया गया । सभी संबंधित कर्मचारी शाम तक उसी अफरातफरी में लगे रहे । अस्तु, सायंकाल तक फिर से मरम्मत-कार्य आरंभ हुआ और देर रात तक बिजली आपूर्ति बहाल हो गयी ।

यह घटना कोई नयी नहीं हैं । इस प्रकार की दुर्घटनाएं आये दिन अपने देश में होती रहती हैं । जब कभी ऐसी दुर्घटना की बातें मुझे पढ़ने-सुनने को मिलती हैं तो मेरा मन बेचैन हो उठता है । उपर्युक्त घटना से मैं कुछ हद तक अवश्य प्रभावित हुआ था, आखिर बिजली न मिल पाने का कष्ट तो मुझे भी हुआ । फिर भी वह सब मुझे सह्य लगता है । किंतु जो बात मुझे अत्यंत विचलित कर डालती है वह यह सवाल है कि ऐसी घटनाएं होती क्यों हैं ? मेरे जेहन में उठने वाला सवाल यह है कि अपने को विकसित देशों की कतार में खड़ा करने और विश्व की महाशक्तियों में स्थान पाने का ख्वाब देखने वाले देश में ऐसी दुर्घटनाएं आये दिन क्यों होती हैं ? चंद्रमा पर चंद्रयान उतारने में सफल और कभी अपने पैर चंद्रभूमि पर रखने का ख्वाहिशमंद देश इस धरती पर रोजमर्रा की जिंदगी में क्यों बुरी तरह असफल है ? क्यों नहीं एक कुशल व्यवस्था अपना सके हैं देशवासी ?

दशकों के अपने अनुभव के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भारतीय समाज विचारशून्य, कर्तव्यों के प्रति लापरवाह, डंडाधारी सामने न हो तो कानूनों का उल्लंघन करने वाला, संवेदनाहीन, तथा निहायत स्वार्थी है । मेरा ऐसा कहना प्रायः सभी को बुरा लगेगा, और वे यहां तक कह बैठेंगे कि ऐसे व्यक्ति को देश से बाहर कर देना चाहिए । लेकिन यह कोई नहीं सोचेगा कि संत कबीर की इस उक्ति
“निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय ।
बिन साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाव ॥”
का महत्त्व क्या है ? किसी में भी यह धैर्य नहीं होगा कि तनिक शांत होकर विचार करे कि मेरी बातों में कितनी सच्चाई है । मैं संदेह का लाभ (अंग्रेजी में बेनेफिट ऑफ डाउट) देना बुद्धिमत्ता नहीं समझता । हम कह देते हैं कि अधिसंख्य भारतीयों में ये दोष नहीं होते । किसी के दोष को देखने का मौका कभी न आया हो तो यह निष्कर्ष मत निकालिए कि उसमें ऐसे दोष नहीं हैं । हम आम तौर पर सरकारी कर्मचारियों में ही इस प्रकार की कमियां देखते हैं, क्योंकि उनकी कार्यप्रणाली का सामना हमें रोजमर्रा की जिंदगी में करना पड़ता है । तब हम कह बैठते हैं कि वे काम नहीं करते, लापरवाही बरतते हैं, टालमटोल की नीति अपनाते हैं, इत्यादि-इत्यादि । परंतु ये अवगुण अधिक व्यापक हैं ।

अपनी उक्त धारणा के कारणों की चर्चा करने से पूर्व मैं उपरिकथित घटना संबंधी लापरवाही दो-चार शब्दों में बता दूं । जब लाइनमैन मरम्मत का कार्य कर रहा था तो बिजली सबस्टेशन से वहां की आपूर्ति क्या बंद नहीं की जानी चाहिए थी ? मोबाइल फोनों के इस जमाने में संपर्क साधकर समुचित कदम उठाने की बात तो संबंधित पक्ष परस्पर कह ही सकते थे । ऐसा क्यों नहीं हुआ ? अखबारों में इस प्रकार की खबरें आए दिन छपती रहती हैं । कोई भी सबक क्यों नहीं सीखता ? संभव है कि बिजली के झटके से दुर्घटना न घटी हो, बल्कि किसी अन्य कारण से विद्युत्कर्मी का संतुलन बिगड़ गया हो और वह गिर गया हो । लेकिन तब भी सवाल यह उठता है कि ऐसे मौकों पर सुरक्षा के समुचित कदम क्यों नहीं उठाये जाते हैं ? पूरे महकमे में एक भी व्यक्ति क्यों नहीं ऐसा होता है जो इस प्रकार के सवालों के प्रति अन्यों को जागरूक करे ? अधिकारी क्योंकर ऐसी वारदातों के प्रति उदासीन बने रहते हैं ? किसी प्रकार गाड़ी चल रही है क्या इसी से उन्हें संतोष कर लेना चाहिए ? क्या कार्य निष्पादन की विधि की गुणवत्ता का कोई महत्त्व नहीं ?

मेरा यह कथन कि भारतीय समाज विचारशून्य, कर्तव्यों के प्रति लापरवाह, इत्यादि है निराधार नहीं है । तमाम ऐसी खबरें मीडिया में छपती है जो बताती हैं कि सड़क पर मैनहोल खुले हों तो हफ्तों खुले ही रहते हैं । सड़क पर गड्ढा खोदा गया हो तो उसे चारों ओर से घेरा नहीं जाता है, और कार्य समाप्ति पर उसे ठीक से पाटा नहीं जाता है । वाहन चालक जहां मर्जी वहां वाहन खड़ा कर देते हैं; दूसरों की असुविधा से उन्हें कोई सरोकार नहीं । मैं अपना माथा पकड़कर बैठ जाता हूं जब सुनता हूं कि सड़क पर खड़े वाहन से कार-बाइक टकरा गये । या सुनता हूं कि लोहे की सरियों से लदे ट्रॉली की सरियों से किसी का शरीर छिद गया । बारातों के आवागमन में पूरी सड़क घेरकर नाचना लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है । विवाह के अवसर पर जश्न के तौर पर लोग बंदूक से गोली चलाते हैं, भले ही उससे किसी की मौत हो जाए । इस प्रकार की एक नहीं अनेक घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं । लोगों की मति कहां चली जाती है ऐसे मौकों पर ?

लोगों की कर्तव्यपरायणता इसी से आंकी जा सकती है कि आये दिन सड़कें धंसती हैं, निर्माणाधीन भवन ध्वस्त होते हैं, जमीन के अंदर की पानी की पाइपें फट जाती हैं । बोर-वेल के गहरे गड्ढों में बच्चे गिर पड़ते हैं । भवनों-गोदामों में आग लग जाती है । सरकारी गोदामों में अनाज सड़ने लगता है । अस्पतालों में मरीजों को उल्टी-सीधी दवाएं खिला दी जाती हैं, और आवारा कुत्ते नवजात शिशुओं को उठा ले जाते हैंरेलगाड़ियां पटरी से उतर जाती हैं, या आपस में भिड़ जाती हैं । भला क्या-क्या गिनाया जाए ? इन सब मौकों पर किसी के चेहरे पर शर्मोहया तथा आत्मग्लानि के भाव देखने को नहीं मिलते हैं । घटनाओं के प्रति कोई व्यक्ति जिम्मेदार नहीं पाया जाता है । भगवान् की यही मर्जी थी की भावना के साथ देश की गाड़ी यथावत् चलती रहती है, और लोग विकसित राष्ट्र कहलाने का सपना देखने में मशगूल हो जाते हैं ।

मुझे यही लगता है कि इस देश के नागरिक कभी न सुधरने का संकल्प लिए बैठे हैं, अन्यथा विशुद्ध लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाएं कभी की बंद हो चुकी होतीं । निजी संस्थाओं में डंडा चलने या खुला दरवाजा दिखा दिये जाने का भय रहता है, अतः वहां के कर्मचारी कार्य करते हैं । लेकिन सरकारी कर्मचारी ? कोई परवाह नहीं, कोई कर्तव्यनिष्ठा नहीं, कोई संवेदनशीलता नहीं, सामुदायिक हितों से सरोकार नहीं । यदि कर्तव्यनिष्ठा व्यापक स्तर पर होती तो इस देश में इतना भ्रष्टाचार न होता, पुलिस वालों से डर न लगता, सरकारी शिक्षा की दुर्दशा न होती, न्याय पाने में समय न लगता, राजनीति में जातीयता या धार्मिकता माने न रखते, दबंगई से काम निकालने की बातें होतीं, मिलावटी खाद्य सामग्री न बिकती, नकली दूध-घी का कारोबार न चल रहा होता, और लोगों को कानून का भय रहता । पर यह सब बखूबी हो रहा है, क्योंकि प्रशासन लापरवाही बरतता है ।

कुल मिलाकर यही कहा जाना चाहिए कि देशवासी न सुधरने का संकल्प लिए बैठे हैं । इस कथन के लिए क्षमाप्रार्थी हूं । – योगेन्द्र जोशी

(लगे हाथ एक जानकारी देता चलूं कि बिजली के उच्च तनाव या वोल्टेज (हाई टेंशन, 11 हजार वोल्ट और उससे अधिक) प्रसारण तारों के नीचे भवन निर्माण नियमानुसार प्रतिबंधित होता है । इसी प्रकार ऐसे तारों को सड़कों के ऊपर उनके समांतर बिछाना भी वर्जित है । ये तार सड़कों को एक बाजू से दूसरे बाजू पार कर सकते हैं, किंतु तब उनके नीचे तारों की एक जाली अवश्य लगी होनी चाहिए । हर विद्युद् विभाग इन बातों को जानता अवश्य है, परंतु उस पर अमल शायद ही कभी करता है । आगे दिए चित्रों को देखिए कि जहां मैं गया था वहां के एक भवन तथा सड़क के ऊपर हाई टेंशन तार कैसे फैलाए गये हैं । मेरा अनुमान है कि इन तारों पर 33 या 66 हजार वोल्ट की बिजली दौड़ रही है ।)


आजकल भ्रष्टाचार की बातें जोर-शोर से की जा रही हैं । महज बातों से कुछ होना नहीं है, फिर भी उन पर बहसें चल रही हैं, बौद्धिक विलास के लिए ही सही । समाज अपने तरीके से चलता आया है और आगे भी चलेगा । बातें करते समय हम भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार तो हमारे खून में घुल चुका है, उसे दूर करेंगे कैसे । हालात कुछ वैसे ही वैसे ही हैं जैसे दूध में नमक घुल गया हो । नमक की डली दूध में घुल जाए उसके पहले ही यदि दूध निथार लिया जाए तो उसकी अशुद्धता स्वीकार्य स्तर पर बनी रह सकती है । लेकिन जब नमक घुल ही चुका हो तो आप कुछ नहीं कर सकते हैं । दूध फेंक सकते हैं, बस । लेकिन दूध फेंकने की हैसियत ही न हो तो आपको उसी से काम चलाना पड़ेगा । हम हिंदुस्तानियों के हाल कुछ ऐसे ही हैं । जिंदगी के दूध में भ्रष्टाचार का नमक घुल चुका है । असल दूध तो आप नाली में उड़ेल सकते हैं, किंतु जिंदगी को तो छोड़ नहीं सकते हैं । उसे जीना ही पड़ेगा, भ्रष्टाचार को सहज भाव से सहते हुए । यही सब चल रहा है । अस्तु ।

मेरा वास्ता सरकारी महकमों से कम ही पड़ता है । इसलिए किसी सरकारी दफ्तर में बैठी भ्रष्टाचार की राक्षसी के दर्शन करने की नौबत लंबे समय से नहीं आई है । लेकिन पिछले हफ्ते वह मुझे घर बैठे ही दर्शन दे गई, भले ही कुछ सेकंडों के लिए । इतने भर से मैं भयभीत नहीं हुआ, किंतु उसका संदेश मेरे सवा लीटर के भेजे में घुस ही गया, “मूर्ख मानुष, इस मुगालते में नहीं रहना कि मैं अब जिंदा नहीं रहूंगी । मैं तो तब तक जीती रहूंगी जब तक तुम्हारी यह मानव जाति घरती पर है । तुम मेरे विरुद्ध जो चाहो बको, मुझे फर्क नहीं पड़ता है । … और सुन लो, उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिंद महासागर के बीच का यह भूखंड तो मुझे खास पसंद है । इसे छोड़ मैं कहीं भी जाने वाली नहीं ।” और यह मूक संदेश देकर वह अंतर्धान हो गयी ।

पिछले हफ्ते हुआ क्या इसकी चर्चा पर लौटता हूं । मेरे शहर वाराणसी में जल निगम के कर-संग्राहक पानी एवं सीवर का टैक्स आम तौर पर संबंधित उपभोक्ताओं के मकानों पर जाकर नगद वसूलते हैं । आप चाहें तो उनके कार्यालय की खिड़की पर जाकर भी टैक्स जमा कर सकते हैं । घर पर आकर उनके टैक्स इकट्ठा करने पर किसी को आपत्ति नहीं होती होगी । शायद निगम के तत्संबंधित कर्मियों को भी वसूली दिखानी पड़ती होगी, इसीलिए वे इतनी दिलचस्पी लेते होंगे । अन्यथा सरकारी कर्मी क्योंकर जहमत मोल लेगा ? हां, तो पिछले सप्ताह एक टैक्स कर्मी घर पहुंचे । शिष्टाचार के नाते मैंने उनका हल्के-फुल्के जलपान के साथ स्वागत किया । ऐसा शिष्टाचार मैं अधिकांश मौकों पर बरतता ही हूं । बीते दो-चार सालों से जो सज्जन आ रहे थे उनसे मेरा सामान्य परिचय हो चुका था । किंतु इस बार का चेहरा नया था । मैंने टैक्स की राशि के बारे में पूछा तो पता चला कि इस बीच कुछ वृद्धि हो चुकी है । उन्होंने दो हजार एक सौ छियानबे का हिसाब समझाते हुए कहा, “दो हजार दो सौ का ही हिसाब समझ लीजिए ।”

मैंने उनको पांच-पांच एवं सौ-सौ के नोटों के माध्यम से बाइस सौ रुपयों की राशि पेश की । ये छियानबे की राशि सौ के बेहद करीब थी, इसलिए मैंने सोचा कि वे चार रुपये लौटा देंगे । लेकिन उनके “… हिसाब समझ लीजिए” कहने पर मुझे अंदेशा तो हो ही गया कि उनकी नियत कुछ ठीक नहीं है । घर के ओने-कोने से बीन-बटोरकर फुटकर छियानबे का इंतजाम शायद हो भी जाता, लेकिन मैंने इसकी कोशिश नहीं की । मैंने सोचा कि वे चार रुपये नहीं भी लौटाएंगे तो बहुत बड़ी बात नहीं । चायपानी के तौर पर पांच-सात रुपये का खर्च तो मैं स्वेच्छया कर ही रहा था, चार रुपये और सही यही विचार मन में आया । उन्होंने टैक्स का पैसा जेब में रखा और उसकी रसीद तैयार कर मुझे सौंप दी । उनके साथ बैठे-बैठे दो-चार बातें इधर-उधर की भी हो गयीं ।

असल कार्य संपन्न हो चुका था और मैं इंतजार कर रहा था कि अब वे उठेंगे और विदा लेंगे । अंत में उठने से पहले वे बोल पड़े “सेवा वगैरह कुछ होगी ?”

मैं चौंका, क्षण भर के लिए सोच में पड़ा कि क्या मतलब । फिर संभला और समझ गया कि वे दान-दक्षिणा की उम्मींद लेकर चल रहे थे । मैं उसके लिए तैयार नहीं था और न उसकी कोई वजह ही थी । वे टैक्स इकट्ठा कर रहे थे तो विभाग का दायित्व निभा रहे थे । मैं उनसे कोई उल्टा-सीधा कार्य करवा रहा होता तो कुछ बात भी होती । मुझे तो उनका चार रुपया न लौटाना ही खल रहा था, जिसके बारे में मैंने कुछ कहा नहीं । मैंने संयत होकर जवाब दिया, “आज तक तो ‘ऐसा’ कुछ किया नहीं, भला आज कोई नयी बात तो हुई नहीं ।”

विचारे किंचित् नैराश्य भाव से बोले “हां, वो तो मालूम है … ।” और अपना झोला उठाकर वे चल दिए ।

उनके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि कुछ सरकारी मुलाजिम पूरी बेशर्मी के साथ भिखमंगों की भांति पैसा मांगने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं । मुझे लगता है कोई भी कानून लोगों में संकोच भाव पैदा नहीं कर सकता । बेहयाई के साथ पैसा वसूलने में कइयों को कोई दिक्कत नहीं होती । तब भला भ्रष्टाचार की राक्षसी इस देश को छोड़ कहीं अन्यत्र  क्यों जाएगी ? – योगेन्द्र जोशी

घटना पंद्रह-बीस साल पुरानी है, जब मैं विश्वविद्यालय मैं कार्यरत था । एक दिन अपने भौतिकी (फिजिक्स) विभाग के गलियारे से गुजरते वक्त बी.एससी. कक्षा के दो छात्र मेरे सामने आ खड़े हुए । उन्होंने मुझसे भौतिकी पाठ्यक्रम के एक प्रश्न का हल जानना चाहा । वे छात्र मेरी स्वयं की कक्षा के छात्र नहीं थे । दरअसल उन दिनों मैं बी.एससी. कक्षा का कोई भी सैद्धांतिक प्रश्नपत्र (थ्यॉरेटिकल पेपर) नहीं पढ़ा रहा था । अध्यापन के मेरे दायित्व तब बी.एससी. की भौतिकी प्रयोगशाला और एम.एससी. के सैद्धांतिक-प्रायोगिक प्रश्नपत्रों तक सीमित था । अतः असमर्थता व्यक्त करते हुए मैंने उन्हें टालने की कोशिश की, “मैं तो पिछले कुछ अर्से से बी.एससी. में पढ़ा ही नहीं रहा हूं । कई टापिकों (प्रसंगों) से संपर्क भी आजकल छूटा पड़ा है । इस समय ठीक-से तैयार हुए बिना मैं कहां तुम्हारी मदद कर सकूंगा,  भई ?”

“आप सवाल सॉल्व कर लेंगे, सर । आपको अधिक नहीं सोचना पड़ेगा, हमें मालूम है ।” उनका सम्मिलित उत्तर था ।

“तुमसे किसने कह दिया कि मैं सॉल्व कर लूंगा ? न तो मैं तुम्हारी क्लास लेता हूं, और न ही मैं किसी और सेक्सन को थ्यौरी पढ़ा रहा हूं । … खैर छोड़ो । … भला सवाल है किस टॉपिक का, और पढ़ा कौन रहा है तुम लोगों को ?” मैंने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की ।

“सर, मिकैनिक्स (यांत्रिकी) का सवाल है” कहते हुए उन्होंने मुझे संबंधित अध्यापक का नाम बताया । मैं जानता था कि वे सज्जन उनके सवाल में दिलचस्पी नहीं ले रहे होंगे । उनके पास इतनी फुरसत नहीं होगी कि वे सवाल सुनें और उसे हल करने का तरीका बतायें । ऐसे काम में क्योंकर कोई समय गवाये जिससे प्रत्यक्षरूपेण कोई अतिरिक्त लाभ ही न हो ? एक अध्यापक-सह-वैज्ञानिक के नाते उनका ‘कर्तव्य-दर्शन’ कुछ इसी प्रकार का था यह बात एक लंबे अर्से से सहकर्मी होने के नाते मैं उनके बारे में महसूस करता आ रहा था ।

उस समय मेरी मनोदशा (मूड) उन छात्रों की समस्या सुलझाने की नहीं थी । मैं सोचने लगा कि ख्वाहमख्वाह क्यों जहमत मोल लूं । इसलिए बहुत कुछ जानने-समझने के बावजूद मैंने उन्हें टालने के इरादे से कहा, “लेकिन तुम लोगों को तो विषय पढ़ा रहे अपने टीचर से सवाल पूछना चाहिए । अगर वे न मिल पा रहे हों तो दूसरे सेक्सन में जो पढ़ा रहा हो उस टीचर से पूछना चाहिए । मेरे जैसों, जिनका उस टॉपिक से संपर्क छूट चुका हो, के पास जाने का कोई तुक नहीं है ।”

उन्होंने मेरी बात सुनी और बोले, “ठीक है, सर, उन्हीं से पूछ लेते हैं ।”

उसके बाद मैं विभाग में अपने कमरे की ओर बढ़ गया । वे भी विपरीत दिशा में बाहर बरसाती (पोर्च) की तरफ चल दिए । मैं महसूस कर रहा था कि वे निराश हुए होंगे, और यह अच्छी तरह जानता था कि वे संबंधित अध्यापक के पास नहीं जाएंगे । वहां उन्हें पहले भी निराशा हाथ लगी होगी । मुझे लगा कि मैंने नहीं लौटाना चाहिए था । हो सकता है उनका सवाल मेरे लिए कठिन न रहा हो । यों भी एक अध्यापक के नाते बी.एससी. की भौतिकी मेरे लिए कोई कठिन विषय नहीं रही है । बहुत संभव है कि मुझे सवाल पर अधिक दिमाग न खपाना पड़ता ।

अनायास मुझे लगा कि मैंने उनकी मदद करनी चाहिए थी । मैं पीछे मुड़ा और तेज कदमों से उसी ओर चल दिया जिधर छात्र गए थे । बरसाती के पास वे मुझे दिखाई दिए । मैंने उन्हें आवाज दी और अपने पास बुलाया । फिर उन्हें साथ लेकर अपने कमरे में आया और उनसे संबंधित सवाल के बारे में पूछा । मुझे उसको सुलझाने में कोई दिक्कत नहीं हुई । समय के दस-बारह मिनट के अंतराल में उस सवाल का हल समझाकर उन दोनों को विदा कर दिया ।

उस समय आत्मसंतोष का भाव मेरे मन में भर आया । कमरे की शांतता में बैठे मैं सोचने लगा कि एक अध्यापक के दायित्वों को एकदम साफ तौर पर परिभाषित किया जा सकता है क्या । क्या यह कहा जा सकता है कि उससे बस इतना ही अपेक्षित है और इसके आगे नहीं ? क्या व्यक्ति को अपने दायित्व अक्सर स्वयं निर्धारित नही करने होते हैं ? दायित्व सदैव पूर्वतः नियत नहीं होते । कभी-कभी उन्हें तात्कालिक आवश्यकताओं या परिस्थितियों के अनुसार नियत करना होता है । मैं फलां कार्य करूं या उसे भूल जाऊं जैसे विचारों के ऊहापोह का सामना करना पड़ सकता है । तब आपको दूसरों एवं अपने हितों के बीच सामंजस्य बिठाते हुए निर्णय लेना पड़ता है । आपका हित नहीं भी सध रहा हो, लेकिन किसी का भला उस कार्य में निहित हो तो उसे किया जाना चाहिए । उक्त घटना यों तो बहुत छोटी है, किंतु इसमें निहित संदेश अवश्य गंभीर है । – योगेन्द्र जोशी

अपने लोग कभी-कभी इस बात पर गर्वान्वित-से दिखते हैं कि अपनी भाषा हिंदी – ‘इंडिया दैट इज भारत’ की राजभाषा – विश्व की दूसरी-तीसरी सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है । यह बात शायद सही हो, लेकिन यह तो सच है ही कि यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में सर्वाधिक तिरस्कृत है । कोई भी ‘हिंदीभाषी’ व्यक्ति जो अंग्रेजी पढ़ने-लिखने से परिचित हो चुका हो इसे आम जनों के साथ बोलचाल के लिए मजबूरन प्रयोग में लेता है, अन्यथा उसकी प्राथमिकता तो अंग्रेजी ही रहती है, जो देशवासियों की नजर में श्रेष्ठ एवं उपयोगी भाषा ही नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार एवं द्योतक भी है । आप अंग्रेजी जानते हुए भी हिंदी ही प्राथमिकता के साथ प्रयोग में लेते हों इसकी उम्मीद आम तौर पर नहीं की जा सकती है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही है । मैं ऐसे ही एक ताजे अनुभव की बात करता हूं ।

दो-तीन दिन पूर्व मैं सपत्नीक दो-तीन सप्ताह के नई दिल्ली प्रवास के बाद वापस अपने शहर वाराणसी आ रहा था । मुरादाबाद होकर चलने वाली काशी-विश्वनाथ नाम की गाड़ी के आरक्षित डिब्बे में हमारे बर्थों (शायिकाओं) के पास खिड़की से सटी बर्थ एक युवती के नाम थी । वह युवती गाजियाबाद के किसी तकनीकी संस्थान में अध्ययन कर रही है यह बात बाद में दो-तीन अन्य युवा यात्रिकों, जो स्वयं भी तकनीकी विषयों के छात्र थे, के साथ उसके वार्तालाप से मुझे ज्ञात हो गयी । मतलब यह है कि उनके छात्र होने का अनुमान मैंने उनकी आपसी बातचीत के आधार पर लगाया था ।

हमारे उस डिब्बे में मुरादाबाद स्टेशन पर एक सज्जन भी सवार हुए । उनकी बर्थ हम लोगों के ही अगल-बगल थी । साथी यात्रिकों से उनकी बातों से स्पष्ट हो गया था कि वे बीएचयू (पूर्व में मेरा कार्यस्थल) में अध्यापक हैं और मेरठ में आयोजित एक वैज्ञानिक गोष्ठी में भाग लेकर वाराणसी लौट रहे हैं ।

रेलगाड़ी के मुरादाबाद स्टेशन से आगे बढ़ने के कुछ मिनटों बाद उन अपेक्षया नवागन्तुक यात्री ने उस छात्रा से यह जानना चाहा कि वह क्या करती है और कहां जा रही है । केवल उसी छात्रा में उनकी दिलचस्पी क्यों जगी थी यह मैं समझ नहीं सका । खैर, जैसा कि उम्मीद की जाती है उन दोनों के बीच की आरंभिक बातचीत सामान्य हिंदी में ही हुई । किंतु जैसे ही उन सज्जन को यह अहसास हुआ कि वह युवती तकनीकी विषय की छात्रा है, और तदनुसार अंग्रेजी भाषा के प्रयोग से सुपरिचित है, तो वे हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आये । उन दोनों के बीच चंद मिनटों की बाद की वार्ता अंग्रेजी में ही संपन्न हुई । मुझे याद आता है कि उन्होंने अपनी निकटता दर्शाने के लिए छात्रा को कुछ ‘स्नैक्स’ भी अर्पित किए जिन्हें उसने विनम्र भाव के साथ अस्वीकार कर दिया था ।

मैं उस वार्तालाप में भागीदार नहीं था और अपनी सीट पर बैठे अखबार के पन्ने कुछ यूं उलट-पलट रहा था कि गोया मैं उस वार्तालाप से अनजान, था या उसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी । किंतु बाहरी तौर पर अनभिज्ञ-सा बना मैं वस्तुतः पूरे वाकये पर गौर कर रहा था । मेरे लिए उनकी बातचीत के असली विषय की कोई अहमियत नहीं थी । उस समय जो बात मेरी दृष्टि में अहम थी और जो मुझे खटक रही थी वह थी उनका हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आना । दोनों हिंदी जानते थे, और मुझे पक्का विश्वास है कि दोनों की मातृभाषा – भले ही कहने भर को ही मातृभाषा हो – हिंदी ही रही होगी ।

उस समय मैं सोचने लगा कि आखिर वह कौन-सी मजबूरी रहती है जिसके कारण एक हिंदीभाषी अन्य हिंदीभाषी के साथ भी हिंदी में बात करने से कतराता है, और तुरंत ही अंग्रेजी को वरीयता देते हुए उसमें बतियाने लगता है । कोई व्यक्ति अन्य भाषाभाषियों के साथ भी पहले हिंदी में प्रयास करे और काम न चलने पर ही अंग्रेजी का प्रयोग करे तो यह बात मेरे समझ में आती है । किंतु अपने देश में हाल उल्टे ही लगते हैं । यहां तो अजनबियों के साथ अंग्रेजी में बात करना अंग्रेजी पढ़े-लिखे अनेकों लोगों की प्राथमिकता रहती है । क्या इस मानसिकता से हम भारतीय कभी मुक्त हो पाएंगे यह प्रश्न मेरे मन में शेष यात्रा के दौरान उठता रहा ।

और अपने घर पहुंचने पर मैंने जब खुद की अनुपस्थिति में इकट्ठी हुई डाक पर नजर डाली तो उसमें एक निमंत्रण-पत्र मिला, जिसका विषय था हमारे एक पड़ोसी की पोती का जन्मदिन, जो इस बीच मनाया जा चुका था । निमंत्रण-पत्र था ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले एक पड़ोसी परिवार का, जिससे जुड़े लोगों के लिए – मुझे पूरा विश्वास है – अंग्रेजी आज भी कमोबेश अनजान भाषा होगी । नवजात बच्ची के दादा से पहले की पीढ़ियां अनपढ़ या अल्पशिक्षित रही होंगी ऐसा सोचता हूं मैं । अवश्य ही अब ‘फॉरेन’ अनुभव वाले बच्ची के कंप्यूटर इंजीनियर ‘पापा’ को अब हिंदी से परहेज और अंग्रेजी से लगाव हो गया होगा ।

उपर्युल्लिखित अनुभव मेरे लिए नये नहीं हैं । हिंदी से जुड़े ऐसे अनुभव मुझे आए दिन होते रहते हैं, और हर बार हिंदी को लेकर हिंदीभाषियों में व्याप्त कुंठा मेरे चिंतन का विषय बन जाता है । मुझे लगता है हिंदी एक जहाज की तरह है जिसमें जहां-तहां सुराख हो गये हों, जिनसे रिसता हुआ पानी उसे डुबाए जा रहा हो । लेकिन उस भाषा के प्रति लगाव रखने वाले और उसे बचाए रखने को समर्पित अभिमानी कुछ गिने-चुने देशवासी उस पानी को उलीच कर हटाने और जहाज को बचाने की जुगत में लगे हैं । डुबाने को तत्पर रिसाव और उससे लड़ रही ताकतें परस्पर संघर्षरत हैं । वस्तुस्थिति की गंभीरता को भांपते हुए ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, जो हिंदी के उस जहाज को छोड़ अंग्रेजी की नाव पर चढ़कर सुरक्षित हो चुकने का सुख पा रहे हैं । वर्तमान परिस्थिति में वही बुद्धिमान समझा जा रहा है जो हिंदी का जहाज छोड़ झट-से अंग्रेजी-नाव की ओर लपक रहा हो ।  योगेन्द्र जोशी

मैं अपने शैक्षणिक जीवन के एक अनुभव का जिक्र करने जा रहा हूं । इस अनुभव का संबंध दस-बारह वर्ष पहले अपने एक पूर्वछात्र के साथ संपन्न वार्तालाप से है । उस समय वह मेरे विश्वविद्यालय (बीएचयू) के स्नातकोत्तर पूर्वार्ध, अर्थात् एमएससी प्रीवियस, कक्षा में भौतिकी (फिजिक्स) विषय का छात्र था । मेरा अनुमान है कि करीब पचास छात्र-छात्राओं की उस कक्षा में वह पढ़ाई के लिहाज से शीर्ष के दसएक में से एक रहा होगा । कक्षा के अन्य जिज्ञासु छात्रों की भांति वह भी यदाकदा मेरे बैठने-पढ़ने के कमरे में अपनी शंकाएं लेकर आ जाया करता था । मैं उन लोगों से कभी-कभी विषय से हटकर अन्य प्रकार की दो-चार बातें भी कर लिया करता था । एक बार ऐसी ही बातें तनिक अधिक विस्तार से उस छात्र के साथ भी हुई थीं । बातें एक नजरिये से दिलचस्प थीं, तो दूसरे नजरिये से तकलीफदेह और निराशाप्रद । वे बातें मुझे आज भी कुछ हद तक याद हैं । मैं उसी वार्तालाप की चर्चा कर रहा हूं ।

उस दिन संबंधित छात्र से मेरी बातों की शुरुआत निजी सवालों से हुई थी । मैंने उससे जानना चाहा था कि उसका घर किस गांव अथवा शहर में है, और यह भी कि उसने बीएससी की परीक्षा किस विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय से उत्तीर्ण की थी । उसने बताया कि उसका घर मेरठ में है और उसने इलाहाबाद में रहकर वहां के ईविंग क्रिश्चियन कालेज से बीएससी की उपाधि अर्जित की है । उक्त कालेज इलाहाबाद का एक प्रतिष्ठित कालेज हुआ करता है इस बात से मैं सुपरिचित रहा हूं । मैं जानता हूं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तुलना में मेरठ विश्वविद्यालय दोयम दर्जे का माना जाता है । इलाहाबाद सदा से शिक्षा का केंद्र रहा है और 19वीं शताब्दि में वहां अवस्थित विश्वविद्यालय देश के उच्चस्तरीय शिक्षण संस्थाओं में से एक रहा है । अगर कोई उस विश्वविद्यालय में पढ़ने का विचार करे तो यह बात समझ में आती है । किंतु स्थानीय विश्वविद्यालय छोड़ कोई घर से दूर इलाहाबाद के एक कालेज में पढ़ने पहुंचा हो यह बात एक शिक्षक के नाते मेरी समझ से परे थी । मैंने उससे यह जानना चाहा कि मेरठ में विश्वविद्यालय के होते हुए क्यों उसने घर से दूर इलाहाबाद में पढ़ाई की, और वह भी एक कालेज में न कि विश्वविद्यालय में ।

छात्र का उत्तर था, “सर, मेरठ यूनिवर्सिटी बस ऐसी ही है । मेरे पिताजी ने कहा था कि कुछ ढंग की पढ़ाई करनी हो तो इलाहाबाद जाओ । वहां यूनिवर्सिटी में एड्मिशन न हो पाने के कारण मैंने ‘इसीजी’ (ईविंग क्रिश्चियन कालेज का संक्षिप्त नाम) में एड्मिशन लिया । दरअसल मेरे पिताजी ने अपने वक्त में वहीं से ग्रैजुएशन किया था । उनकी राय थी कि मेरठ यूनिवर्सिटी से तो इसीजी बेहतर है ।”

उसका जवाब मेरे लिए कुछ हद तक चौंकाने वाला था । उसका यह कहना कि मेरठ यूनिवर्सिटी बस ऐसी ही है उस विश्वविद्यालय पर एक नकारात्मक टिप्पणी थी । इलाहाबाद, बीएचयू तथा अन्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की तुलना में मेरठ का स्तर कमतर होने की बात से मैं वाकिफ था, किंतु उसके हाल इसीजी से भी बदतर होंगे यह मैं नहीं सोचता था । इस बारे में उसकी धारणा के आधार को समझने की जिज्ञासा मेरे मन में जगी । मैंने उससे पूछा, “क्यों भई ऐसी क्या खराबी है वहां ?”

“सर वहां पढ़ाई-लिखाई तो कुछ होती नहीं है । न स्टूडेंट्स को और न ही टीचर्स को कोई दिलचस्पी रहती है । इम्तहान में नकल का जोर रहता है, और नंबर कैसे दिये जाते हैं यह तो भगवान ही जाने ।” उसने अपने खयालात पेश किए ।

“हो सकता है तुम्हें गलतफहमी हो । ऐसा नहीं होगा, किसी ने तुम्हें गलत बताया होगा । तुम तो वहां पढ़े नहीं, तुम्हारा अपना अनुभव तो है नहीं । सुनी-सुनाई बातें कभी-कभी अतिरंजित भी होती हैं ।” मैंने उसे समझाया ।

“नहीं सर, ऐसी बात नहीं । आप खुद ही समझ सकते हैं ।” उसने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा, “मेरी बहन ने उसी यूनिवर्सिटी से बीए किया । कैसे किया यह मुझे मालूम है । मुश्किल से कभी-कभार क्लास अटेंड की होगी । क्या अटेंड करती, क्लास होती तब न ! आप मानेंगे नहीं, लेकिन उसने खुद इम्तहान नहीं दिया । किसी और ने दिया और उसे डिग्री मिल गयी ।”

मुझे उसकी बातें अविश्वसनीय लग रही थीं । मैं सोच नहीं पा रहा था कि वह सच बाल रहा था या झूठ । भला झूठ बोलने की उसे क्या जरूरत थी, वह भी अपनी बहिन को लेकर । मैं अपनी कक्षा के एक छात्र होने के नाते उसे जितना समझ सकता था उसके अनुसार वह सही बोल रहा था । उन दिनों एमएससी पूर्वार्ध की अधिकतम पीरियडों, सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक, से में संबंद्ध था, अतः छात्रों से सुपरिचित होना मेरे लिए अपेक्षया अधिक मौके थे । उसकी बातें में नकार नहीं पा रहा था । उसके साथ आगे क्या-क्या बातें हुईं इसकी अहमियत नहीं है । मेरी लिए जो बात चिंतनीय थी वह मैं सुन चुका था ।

उसने जो बताया उसमें दम है इसका अहसास मुझे कुछ सालों बाद तब हुआ, जब मेरठ विश्वविद्यालय के परीक्षा घोटालों की खबरें जोरशोर से अखबारों और टीवी चैनलों पर आने लगीं । खबरें आ रही थीं कि कैसे वहां की परीक्षा पुस्तकों का मूल्यांकन परीक्षकगण प्राइमरी से इंटर तक के छात्रों से करवा रहे हैं ।

अपने देश में कदाचार के अनेक रूप हैं । किसी और क्षेत्र में हम कितने ही पिछड़े हों, इस क्षेत्र में शायद ही कोई प्रमुख देश हमें मात दे सकता है । मेरा देश महान । वाकई महान है यह देश । – योगेन्द्र जोशी

बैंकों एवं इसी प्रकार की अन्य सेवाप्रदाता कंपनियों के कर्मचारियों का अपने ग्राहकों के पति रवैया सभी देशों में एक जैसा नहीं होता है । ब्रिटेन में मिले अनुभव के आधार पर कम से कम मैं तो यही कहूंगा । अपने देश में बैंक कर्मचारियों की कोशिश यह नहीं होती है कि ग्राहकों को नियम-कानूनों के नाम पर कोई असुविधा न पहुंचने पाये । मेरा अनुमान है कि विश्व के कई देशों के बैंक कर्मचारी आम ग्राहक के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, और वे अपनी संस्था की साख बनाये रखने की तमाम कोशिशें करते हैं, भले ही ऐसा करने में बैंक को थोड़ा-बहुत वित्तीय खतरा क्यों न उठाना पड़ रहा हो । इस संदर्भ में मुझे कोई पच्चीस वर्ष पहले का एक अनुभव याद आता है ।
घटना तब की है जब मैं विज्ञान-विषयक उच्चाध्ययन के लिए द्विवर्षीय ब्रितानी प्रवास पर था । वहां के एक विश्वविद्यालय में अपना कार्यकाल पूरा कर चुकने के बाद मुझे सपरिवार स्वदेश लौटना था । अपनी वापसी यात्रा की तैयारी के साथ मुझे अपना बैंक खाता भी बंद करना था । वापसी हवाई यात्रा के एक दिन पूर्व मैं इस कार्य के लिए बैंक की संबंधित शाखा में पहुंचा । मैंने अपनी पास बुक तथा बचे हुए अप्रयुक्त चेकों को काउंटर पर बैठी महिला कर्मचारी को सौंपा और उससे खाता बंद करके बची हुई जमा राशि लौटाने का निवेदन किया । उसने अपने कंप्यूटर पर मेरे खाते और लौटाए गये चेकों की पड़ताल की और मुझसे कहा कि मेरे चेकबुक में ऐसे दो चेक मौजूद नहीं हैं, जिनका भुगतान खाते के ब्योरे के अनुसार तब तक नहीं हुआ था । उस महिला कर्मचारी के अनुसार उन चेकों का अभी भुगतान बचा था, तदनुसार खाता बंद करने में तकनीकी दिक्कत आ रही थी ।
खाता बंद कराने में मुझे दिक्कत आ सकती है इस संभावना को ध्यान में रखते हुए मैं बैंक नहीं पहुंचा था । एक बारगी मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूं । मुझे अपनी गलती का अहसास हो आया और उसके सामने वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए मैंने अपना पक्ष रखा । वह बैंककर्मी अंदर अपने अधिकारी के पास गयी और दो-तीन मिनट में लौटकर मुझसे बोली, “हम आपकी बात पर विश्वास करते हैं, और यह मानते हैं कि बैंक को धोखा देने का आपका कोई इरादा नहीं है।
इतना कहकर उसने शेष औपचारिकताएं पूरी कीं, और मेरा खाता बंद करते हुए उसने शेष जमा राशि लौटा दी । धन्यवाद ज्ञापन के साथ मैं लौट आया । खाता बंद कराने में क्या दिक्कत थी मैं इसका खुलासा कर दूं । दरअसल मुझे मिली चेकबुक का हर चेक 50 पौंड (ब्रितानी मुद्रा) के लिए ‘गारंटीड’ था । गारंटीड का मतलब यह था कि जिस किसी को भी 50 पौंड (आज के करीब 3500 रुपये) तक की रकम का चेक काटकर दिया जाता बैंक उसको उस राशि का भुगतान अवश्य करता, भले ही संबंधित खाते में पर्याप्त धनराशि न हो । ऐसे चेक स्वीकारने में किसी को धोखे का डर नहीं रहता था, क्योंकि उसको भुगतान मिलना सुनिश्चित था । घाटा सहना बैंक का काम होता और ग्राहक से वसूलना उसका सिरदर्द । अतः उन दिनों ब्रितानी बाजारों में अनजान व्यक्ति से भी इस प्रकार के गारंटीड चेक स्वीकारने में किसी को कोई खतरा नहीं दिखता था, और चेकों द्वारा पैसे का लेनदेन एक सामान्य बात थी ।
चूंकि मैं दो चेक बैंक को नहीं लौटा सका था, अतः बैंक यह मान सकता था कि मैंने किसी को वे चेक 50-50 पौंड तक की राशि भरकर दे रखे होंगे, जिनका भुगतान तब तक नहीं हुआ था । ऐसे में बैंक 100 पौंड तक की राशि काटकर मुझे शेष जमा लौटाने की बात कर सकता था । लेकिन बैंक ने ऐसा नहीं किया और मेरे प्रति विश्वास व्यक्त करते हुए पूरी जमा राशि लौटा दी । असल में मैंने किसी को चेक नहीं दिए थे, बल्कि उन्हें पहले कभी कारणवशात् निरस्त करते हुए फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिया था । मुझे उन निरस्त चेकों को रिकार्ड के तौर अपने पास रखना चाहिए था । मेरी गलती यही थी कि मैंने ऐसा नहीं किया था ।
दूसरे दिन मैंने विश्वविद्यालय के एक अध्यापक को पूरा किस्सा सुनाया, और उससे जानना चाहा कि बैंक ने मेरे प्रति जो नरमी दिखाई उसका संभव कारण क्या रहा होगा । उसने जो बात मुझे समझाई उसके अनुसार आम तौर पर बैंक अपने अनुभवों के आधार पर यह मानकर चलते हैं कि अधिकांश ग्राहक ईमानदार होते हैं और बैंक को धोखा देने का उनका कोई इरादा नहीं होता है । वे भूल कर सकते हैं जिसे वे सुधार भी लेते हैं । बैंकों की नीति रहती है कि ग्राहक की ऐसी भूलों को तूल देकर बैंक को उनके प्रति संवेदनाविहीन व्यवहार नहीं दिखाना चाहिए । ग्राहक की बातों पर विश्वास करते हुए उसकी परेशानी हल करना व्यावसायिक कार्यकुशलता एवं व्यवहारपटुता मानी जाती है । अवश्य ही ऐसा करने में बैंक को खतरा उठाना पड़ सकता है । किंतु कभी-कभार – बहुत कम मामलों में – होता है । उन मौकों पर बैंक को जो वित्तीय घाटा हाता है, उसके लिए भी वे प्रस्तुत रहते हैं । किंतु उस संभावित घाटे से बचने के लिए वे सभी ग्र्राहकों पर अविश्वास करने लगें यह नीति उन्हें स्वीकार्य नहीं । ग्राहकों के बीच सद्व्यवहार की साख बनाये रखने के लिए ऐसे खतरे उठाने ही पड़ते हैं ।
मैं समझता हूं कि इस प्रकार की नीति के तहत ही उस बैंक अधिकारी ने मेरी बात मान ली होगी और वांछित कार्य निष्पन्न किया होगा । यदि ऐसी ही किसी स्थिति का सामना मुझे अपने देश में करना पड़ा होता, तो नियम-कानूनों का हवाला देते हुए बैंक ने कार्य-निष्पादन में असमर्थता जताई होती । इस माने में हम शायद पीछे हैं । – योगेन्द्र जोशी