राह चलते यदाकदा ऐसा कुछ अनुभव में आ जाता है जो मेरे सामने मानव व्यवहार से जुड़े तमाम सवाल खड़े कर देता है । हाल ही में एक रिक्शा चालक ने उसके साथ घटी घटना की बात मुझे बताई जिसे सुन मैं सोचने लगा कि क्योंकर लोग इतने अनुदार या कठोर होते हैं

मेरी पत्नी और मैं एक वैवाहिक समारोह में शामिल होने के लिए दो-चार दिनों के लिए उत्तराखंड राज्य के हल्द्वानी शहर गये हुए थे । उस दौरान एक दिन अपने एक रिश्तेदार से मुलाकात करने के बाद हम दोनों अपने टिकने के स्थान लौट रहे थे  तब रात के करीब साड़े-आठ पौने-नौ बजे होंगे । अपने गंतव्य तक पैदल चलने पर हमें पर्याप्त समय लगेगा यह सोचते हुए शहर के मुखानी नामक चौराहे पर हमने एक रिक्शा तय किया । रिक्शा वाले से हमने पूछा कि क्या वह लालडाट तक चलेगा । (लालडाट संबंधित सड़क पर नगरवासियों के लिए सुपरिचित एक प्रमुख तिराहा है ।) बतौर भाड़ा 10 रुपये की मांग रखते हुए वह तैयार हो गया । चलते-चलते उसने एक सवाल भी मुझसे पूछ लिया, “बाबूजी, आपको क्या लालडाट पर ही उतरना है, या उसके आगे भी जाना है ?”

“जाना तो आगे है, लेकिन हम वहीं उतरकर पैदल चले जाएंगे । वहां से कोई दो-ढाई सौ कदम दूर होगा ।” मैंने जवाब दिया ।

रिक्शा चालक थोड़ी देर चुप रहा, फिर खुद ही बोल पड़ा, “बाबूजी, ये सवाल आपसे इसलिए पूछ रहा हूं कि बाद में लोग अक्सर थोड़ा और आगे चलने और फलां-फलां जगह उतारने के लिए कहने लगते हैं । उस समय दिक्कत हो जाती है; भाड़ा भी ठीक से नहीं मिल पाता है ।”

“हां ऐसा हो तो सकता है । सवारी हो या रिक्शा वाला कहां जाना है और कितना भाड़ा होगा ये बातें पहले ही ठीक-ठीक तय कर लेनीं चाहिए ।”

“कल मेरे साथ जो हुआ उससे मैंने भी यह सबक सीख लिया कि सवारी से साफ-साफ पूछ लेना जरूरी है । इसीलिए आपसे मैंने पूछा ।”

“कल क्या हुआ भई ?” मेरी पत्नी ने सहज जिज्ञासावश उससे पूछा ।

“लगभग यही टाइम रहा होगा कल रात जब एक ‘लेडीज’ सवारी मेरे रिक्शे पर बैठी । लालडाट पर उतरने की बात कही थी उसने । दस रुपया भाड़ा तय हुआ था । जब मैं लालडाट पहुंचा तो सवारी बोली कि थोड़ा आगे चलकर कुसुमखेड़ा चौराहा (अगला प्रमुख चौराहा) तक पहुंचा दो ।”

गौर करें कि अपने हिंदीभाषी क्षेत्र में महिलाओं का जब जिक्र होता है तो उन्हें ‘लेडीज’ शब्द से इंगित किया जाता है । एकबचन-बहुबचन में कोई फर्क नहीं रहता । अंगरेजी शब्द प्रयोग करना हमारी आदत हो चुकी है । बस हो या रेलगाड़ी या रिक्शा-टैक्सी, जनानी सवारी को लेडीज सवारी ही कहा जायेगा । खैर, रिक्शा वाला अपनी बात पूरी करता इससे पहले मैंने कहा, “तो तुमने कहा होगा कि रिक्शा तो यहीं तक के लिए तय है; इस पर सवारी झगड़ने लगी होगी । यही ना ?”

“नहीं सा’ब, मैंने सोचा रात का समय है, जनानी सवारी है, दूसरा रिक्शा खोजना पड़ेगा, चलो मैं ही वहां तक छोड़ देता हूं । लेकिन सवारी वहां पर उतरने के बजाय बोली, ‘थोड़ा आगे हनुमान मंदिर तक ले चलो, पांच रुपये और ले लेना ।”

“तुमने इस बार मना कर दिया होगा ।” मैंने अनुमान लगाया ।

“नहीं, मैं मान गया । परंतु वहां पहुंचने पर सवारी फिर बोली, ‘अरे दो कदम आगे लालडाट तक पहुंचा दो भैया ।’ मुझे उनका रवैया ठीक नहीं लग रहा था, पर भलमनसाहत में सोचा कि इतना और सही ।”

वह अपनी बात पूरी करता उससे पहले ही मैंने सवाल पूछा, “लालडाट ? लालडाट वहां कहा से आया, उसे तो पहले ही तुम छोड़ आए थे ?”

“पता नहीं क्यों आसपास के लोग उस चौराहे को भी लालडाट कहते हैं । कई लोग इस बात को नहीं जानते ।”

“अच्छा तो फिर क्या हुआ ?”

“हुआ क्या; वहां पहुचे तो सवारी उतरी और मुझे 10 का नोट थमाने लगी । मैंने लेने से इंकार किया और याद दिलाया कि 15 रुपया देने की बात तो आप ही ने की । एक तो ‘थोड़ा और आगे, थोड़ा और आगे’ कहते हुए हमको यहां तक ले आईं और अब 15 रुपया भी नहीं दे रहीं । तब तक वहां पर और लोग भी जमा हो गये । सबसे सामने बोलीं कि लालडाट का 10 रुपया तय हुआ था । मैं अपनी बात कहता रहा लेकिन किसी ने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया । अंत में मैं उनका दिया 10 रुपया भी यह कहते हुए लौटाने लगा कि इसे भी रख लीजिए ।”

तब तक लालडाट का चौराहा आ चुका था । हमने रिक्शा रुकवाया और उतरते हुए बोले, “तब जाकर उन्होंने 15 रुपये दिए होंगे ।”

“नहीं सा’ब, उन्होंने उसे वापस अपने पर्स में रखा और चलती बनीं । तब मैंने सोचा कि आइंदा से अपनी सवारी से साफ-साफ तय कर लेना जरूरी है ।”

मेरी पत्नी ने उसे 10 के बदले 20 रुपये थमाते हुए कहा, “कल तुम्हें उस सवारी से 10 रुपये भी नहीं मिले, लो इसे हमारी तरफ से रख लो ।”

उसने 10 का अतिरिक्त नोट लेने से पहले तो मना किया, फिर हमारे जोर डालने पर उसे लेते हुए बोला, “आपको कहां जाना है ? मैं छोड़े देता हूं ।”

“हम तो यहां से पैदल जाने के विचार से ही चले थे, सो पैदल ही चले जाते हैं । ये तुम हमारी तरफ से रख लो । हम अपने मन से दे रहे हैं ।”

उसने हमारा शुक्रिया अदा किया । उस वाकये की परस्पर चर्चा करते हुए हम आगे बढ़ गए । रास्ते में पत्नी बोलीं, “उसने कोई मनगढ़ंत बात तो कही नहीं होगी । दुनिया में ऐसे लोग होते ही हैं जो दूसरे का दो पैसा मारने में भी नहीं हिचकते हैं ।” – योगेन्द्र जोशी

कुछएक दिनों पहले मैं अपने एक रिश्तेदार से मिला । सामान्य कुशल-क्षेम की चर्चा के बाद बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि कैसे ऊटपटांग की टेलीफोन कॉलें उन्हें कभी-कभी मिल जाती हैं । अपने हालिया अनुभव का जिक्र करते हुए वे बोले कि अभी दो-चार दिन पूर्व उन्हें एक आदमी से फोन आया जिसने खुद को बीमा कंपनियों से जुड़ा कर्मचारी बताया । उसने कहा, “देखिए, आपके किसी पुराने बीमा के बोनस का भुगतान किया जाना है ।”

इस तरफ से जवाब गया, “मुझे तो रुके पड़े किसी ऐसे भुगतान का ख्याल नहीं है । फिर भी कोई हो तो भेज दीजिए । इसमें पूछने की क्या बात है ?”

दूसरी तरफ से सलाह मिली, “बोनस की राशि लाखों में है । उसमें सिक्योरिटी और प्रॉसेसिंग आदि की कुछ फीस लगेगी । आपको इतना (याद नहीं कितना) पैसा जमा करना होगा । कहां और कैसे यह हम आपको बताते हैं ।”

मेरे मित्र ने बीच में टोकते हुए फोनकर्ता से कहा, “देखिए यह सब तो नहीं चलेगा । आप बोनस से उतना पैसा काटकर शेष भेज दीजिए । बात सीधी-सी है ।”

इतना कहे जाने पर फोन कट गया । उसके बाद रिश्तेदार के पास से लौटने के दो-तीन दिन बाद कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे भी हुआ । मेरे पास भी एक फोन-कॉल आई । फोनकर्ता बीमा संबंधी बोनस की उपलब्धता की बात करने लगा । मुझे मालूम था कि यह सब लोगों को बेवकूफ बनाने की एक कोशिश है । मैंने पूछा, “आप किस संस्था की ओर से बात कर रहे हैं ?”

उसने कहा,आई.आर.डी.ए.

“आई.आर.डी.ए.? मैंने इस संस्था का नाम कभी नहीं सुना है ।” मैं इस संस्था से वाकई अनभिज्ञ रहा हूं ।

“नाम नहीं सुना ? अजीब बात है । यह भारत सरकार की एक संस्था हैः बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डिवलपमेंट ऑथोरिटी), जो देश की सभी बीमा कंपनियों के कामकाज पर नजर रखती है ।”

मुझे अंदाजा है कि इस प्रकार के फोन लोगों को पैसे का लालच देकर बेवकूफ बनाने और उनसे खुद ही पैसा ऐंठने के लिए किए जाते हैं । सरकारी तंत्र के कर्मचारियों से यह उम्मीद भला कोई कैसे कर सकता है कि वह आपके वाजिब बकाए को लौटाने की बात खुदबखुद करें । उनसे पैसा पाने के लिए तो कागजी लिखापड़ी के साथ कार्यालयों के दसियों चक्कर हर किसी को लगाने पड़ते हैं । और यहां आपके बकाए के लिए चिंता जताने वाला कोई फोन कर रहा है ! भला कैसे कोई विश्वास कर सकता है ! लिहाजा मुझे उस व्यक्ति की बोनस संबंधी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी । फिर भी मेरा मन हुआ कि उससे इधर-उधर के सवाल पूछ डालूं । मैंने कहा, “कौन-कौन सी हैं ये बीमा कंपनियां जिनकी आप बात कर रहे हैं, जानना चाहता हूं ।”

         “आपको बोनस से मतलब है या बीमा कंपनियों की लिस्ट से ?” उसने अपनी नाखुशी जाहिर की ।

         “अरे भई, मामला ठीक से समझ लेना चाहिए । इसलिए कुछएक सवाल-जवाब करना जरूरी है ।” मैंने अपनी सफाई पेश की ।

वह व्यक्ति समझ गया कि उसे कुछ हासिल होना नहीं है । अपना गुस्सा उतारते हुए उसने झल्लाकर कहा, “आप जैसा फिजूल आदमी मैंने नहीं देखा ।”

मैंने चाहा कि उसके इन शब्दों को मैं स्वयं उसके प्रति दोहराऊं, किंतु तब तक उसने फोन काट दिया । – योगेन्द्र जोशी

 

          गरमी का मौसम और दोपहर के करीब 2 बजे । चोर थानेदार साहब से मिलने पहुंचता है । इस समय बाहर और थाने में अपेक्षया सुनसानी है । साहब से मिलने का यही समय मुकर्रर हुआ है । साहब चोर को एक ओर आड़ में ले जाते हैं । चोर गुड़ी-मुड़ी हालत में कुछ नोट साहब की हथेली पर रखता है । साहब पूछते हैं, “कितना है ?” जवाब मिलता है, “पांच हजार हुजूर ।”

         “कहां और कितने पर हाथ साफ किया ?” साहब रौब से सवाल दागते हैं ।

जवाब में चोर मोहल्ले का नाम लेता है और उसके भीतर मकान की मोटामाटी स्थिति बताता है । लाखएक के करीब का माल रहा होगा यह भी कहता है ।

“इतने से कैसे काम चलेगा ?” सवाल पूछा जाता है ।

“हुजूर अभी देखना होगा बाजार में क्या मिलता है । और फिर रोज-रोज तो मौके मिलते नहीं । इसी में अपना और परिवार का पेट भी पालना होता है । हमारी मजबूरी भी थोड़ा समझिए, हुजूर !”

          “ठीक है, ठीक है”

          “हजूर तो मैं चलूं ?” कहते हुए वह बाहर आकर अपनी साइकिल  पकड़ता है और चल देता है ।

          एक-डेड़ घंटे के बाद एक महिला थाने में पहुंचती है । अपना परिचय देते हुए मोबाइल मिलाती है और कहती है, “सोनी सा’ब, जरा इनसे बात कर लिजिए ।”

          दूसरी ओर से बोले गए हलो और परिचयात्मक शब्दों को सुनने पर साहब बोलते हैं, “अरे लाल साहब, ठीक-ठाक हैं न ? कहां से बोल रहे हैं ?”

          लाल सा’ब फोन पर थानेदार साहब को वाकये के बारे में बताते हुए उनके पास पहुंची अपनी पत्नी की मदद के लिए निवेदन करते हैं । “ठीक है । मैं देख लूंगा, आप परेशान न हों ।”

          लाल साहब की पत्नी अपने घर में हुई चोरी की घटना के बारे में विस्तार से जानकारी देती हैं और तदनुसार एफआईआर दर्ज कराती हैं । मोहल्ले का नाम सुन साहब का माथा ठनकता है । ये तो वही मोहल्ला है जिसके बाबत अभी ‘वह’ आया था । वे आश्वासन देते हुए कहते हैं, “ठीक है हम तुरंत ही आगे की काररवाही करेंगे । आप निश्चिंत होकर लौटिए । चोर पकड़ में आ ही जाएगा ।”

          महिला वापस चली जाती है । थानेदार साहब सोचने लगते हैं, “लगता है यह मामला वही है जिसके लिए कुछ ही समय पहले उन्हें रकम मिली है । … ठीक है, चोरी का सामान तो उससे वापस दिलाना ही पड़ेगा । आखिर अपनी ही बिरादरी का मामला जो है । और पांच हजार की वह रकम ? हाथ में आ चुकी रकम तो लौटाई नहीं जा सकती है । … ठीक है, उससे अगली बार नहीं लेने का वादा करेंगे । … आखिर उसूल का सवाल है ।”

साहब अपने सिपाही को बुलाते हैं और आगे की काररवाही में जुट जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

(यह कथा वास्तविक घटना पर आधारित नहीं है । यह पूर्णतः काल्पनिक है और आज, 20 अप्रैल, के दैनिक जागरण में छपे ‘मडुवाडीह में दारोगा के मकान में चोरी’ शीर्षक वाले समाचार से प्रेरित होकर लिखी गयी है ।यदि कोई आहत महसूस करे तो उससे क्षमा की प्रार्थना है । क्षमा मांगने पर हर पाप धुल जाता है । अपने देश में आजकल माफी मांगने और माफ करने का कर्मकांड काफी लोकप्रिय हो चला है । – योगेन्द्र जोशी)

          आज के औद्योगिक युग में मनुष्य बेहद आराम-तलब हो चुका है । मुझे लगता है कि कभी-कभी यह आराम-तलबी हास्यास्पद सीमा पार कर जाती है । चंद रोज पहले एक दिलचस्प और अपने किस्म का वाकया मेरे अनुभव में आया – दिलचस्प मेरी नजर में । हो सकता है लोग ऐसा न मानें ।

          इससे पहले कि वाकये का ब्योरा पेश करूं, मैं बताना चाहूंगा कि मेरे शहर बनारस (वाराणसी) की जो भी तारीफें आपने सुनी हों वे किस हद तक सही होंगी इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहता; बस, मेरी अपनी नजर में यह शहर दुर्व्यव्यवस्था के मामले मैं अद्वितीय है । इस शहर में कौन-सी सड़क ठीक-ठाक हालत में है इसे आपको खोजना पड़ेगा । कोई भी सड़क बनने के बाद पहली बरसात झेल जाए तो आश्चर्य होता है । सड़कों पर वाहनों के बेतरतीब आवागमन को देख आपके मन में सहज शंका उठेगी कि यहां यातायात के कोई नियम हैं भी कि नहीं । पुराना शहर होने के कारण सड़कें सब जगह इतनी चौड़ी नहीं हैं कि निरंतर बढ़ते निजी मोटर-वाहनों का बोझ झेल सकें । परिणाम साफ जाहिर है, ट्रैफिक जाम । और कोढ़ में खाज की नौबत आ जाती है जब इन सड़कों पर पाइप-लाइनें बिझाने के लिए खोदाई होने लगती है, जैसा कि आजकल चल रहा है ।

          ‘लंका’ इस शहर के प्रमुख स्थानों में से एक है, जहां बी.एच.यू. (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) का प्रवेश द्वार है और उसके परिसर में अवस्थित चिकित्सा संस्थान के अस्पताल पहुंचने का मार्ग है । इसके आसपास रिहायशी मकान और बहुमंजिली इमारतें हैं, तथा स्थानीय लोगों की जरूरतों की पूर्ति करने वाला बाजार है । शहर के अन्य स्थानों के लिए पैडल-रिक्शे, आटोरिक्शे जैसे साधन भी यहां पर रात-दिन मिलते हैं ।

          वाकत तब का है जब एक दिन मुझे अपनी धर्मपत्नी जी के साथ कार्यवशात् यहां आना पड़ा था । हम घर के पास स्थित सुंदरपुर चौराहे से सवारी आधार पर चलने वाले आटोरिक्शा से लंका के लिए चल दिये । बताता चलूं कि वाराणसी में आटोरिक्शे पांच सवारियां बिठाकर चलते हैं । लंका के निकट पहुंचने पर देखने को मिला कि वहां तो जाम लगा है । हमारे आटोरिक्शे को गंतव्य स्थल, चौराहे, पर पहुंचने के लिए अभी कोई डेड़ सौ या उससे भी कम दूरी तय करनी थी, लेकिन उस जाम को देखते हुए उसने वाहन रोक दिया और सामने के वाहनों के आगे बढ़ने का इंतजार करने लगा । हमने देख रहे थे कि दूर तक खड़े वाहनों में कोई गति नहीं है । स्थिति खराब देख मैंने अपनी सहधर्मिणी से कहा, “क्यों न हम उतर जायें और पैदल चल दें । मुझे तो लगता है जितनी देर में यह आटो चौराहे पर पहुंचेगा उससे कहीं कम समय में हम पैदल वहां पहुंच जाऐंगे ।”

उन्होंने सहमति जताई, और भाड़ा अदा करते हुए हम उतरने लगे । इतने में एक महिला, उम्र से अंदाजन तीस-पैंतीस वर्ष की, आटोरिक्शे के पास पहुंची और बोली, “चौराहे तक ले चलिए तो ।”

          “अरे बहन जी, सामने ही तो चौराहा है, पैदल चले जाइए ।”

          “कौन चले वहां तक पैदल ! आप छोड़ दीजिए ।”

          तब तक हम दोनों उतर चुके थे । वाहन चालक और उस महिला के बीच आगे क्या बातें हुई होंगी मैं बता नहीं सकता, क्योंकि हम जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए बगल की एक गली के रास्ते चौराहे की तरफ चल दिए । बगल की गली का रास्ता हमने इसलिए चुना कि उस जाम में घुसकर पैदल भी आगे निकल पाना नामुमकिन-सा लग रहा था ।

गली से गुजरते हुए पत्नी महोदया बोलीं, “पता नहीं कैसी खबती महिला थी वह कि दस कदम पैदल चलने से भी कतरा रही थी ।”

पर्वतीय क्षेत्र का मूल बाशिंदा होने के कारण मुझे मीलों पैदल चलने की आदत रही है । पहाड़ों पर तो पैदल चलने के अलावा कोई अन्य साधन आम तौर पर उपलब्ध भी नहीं रहता है । लेकिन मैदानी इलाकों में स्थिति कुछ अलग रहती है । तथापि यहां भी लोग पैदल चलते ही हैं या साइकिल चलाते हैं । पता नहीं क्यों अब कुछ लोग कुछ कदम भी पैदल चलने से बचते हैं । ऐसा नहीं कि वह महिला अस्वस्थ हो । अधिकतर लोग उस महिला की तरह बर्ताव करते भी नहीं होंगे । मैं समझता हूं वह अपवाद रही होगी । लेकिन यह दिलचस्प तो है ही कि उस सरीखे लोग भी दुनिया में मिल जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

          मैं अपने छात्र-जीवन के एक अनुभव की चर्चा यहां पर करने जा रहा हूं । किंतु उसके पहले कुछ मननीय बिंदुओं की ओर पाठक का ध्यान खींचना समीचान समझता हूं । मेरे मन में अक्सर एक सवाल उठता हैः क्या प्रकृति ने सभी मनुष्यों को कमोवेश समान दिमागी क्षमता दे रखी है? ये सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि आजकल प्रायः सभी अभिभावकवृंद अपने पाल्यों को डाक्टरी, इंजिनियरिंग जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की ओर धकेलते हुए देखे जाते हैं, बिना इस पर ध्यान दिये हुए कि उन बच्चों की क्षमताएं इच्छित विषयों के अनुरूप नहीं हैं ।

अपने देश के एक प्रख्यात विश्वविद्याल में अध्यापन के दौरान मैंने छात्रों की शैक्षिक क्षमताओं में उल्लेखनीय अंतर देखा है । मेरी संस्था में देश के विविध हिस्सों से छात्र अध्ययन हेतु आते रहे हैं, और राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा परीक्षा उत्तीर्ण करके आने वाले उन छात्रों का स्तर औसत से बेहतर होने की आशा की जाती रही है । भौतिकी (फिजिक्स) मेरा विषय रहा है, और छात्र जीवन में गणित एवं भौतिकी मेरे लिए सरलतम विषय रहे हैं । मुझे यह समझ नहीं आता था कि ऐसे सरल विषयों को भी लोग दुरूह क्यों समझते हैं । अधिकतर छात्र इन विषयों से डरे-सहमे-से देखने-सुनने को मिलते हैं । जैसे-जैसे मेरा शैक्षणिक अनुभव बढ़ता गया, मुझे कप्यूटर विज्ञान का अध्ययन-अध्यापन करने का अवसर मिला, और कंप्यूटरों की कार्यप्रणाली को ध्यान में रखते हुए ‘न्यूरोसाइंस’ समझने की विश्व-वैज्ञानिकों के प्रयासों से अवगत होने लगा, मुझे विश्वास होने लगा कि लोगों के मस्तिष्क की क्षमता में परस्पर बहुत अंतर हो सकता है । हमारा मस्तिष्क गर्भावस्था से लगभग निरंतर विकसित होता रहता है । व्यक्ति की स्वयं की जैविक संरचना, उसको उपलब्ध भोजन की पोषकता, उसके परिवेश, औपचारिक/अनौपचारिक दिमागी प्रशिक्षण आदि का विकास की उक्त प्रक्रिया में कितना-कितना योगदान रहता है यह मैं नहीं जानता । इतना अवश्य मानता हूं कि इन सबका बहुत महत्व है ।

          मैं अपने छात्र जीवन के एक वाकये का जिक्र करता हूं । उन दिनों मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर (एम.एससी.) कक्षा में पढ़ता था, और वहां के ए.जे. (म्युअर) छात्रावास में रहता था । तब विश्वविद्यालय के किसी भी छात्रावास में सभी विषयों के छात्र रहते थे, यानी छात्रावास विषयवार बंटे हुए नहीं थे । छात्रावास में चूंकि छात्रों की संख्या सौ-सवासौ से अधिक नहीं थी, अतः सभी परस्पर एक-दूसरे को जानते थे । किसी के साथ निकटता का अधिक या कम होना स्वाभाविक था ।

हम लोगों के साथ एक छात्र एलएल.बी. में पढ़ता था । एक दिन विज्ञान विषय से संबंद्ध अन्य दो-तीन छात्रों के साथ मैं गपशप में मशगूल था । कुछ देर में वह भी हम लोगों में शरीक हो गया । गपशप का विषय क्या रहा होगा यह तो मैं अब बता नहीं सकता, किंतु इतना याद है कि बातचीत के दौरान उसने अपनी एक समस्या हमारे सामने रख दी । उसने कहा, “अरे यार, तुम लोग तो मैथ्स (गणित) पढ़ते आए हो । पढ़ने को तो हाईस्कूल तक मैंने भी पढ़ी है, लेकिन मैं आजतक गुणा-भाग, एच.सी.एफ-एल.सी.एम. जैसी चीजें बिल्कुल समझ नहीं सका हूं । …”

          हममें से किसी ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, “वाह, ग्रैजुएशन करके एलएल.बी. तक पहुंच गये और कहते हो बिल्कुल समझ में नहीं आता । हम नहीं मानते । …”

          “बस रटे-रटाये तरीके से सब कुछ करते आया हूं, और इम्तिहान भी पास करते रहा हूं । पर सच बताऊं तो यही कहूंगा कि मैथ्स समझ में आती नहीं । मैं किसी को खुद नहीं बता सकता क्यों और कैसे कोई चीज कैल्क्युलेट की जाती है । एच.सी.एफ. कैल्क्युलेट भले कर लूं, लेकिन बता नहीं सकता कि क्यों ऐसे या वैसे कैल्क्युलेट किया जाता है । …”

          मैं उसकी बात समझ रहा था । समझने से उसका तात्पर्य वाकई गंभीर था । मेरी समझ में उसकी दशा कुछ वैसे ही थी जैसे एक आम स्कूटर चलाने वाले की होती है जो स्कूटर चलाना तो बता सकता है, परंतु यह नहीं समझा सकता कि स्कूटर का टू-स्ट्रोक ‘इंटरनल कंबस्चन’इंजन कार्य कैसे करता है, या यह कि क्लच प्लेट्स अपनी भूमिका कैसे निभाते हैं, इत्यादि । मेरी दृष्टि में समझने का मतलब विषय को आत्मसात् करना होता है ।

          उस समय तो बात आई-गई हो गयी । मुझे मालूम नहीं कि किसी ने बाद में उसकी ‘समझ’ बढ़ाने का प्रयास किया या नहीं । बस यह याद रह गया कि गणित की सही समझ हर किसी को हो यह जरूरी है । अध्यापन के अपने व्यावसायिक जीवन में मैंने इस तथ्य को अधिक गहराई से अनुभव किया है ।

          दरअसल मनुष्यों की बौद्धिक क्षमता में बहुत फर्क देखने को मिलता है । मानव समाज में एक ओर कुशाग्रबुद्धि के गिने-चुने लोग होते हैं तो दूसरी ओर मंदबुद्धि के लोग भी मिल जाते हैं । इतना ही नहीं, कोई एक विधा में पारंगत होता है तो कोई दूसरा किसी अन्य विधा में । बिरले ही होते हैं जो कई विधाओं में महारत रखते हों । यह आवश्यक नहीं कि जो गणित के जटिल प्रश्न हल कर सकता हो वह अच्छाखासा उपन्यास भी लिख ले, या बढ़िया पेंटिग भी बना ले । कहने का तात्पर्य यह है कि मेरे साथ के उस छात्र का मस्तिष्क गणित के अनुरूप नही ढला होगा जिसके कारण उसे गणित समझने में दिक्कत रहती होगी । – योगेन्द्र जोशी

ढपोलशंख (या ढपोरशंख) का नाम बहुतों ने सुना होगा कुछएक ने उसकी कहानी भी पढ़ी होगी । मैंने अपने छात्र जीवन में संस्कृत विषय की किसी पुस्तक में पढ़ी थी । ठीक-ठीक याद नहीं, शायद हाईस्कूल कक्षा में पढ़ी होगी । आज के राजनैतिक-प्रशासनिक माहौल में मुझे अक्सर उस कथा का स्मरण हो आता है । पढ़े गये उस पाठ का सार-संक्षेप मुझे अभी भी याद है । उसी का उल्लेख मैं अपने शब्दों में यहां कर रहा हूं ।

एक निर्धन ब्राह्मण अपनी आर्थिक तंगी से दुःखी होकर घर से निकल पड़ा धनोपार्जन करने के लिए । मार्ग में उसे किसी सत्पुरूष ने राय दी कि यदि वह समुद्र के अधिष्ठाता देवता वरुण को तप एवं आराधना से प्रसन्न करे तो उसे समुचित वर देकर वे उसकी निर्धनता हर लेंगे । गरीब ब्राह्मण सरल-हृदय तथा आस्थावान था । वह समुद्र तट पर पहुंचा और वहां तपस्या आरंभ कर दी । कालांतर में वरुण देवता एक संन्यासी के रूप में उसके सामने प्रकट हुए और बोले, “वत्स, बोलो तुम इस एकांत में तल्लीन होकर जप-तप में क्यों लगे हो ? तुम किस समस्या का समाधान पाना चाहते हो ?”

उस ब्राह्मण ने सम्मान के साथ संन्यासी को नमन किया और फिर उसने अपनी व्यथा उन्हें सुनाई । संन्यासी ने अपनी झोली से एक शंख निकालकर कहा, “लो, मैं तुम्हें ‘श्रीशंख’ नामक यह शंख दे रहा हूं जो तुम्हारे कष्ट दूर करेगा । इस शंख की तुम आस्था के साथ पूजा-अर्चना करना और फिर अपनी आवश्यकता के अनुसार इससे अशर्फियों की मांग करना; यह तुम्हारी इच्छा पूरी करेगा । लोभ-लालच में पड़कर अधिकाधिक धन की मांग मत करना । बस अपनी आवश्यकता भर की मांग करना ।”

इतना कहने के बाद संन्यासी अंतर्ध्यान हो गये । ब्राह्मण श्रीशंख को साथ लेकर घर लौटने लगा । मार्ग में रात्रिविश्राम के लिए वह एक गांव में किसी संपन्न व्यक्ति के घर पर ठहर गया । उस व्यक्ति ने भोजन-पानी समर्पित करते हुए उनका आतिथ्य-सत्कार किया । उसके पूछने पर ब्राह्मण ने अपनी निर्धनता और वरुण देवता के वरदान की सभी बातें बिना कुछ छिपाए सुना दीं । उसने श्रीशंख की विशेषता का भी वर्णन कर दिया । उस व्यक्ति की जिज्ञासा शांत करने के लिए ब्राह्मण ने शंख से एक-दो अशर्फियां भी मांगकर दिखा दीं ।

श्रीशंख की खूबी देखकर ब्राह्मण के मेजमान के मन में लालच आ गया । रात में जब ब्राह्मण गहरी नींद में सोया था तो उसने ब्राह्मण की गठरी से श्रीशंख चुरा लिया और उसके स्थान पर दिखने में समान एक साधारण शंख रख दिया । प्रातःकाल किसी प्रकार की शंका किए बिना ब्राह्मण अपने घर के लिए चल पड़ा ।

घर पहुंचने पर उसने प्रसन्न हो अपनी अर्धागिनी को वरुण देवता द्वारा प्रदत्त शंख का रहस्य बताया । तत्पश्चात् स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो शंख की पूजा-प्रार्थना करते हुए कुछ मुद्रा की याचना की । लेकिन वह तो साधारण शंख था, भला उसका क्या उपकार करता; श्रीशंख तो वह मार्ग में ही खो बैठा था ! वह मामला समझ नहीं पाया । उसने निर्णय लिया कि वह दुबारा वरुण देवता की शरण में जाएगा ।

उस निष्कपट ब्राह्मण ने पिछली बार की तरह वरुण देवता की पूजा-अर्चना की; देवता प्रसन्न होकर प्रकट हुए; उन्होंने समझाया कि मार्ग में उसके साथ कैसे धोखा किया गया; और अंत में उन्होंने उसे ढपोलशंख (ढपोरशंख) नाम का नया शंख दिया । वे बोले “देखो, यह शंख तुम्हें कुछ देगा नहीं, लेकिन तुम्हें देने का वादा करेगा जरूर । तुम कहोगे कि मुझे एक अशर्फी दे दें, तो यह कहेगा, ‘एक अशर्फी क्या तुम दस मांगो, बारह मांगो, वह मिलेगा ।’ तुम जितना मांगोगे यह उससे कहीं अधिक मांगने की बात करेगा ।”

देवता ने ब्राह्मण को समझाया, “आगे तुम्हें क्या करना है मैं समझाता हूं । मार्ग में तुम उसी लालची और धोखेबाज मनुष्य के पास ठहरना । उसके समक्ष इस शंख की भूरि-भूरि प्रशंसा करना और इससे एक अशर्फी मांगना । जब यह अधिक मांगने के लिए कहेगा तो तुम कहना, ‘ठीक है, घर पहुंचकर ही मांगूंगा शंख देवता ।’ वह व्यक्ति लालच के वशीभूत हो रात्रि में इस शंख को ले लेगा और श्रीशंख इसके स्थान पर रख जाएगा ।”

ब्राह्मण ने वैसा ही किया जैसा कहा गया था । फलतः उसे उसका श्रीशंख मिल गया जिसे लेकर वह अपने घर लौट आया । उधर उस लालची व्यक्ति ने ब्राह्मण के चले जाने के बाद ढपोलशंख की पूजा-अर्चना की । जब वह कुछ अशर्फियों की मांग करने लगा, तो  ढपोलशंख कुछ अधिक मांगने को प्रेरित करता । वह अधिक मांगता तो शंख उससे भी अधिक मांगने की बात करता । यह सिलसिला कुछ देर तक चलता रहा । अंत में खिन्न होकर वह मनुष्य बोला, “हे शंख देवता, आप और अधिक मांगने की बात कर रहे हैं, किंतु कुछ दे नहीं रहे । कुछ दीजिए तो ।”

वह शंख खिलखिला कर हंस दिया और बोला, “अरे मूर्ख, मैं ढपोलशंख हूं ढपोलशंख । मैं देता-वेता कुछ नहीं, सिर्फ वादा भर करता हूं । देने वाला शंख तो गया उसी के साथ जिसे तुमने धोखा दिया ।”

और तब से समाज के उन लोगों को ढपोलशंख कहा जाता है जिनकी आदत झूठे वादे करने की होती है । दुर्भाग्य से हमारे राजनेता एवं नौकरशाह इसी श्रेणी में आते हैं । – योगेन्द्र जोशी

बीते अगस्त माह के प्रथम सप्ताह मैं सपत्नीक दिल्ली में था । उन दिनों दिल्ली में पर्याप्त वर्षा हो रही थी, लिहाजा वहां की सड़कों के निचले हिस्सों में भारी जलजमाव की स्थिति पैदा हो रही थी । जलजमाव के कारण सड़कों पर यातायात जाम की समस्या तो थी ही, साथ में कुछ जगहों पर वाहनों के पानी में फंस जाने की भी नौबत आ रही थी । यों बरसात के मौसम में इस प्रकार की समस्याएं अपने देश के अधिकांश बड़े शहरों में देखने को मिल जाती हैं ।

दो या तीन तारीख की बात होगी, जब हमें दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में अवस्थित घंटाघर इलाके से पूर्वी छोर पर नौइडा से सटे मयूरबिहार जाना था । इन जगहों के बीच कोई बीस-पच्चीस किलोमीटर की दूरी होगी । लोगबाग आम दिनों यह दूरी बस या आटोरिक्शा से तय करते हैं । हमने भी आटोरिक्शे से जाने का विचार किया, लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी इस लंबी दूरी के लिए तैयार नहीं हुआ । सबको यही डर था कि कहीं फंस गये तो घर वापस लौटना भी मुश्किल हो जाएगा । कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहता था । हार मानकर हमने टैक्सी वाले से संपर्क साधा और उसी से चल पड़े । आटो की तुलना में करीब ढाई गुना किराया देना पड़ा । करते भी क्या, जाना जरूरी जो था । साथ में अटैची-बैग होने के कारण बस-सेवा लेने की भी हिम्मत नहीं थी ।

बताई गयी दूरी को तय करने में डेढ़ घंटे से अधिक समय लग गया । समय बिताने के लिए हमने टैक्सी वाले से ही गपशप शुरू कर दी । हमने दिल्ली की सड़कों, जलजमाव और ट्रैफिक जाम को ही बातचीत का विषय चुना । उसने विस्तार से तकलीफदेह हालातों की जानकारी दी । अपना असंतोष व्यक्त करते-करते वह कहने लगा, “यह सब आज के राजनेताओं की करतूत है जी । सभी भ्रष्टाचार के नाले में डुबकी लगा रहे हैं, उन्हें अपना घर भरने और भाई-भतीजों, यार-दोस्तों को लाभ पहुंचाने से मतलब । खुद ईमानदार होते तो सरकारी आफिसरों पर भी अंकुश रखते । राजनेता-अधिकारी दोनों ही लूट मचाए हैं । इसीलिए न सड़कें टिक पाती हैं, और न ही उनमें जमा पानी की कारगर निकासी हो पाती है । राजनैतिक पार्टियां एक-दूसरे पर कीचड़ उछालती हैं जरूर, लेकिन हैं सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे ।”

मैंने उससे सहमति जताते हुए कहा, “बात तो आप सही कह रहे हैं । इन लोगों को देश की चिंता नहीं; इनकी असली चिंता तो सत्ता हथियाने और उसका भरपूर फायदा उठाने की है । पूरे देश में कमोबेश यही हाल है । इस देश का भगवान ही मालिक है !!”

“एक बात कहूं सा’ब ?”

“जरूर कहिए; आखिर रास्ता जो तय करना है । चुपचाप बैठे रहने से बेहतर है बातचीत चलती रहे ।”

“इधर दिल्ली में एक नयी असेम्बली बिल्डिंग बनने की खबर है … ”

“अच्छा है, एक और मौका मिलेगा धांधली करने का । बिल्डिंग बनेगी तो बनते-बनते गिर भी पड़ेगी ।” मैंने चुटकी ली ।

“वह तो है ही । लेकिन कोई भरोसा नहीं इन लोगों का । हो सकता है मजबूत ही बनवा लें । आखिर उसमें इन्हीं लोगों की बिरादरी बैठेगी न; कोई गरीब जनता के लिए थोड़े ही बनेगी कि जो कमजोर बनने देंगे ।” उसका जवाब था ।

“हां, ये बात भी सही है ।”

“मैं सोचता हूं, सा’ब, कि कोई उस बिल्डिंग के नीचे नींव में डाइनामाइट फिट कर देता । जिस दिन इनॉग्युरेशन (उद्‌घाटन) होता और ढेरों राजनेता उसमें बैठे रहते, उसे उड़ा दिया जाता । अपने आप मरते सब स्सा…”

उसकी बातें सुनकर मैं समझ नहीं पा रहा था कि बदले में मैं क्या बोलूं । इतना मुझे जरूर लग रहा था कि उसके मन में आज के राजनेताओं के प्रति नफरत भरी हुई है । उसकी इस बात पर हम चुप ही रहे । वह अपनी बातें कहते रहा ।

आज राजनेताओं की साख किस कदर गिर चुकी है और लोग उनके प्रति कितना रुष्ट हैं, मुझे इन बातों का अंदाजा उस आदमी की बातों से लग रहा था । – योगेन्द्र जोशी