मोदी सरकार ने हाल में राजभाषा हिन्दी के प्रयोग पर बल दिया है । इस नई सरकार के “हिन्दी प्रेम”के प्रति कई राजनेताओं ने विरोधात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है । प्रखर विरोध तमिलनाडु के दोनों प्रमुख दलों के शीर्षस्थ नेताओं की ओर से देखने को मिला है । अन्य राज्यों के नेताओं ने नाखुशी तो व्यक्त कर दी, लेकिन उनका विरोध जबर्दस्त नही कहा जा सकता है । वस्तुतः तमिल राजनीति हिन्दी विरोध पर टिकी है । वहां के नेतागण इसे अपनी तमिल अस्मिता से जोड़ते हैं । संविधान सभा में जब हिन्दी को राजभाषा बनाने की बात की जा रही थी तब भी यह विरोध था और आज भी है । दक्षिण भारत की अपनी हालिया यात्राओं में मैंने अनुभव किया है कि हिन्दी के प्रति उनके रवैये में बदलाव आता जा रहा है ।

हिन्दी विरोध की बात पर मुझे 1973 में संपन्न दक्षिण भारत की अपनी यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब मैं अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में नया-नया प्रविष्ट हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । तब बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । किसी अन्य शहर से चेन्नै-बेंगलूरु का आरक्षण रेलवे विभाग तार (टेलीग्राम) द्वारा किया करता था जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । लेकिन आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में होती भी नहीं थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । (प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर सोते हुए रातें गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है ।) कुछ ही देर में वहीं मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रह सकते हैं और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । पाश्चात्य समाजों में ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन से यह खासियत अब गायब होने लगी है ।

उन सज्जन को जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर तो हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।”

उनको जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।

उनका उत्तर था, “मैं केरला का रहने वाला हूं और कुछ देर बाद अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकलूंगा । दरअसल मुझे कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से नहीं बात कर सकते ।”

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनसे कहा, “मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उस विरोध का अनुभव भी कर रहा हूं । ऐसा विरोध तो केरला में भी होगा न ?”

“नहीं, ऐसा नहीं है । केरला के लोग व्यावहारिक हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं । आपने केरला की नर्सों को उत्तर भारत के अस्पतालों में भी देखा होगा । केरला के लोग जानते हैं हिन्दी से परहेज उनके हक में नहीं है ।”उनका उत्तर था ।

और कुछ समय बाद वे अपनी रेलगाड़ी पकड़ने चल दिए । इस दौरान उनसे अन्य कितनी तथा कैसी बातें हुई होंगी इसे आज ठीक-से बता पाना संभव नहीं । पर इतना जरूर कह सकता हूं कि ऊपर कही गईं बातें वार्तालाप का सारांश प्रस्तुत करती हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

मैं अपने घर के अहाते में टहल रहा हूं । सड़क पर भोंपू की आवाज आती है – भोंपू जो आजकल मुश्किल से ही कहीं प्रचलन में दिखाई देता है । मैं समझ जाता हूं कि एक कबाड़ी घर के सामने से गुजरने वाला है । कबाड़ खरीदकर ले जाने वाले इस धंधे में लगे अन्य लोग भी इधर से गुजरते हैं, लेकिन कोई दूसरा भोंपू बजाते हुए नहीं निकलता है । हां, “रद्दी अखबार वालाऽ…”, “रद्दी कागज अखबार बेचोऽ…”, “कागज लोहा पेपर प्लास्टीकऽ…” जैसे बोल जोर-जोर से बोलते हुए वे लोग गुजरते जरूर हैं । जब भी संयोग से मुझे भोंपू की आवाज सुनाई देती है तो मैं समझ जाता हूं कि वही कबाड़ वाला गुजर रहा होगा । वह रोज ही यहां से निकलता है या दो-तीन दिन में एक बार यह मैं बता नहीं सकता ।

मुझे याद नहीं कि भोंपू वाले इस “कारोबारी”को मैंने पहले कभी कबाड़ का सामान दिया हो । मेरा मन होता है कि आज इसी को कबाड़ सौंप दूं । मैं अखबार की रद्दी, प्लास्टिक की बोतलें, या इसी प्रकार की बेकार हो चुकी चीजें घर में अधिक जमा नहीं होने देता हूं । बीच-बीच में जब भी ध्यान आता है सड़क पर गुजरते किसी भी कबाड़ी को बुलाकर दे देता हूं । सोचता हूं आज इसी को चुना लिया जाए । मैं अपने अहाते का प्रवेशद्वार खोलता हूं और जैसे ही वह नजदीक आता है इशारे से उसे बुलाता हूं ।

मैं घर के अंदर से चार-पांच किलो पुराने अखबार उठा लाता हूं और उसे सौंप देता हूं । फिर दुबारा अंदर जाकर प्लास्टिक का एक थैला लेकर वापस बाहर आता हूं । मैंने इस थैले में कबाड़ की छोटी-मोटी चीजें जमा कर रखीं हैं । थैला उसे देते हुए कहता हूं, “ये पूरा थैला लेता जाइएगा । इसमें पड़ी कुछ चीजें अगर कबाड़ के काम की भी न हों तो कूड़े में डाल दीजिएगा ।”

“और भी कुछ है, बाबूजी ?” वह जानना चाहता है ।

“नहीं, कबाड़ का और सामान तो अभी नहीं । इतना ही इस समय है; आपकी आवाज सुनी तो सोचा आपको ही क्यों न सौंप दूं । असल में मैं घर में कबाड़ की चीजें अधिक जमा नहीं होने देता हूं । थोड़ा बहुत जो भी बीच-बीच में जमा हो जाता है ध्यान आने पर किसी न किसी को सौंप देता हूं । आज आप ही सही ।”

वह अपना तराजू-बटखरा बोरे से बाहर निकालने लगता है । मैं उसे रोकते हुए कहता हूं, “ये सब तौलने की जरूरत नहीं है; ऐसे ही रख लीजिए ।”

“ऐसे ही रख लीजिए” मेरे इन शब्दों के अर्थ वह कदाचित यह लेता है कि इतना कम तौलने की जरूरत ही क्या है, जो उचित लगे अंदाजे से दे दीजिए । परंतु मेरा मंतव्य दरअसल ऐसा है नहीं । मैं उसे बेचने का इरादा नहीं रखता, बल्कि उसे मुफ्त में दे देना चाहता हूं । मैं कहता हूं, “अरे भई, इसका कोई पैसा नहीं लेना है मुझे । आप यूं ही रख लीजिए ।”

“मुफ्त में लेना भीख मांगना जैसा होगा, बाबूजी । मैं अपने काम से निकला ही हूं । अभी बोहनी का वक्त है, इसलिए आपको कुछ तो लेना ही होगा ।” कहते हुए वह अपना बटुआ खोलकर मेरी ओर बढ़ा देता है ।

“ठीक है, आप कहते हैं तो कुछ ले लेता हूं । बोलिए कितना लूं ?” मैं उससे पूछता हूं ।

“जो आप ठीक समझें ।”

“ठीक है, एक रुपया ले रहा हूं । चलेगा ?”

“ठीक है, जैसा आप चाहें । … लेकिन आप ये अखबार, प्लास्टिक बगैरह मुफ्त में क्यों देना चाहते हैं ?” वह जिज्ञासा व्यक्त करता है ।

“मैंने पिछले कुछ सालों से बेकार हो चुकीं घर की चीजें कबाड़ के तौर पर बेचना बंद कर दिया । मैंने सोचा कि ये सब चीजें मेरे लिए तो बेकार हैं ही; मेरी आमदनी इन पर आधारित तो है नहीं । मैं किसी को दे दूं तो मुझे किसी प्रकार के नुकसान का एहसास होने वाला नहीं । लेकिन कबाड़ की खरीद-फरोख्त में लगे आदमी के लिए ये चीजें रोजीरोटी का आधार हैं । उन्हें तो सभी जगह से इन्हें इकट्ठा करना होता है । उनके लिए ये कीमती चीजें हैं । इसलिए मेरे मन में एक बार विचार आया कि घर में बेकार पड़ी चीजें किसी को क्यों न दे दूं जिसके लिए उसका महत्व हो । बस तब से यह चल रहा है ।”

“ विचार तो अच्छा है, बाबूजी, लेकिन ऐसा कहां कोई सोचता है । अच्छी माली हालत वाला भी कहीं से दो पैसा मिल रहा हो तो छोड़ना नहीं चाहता । … अच्छा बाबूजी, चलूं, नमस्ते ।” कहते हुए वह विदा हो लेता है । – योगेन्द्र जोशी

इस बार मेरे शहर वाराणसी का लोकसभा चुनाव देश भर के लिए सर्वाधिक महत्व का रहा, क्योंकि यहां से बहुचर्चित प्रत्याशी थे नरेन्द्र मोदी और साथ में थे उनको चुनौती देने वाले नवोदित राजनेता अरविंद केजरीवाल । यों इनके अलावा भी मैदान में ताल ठोंकने वाले थे अपने-अपने दलों के प्रत्याशी अजय राय, कैलाश चौरसिया एवं विजय जायसवाल, जिनका अपना-अपना जनाधार रहा है । इन पाचों को मिलाकर मैदान में थे कुल 42 प्रत्याशी जिनमें अधिकांश अज्ञात श्रेणी के थे । इतनी बड़ी संख्या के लिए तीन-तीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था की गई थी प्रत्येक पोलिंग बूथ पर । इतने प्रत्याशी मैदान में क्यों उतरे होंगे यह वे ही बता सकते हैं, पर मतदान को पेचीदा बनाने में उनका योगदान अवश्य रहा ।

वस्तुतः वाराणसी इस बार “वीआईपी”चुनाव क्षेत्र बन गया था । मेरे लिएयह चुनाव इसलिए माने रखता था कि मैं एवं मेरी पत्नी स्थायी बाशिंदे होने के कारण इस क्षेत्र के लंबे अर्से से मतदाता हैं । इस बार के चुनाव में मुझे कुछएक ऐसे अनुभव हुए जो मेरी दृष्टि में चुनाव आयोग की घटिया कार्यप्रणाली दर्शाते हैं ।

हमारी कालोनी के चुनाव स्थल पर दो अलग-अलग कमरों में अलग-अलग मतदाता सूची के अनुसार मतदान प्रक्रिया चली । पहले कमरे पर मतदाताओं की संख्या इतनी कम थी कि वहां लाइन लगााने की जरूरत ही नहीं थी, जब कि दूसरे पर मतदाताओं को लंबी लाइन में इंतिजार करना पड़ रहा था । एक दिलचस्प लेकिन आपत्तिजनक बात जो मैंने वहां देखी वह है कि कुछ मतदाताओं के नाम दोनों ही सूचियों में मौजूद थे । पोलिंग बूथ पर पहुंचने पर जब हम अपने को मिले मतदाता पर्ची के अनुसार उस लंबी लाइन में लगे तो एक युवक हमारे पास पहुंचा और बोला, “अंकलजी, आप दोनों का नाम तो पहली सूची में भी है । क्यों न वहीं वोट डाल दें । लंबी लाइन में लगने से बच जाएंगे ।”

लाइन में लगने से बच जाएं और तुरंत मतदान करके छुट्टी पा जाएं इससे भला और क्या हो सकता था । लाइन छोड़ हम वहीं पहुंच गए । उस कमरे के प्रभारी ने आरंभ में मेरी पहचान पर शंका जाहिर की लेकिन फिर मान लिया कि मैं सही मतदाता हूं । मतदान की शेष प्रक्रिया संपन्न की गई और मैंने मशीन का वांछित बटन दबाकर मत व्यक्त कर लिया । लेकिन समस्या मेरी पत्नी के साथ आई जब मतदान कर्मचारियों ने कहा कि उनका नाम सूची में “विलोपित”श्रेणी में है । यानी वे मतदाता हुआ करती थीं लेकिन अब नहीं रहीं । अजीब बात कि पति-पत्नी सालों से साथ-साथ अपने निजी मकान में रहते आए हैं और उनमें से एक का नाम गायब ! बहस करना निरर्थक रहा । इस विलोपित श्रेणी को मतदाता सूची में रखने का औचित्य हमारी समझ से परे था । हम बाहर निकले और मेरी पत्नी वापस उसी लाइन में फिर से लग गईं जिसे छोड़कर आईं थी । इस बीच लाइन में और लोग जुड़ चुके थे, जिसके कारण अतिरिक्त विलंब झेलना पड़ा । डेड़एक घंटे में वह अपना मत दे पाईं ।

मैंने मतदाताओं की परस्पर भिन्न दो-दो सूचियों की बात ऊपर कही है और बता चुका हूं कि कुछ व्यक्तियों के नाम दोनों में मौजूद थे । ऐसी सूचियों को मैं आयोग की अकुशल एवं दोषपूर्ण कार्य प्रणाली के प्रमाण के तौर पर देखता हूं । ऐसी सूची दोहरे मतदान की संभावना कैसे पैदा करती हैं इसे मैं एक अनुभव से स्पष्ट करना हूं ।

मतदान के दूसरे दिन प्रातः मैं अपने घर के पास की सब्जीसट्टी पर गया । वहां मैं एक परिचित युवक के पास पहुंचा जो ठेले पर सजाकर सब्जी बेच रहा था । खरीद-फरोख्त के दौरान उसने पूछा, “अंकल, कल वोट तो दिया ही होगा । किसको दिया वोट ?” 

मैंने अपने वोट के बारे में बताने के बजाय उल्टे उसी से पूछ डाला, “तुम बताओ तुमने किसको वोट दिया ?”

  “मैंने तो दो-दो वोट डाले कल, दोनों अलग-अलग जनों को ।”उसका उत्तर था ।

“सो कैसे ?” मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा ।

“हुआ यह कि मैं सुबह ही वोट डाल आया । घर लौटने पर मेरे पड़ोसी दोस्त ने कहा, ‘तुम्हारा नाम तो दोनों लिस्ट में है । क्यों न दुबारा वोट डाल आते हो ।’सो मैं दुबारा वोट डाल आया ।”

“दूसरी बार भी उसी प्रत्याशी को वोट दिया होगा ।” मैंने अनुमान लगाया ।

“नहीं अंकलजी, पहली बार मैंने मोदी को वोट दिया और दूसरी बार केजरीवाल को । असल में दोनों ही अच्छे हैं । इसलिए दोनों को ही एक-एक वोट दे दिया ।” उसका जवाब था ।

“लेकिन तुम्हारी अंगुली पर तो स्याही का निशान रहा होगा; दुबारा कैसे वोट डाल पाए ?” मैंने सवाल किया ।

“दरअसल मेरे दोस्त ने उसकी काट भी मुझे बताई । उसने कहा कि निशान ताजा है सो पपीते के सफेद चेप से साफ हो जाएगा । वही मैंने किया । यों टॉयलेट की सफाई में इस्तेमाल होने वाले एसिड से भी साफ हो जाता है ।”

“अच्छा ठीक है, अभी तुम अपने ग्राहकों को सब्जियां तौलो ।” कहते हुए मैं घर लौट आया ।

इतना बता दूं कि वह युवक किसी अन्य पोलिंग बूथ का मतदाता था । उसकी बातें सुनकर मैं सोचने लगा कि अगर मतदाताओं के नाम एकाधिक सूचियों में हों और वे अंगुली पर लगा निशान मिटाकर दुबारा-तिबारा मत प्रयोग करें तो चुनाव परिणाम विश्वसनीय नहीं रह सकते । - योगेन्द्र जोशी

दो रोज पहले की बात है जब मेरी मुलाकात एक ऐसे रिक्शा वाले से हुई जिसका व्यवहार आम रिक्शाचालकों से कुछ हटकर था, जिसकी सोच आम आदमी से भिन्न थी, और जिससे बात करना दिलचस्प था । हुआ यह कि कल मैं सपत्नीक घर से गोदौलिया कार्यवशात गया था । गोदौलिया मेरे शहर वाराणसी का पुराना और घनी बस्ती वाला व्यापारिक स्थान है, जिसके निकट ही सुचर्चित बाबा विश्वनाथ मंदिर और गंगातट का दशाश्वमेध घाट हैं । बेहद भीड़भाड़ वाले इस जगह के ‘गोदौलिया चौराहे’ पर आवागमन हेतु सामान्यतः रिक्शा ही उपलब्ध हो पाते हैं । थ्रीह्वीलर आटोरिक्शे करीब आधा-पौन किलोमीटर दूर मिलते हैं । वहां से हम रिक्शा से लौटे थे ।

संध्या का समय था । गौदौलिया से लौटते समय जब हम लंका तक के लिए रिक्शा खोज रहे थे तो संयोग से एक नौजवान रिक्शावाला बगल में आ खड़ा हुआ और बोला, “लंका चलना है न ? आइए, बैठिए ।” और आगे रिक्शाभाड़े के बाबत खुद ही कहने लगा, “वैसे तो लंका तक का किराया चालीस रुपया होता है, लेकिन चूंकि मुझे उसी तरफ जााना है, इसलिए केवल तीस रुपया दे दीजिएगा ।” (बताता चलूं कि लंका हमारे घर के निकट है और वहीं पर सुविख्यात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का प्रवेशद्वार है ।)

भाड़े पर हामी भरते हुए हम रिक्शे पर बैठ गये, और वह चल पड़ा । नौजवान होने के कारण रिक्शा चलाने में उसे खास मशक्कत नहीं करनी पड़ रही थी ऐसा मुझे लगा । मार्ग में वह रामभक्ति के गीत/भजन गाने लगा । बीच रास्ते हमने उससे कहा, “बेटा, हमें लंका के अगले चौराहे यूनिवर्सिटी गेट वाले से पास छोड़ देना ।”

“आप जहां कहें वहां छोड़ दूं ।” उसका जवाब था ।

“तो क्या तुम सुंदरपुर तक चलोगे ?” हमने उससे पूछा ।

“छोड़ तो देता लेकिन अब रिक्शा जमा करने का समय हो रहा है ।”

“यह रिक्शा किराये पर लिए हो क्या ? कितना किराया भरना पड़ता है इसका ? और लंका के पास ही रहते हो क्या ?”

“चालीस रुपया रोज पडता है । लंका से सामनेघाट की ओर कुछ दूरी पर है मालिक की दुकान । गंगा पार रामनगर में मेरा घर है; वहीं से निकल जाऊंगा घर के लिए ।” उसने उत्तर दिया ।

रास्ते भर मुक्त भाव से उसे भजन गुनगुनाते देख मैंने पत्नी से कहा कि लगता है यह व्यक्ति तनाव में नहीं रहता होगा । जिज्ञासावश मैंने उससे पूछा, “लगता है भजन-कीर्तन की पुस्तकें पढ़ने का शौक है । कितने तक पढ़े हो भई ।”

“बाबूजी, स्कूल गये तो थे लेकिन हमें कुछ आता नहीं था । बस टीचर लोग हर साल अगली कक्षा में बढ़ा देते थे । क्या बताऊं ?”

“फिर भी पढ़ना-लिखना तो आता ही होगा ।”

“हां, थोड़ा-बहुत पढ़-लिख लेता हूं काम भर का, ज्यादा नहीं ।”

तब तक हम लंका पहुंच चुके थे । मैंने पत्नी से इशारे से कहा, क्यों न चालीस रुपया भाड़ा दे दें । पत्नी ने सहमति जताई और उसे मैंने यह धनराशि चुका दी । वह बोला, “लेकिन बाबूजी मैंने तो आपसे तीस ही रुपये मांगे थे । चूंकि मुझे इधर आना था तो सोचा कि जो भी मिल जाए अच्छा ।”

“ठीक है, हम अपनी मरजी से दे रहे हैं ।” कहते हुए हम रिक्शे से उतरने लगे तो उसने रिक्शे के हत्थे पर लटक रहे अपने झोले से कागज के कुछ पन्ने निकाले और हमें सोंपते हुए बोला, “आपको याद होगा, अभी दो-चार पहले राहुल गांधी शहर के रिक्शाचालकों से मिले थे । मैं भी उनसे मिला था; उन्हें एक पत्र भी सोंपा था । यह उसी की कापी है । मैंने उन्हें एक गीत भी सुनाया ।”

उसने भोजपुरी में शब्दबद्ध एवं भारतमाता को संबोधित वही गीत, “माई, माई …” हमें सुना डाला । उस गीत के बोल हमें याद नहीं हैं, लेकिन इतना ध्यान है कि उसमें देश की गरीब जनता की व्यथा का जिक्र करते हुए भारत मां से उनके कष्ट मिटेंगे यह प्रश्न पूछा गया था । मेरे इस सवाल पर कि वह गीत किसका लिखा है, उसने बताया कि गीत स्वयं उसी का लिखा है । मैंने पूछा, “क्या इसकी लिखित प्रति भी रखे हो ? अगर हो तो वह भी दे दो ।”

उसका उत्तर था, “गीत की प्रति तो मेरे पास नहीं है, लेकिन आपको यह इंटरनेट पर मिल जाएगा । बनारस के रिक्शा वालों से आप राहुल जी की बातचीत उनकी जिस साइट पर मिलेगी वहीं यह भी मिल जाएगा ।”

उक्त वार्तालाप के पश्चात हमने उसकी रुचियों पर उसे बधाई के साथ शुभकामनाएं दीं और घर लौट आए । दरअसल धन-दौलत और ऐशो-आराम के बाबत भी उसने अपने खयालात हमारे सामने पेश किए थे । हम दोनों उसकी बातों से प्रभावित थे, क्योंकि वह हमें आम रिक्शावाले से कुछ हटकर लगा । बाद में मैंने इंटरनेट पर उस गीत को खोजने का प्रयास किया, किंतु मुझे वह मिल नहीं सका । गीत तो नहीं परंतु उसके द्वारा लिखित उपर्युक्त पत्र की प्रति वाकये के इस विवरण के साथ संलग्न है । – योगेन्द्र जोशी

Rickshawmans let2Rahul

रेलगाड़ी एवं बसों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए बैठने के स्थान बहुधा आरक्षित रहते हैं । वरिष्ठ का मतलब उस व्यक्ति से है जो वयसा साठ साल या अधिक का हो चुका हो । बसों/रेलगाड़ियों के संदर्भ में तो यह परिभाषा काफी पहले से प्रचलन में रही है । इसके विपरीत आयकर विभाग कुछ वर्ष पहले तक पैंसठ अथवा उससे अधिक की उम्र ले चुके व्यक्ति को ही वरिष्ठ मानता था । परंतु अब उस विभाग में भी उक्त परिभाषा लागू हो चुकी है । वरिष्ठ नागरिकों को वहां भी आयकर की किंचित छूट प्राप्त हो जाती है । अन्य कई क्षेत्रों में भी वरिष्ठों को सिद्धांततः किसी न किसी प्रकार की रियायत देने के नियम हैं, जैसे अस्पतालों में । सभी वरिष्ठ नागरिकों को उन रियायतों की जानकारी हो ही यह आवश्यक नहीं है । जहां सुविधाएं आरक्षित हों वहां भी उसका लाभ मिल ही जाए जरूरी नहीं । संबंधित अन्य लोग इन प्रावधानों की परवाह करते ही हों यह आवश्यक नहीं ।

मेरी पत्नी एवं मैं वरिष्ठ नागरिक हैं । मुझे वरिष्ठ दिखना एवं कहलाना सम्मानजनक लगता है मैंने सुना है कि कुछ लोग उम्र छिपाने के इच्छुक होते हैं और वे उम्रदराज न लगें इसके लिए सिर के बालों को खिजाब से रंगते भी हैं । लेकिन मुझे उम्र के साथ बालों का सफेद होना स्वाभाविक लगता है । मेरे बालों में अभी सफेदी कम ही है, लेकिन मैं चाहता हूं कि वे हिमवत श्वेताभ हों । आखिर उम्र का सयानापन भी तो कहीं झलके । सयानापन न भी हो तो कम से कम उसका भ्रम तो पैदा हो । बुजुर्ग लगने वाले को लोग कुछ तो सम्मान देते ही हैं ऐसा मैं समझता हूं । कभी-कभी ऐसा स्पष्टतः अनुभव में आता भी है । इस संबंध में मुम्बई की एक हालिया घटना मेरे स्मरण में आती है, जिसका जिक्र मैं यहां पर करना चाहता हूं ।

हाल ही में कभी हम पति-पत्नी कुछ दिनों के प्रवास पर मुम्बई में थे । एक दिन हम उस महानगर के समुद्र तट पर स्थित ख्यातिप्राप्त “गेटवे-आफ-इंडिया” के आसपास भ्रमणार्थ निकले । वापसी के लिए हमने स्थानीय रेलगाड़ी यानी लोकल ट्रेन चुनी जो “चर्च-गेट रेलवे टर्मिनस” से लेनी थी । गेटवे-आफ-इंडिया से चर्च-गेट तक की दूरी हमने महानगर की स्थानीय बस सेवा से तय की । संबंधित नगरीय बस इन्हीं दो स्थानों के बीच चलती है । मेरे अनुमान में दोनों स्थानों के बीच की दूरी पांच-एक किलोमीटर से अधिक नहीं होगी ।

हमें जो बस मिली वह सवारियों से पहले ही भर चुकी थी, और तुरंत ही चलने को तैयार थी । अगली बस का इंतिजार करने के बजाय हमने उसी से गंतव्य तक जाने का विचार किया । बस के अंदर सभी सीटें भरी हुई थीं, अतः हम चालक के पास के प्रवेशद्वार के निकट खड़े हो लिए । उस भीड़ में हमारे लिए यह पता करना कठिन था कि कहीं आसपास की दो-एक सीटें वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित हैं या नहीं । दरअसल नगरीय बसों से चलने के आदी न होने के कारण हमें इस संभावना का ख्याल तक नहीं था । मेरा सोचना है कि अन्य सवारियां भी उस आरक्षण के प्रति सामान्यतः सचेत नहीं रहती होंगी । वरिष्ठ नागरिकों का आवागमन भी इन बसों के माध्यम से शायद कम ही होता होगा, जिसके कारण ये सीटें अक्सर खाली रहती होंगी और उन पर अन्य सवारियां बैठ जाती होंगी ।

बस के चल चुकने के एक-दो मिनट पश्चात एक युवती अपनी सीट से उठी और मेरी ओर मुखातिब होकर बोली, “आप इस सीट पर बैठ जाइए ।

मैंने पत्नी को इशारा किया कि वह अमुक सीट ग्रहण कर लें । उनके बैठ जाने पर बगल में बैठी पुरुष सवारी भी उठ खड़ी हुई, मुझे उस स्थान पर बैठने का संकेत करते हुए । शायद उसको भी लगा होगा कि बैठने का वह स्थान हम वरिष्ठों के लिए छोड़ देना चाहिए । इस प्रकार सौभाग्य से हमें बैठने की जगह मिल गई, वरिष्ठ नागरिक होने के नाते । हमने इस बात पर गौर नहीं किया कि वे सीटें वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित थीं अथवा नहीं । यह भी हो सकता है कि उन दो सवारियों ने मात्र सदाशयता के नाते हमारे लिए बैठने का स्थान छोड़ा हो । जो भी हुआ हो, ऐसे अवसरों पर एक प्रकार का संतोष-भाव मन में अवश्य उपजता है । – योगेन्द्र जोशी

          रेलगाड़ी से लंबी यात्रा करना बहुतों को उबाऊ लगता है, लेकिन मेरे लिए वह अधिकांश मौकों पर काफी दिलचस्प सिद्ध होता है । मैं अपने साथ यात्रा के दौरान विविध प्रकार की पढ़ने की सामग्री लेकर चलता हूं । बीच-बीच में बदलाव के लिए खिड़की के बाहर के दृश्य भी देख लेता हूं । चाय-कॉफी जैसे पेय अगर मिलते रहें तो यात्रा का आनंद बढ़ जाता है, और ऊब का सवाल नहीं के बराबर रह जाता है । अगर रेलगाड़ी के डिब्बे में उछल-कूद मचाने, हंसने-रोने में लगे छोटे-बड़े बच्चे मौजूद हों, अथवा ऐसे यात्री हों जो किंचित असामान्य हरकतों में लगे दिखें या रोचक वार्तालाप के नजारे पेश कर रहे हों, तो यात्रा का समय कैसे कट जाता है पता नहीं चलता । मैंने पाया है कि कुछ लोग अपनी निजी जानकारी भी साथी यात्रिकों के साथ साझा कर बैठते हैं, अन्यथा आम तौर पर समसामयिक राजनैतिक घटनाएं उनके बीच बहस का अच्छा-खासा विषय बन जाता है, जिसमें कब कौन भाग ले ले कहा नहीं जा सकता । और भी यात्रा के दौरान बहुत-कुछ देखने-सुनने को मिल जाता है । आगे मैं ऐसी ही एक घटना का जिक्र कर रहा हूं ।

चंद रोज पहले मैं अपनी सहधर्मिणी के साथ वाराणसी से मुंबई की एसी 2-टियर डिब्बे में बैठकर यात्रा कर रहा था । खिड़की से सटी ऊपर-नीचे की आरक्षित शायिकाएं (बर्थ) हमें मिलीं हुई थीं । सामने की चार बर्थों (ऊपर-नीचे मिलाकर) में से तीन पर एक ही परिवार के पति-पत्नी एवं उनकी युवा बेटी यात्रा कर रहे थे । उस परिवार की प्रौढ़ महिला नीचे की एक शायिका पर लेटकर झपकी ले रही थीं, जब कि सामने की शायिका उस समय कदाचित खाली थी । डिब्बे में अन्यत्र आरक्षित शायिकाओं वाली दो महिलाएं उस खाली शायिका पर बैठकर गपशप में मशगूल हो गई थीं । उन यात्रिकों ने हमारी ओर के पर्दे खींचकर थोड़ा फैला दिए थे । हम दोनों खिड़की के पास बैठे हुए पत्रिकाएं पढ़ने में व्यस्त हो गए थे ।

उस ओर से आने वाली आवाजें हमारे कानों पर पड़ तो रही थीं, किंतु हम उन पर खास ध्यान नहीं दे रहे थे । फिर कुछ समय बाद अनायास उधर से जोर-जोर से बोलने की आवाज आने लगी । हम समझ नहीं पाये कि माजरा क्या है, लेकिन तुरंत ही अंदाजा लग गया कि उस तरफ बैठे दोनों पक्षों के बीच पहले गरमागरम बहस और फिर उससे आगे बढ़कर तू-तू-मैं-मैं शुरू हो चुकी है । हुआ क्या यह जानने की इच्छा हमारे मन में भी जगी । मामले के बारे में हम अनुमान ही लगा सकते थे, क्योंकि उन लोगों से सीधे-सीधे पूछना किसी को भी उचित या अस्वीकार्य लग सकता था । उनकी आपसी बहस पर ध्यान देने पर हमें समझ में आया कि वहां बैठे परिवार की युवती ने अन्य दोनों महिलाओं से शायद यह कहा, “आप लोग हौले-से बातें करते तो मेहरबानी होती; देखिए इधर मेरी मां भी सो रही हैं ।”

उसका यह निवेदन उन महिलाओं को शायद पसंद नहीं आया । उन्होंने प्रतिक्रिया में शायद यह कहा, “आप पहले अपनी मां के खर्राटे बंद क्यों नहीं करवा रही हैं ? क्या दूसरों को उससे परेशानी नहीं होती ?”

 “देखिए सोते हुए व्यक्ति का अपने खर्राटों पर कोई वश नहीं चलता, लेकिन हौले से बातें करना तो आपके वश में है न ? दोनों बातों की तुलना ठीक नहीं ।”

हमारी नजर में मामला बहुत गंभीर नहीं था । परंतु मामला तब बिगड़ ही जाता है जब लोगों के अहम को चोट लगती है । “सामने वाले की यह हिम्मत कि हमें टोके !” का भाव बहस के दौरान लोगों के मन में अक्सर पैदा हो जाता है और एक-दूसरे की बात समझने से वे इंकार कर बैठते हैं । शायद ऐसा ही कुछ तब हुआ होगा और बात तू-तू-मैं-मैं तक जा पहुची ।

उस ‘झगड़े’ का दिलचस्प पहलू यह रहा कि दोनों ही पक्ष जल्दी ही अंगरेजी पर उतर आए, यानी तू-तू-मैं-मैं तुरंत ही अंगरेजी में होने लगी । एक पक्ष की आवाज सुनाई दी, “यू लैक मैनेरिज्म; लर्न दैम ।”

दूसरे पक्ष के शब्द सुनाई दिये, “फर्स्ट यू योअरसेल्फ लर्न मैनेरिज्म बिफोर टेलिंग अदर्स ।”

कुछ देर ऐसे ही चलता रहा । मुझे मन ही मन हंसी आ रही थी । हम भारतीयों की खासियत यह है कि जब कभी हमें दूसरों पर गुस्सा आता है तो हम अपनी भावना व्यक्त करने में भी अंगरेजी की मदद लेते हैं । अंगरेजी में गुस्से का इजहार अधिक प्रभावी होता है इस विचार से शायद अधिकतर ‘शिक्षित’ भारतीय ग्रस्त रहते हैं । मैं समझता हूं कि कई लोगों के लिए अंगरेजी बोलना दूसरे पर रॉब झाड़ने या उसे स्वयं को हीन अनुभव कराने में मददगार होता है । या हो सकता है वे अनजाने ही अंगरेजी पर उतर आते हों ।

उस घटना के अगले दो-चार मिनट मुझे और भी अधिक रोचक लगे । उन दो महिलाओं के साथ का एक किशोर भी अगल-बगल के किसी शायिका से अवतरित होकर उस कांड में शामिल हो गया । वह बीच-बीच में “यू शट अप !” के शब्द बोलकर दूसरे पक्ष को चेतावनी देने लगा । ऐसा करते समय वह हर बार अपने दांये हाथ के अंगूठे तथा मध्यमा अंगुली से चुटकी बजाता और तर्जनी को दूसरे पक्ष की ओर तान देता । उसका मुख भी तमतमा उठता । उसके हावभाव देख हम मन ही मन खूब हंसे ।

कुछ देर तक इस तमासे को देखने के बाद अपनी श्रीमतीजी अधीर हो बैठीं और उठकर सामने के पर्दे के पास चली गईं । उन लोगों की ओर मुखातिब हो वे बोलीं, “देखिए, आप दोनों ही को मैनरिज्म सीखने की जरूरत है । एक छोटी-सी बात को लेकर झगड़ना कौन-सा मैनरिज्म है ? कंपार्टमेंट में और यात्री भी बैठे हैं, उनके सामने तमासा खड़ा करना बुद्धिमानी नहीं है । अरे भई, यात्रा में कई प्रकार की दिक्कतें हो सकती हैं । अक्सर थोड़ा-बहुत एड्जस्ट करना पड़ जाता है ।”

संयोग से उन्होंने उक्त बातों पर आपत्ति नहीं जताई । बहुत संभव है कि हमारी बढ़ी उम्र का लिहाज किया हो । कारण जो भी हो, दोनों पक्ष शांत जरूर हो गए । – योगेन्द्र जोशी

          जिस घटना का जिक्र मैं इस स्थल पर करने जा रहा हूं वह मुझसे सीधे तौर पर नहीं जुड़ी है, बल्कि वह दो-तीन रोज पहले के अखबार में प्रकाशित एक समाचार पर आधारित है । “मुर्गी से इश्क लड़ाने पर मुर्गे को मार दिया तीर” शीर्षक के साथ छपी घटना का विवरण हिंदी दैनिक जागरण के 26 दिसंबर के अंक में देखा जा सकता है । मामला अलीराजपुर का है । ये स्थान कहां है इसका अंदाजा मुझे नहीं, किंतु घटना के विवरण से यही लगता है यह किसी आदिवासी क्षेत्र में है, जहां तीर-कमान प्रचलन में हैं ।

अखबारों में तो तमाम प्रकार की घटनाएं छपती रहती हैं, जो प्रायः राजनैतिक उथल-पुथल, आरोप-प्रत्यारोप, और प्रशासनिक संवेदनहीनता एवं लापरवाही से लेकर हत्या-डकैती-दुष्कर्म आदि जैसी विचलित करने वाली खबरों से जुड़ी रहती हैं । खबरें सभी प्रकार की प्रकाशित होती हैं, जिनमें कुछएक का विशेष सामाजिक महत्व होता है तो अधिकांश अन्य पढ़कर आई-गई के तौर पर भुला दी जाती हैं । किंतु कभी-कभी कोई घटना ऊपरी तौर पर  महत्वहीन होते हुए भी अपने पीछे विचारणीय सवाल छोड़ जाती है । कम से कम मुझे तो अक्सर ऐसा लगता है । उक्त घटना की खबर पढ़ने पर मेरे मन में सवाल उठा कि कुछ मनुष्य गुस्से में विवेकशून्य होकर तुरंत ही आत्म-संयम क्यों खो बैठते हैं ? क्यों वे कुछ क्षण ठहरकर अपनी प्रतिक्रिया के घातक परिणामों पर विचार नहीं कर पाते हैं ? अस्तु, मैं घटना की बात करता हूं ।

खबर यह थी कि दो भाई – कदाचित सगे, जिसका स्पष्ट उल्लेख खबर में नहीं – पड़ोसी थे और हैं । एक के घर में मुर्गी पली थी तो दूसरे के घर में संयोग से मुर्गा । हो सकता है उनके पास और भी मुर्गे-मुर्गियां रही हों, लेकिन घटना में किरदार निभाने वाले एक मुर्गी ओर एक मुर्गा बताए गये हैं । ये दोनों रहे तो पक्षी जाति के, उन्हें क्या मालूम कि उनके मालिकों के बीच अच्छे संबंध नहीं हैं । उन्हें यह समझ नहीं रही कि उन्हें भी मालिकों की भांति आपस में दूरी रखनी चाहिए । उनमें से कोई एक दूसरे के पास पहुंच गया । बहुत संभव है कि मुर्गा ही मुर्गी के पास पहुंचा हो । अपनी प्रजाति का कोई सदस्य आसपास टहल रहा है यह देख दूसरे मन में उससे नजदीकी बढ़ाने की इच्छा स्वभावतः जगी हो । विपरीत लिंग के सदस्यों के बीच ऐसा आकर्षण खास तौर पर देखा जाता है । खबर के अनुसार मुर्गा मुर्गी से ‘इश्क लड़ाने’ पहुंचा था । इश्क का इजहार कैसे किया जा रहा होगा यह अनुमान लगाने की बात है ।

बहरहाल मुर्गी के मालिक को वह इश्कबाजी नागवार लगी । उसे गुस्सा आया और चल दिया घर के भीतर अपना तीर-कमान लेने । हो सकता है उसने मुर्गे को दो-एक बार भगाया हो, लेकिन ढीठ मुर्गा माना न हो जिससे तीरंदाज मुर्गी-मालिक का गुस्सा और भड़क गया हो । घर से बाहर आकर उसने मुर्गे पर निशाना साधा और उस पर तीर छोड़ दिया । बेचारे मुर्गे को अपनी हरकत की सजा मिल गयी; तीर उसके शरीर के आर से पार निकल गया । यह तो गनीमत रही कि उसके मालिक (दूसरा भाई) को पता चल गया और ले गया उसे पशु-चिकित्सक के पास जिसने संभव उपचार आरंभ कर दिया । उसकी जान बच गई और वह स्वास्थ्यलाभ करने लगा । उसके मालिक ने घटना के बाबत पुलिस में रिपोर्ट कर दी । उधर मुर्गी का मालिक गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हो गया ।

मनुष्य को ऊपर वाले ने सोचने-विचारने की क्षमता दे रखी है । तब भी वह उल्टी-सीधी हरकतों से बाज नहीं आता है । लाख समझाया जाए तो भी कई मनुष्य गलत-सलत कार्य से बचने की कोशिश नहीं करते । बेचारे पशु-पक्षी तो ऐसी समझ पाये नहीं हैं । उन पर ‘सभ्य मानव समाज’ के नियम-कानून तो लागू होते नहीं हैं । तब उन पर क्या गुस्सा करें ? हां, यदि वे असुविधा पैदा कर रहे हों या किसी प्रकार की हानि पहुंचा रहे हों तो उन्हें डराया-भगाया जा सकता है । नियंत्रित रखने के लिए न्यूनाधिक ताड़ना भी की जा सकती है । लेकिन गुस्से में उनकी जान तक लेने का विचार विवेकहीनता का ही द्योतक कहलाएगा ।

तीर चलाने वाले उस व्यक्ति को यह तो मालूम रहा ही होगा कि वह जो कार्य करने जा रहा है वह अनुचित हैा । इसीलिए तो वह बाद में फरार हो गया । जाहिर है गुस्से के अधीन की गई करतूत की कीमत चुकानी ही पड़ी । दरअसल पूरी घटना की कुछ न कुछ कीमत दोनों ही पक्षों को चुकानी पड़ी । मिला क्या ? केवल तसल्ली इस बात की कि मैंने जो हुआ उसे सहा नहीं और मुर्गे को ‘सबक’ सिखा दिया, गोया कि मुर्गा यह समझ सकता हो कि उसे भविष्य में ऐसी नासमझी नहीं करनी चाहिए!

इस प्रकार की घटनाएं हमें अक्सर देखने-सुनने को मिलती हैं । मैंने महसूस किया है कि अनेकों मनुष्य बात-बात पर क्रोधित हो जाते हैं, अपना आपा खो बैठते हैं, और गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त कर बैठते हैं । अवांछित एवं हानिप्रद व्यवहार किसी एक व्यक्ति तक सीमित हो ऐसा नहीं होता, अपितु पूरा जनसमूह ऐसी हरकत पर उतर आता है । कहीं कोई नहीं रह जाता जो कहे कि जरा ठंडे दिमाग से घटना के बारे में सोचा जाना चाहिए और संयमित प्रतिक्रिया क्या हो इस पर विचार करना चाहिए । कहीं किसी वाहन से दुर्घटनावश किसी की जान निकल गयी तो वहां से गुजरने वाले वाहनों की तोड़फोड़ या उनकी आगजनी पर लोग उतर आते हैं । अस्पताल में गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु पर भी इसी प्रकार की प्रतिक्रिया देखने को मिलती है । ऐसी खबर भी सुनने को मिल जाती है जिसमें किसी बात पर गुस्सा होने पर परिवार का कोई सदस्य साल-छः महीने के बच्चे की पटककर जान ले लेता है, अथवा अपनी ही जान गंवा देता है ।

मुझे लगता है कि अनेक जन प्रतिकूल एवं खिन्न करने वाली परिस्थितियों में आत्मसंयम एवं विवेक खो बैठते हैं, और फलतः अनर्थ कर बैठते हैं । हम चाहें या न, यही इस जीवन का कटु एवं अपरिहार्य सत्य है । - योगेन्द्र जोशी