हिंदी की दुरवस्था का एक अनुभव यह भी

January 30, 2010 by योगेन्द्र जोशी

मेरे मोहल्ले में बंदरों का आतंक छाया हुआ है । पहले यहां बंदर नहीं दिखाई थे, लेकिन कोई डेड़ दशक पहले उन्होंने अपने कदम यहां जो रखे तो उसके बाद लौटने का नाम नहीं लिया । तब सुना गया था कि संकटमोचन मंदिर (वाराणसीवासियों की असीम श्रद्धा का प्रतीक प्रख्यात हनुमान् मंदिर) से खदेड़े जाने पर ही उन्होंने इस मोहल्ले में शरण ली थी । कालांतर में वे इस स्थान के स्थाई बाशिंदे हो गये । आप कहेंगे बंदर तो अपने देश के प्रायः सभी शहरी इलाकों में दिखाई दे जाते हैं, आपके मोहल्ले में भी हैं तो आश्चर्य ही क्या है, न होते तब आश्चर्य होता । आप सच कह रहे हैं । जैसे आदमी गांव-देहात छोड़कर शहर में बसने चले आ रहे हैं, ठीक वैसे ही बंदर भी अपना आशियाना शहरों में खोज रहे हैं । कारण दोनों के अलग-अलग भले ही हों । खैर इन बंदरों की मौजूदगी का हिंदी से कोई लेना-देना नहीं । मुझे तो हिंदी से जुड़े एक अनुभव का जिक्र करना है, जिसका मंकी (बंदर) शब्द से संबंध अवश्य है । इसीलिए इतना कह गया । सो सुनिए उसके बारे में ।

बस दो रोज पहले की ही बात है । सुबह-सुबह मैं निकल गया अपने घर के सामने की चालीस-फुटा सड़क पर करीब सौ मीटर चलते हुए पास के मुख्य मार्ग पर दुकान से कुछ सामान लेने । लौटते वक्त आठएक साल का एक बच्चा, जो मेरे मकान के सामने ही रहता है, मुझे मिल गया सड़क के किनारे किसी का इंतिजार-सा करता हुआ । जैसे ही मैं उसके पास से गुजरा, उसने मुझे देखा और दौड़कर मेरे बगल में आ गया । मुझसे लगभग सटते हुए-सा वह मेरे साथ चलने लगा । मैं उस बच्चे को जानता तो था ही, पर कभी राह चलते उससे बात की हो या वह दो कदम भी मेरे साथ चला हो ऐसा याद नहीं पड़ता । सो उसके उस समय के बरताव से मैं कुछ चौंेका । मैंने पूछ डाला, “क्यों भई, क्या हो गया जो मेरे साथ बगल में चल रहे हो ?”

उसने सामने आगे सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, “वहां मंकी हैं, काटते हैं ।”

“मंकी हैं या बंदर ?” मैंने पूछा, जानने के लिए कि देखूं क्या जवाब देता है । सामने कुछ दूरी पर दो-तीन बंदर दिखाई दे रहे थे । मोहल्ले के बंदर कभी-कभी काटने भी दौड़ पड़ते हैं, खासकर तब जब उन्हें छेड़ा जाए । उस बच्चे का डर स्वाभाविक था और वह कदाचित् मेरे साथ खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा था ।

मेरे सवाल का जवाब उसने यों दिया, “बंदर तो हिंदी में कहते हैं, अंगरेजी में तो मंकी कहते हैं ।”

मैंने उसे टोकते हए कहा, “पर तुम तो हिंदी में बोल रहे हो, अंगरेजी में तो नहीं ।”

वह चुप रहा । उसके पास मेरे प्रश्न का शायद कोई उत्तर नहीं था । वयसा आठएक साल के उस बच्चे के पास भला क्या उत्तर हो सकता था ? कह नहीं सकता कि उसके मन में कोई विचार उठे भी होंगे । लेकिन एक चीज मैं महसूस कर रहा था । उस बच्चे के मन में स्कूली पढ़ाई यह विचार भर रही थी कि तुम्हें अंगरेजी सीखना ही नहीं, बल्कि उसे बोलना भी है । और उसकी शुरुआत अपनी रोजमर्रा की बोली में अधिकाधिक अंगरेजी शब्दों को ठूंसने से ही होगी । अंगरेती की श्रेष्ठता एवं अनिवार्यता और हिंदी की निरर्थकता के भाव उसके मन में उपजाये जा रहे होंगे ऐसा मेरा विश्वास है ।

स्थिति का समुचित आकलन करने में उस बच्चे की पृष्ठभूमि पर विचार करना आवश्यक है । बता दूं कि उसके दादा पांच भाइयों में से एक हैं । आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षिक तौर पर पिछड़े वर्ग के पांचों भाई मेरे घर के सामने छोटे तथा अतिसामान्य अलग-अलग मकानों में गुजर-बसर करते हैं । कभी इन भाइयों के बाप-दादा इस मोहल्ले की कृषि योग्य पूरी जमीन पर मालिकाना हक रखते थे । करीब पचास वर्ष पूर्व जब उनकी जमीन पर कालोनी विकसित हुई तो वे लोग जमीन के एक छोटे-से टुकड़े में सिमटकर रह गये । जमीन का जो भी मूल्य तब मिला होगा उसका सदुपयोग उनके बाप-दादा शायद नहीं कर पाये । मौजूदा पांचों भाई निपट निरक्षर हैं, अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तरह । इन भाइयों के बच्चों — जिनकी कुल संख्या बीस-पच्चीस है और जिनमें से केवल तीन-चार ही शादीशुदा तथा बाल-बच्चेदार हैं — तक अब साक्षरता पहुंच चुकी है, लेकिन मात्र प्राथमिक दर्जे की । शायद एक या दो ने हाईस्कूल तक पढ़ भी लिया है, किंतु उसके आगे नहीं । भाइयों के बाद की इस बीच की पीढ़ी के सदस्य अब स्कूली पढ़ाई के प्रति सजग हो चुके हैं । वे स्वयं भले ही अंगरेजी न जानते हों, किंतु अंगरेजी की महत्ता को समझने लगे हैं । और इसी कारण अपनी सीमित आमदनी के भीतर वे अपने बच्चों को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने के बजाय चौराहे-चौराहे पर खुल चुके आजकल के ‘इंग्लिश मीडियम’ निजी विद्यालयों में से किसी एक में भेज रहे हैं । वह बच्चा ऐसे ही किसी स्कूल से ‘बंदर’ के बदले ‘मंकी’ कहना सीख गया है ।

यह वाकया एक कटु सच को उजागर करता है । वह यह कि जैसे-जैसे अपने देश की उम्र बढ़ रही है, वैसे-वैसे अंगरेजी की जड़ें ‘इंडियन सोसाइटी’ में गहरे उतरती जा रही हैं, और हिंदी अपने ही लोगों के मध्य तिरस्कृत होती जा रही है । वाकई विचित्र है इस देश के बाशिंदों का रवैया । – योगेन्द्र जोशी

दहेज में कार: सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल

January 9, 2010 by योगेन्द्र जोशी

अपने देश की विशेषता को कई जन ‘अनेकता में एकता’ जैसे वाक्यांश से व्यक्त करते हैं । वास्तव में विलक्षण है अपना देश । यह विचित्रताओं, विसंगतियों, और विरोधाभासों का धनी है । यहां परस्पर विरोधी बातें एक साथ देखने को मिल जाती हैं और सामाजिक विकृतियों की भरमार है, जिनकी आलोचना विभिन्न मंचों से की जाती रही है । फिर भी वे परंपरा के नाम पर जीवित हैं और लोगों के द्वारा खुलकर अपनाई जाती हैं । ऐसी विकृति में एक है दहेज प्रथा । दहेज लेना तथा देना, दोनों, अनुचित हैं । यदि आप सर्वेक्षण पर निकल पड़ें तो शायद ही दो-चार लोगों को पायेंगे, जो दहेज को स्वीकार्य प्रथा के तौर पर मान्यता देते हों । अधिकांश लोग इसे कुरीति कहेंगे और इसके विपक्ष में बोलेंगे, परंतु जब उनके व्यवहार पर गौर करेंगे तो ठीक इसका उल्टा पायेंगे । उनका तर्क होगा ‘क्या करें जी, इसी समाज में रहना है, जो प्रचलित है उसके हिसाब से ही चलना होगा न !’ मतलब साफ है । किसी बात को सिद्धांततः अनुचित कहना एक बात है, और उस अनुचित बात को अमल में न लाना दूसरी बात । दोनों एक साथ देखने को मिलेंगी आपको अपने हिंदुस्तान में ।

जहां तक दहेज का सवाल है, मैंने अनुभव किया है कि एक ओर इसे निंद्य तथा त्याज्य घोषित किया जाता है तो दूसरी ओर इसे सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक समझा जाता है । अक्सर देखने में आता है कि वर के माता-पिता अधिक से अधिक दहेज मिले इसकी लालसा करते हैं । संपन्न होने पर कन्या के अभिभावक भी दहेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, और ऐसा करके वे अपनी ‘हैसियत’ दिखाने की अघोषित इच्छा पूरी करते हैं । हैसियत न हो तो भी कन्यापक्ष के लोग अपनी ‘इज्जत’ के लिए अच्छे दहेज के प्रबंध में जुट जाते हैं । मतलब यह कि दहेज दोनों ही पक्षों के लिए प्रतिष्ठा की बात होती है

कदाचित् कुछ लोग यह सोचते होंगे कि प्रेम-विवाह के मामलों में दहेज का सवाल और प्रतिष्ठा की बात नहीं उठती होंगी । यदि लड़का-लड़की घर वालों की मरजी के बिना ही विवाह करने पर तुल जायें तो बात अलग है । अन्यथा वहां भी दहेज की बात उठ ही जाती है, प्रतिष्ठा के नाम पर । लेकिन प्रतिष्ठा बचाने के चक्कर में दिलचस्प एवं असामान्य कदम भी कभी-कभी लोग उठाते होंगे, यह मैं कभी सोच नहीं सकता था । लेकिन हाल की एक रोचक घटना ने मेरी धारणा ही बदल दी । उसी का ब्यौरा आगे प्रस्तुत है ।

मेरे पड़ोस में वर्षों पहले एक परिवार रहता था । उस परिवार का दस-बारह साल का एक लड़का यदाकदा मेरे पास आया करता था अपनी पढ़ाई-लिखाई के संबंध में । मैं उसकी मदद कर देता था । तब उसके तथा मेरे बीच अच्छे संबंध स्थापित हो गये थे । बाद में वह परिवार दूसरे शहर चला गया था । उस लड़के का जब कभी मेरे शहर आना होता था तो मुझसे अवश्य मिल लेता था । साल-छः महीनों में कभी फोन वगैरह से भी वह मेरे हाल पूछ लेता था । अब तो वह पच्चीस-तीस साल का नौकरी-पेशा युवक है ।

एक दिन मध्याह्न में अप्रत्याशित रूप से वह मेरे घर पहुंच गया । हमारे बीच सामान्य शिष्टाचार तथा पारिवारिक कुशलक्षेम की बातें हुईं । जिज्ञासावश मैंने उसके आने का कारण भी पूछा । उसने बताया कि वह अपने एक मित्र के विवाहोत्सव में सम्मिलित होने आया है । वैवाहिक कार्य कब और कहां होना है इत्यादि की जानकारी भी मैंने उससे लेनी चाही । बातों-बातों में उसने कहा कि उसके मित्र का विवाह दरअसल प्रेम-विवाह है । मित्र के बताये अनुसार उसके परिवार के सदस्य आरंभ में उस रिश्ते के विरोध में थे । उसकी होने वाली पत्नी के घर वाले भी इच्छुक नहीं थे, क्योंकि दोनों पक्षों में जातीय भेद था ।

मेरे परिचित उस युवक ने विस्तार से बताना आरंभ किया कि पे्रमी युगल की जिद पर कन्यापक्ष तो तैयार हो गया; आखिर लड़की की शादी का सवाल जो था । हमारे हिंदू समाज में लड़की की शादी करना कोई आसान काम तो होता नहीं; कुछ नहीं तो दहेज की समस्या उठ खड़ी हो जाती है; उसी को लेकर बात बनते-बनते अक्सर बिगड़ जाती है । कन्या पक्ष को उम्मींद थी कि हांमी भरने पर दहेज की समस्या शायद न रहे ।

उधर प्रेमासक्त युवक के घर वाले भी जात्यंतर को लेकर विवाह के विरोध में थे । किंतु इससे बड़ी समस्या उनके सामने दहेज को लेकर थी । युवक के बड़े भाई की शादी दो-तीन वर्ष पूर्व बड़े धूमधाम से हुई थी और उसमें अच्छा-खासा दहेज भी परिवार को मिला था । तब संपन्न हुए विवाह को लेकर मित्रों-संबंधियों में प्रशंसात्मक चर्चा रही थी । पर इस बार उन लोगों को डर था कि दहेज से हाथ धोना पड़ेगा और उसके साथ ही उनकी ‘प्रतिष्ठा’ दांव पर लग जाएगी । बड़े भाई के मामले में स्वीकारे गये दहेज के मद्देनजर वे लोग दहेज के विरोधी तथा सादे विवाह के पक्षधर होने का दिखावा नहीं कर सकते थे ।

प्रेमी युगल युवक के परिवार की इच्छा के विरुद्ध अदालत या मंदिर में जाकर दांपत्यसूत्र में बंध सकता था, जैसा कि बहुधा सुनने को मिलता है । लेकिन वे इतना गंभीर कदम भी नहीं उठाना चाहते थे । अतः उनके प्रयास जारी रहे । अंत में वे सफल भी हो गये, लेकिन युवक के परिवार की दहेज की मांग पूरी किए जाने की शर्त पर ।

दहेज को लेकर एक दिलचस्प बात मेरे परिचित युवक को उसके मित्र ने बताई थी । वह यह कि दहेज में एक कार की मांग मित्र के परिवार वालों ने कन्यापक्ष के सामने रख दी, और कार भी ऐसी-वैसी नहीं, बड़ी तथा थोड़ी महंगी, छः-साड़े-छः लाख तक की, उनकी प्रतिष्ठा के अनुकूल । दहेज में कार की मांग आजकल सामान्य बात हो चुकी है इस बात को समझते हुए लड़की वाले कार के लिए राजी तो हो गये, परंतु महंगी कार उनके बजट में ‘फिट’ नहीं हो रही थी । वे अधिक से अधिक चार-साड़े-चार लाख तक खर्च करने को तैयार थे, लेकिन मांग पूरी करने में डेड़-दो लाख अधिक चाहिए थे । मामला कुछ पेचीदा होने जा रहा था । जहां एक पक्ष अपनी आर्थिक सीमा का हवाला देते हुए रियायत की मांग कर रहा था, वहीं दूसरा पक्ष अपनी इज्जत दांव पर लगी देख रहा था ।

जब महंगी कार की बात दूसरे शहर में नौकरी कर रहे उस प्रेमी युवक के कान तक पहुंची तो वह थोड़ा घबड़ाया । बड़े सौभाग्य से तो उसके विवाह का संयोग बन रहा था, और अब डर लग रहा था कि बात फिर कहीं अटक न जाए । उसने लाखएक का जुगाड़ अपनी जेब से किया और अपनी प्रेमिका के माध्यम से उनकी मदद कर दी । आखिर वह उस परिवार का भावी दामाद जो था । उसने सोचा कि विपदा में मदद करने का कर्तव्य उसे विवाह से पूर्व ही निभाना आरंभ करना चाहिए । इस मदद के बारे में किसी को पता न चले यह उसने स्पष्ट कर दिया था ।

उसी दौरान लड़की के पिता द्वारा वरपक्ष को मनाने का प्रयास भी चलता रहा । लड़के के पिता इस बात पर टिके रहे कि कार तो प्रतिष्ठा के अनुरूप ही रहनी है । कुछ सोच-विचार करने के बात समस्या सुलझाने हेतु उन्होंने खुद लाख-एक की मदद करने का प्रस्ताव लड़की के पिता के सामने रख दिया । लड़की वालों को राहत मिल जाये और वरपक्ष की इज्जत भी रह जाये इससे भली बात और क्या हो सकती थी । मेरा परिचित युवक उसी मित्र के पाणिग्रहण संस्कार में शामिल होने आया था इसी बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या हुआ होगा ।

उस विवाह के बारे में इतना सब बताने के बाद उस युवक ने टिप्पणी करते हुए कहा, “चाचाजी, दहेज को लेकर बनते हुए रिश्तों का टूटना अपने समाज में कोई नई बात नहीं है । दहेज के चक्कर में विवाहिताओं के प्रताड़ित किए जाने की घटनाएं भी सुनने में आती रहती हैं । लेकिन कन्यापक्ष से लिए जाने वाले दहेज में वरपक्ष भी अपना योगदान देता हो ऐसा आपने पहले कभी सुना है क्या ?”

मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि उत्तर क्या दूं । मैंने हंसते हुए कहा, “अविश्वसनीय है यह वाकया, पर तुम कह रहे हो तो विश्वास करना ही पड़ेगा । झूठ तो मुझसे बोलोगे नहीं ।”

“विश्वास कीजिए, एकदम सच है ।” कहते हुए वह भी मेरे साथ हंस दिया । – योगेन्द्र जोशी
(अपनी जानकारी में आई एक घटना पर आधारित । यहां पर कुछ घुमा-फिराकर विवरण प्रस्तुत किया गया है, सकारण ।)

असफल भविष्यवाणी की एक घटना

December 10, 2009 by योगेन्द्र जोशी

मेरे एक मित्र हैं, छात्रजीवन के सहपाठी । वैज्ञानिक विषयों में उनकी रूचि बचपन से ही रही है । ज्योतिष में उनका तनिक भी विश्वास नहीं है, यद्यपि उनके पुरखे कभी पौरोहित्य कर्म के साथ ज्योतिष का कार्य भी करते थे । लेकिन अब शायद ही कोई बचा होगा जो इस खानदानी व्यवसाय में रह गया हो । मेरे मित्र ने एक बार मुझसे ज्योतिषिक भविष्यवाणी से संबंधित एक घटना का जिक्र किया था, जो उनके कुटुम्ब में कभी घटी थी और जिसके बारे में उन्होंने अपने पिताश्री के मुख से काफी कुछ सुन रखा था । घटना कोई सौ-सवासौ वर्ष पहले की है, अर्थात् उन्नीसवीं सदी के अंत की । मित्र के पिताजी ने बताया था कि उनके दादाजी (मित्र के परदादा) ने ज्योतिषिक गणना से प्रेरित होकर ही पहले से ही विवाहित पुरुष से अपनी बेटी का विवाह सोच-समझ कर संपन्न किया था । लेकिन वही ज्योतिष उन्हें यह संकेत नहीं दे सका था कि उनकी बेटी जल्दी ही विधवा भी हो जायेगी । मित्र के द्वारा बयान किया गया किस्सा मुझे काफी रोचक लगा । हुआ क्या इसे सुनाता हूं ।

मित्र के कथनानुसार उनके परदादा एक बार अपने एक रिश्तेदार के यहां कन्यापक्ष के निमंत्रण पर वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने गये थे । रिश्तेदार के यहां पहुंची हुई बारात में उनके होने वाले दामाद भी बतौर बाराती पहुंचे थे । बारातियों और घरातियों के बीच भेंट-मुलाकातों और परस्पर परिचय की औपचारिकताओं के दौरान परदाद का अपने भावी दामाद से साक्षात्कार हो गया । भावी दामाद भी स्वयं ज्योतिष में रुचि रखते थे, अतः दोनों को बातचीत के लिए अच्छा विषय मिल गया । वार्तालाप के दौरान भावी दामाद ने अपने होने वाले श्वसुर के सामने अपनी जन्मकुंडली में ग्रहों की क्या स्थिति है इसका पूरा ब्यौरा प्रस्तुत कर दिया । मित्र के परदादा ने कुछएक क्षण की मौखिक ज्योतिषिक गणना और विचार-मंथन के पश्चात् उनको इस अहम ‘तथ्य’ से अवगत कराया कि उनके भाग्य में द्वि-विवाह का योग है । उन्होंने यह भी भविष्यवाणी कर दी कि उनकी पहली पत्नी अपनी एकमात्र संतान के साथ कालांतर में परलोकवासी हो जायेंगी ।

परदादा के भावी दामाद के लिए यह सब सुनना चिंताजनक था । ज्योतिष में गहरी आस्था के कारण वे कही गयी बातों को हंसते हुए नहीं नकार सकते थे । कदाचित् उनके अपने ज्योतिष-ज्ञान क अनुसार कथित बातों में शंका की गुंजाइश नहीं थी । मुद्दा सचमुच में गंभीर लगने लगा । दोनों ने मिलकर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि जब प्रथम पत्नी का मृत्युयोग है ही तो दूसरा विवाह कर लेना ही उचित है । और जब दूसरा विवाह करना ही है तो उसे समय पर कर लेना ही बुद्धिमत्ता होगी । बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा और बात यहां तक पहुंच गयी कि परदादा ने अपनी ही विवाह-योग्य कन्या का प्रस्ताव भावी दामाद के समक्ष रख दिया । इस प्रकार उस दिन के विवाह समारोह के अवसर पर दोनों के बीच काफी कुछ निश्चित हो गया । बाद में विवाह-प्रस्ताव की बात आगे बढ़ी और कालांतर में मित्र के पिताश्री की बुआ का पाणिग्रहण संस्कार भी संपन्न हो गया । बुआ एवं फूफा की उम्र में करीब बीस वर्ष का अंतर रहा होगा । ध्यान रहे कि तत्कालीन हिंदू समाज में प्रायः सर्वत्र कन्याएं कम उम्र में बाह दी जाती थीं, तेरह-चौदह साल या उससे भी कम उम्र में । पुरुषों की उम्र पर विशेष प्रतिबंध नहीं होता था; उनका दूसरा-तीसरा विवाह चालीस-चालीस वर्ष में होना असामान्य बात नहीं होती थी ।

विवाह के पश्चात् दो-चार वर्षों का समय ठीक से बीत गया । और फिर किसी रोग की चपेट में आकर मित्र के पिताश्री के फूफाजी की पहली पत्नी और उनके एकमात्र आत्मज की अकाल मृत्यु हो गयी । परदादा की भविष्यवाणी सच सिद्ध हो गयी । यह ज्योतिष की सफलता का एक उदाहरण था । लेकिन बात यही पर समाप्त नहीं हो गयी । कालांतर में बुआ-फूफा के एक-एककर के तीन संतानों का भी जन्म हुआ । लग रहा था समय उनके अनुकूल बीत रहा था । लेकिन फिर उनके भाग्य ने पलटा खाया और फूफाजी की भी अकाल मृत्यु हो गई । उस समय वे करीब पचास वर्ष के रहे होंगे और बुआ लगभग तीस साल की । विधवा हो चुकने पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने तीन छोटे बच्चों की समुचित परवरिश की । आगे क्या हुआ वह ज्योतिष के संदर्भ में अहमियत नहीं रखता ।

मेरे मित्र को आज तक यह समझ में नहीं आया है कि जिस ज्योतिष ने उनके परदादा को अपनी पुत्री का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न करने हेतु प्रेरित किया वही ज्योतिष उनको धोखा कैसे दे गया कि उनकी बेटी को वैधव्य का दंश झेलना पड़ा । मित्र का कहना है कि यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो सही भविष्यवाणी कर पाना संभव ही नहीं है । मनुष्य केवल अनुमान लगा सकता है । अल्पकालिक अनुमान के सही ठहरने की गुंजाइश अधिक होती है, लेकिन दीर्घकालिक अनुमान के सही सिद्ध होने की संभावना अधिक नहीं हो सकती । – योगेन्द्र जोशी

प्रतिष्ठा का सवाल: खरीदारी महंगी कार की

November 12, 2009 by योगेन्द्र जोशी

प्रदर्शन की लालसा या प्रवृत्ति प्रायः हर मनुष्य के व्यक्तित्व का एक खास पहलू होता है । मैं इसे एक हानिकारक कमजोरी के रूप में देखता हूं, क्योंकि मानव समाज की कई समस्याओं का मूल इसी में देखा जा सकता है । उदाहरणार्थ, हमारे समाज में संपन्न व्यक्तियों के यहां तड़क-भड़क के साथ विवाह रचे जाते हैं, दूसरों को अपनी हैसियत और दौलत दिखा-दिखाकर । देखा-देखी में अन्य लोग भी ऐसे ही प्रदर्शन के चक्कर में पड़ जाते हैं, भले ही उनकी हैसियत कमतर हो । ऐसे मौकों पर धन की जो बरबादी होती है उसका समाजोपयोगी कार्यों में निवेश हो सकता है, किंतु ऐसा होता नहीं है ।

कम ही लोग होते हैं, जो इस प्रवृत्ति से मुक्त हों, संस्कारवश अथवा आत्मसंयम के द्वारा । जो लोग ऊपरी तौर पर दिखावे की मानसिकता से मुक्त दिखते हैं उनमें अधिकतर वे होते हैं जिनके पास इतना कुछ नहीं होता है कि प्रदर्शन कर सकें; उनकी मजबूरी होती है । दिखावे की बात में बहुत कुछ शामिल हो सकता है; जो कुछ भी आपके पास हो, और जो सामान्यतः कम ही लोगों के पास हो । जैसे औरतों के मामले में दैहिक सौंदर्य तथा आकर्षक आभूषण । पुरुषों के लिए लंबी-चौढ़ी, गठी हुई काया । गोरापन तो सबके लिए ही आकर्षण की चीज है । जो किसी कला में विशेष रूप से पारंगत होता है, वह मन ही मन यह सोचकर प्रमुदित होता है कि अन्य जन उस कला को ईर्ष्या की दृष्टि से देखते हैं । जिसके पास विशेष बौद्धिक क्षमता होती है वह भी अपनी तेज बुद्धि प्रदर्शित करने के अवसर नहीं छोड़ता है । हर चीज का प्रदर्शन हर समय, हर जगह, संभव नहीं होता है । परंतु एक चीज है जिसके प्रदर्शन के अवसर नहीं खोजने पड़ते हैं, वह है धन-संपदा, दौलत । और यह प्रदर्शन है जिसने आज के जमाने में अन्य सब चीजों को पीछे छोड़ दिया है । आपके रहन-सहन के स्तर पर तो लोगों की दृष्टि न चाहते हुए भी पड़ ही जायेगी । आप सड़क पर ऐसी कार में बैठकर निकलें जिसके टक्कर की पूरे मुहल्ले या इलाके में इक्का-दुक्का ही हो तो भला किसकी नजर आपकी संपन्नता पर नहीं पड़ेगी, कौन आपकी दौलत का कायल नहीं होगा ?

दिलचस्प बात तो यह है कि प्रदर्शन का रोग व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि इसकी चपेट से समाज के विभिन्न समुदाय और राष्ट्र भी नहीं बचे हैं । विश्व के संपन्न एवं सक्षम देश उन मौकों को हाथ से नहीं जाने देते हैं, जब वे दूसरों को मूक शब्दों में कह सकें कि देखा हम तुमसे कितना आगे हैं । ऐसे प्रदर्शनों को स्वस्थ और प्रतिष्ठात्मक माना जाता है । लेकिन जब प्रतिष्ठा के नाम पर प्रदर्शन करने के चक्कर में हम अपनी प्राथमिकताओं को ही भूल जायें, तब उसे क्या बुद्धिमत्ता कहेंगे ? निश्चय ही हम सबका उत्तर एक जैसा नहीं रहेगा; सोच अपनी-अपनी ।

खैर, बहस को लंबा खींचने की आवश्यकता नहीं है । इन बातों के माध्यम से मैं भूमिका बांध रहा था दिखावे के एक वाकये का जिक्र बयान करने के लिए । कोई तीन-चार साल पहले की बात है यह, सुनिए: मेरे एक परिचित हैं, पेशे से बैंक अधिकारी और ऋण लेन-देन के मामलों को जानने-समझने वाले । एक दिन वे मुझसे मिलने आए थे । अन्य बातों के अतिरिक्त पारिवारिक जनों की कुशल-क्षेम की बातें भी हमारी बातचीत का एक हिस्सा थीं । उनके छोटे भाई का जिक्र छिड़ने पर उन्होंने उसके प्रति अपनी नाखुशी और खिन्नता मेरे समक्ष कर व्यक्त कर दीं । उन्होंने बताया कि पेशे से चिकित्सक उनका छोटा भाई अब दिल्ली जैसे महानगर के एक निजी अस्पताल में कार्यरत है । उसका वेतन अच्छा है, किंतु इतना अधिक नहीं है कि बिना सोचे-समझे अनाप-शनाप खर्च करने के लिए पर्याप्त हो । वे बोले कि आजकल डाक्टरी पेशे में सुस्थापित होने में ही कई वर्ष लग जाते हैं । हर आदमी को व्यावसायिक जीवन के आरंभिक वर्षों में अपनी प्राथमिकताओं को सोच-विचार कर तय करना चाहिए और हिसाब-किताब लगाकर ही अपनी आमदनी को विभिन्न मदों पर खर्च करना चाहिए । मैं उनकी बातों से सहमत था ।

समस्या क्या है पूछे जाने पर वे बोले, “मेरे छोटे भाई को निजी वाहन, कार, चाहिए थी । ठीक है, दिल्ली जैसे महानगर में कार की काफी उपयोगिता है इसे मैं स्वीकारता हूं । मेरे वृद्ध हो रहे माता-पिता भी स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उसी के साथ रहते हैं । उन्हें अस्पताल ले-जाने-लाने में, परिवार को सामाजिक समारोहों में ले चलने, अतिथियों की आवभगत करने आदि में कार की उपयोगिता मुझे भी दिखती है ।”

“तो ठीक है, खरीद ले न एक कार । कार रखने की उसकी हैसियत तो अब हो ही रही है । और कारें भी तो अब कितनी सस्ती हो चुकी हैं? ढाई-तीन लाख में !” मैंने अपना मत व्यक्त किया ।

“वह ढाई-तीन लाख की कार से खुश होता तब न ? यही तो समस्या है । उसे छः-सात लाख की कार चाहिए थी । और इतनी महंगी के लिए उसके पास जमा-पूंजी तो थी नहीं । लोन लेकर खरीद ली । मैंने समझाया था कि अभी सस्ती कार से काम चला लो दो-चार साल में जब तुम्हारी आर्थिक स्थिति मजबूत हो जाए तो दूसरी खरीद लेना । मुझे अंदाजा था ही पांच-सात लाख के लोन की अदायगी-किश्तें काफी भारी भरकम पड़ेंगी । बताया भी था कि खामखा उसे अपना बजट ‘टाइट’ करना पड़ेगा । मेरी माना नहीं ।”

मैंने सवाल किया, “आपने पूछा नहीं कि क्यों वह महंगी कार के चक्कर में था ।”

“पूछा, जरूर पूछा । उसका कहना था कि उसके अस्पताल में डाक्टरों के पास एक से एक बढ़िया कारें हैं, कइयों की तो ‘इंपोर्टेड’ । उनके बीच रहकर सस्ती कार ? इज्जत का सवाल था । भला संगी-साथी क्या सोचेंगे – बेचारा ढंग की कार भी नहीं रख सकता ! आप ही बताएं, फिर मैं भला क्या कहता ।”

आगे क्या बातें हुई माने नहीं रखती हैं । अपने अंतिम शब्दों के तौर पर यही कह सकता हूं कि ऐसी घटनाएं समाज में व्याप्त अपनी-अपनी हैसियत दिखाने की मानसिकता के द्योतक होती हैं । – योगेन्द्र जोशी

आरक्षित रात्रिकालीन रेलयात्रा और तिथि-वार का भ्रम

October 30, 2009 by योगेन्द्र जोशी

रेलगाड़ी से यात्रा करना कभी-कभी असामान्य अनुभव दे जाता है, ऐसे अनुभव जो कभी आनंदित कर जाता है तो कभी परेशानी में डाल देता है और कभी आपको एक नसीहत दे जातक है । चार-छः रोज पहले की एक ऐसी ही स्मरणीय घटना का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं । बात तब की है जब मैं दिल्ली से वाराणसी की रेलयात्रा शिवगंगा एक्सप्रेस नाम की गाड़ी से कर रहा था, जो संध्याकाल दिल्ली से रवाना होती है और दूसरे दिन प्रातः अपने गंतव्य वाराणसी पहुंचती है । गाड़ी रात के करीब एक बजे कानपुर पहुंचती है, जहां पर कई यात्री चढ़ते-उतरते हैं ।

जैसा आम तौर पर होता है, गाड़ी के किसी बड़े रेलवे स्टेशन पर ठहराव के समय प्लेटफार्म पर ही नहीं आरक्षित डिब्बों के भीतर भी हलचल शुरू हो जाती है । अधिकांश यात्रियों की नींद ऐसे अवसरों पर खुल ही जाती है, भले ही घनघोर निद्रा का अर्धरात्रि से अधिक का समय ही क्यों न हो । डिब्बे के भीतर की चहल-पहल और शोर-शराबे में मेरी भी नींद खुल गयी । तब मैंने देखा की अनुमानतः अधेड़ अथवा उससे कुछ कम उम्र की एक महिला अपनी शायिका (बर्थ) खोज रही हैं । मैंने अक्सर देखा है कि अधिकांश रेलयात्री यह हिसाब नहीं लगा पाते हैं कि डिब्बे के अंदर उनकी आरक्षित शायिका कौन-सी और कहां पर होनी चाहिए । उन्हें शायिका-संख्या के लिए डिब्बे की दीवालों पर लगी चिप्पियों पर गौर से नजर डालनी पड़ती है । सीधे अपनी शायिका तक पहुंचना कोई कठिन काम नहीं है, क्योंकि शायिकाएं सुनियोजित रूप से क्रमांकित रहती हैं । अस्तु, मैंने उनकी शायिका संख्या 49 (निचली) की ओर इशारा किया । उन्होंने अपना सामान वहां फर्श पर रखा और आश्वस्त होकर शायिका पर बैठ गयीं ।

कुछ ही सेकंड या मिनट भर का समय गुजरा होगा कि एक और यात्री वहां पहुंचा, तकरीबन पैंतीस वर्ष का युवक । उसने भी उसी शायिका (संख्या 49) पर अपने आरक्षण का दावा पेश किया । दोनों के पास आरक्षण का टिकट था और दोनों ही का ही दावा था कि उसी शायिका पर उनका आरक्षण है । दोनों भ्रमित थे और अपने-अपने दावे को सही बता रहे थे । यह जरूर था कि महिला का आरंभिक आरक्षण प्रतीक्षा संख्या 1 के साथ हुआ था, और उसके कथनानुसार पहले दिन पूर्व ही शायिका संख्या 49 के आबंटन के साथ ही उसके आरक्षण की पुष्टि (कंफर्मेशन) हो गयी थी । मेरी जानकारी के अनुसार प्रतीक्षा सूची के यात्रियों के आरक्षण की पुष्टि भले ही बाद में हो जाए, किंतु किसको कौन-सी शायिका मिलेगी यह आरक्षण-चार्ट बनते समय ही नियत होता है । तब उस महिला को कैसे यात्रा से एक दिन पहले ही शायिका संख्या की जानकारी मिल गयी यह प्रश्न मेरे लिए अनुत्तरित था । हो सकता है मेरी जानकारी सही न हो । खैर, मैंने उन दोनों के बीच की समस्या में अपने को उलझाने की जरूरत नहीं समझी । गनीमत की बात यह रही कि दोनों आपस में नहीं झगड़े, बल्कि दोनों ने संचालक (कंडक्टर) का इंतजार करना या उसको खोजना ही मुनासिब समझा ।

अब तक गाड़ी कानपुर स्टेशन छोड़ चुकी थी । कुछ ही मिनटों के पश्चात् डिब्बे में नये प्रविष्ट यात्रियों के टिकटों की पड़ताल करते हुए कंडक्टर वहां पहुंचा । दोनों यात्रियों ने शायिका संबंधी समस्या उसके समक्ष रखी । एकबारगी वह भी चकरा गया । उसके पास उपलब्ध आरक्षण सूची में उस महिला का कहीं नाम नहीं था । उसके टिकट पर प्रतीक्षित ही तो लिखित था । फलतः उसने उस युवक को सूची के अनुरूप शायिका सोंप दी । महिला बार-बार जोर डाल रही थी कि रेलवे अंतरजाल (इंटरनेट) पृष्ठों के अनुसार उसे आरक्षण मिल चुका था । कंडक्टर “अच्छा देखते हैं” कहते हुए उस समय आगे बढ़ गया । इस बीच महिला ने अपने घर मोबाइल से भी बात की और वहां से जवाब मिला कि आरक्षण तो होना ही चाहिए । तो गड़बड़ कहां हुई ? महिला की बातों से लग रहा था कि वह झूठ नहीं बोल रही थी । अवश्य उसे और उसके घर वालों को धोखा हो गया था । सच पूछें तो उस मामले से मेरा कोई वास्ता नहीं था, फिर भी मुझे जिज्ञासा हो रही थी कि जानूं माजरा क्या है ।

अंत में घूम-फिरकर कंडक्टर दुबारा वहां पहुंचा । उसने महिला के टिकट पर एक बार फिर से नजर दौड़ाई । पहली नजर में टिकट ठीक ही लग रहा था । तब आरक्षण सूची में उसका नाम क्यों नहीं है इसे शायद वह भी नहीं समझ पा रहा था । उसने टिकट पर की एक-एक प्रविष्टि को दुबारा गौर से देखना आरंभ किया । ‘यात्रा की तिथि’ पर पहुंचते ही माजरा उसके समझ में आ गया । उसने साश्चर्य महिला से कहा, “बहिनजी, आपकी ट्रेन तो कल ही जा चुकी है । इस पर तो 23 की तारीख (शुक्रवार) अंकित है, और आज 24 तारीख (शनिवार) है । यह टिकट तो अब वैलिड ही नहीं है ।” इस जानकारी से महिला चौंक उठी और बोली, “यह भला कैसे हो सकता है ?” कंडक्टर ने पूरी बात महिला को समझाई । आगे क्या हुआ होगा, आप अंदाजा लगा सकते हैं । महिला अब कुछ कर नहीं सकती थी, उसे तो यात्रा पूरी करनी ही थी । हमारे समाज की ‘आदर्श मानवीय’ परंपरानुसार कुछ लेन-देन हुआ, और उसके गंतव्य तक की यात्रा की व्यवस्था कर दी गयी ।

उस पूरे वाकये के दौरान मेरी नींद उचट गयी थी । डिब्बे के बल्बों को बुझा दिये जाने के बाद मैंने फिर से सोने की चेष्टा की । मैं इस पर विचार करने लगा कि क्यों 23 तारीख के आरक्षण के बावजूद वह महिला 24 को यात्रा करने निकल पड़ी । किस भ्रम में वह और उसके घर के सदस्य यात्रा की असल तिथि भूल गये । इसका रोचक कारण मेरे समझ में आ गया । असल बात यह है कि भारतीय परंपरा में नयी तिथि तथा नये दिनवार की शुरुआत सूर्योदय के साथ मानी जाती है । जब मनुष्य रात की नींद के बाद सुबह उठता है तो उसे एक नये दिन के आरंभ होने की स्वाभाविक अनुभूति होती है, और उस नये दिन से वह सहज रूप से नई तिथि भी जोड़ लेता है । लेकिन जिस ‘कलेंडर’ को वैश्विक स्तर पर अब अपनाया जा चुका है, उसके अनुसार अर्धरात्रि के समय (24:00 बजे) अगली तारीख और अगला वार क्रमानुसार आरंभ हो जाते हैं । घड़ी से अर्धरात्रि के आगमन का पता चल जाता है और यदि व्यक्ति सचेत रहे तो एक नये दिन के आरंभ को भी वह मान लेता है । किंतु अर्धरात्रि कोई ऐसा एहसास नहीं दिलाती है जिससे एक नयी तारीख की अनुभूति होवे । वस्तुतः हम पूरे रात की तारीख दिन तथा संध्याकाल की सततता के रूप में देखने के आदी होते हैं । ऐसे में रात्रि के बारह बजने के बाद भी अपरिवर्तित तारीख की भूल कर बैठते हैं । पूरी रात को एक ही तारीख से जोड़कर देखना सामान्य भूल होती है । उस महिला को यह ध्यान ही नहीं रहा होगा कि 23 तारीख का 01:00 बजे का समय वास्तव में 22 तारीख की अर्धरात्रि के 24:00 बजने के घंटे भर बाद आ जाता है, न कि 23 तारीख के पूरे दिन बीतने के बाद की अर्धरात्रि के बाद । रात्रिकालीन तारीख के बारे में भ्रम कई लोगों में देखा जाता है । वास्तव में जो सावधानी बरतने के आदी होते हैं वे उपर्युक्त रात की तारीख को 22-23 की रात्रि कहकर स्पष्ट करते हैं । उस महिला ने गलती यह कर डाली कि 23 तारीख की 01:00 ए.एम. को 23-24 की अर्धरात्रि के बाद का समय मान बैठी ।

उक्त घटना में यह संदेश निहित है कि अर्धरात्रि के बाद की यात्र के समय तथा दिनांक पर सावधानी से विचार करना आवश्यक है, अन्यथा उपरिवर्णित घटना के समान ही बहुत कुछ अनुभव करना पड़ सकता है । – योगेन्द्र जोशी

टेलीफोन नंबर 911 और पुलिस

October 21, 2009 by योगेन्द्र जोशी

इस समय मैं अमेरिका की ‘सांता क्लारा’ नगरी में हूं, करीब एक माह के प्रवास पर । यह स्थान कैलिफोर्निया राज्य की सिलीकॉन वैली में वहां के बड़े शहर ‘सान होजे’ से लगा हुआ और अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के शहर ‘सान फ्रांसिस्को’ के हवाई अड्डे से साठ-पैंसठ किलोमीटर दूर है । मैं पहले भी एक बार यहां आ चुका हूं । मेरे बेटे, जिसके आग्रह पर मैं तब और इस बार दुबारा यहां आया, ने पहली बार के आगमन पर यहां के नियम-कानूनों का एक संक्षिप्त परिचय मुझे दिया था, ताकि मैं कहीं अनजाने में उनका उल्लंघन न कर बैठूं । तब उसने स्पष्ट किया था कि नियमों के उल्लंघन का मामला पुलिस की नजर में आने पर दंडात्मक काररवाही भुगतनी पड़ सकती है, और किसी प्रकार की रियायत की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती है ।

तब उसने दो बातों पर खास जोर डाला था । पहला तो यह कि कार में बैठने पर हर यात्रिक (पैसेंजर) को ‘सीट बेल्ट’ बांधना या पहनना अनिवार्य है, और यह वाहन चलाने वाले की जिम्मेदारी होती है कि वह सभी यात्रिकों द्वारा ऐसा कर लेना सुनिश्चित कर ले । लापरवाही होने पर दो-तीन सौ डालर (दस-बारह हजार रुपये) के अर्थदंड (फाइन) के लिए तैयार रहना पड़ता है । यातायात संबंधी किसी भी नियम के उल्लंघन पर इसी प्रकार का दंड देना पड़ता है । उसने मुद्दे की गंभीरता समझाने के लिए अपने तथा परिचितों के दो चार अनुभव भी मुझे सुनाये थे । उसने दूसरी बात यह बताई कि पैदल चलने वालों को भी सड़क पार करते समय विशेष सावधानी बरतना आवश्यक होता हैं । आम तौर पर सड़क पर चलने की मनाही रहती है । सड़क के किनारे-किनारे बने पैदल मार्ग पर ही चलने की अनुमति रहती है, और जहां ऐसा मार्ग न हो वहां पैदल चलना मना रहता है । नियमों के विरुद्ध चलने पर दो सौ डालर का अर्थदंड । उसने सड़क पार करने के तौर-तरीके भी समझा दिये थे । मेरे लिए यही जानकारी आवश्यक थी, क्योंकि मैं सुबह-शाम नियमित रूप से टहलने के लिए निकला करता था ।

एक बात, जो मेरे बेटे ने शायद मुझे नहीं बताई थी, या कभी बताई हो तो मेरे ध्यान में नहीं है, यह है कि पूरे अमेरिका में आपात्कालीन सेवा के लिए टेलीफोन नंबर 911 नियत किया गया है । इस सेवा के अंतर्गत पुलिस, अग्निशमन तथा आकस्मिक चिकित्सा शामिल रहते हैं । अगर आप टेलीफोन पर यह नंबर घुमा भर दें, ताकि दूसरी तरफ टेलीफोन की घंटी बज उठे, तो ये सेवाएं तुरंत हरकत में आ जाती हैं । यह आवश्यक नहीं कि पुलिस बगैरह आपसे कोई विवरण जानना चाहें । कितनी गंभीरता से आपात्कालीन सेवा ली जाती हैं इसका अनुभव मुझे हाल में चौदह-पंद्रह दिन पहले हुआ ।

मेरे बेटे के घर पर जो टेलीफोन सेवा उपलब्ध है उसमें अमेरिका से बाहर अन्य देश के टेलीफोन पर संपर्क साधने के लिए डायल किये जाने वाले नंबर के प्रथम तीन अंक 011 रहते हैं । तत्पश्चात् संबंधित देश के कोड, जो अमेरिका में भारत के लिए 91 है, के दो अंक डायल करने होते हैं, और उसके बाद देश के भीतर का वांछित टेलीफोन नंबर । एक दिन मैं अपने देश में छोटे बेटे को फोन करने में जुट गया । जैसा कह चुका हूं, मुझे टेलीफोन के ‘नंबर पैड’ पर 01191… इत्यादि टाइप करना था । मुझसे शायद गलती से आरंभिक अंक 0 (शून्य) के बदले 9 (नौ) दब गया और फलतः 91191… आदि अंक टाइप हो गये । टेलीफोन ने इस नंबर के आंरभिक तीन अंकों 911 को स्वीकारते हुए आपात्कालीन सेवा को डायल कर दिया । कुछ ही क्षणों में टेलीफोन सेवा से जवाबी फोन आ गया कि क्या वास्तव में कोई आकस्मिक समस्या हम लोगों के सामने आ गयी है, यदि हां तो किस प्रकार की समस्या है वह । मेरा बेटा माजरा तुरंत समझ गया । उसने मेरे हाथ से टेलीफोन का चोंगा ले लिया और दूसरे पक्ष को नकारात्मक उत्तर देते हुए समझा दिया कि फोन गलती से लग गया था । बात आयी-गयी हो गयी ।

लेकिन कोई पांच-सात मिनट बीते ही होंगे कि घर के प्रवेश-द्वार की घंटी बज उठी । दरवाजा खोला गया तो देखा कि सामने गहरे नीले रंग का परिधान पहने हुए और कंधे/बांह पर पुलिसिया प्रतीकों को धारण किए हुए एक ‘पुलिसमैन’ खड़ा है । एक-दो क्षण तक हम लोग भौंचक्के-से देखते रह गये, और फिर संभलते हुए उसे पूरी घटना समझा दी । पुलिस का वह कर्मचारी जल्दी ही आश्वस्त हो गया कि हम लोगों के साथ कुछ गंभीर नहीं घटा है । लौटते-लौटते उसने खुद ही यह बात कही कि हिंदुस्तानियों के साथ ऐसी घटनाएं अक्सर होती हैं, क्योंकि टेलीफोन पर वे शून्य के स्थान पर गलती से कभी-कभी नौ दबा बैठते हैं (गौर करें कि टेलीफोन के नंबर पैड पर शून्य तथा नौ के अंक एकदम पास-पास होते हैं ), और तब ‘टेलीफोन कॉल’ आपात्कालीन सेवा को पहुंच जाती है । ऐसे अवसर पर पुलिस सबसे पहले हरकत में आती है, क्योंकि उनकी गाड़ियां शहर में लगातार यत्र-तत्र चक्कर लगाती रहती हैं । टेलीफोन करने वाले के पते पर सबसे निकट वाला पुलिसमैन तुरंत ही पहुंच जाता है ।

पुलिस विभाग की त्वरित कार्यवाही में जुट जाने की संस्कृति एक भारतीय के नाते मेरे लिए अकल्पनीय है ।
अमेरिका में किसी दुर्घटना की खबर और उससे संबंधित समस्त जानकारी बिजली की गति से सभी संबंधित पक्षों को सेकंडों या मिनटों में मिल जाती है । खेद होता है यह देखकर कि हमारे देश में टेलीफोन या गाड़ी के नंबर के आधार पर किसी व्यक्ति का पता खोजने में पुलिस विभाग को कई-कई दिन लग जाते हैं । पाठकों को मेरा यह कहना अप्रिय लगेगा (क्षमा करें) कि अगर उपर्युक्त घटना अपने यहां घटी होती और पुलिसमैन अपने दरवाजे पर पहुंचे होते तो वे दो-चार गालियां दे गये होते, या दस-बीस रुपये वसूल कर ले गये होते । हमारे देश में अमेरिका की नकल करने का फैशन चल पड़ा है, लेकिन कार्यसंस्कृति के मामले में उनसे कुछ सीखने का विचार हमारे मन में नहीं आता । इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अमेरिका की भौगोलिक सीमाओं के भीतर कोई आतंकवादी घटना नहीं घटती है, क्योंकि वहां के कभी सरकारी विभाग मुस्तैदी से कार्य करते हैं । अपने यहां ? – योगेन्द्र जोशी

जातीय अभिमान का एक उदाहरण

September 26, 2009 by योगेन्द्र जोशी

जातीय मानसिकता हमारे हिंदू समाज की विशेषता कही जाती है, एक ऐसी विशेषता जिस पर गर्व नहीं किया जा सकता है और न ही जिसे उचित ठहराया जा सकता है । जातीय व्यवस्था को प्राचीन काल की वर्णाश्रम व्यवस्था का विकृत रूप माना जा सकता है । वर्णाश्रम को स्वयं में कोई दोषपूर्ण सामाजिक व्यवस्था कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि उसके सैद्धान्तिक आधार में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है । किंतु क्या प्राचीन काल में उन सिद्धांतों का पालन समुचित रूप से समाज में हो रहा था इस प्रश्न का उत्तर असंदिग्ध हां में दे पाना कठिन है । कदाचित् आरंभ में व्यवस्था ठीक चली हो, परंतु कालांतर में वर्णभेद सामाजिक भेदभाव और ऊंचनीच का आधार बन गया हो, जिसने अंततः आज के जातिगत भेदभाव का रूप ले लिया हो ।

क्या यह जातीय मानसिकता हिंदू समाज तक ही सीमित है ? मुझे लगता है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की विशेषता है और इस क्षेत्र के अन्य धर्मावलंबियों में भी व्याप्त है, भले ही वह खुलकर देखने को न मिले । मैंने सुना है कि अपने देश में मुस्लिमों और सिखों में भी ऊंचनीच की बातें प्रचलित हैं । यह एक तथ्य है कि आज के हिंदुस्तानी गैरहिंदुओं के पूर्वज प्रायः हिंदू ही थे, जिन्होंने परिस्थितिवश अन्य धर्म स्वीकार तो कर लिया, लेकिन जो जातीय दृष्टि से ऊंचे या नीचे होने के भाव से मुक्त नहीं हो सके । जिनके पूर्वज पहले कभी बतौर हिंदू के तथाकथित उच्च जाति में थे, वे धर्मांतरण के बाद भी अपने को ऊंचा समझते रहे । पीढ़ियों पहले की हिंदू पृष्ठभूमि से जुड़े ऐसे विचार वास्तविक हैं इस बात का अनुभव मुझे अपने इंग्लैंड प्रवास में हुआ था, जिसका उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं । (जातीय मानसिकता का एक किस्सा मैं पहले भी अन्य पोस्ट (क्लिक करें) में बयान कर चुका हूं ।)

कोई ढाई दशक पहले मैं दक्षिणी इंग्लैंड के साउथहैम्पटन विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक उच्चानुशीलन के लिए गया हुआ था । अपने वहां के प्रवास के समय मेरा परिचय एक पाकिस्तानी शोधछात्र से हुआ था, लगभग मेरा हमउम्र और इस्लाम-धर्मावलंबी । मुझे उसका नाम अब ठीक-ठीक याद नहीं है; इतना ही अब याद आता है कि उसका पारिवारिक नाम (सर्नेम) रफीक था । हम दोनों की भेंट यदाकदा हो जाया करती थी । हमारी परस्पर बातचीत हिंदुस्तानी में ही हुआ करती थी । भेंट होने पर रफीक ‘नमस्ते’ कहकर मेरा अभिवादन करता था । वह जानता था कि कई हिंदीभाषी हिंदू अभिवादन के तौर पर ‘नमस्ते’ का प्रयोग करते हैं । यहां पर इतना बता दूं कि हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी अपने-अपने घरों, यानी देशों, में रहकर एक-दूसरे को जितना भी भला-बुरा कहें, इंग्लैंड प्रवास के दौरान उनके संबंध पर्याप्त मैत्रीपूर्ण और घनिष्ठ रहते हैं । यह बात उत्तरभारतीय हिंदीभाषियों पर खास तौर पर लागू होती है । इसका कारण उनके खान-पान और बोली में पर्याप्त समानता का होना कहा जायेगा । अस्तु, जातीयता संबंधी अपनी आंरभिक बात पर लौटता हूं ।

एक बार रफीक और मेरे बीच की बातचीत में संयोगवश जातीयता का जिक्र आ गया । प्रसंग क्या रहा होगा अब ध्यान में नहीं आता है, किंतु उसके दो-चार शब्द मेरे स्मरण में आज भी हैं । रफीक बोला “भाई साहब, आपको बताऊं, हम राजपूत यानी क्षत्रिय मुसलमान हैं ।”

मेरे यह पूछने पर कि राजपूत मुसलमान होने का मतलब क्या है, उसका जवाब था “असल में हमारे पुरखे राजस्थान के रजवाड़े या उनके खानदान से थे । धर्मांतरण के बाद वे मुसलमान हो गये, लेकिन हमारी जाति अन्य मुस्लिमों से ऊपर रही है । हम ऐसे-वैसे मुसलमान नहीं हैं; हम तो अपने को औरों से ऊंचा मानते हैं ।”

उसकी बात में जातीय गर्वानुभूति की झलक मुझे मिल रही थी । इस संबंध में रफीक से अन्य क्या बातें हुईं अब याद नहीं, लेकिन उसके राजपूत मुस्लिम होने के गर्व का खयाल मुझे आज भी आ जाता है । मुझे लगता है कि वंशानुगत श्रेष्ठता की भावना सभी समाजों में कमोबेश मौजूद रहती है । - योगेन्द्र

एक अनुभव यह भी, सब्जीसट्टी में

August 25, 2009 by योगेन्द्र जोशी

पूर्वाह्न का समय है । मैं सागभाजी खरीदने निकल पड़ता हूं घर से । मेरे घर से कोई तीनएक सौ मीटर की दूरी पर सब्जीसट्टी है, जहां सागसब्जी का कारोबार प्रातः करीब छः बजे आरंभ हो जाता है और दोपहर तक चलता है । शहर के पास के गांवों से किसान ताजा सब्जी ले आते हैं और वहां सब्जी कारोबारियों को बेच जाते हैं । थोक कारोबारियों के साथ-साथ फुटकर विक्रेताओं की भी दुकानें वहां सज जाती हैं ।

मैं सागसब्जी खरीद चुकने के बाद एक भुट्टा-विक्रेता (यानी मक्के की बाल बेचने वाले) के पास पहुंचता हूं । पूछता हूं, “क्या हिसाब है भई भुट्टा ?”

जवाब मिलता है, “सोलह रुपये ।”

“सोलह रुपये ? सोलह रुपये दर्जन (गिनती के दर्जन भर बालें सोलह रुपये में) या …?”

“सोलह रुपये किलो, बाबू जी ।”

“सही हैं दाम ?” मैं यूं ही पूछ लेता हूं । मोलभाव का कोई इरादा नहीं मेरा, फिर भी देखना चाहता हूं कि क्या कहता है वह ।

“अरे बाबूजी बाजार में देख लीजिए न, कम में कहां मिल रहा है । आप तो रोज के खरीददार हैं, आपसे अधिक दाम वसूलेंगे क्या ?”

उसका अंतिम वाक्य सुनकर मैं मन ही मन मुसकराता हूं । ‘मैं रोज का गाहक हूं’ वह कहता है, क्या वाकई ? हर किसी से यही रटा-रटाया वाक्य बोलना बेचारे का ‘धर्म’ बन चुका है । इस बार के मौसम में मैंने मुश्किल से तीन या चार बार ही भुट्टा खरीदा होगा और वह भी कभी किसी से तो कभी किसी और से । इस व्यक्ति से तो पहली बार । याद नही आता कि पहले कभी उससे खरीदा भी है । हाल-फिलहाल तो नहीं । मैं उससे एक किलो बालें तौलने को कहता हूं । मैं छांटकर उसे सौंपता हूं, गिनती की कुल छः बालें तराजू पर चढ़ती हैं ।

इस बीच चढ़ती उम्र के एक सज्जन वहां पहुंचते हैं और भुट्टे वाले से विक्री दर के बारे में पूछते हैं । विक्रेता कहता है, “अरे साहब यही सोलह-बीस रुपया किलो चल रहा है ।”

“अरे भई हम तो रोज के हैं न, ठीक-ठीक लगाओ ।” इतना कहते हुए वे बालें छांटने लगते हैं । तब तक भुट्टे वाला मेरे लिए तौल चुका होता है । गिनती की छः बालें मैं अपने झोले में भर लेता हूं । जब तक जेब से पैसा निकालकर उसे दूं तब तक वह उन सज्जन द्वारा छांटी गयीं बालें तराजू पर रख तौलने लगता है । मेरी नजर उनकी गिनती करने लगती है, जिज्ञासावश । छः बालें, वही संख्या जो खरीद में मुझे मिलीं और लगभग वैसी ही, उन्नीस-बीस । दूसरे पलड़े पर देखता हूं कि एक किलो के साथ सौ ग्राम (शायद; या पचास का हो) का बांट रखा है । वह एक बाल हटाने की कोशिश करता है । वह सज्जन रोकते हुए कहते हैं, “अरे रखो, रखो उसे भी । रोज के गाहक हैं हम और तब भी सोने के माफिक तौलोगे क्या ?”

भुट्टे वाला उनकी बात रख लेता है । मैं उसे पैसा देता हूं और घर लौट चलता हूं । रास्ते में सोचता हूं कि क्या उस बेचने वाले ने उन्हें कुछ सस्ता दिया होगा ? मुझे शंका होती है । कहीं ऐसा तो नहीं कि वह उनके मोलभाव के तरीकों से परिचित हो और अपने मुनाफे को बनाये रखने के लिए कोई तरीका अपनाता हो अन्यथा उनके तौलते समय भी लगभग उतनी ही बालें चढ़ी जितना मेरी खरीद के समय । और बांट ? एक किलो के ऊपर । उसने कही उन्हें दिखाने भर के लिए सौ-पचास का अतिरिक्त बांट तो नहीं रखा था ?

यह तो रहा घटना का एक पहलू, दूकानदार से संबंधित । दूसरा पहलू देखिए: मेरा उन सज्जन से औपचारिक परिचय नहीं है, किंतु मुझे मालूम है कि वे हिंदू विश्वविद्यालय में हैं, जहां पहले कभी मैं भी कार्यरत था । मेरे अनुमान में वे कृषि संकाय में अध्यापक हैं । अब तक काफी वरिष्ठता पा चुके होंगे । आज के दिन साठ-सत्तर हजार रुपये से कम की माहवारी तनख्वाह नहीं होनी चाहिए उनकी । तब एक अदने दुकानदार से खरीद-फरोख्त में एक-दो रुपये उनके लिए कोई माने रखते हैं क्या ? उसके विपरीत अगर दो-एक रुपये अतिरिक्त उस आदमी को मिल ही जाते तो उसके लिए अवश्य माने रखता । इतनी उदारता तो उनके सामर्थ्य में है ही !

पर आम जिंदगी में उदारता कम ही देखने को मिलती है । मेरे जीवन का अनुभव है कि सामान्यतः हर व्यक्ति कम से कम खोते हुए अधिकाधिक लाभ प्राप्त करना चाहता है । वह ऐसा चिंतन-मनन के बाद लिए गये निर्णय के आधार पर नहीं करता है, बल्कि ऐसा उसके स्वभाव में निहित रहता है । जब तक सागसब्जी वाले से मोलभाव न कर लें कुछ लोगों को तसल्ली नहीं होती है । और सब्जी वाले भी इस बात को बखूबी समझते हैं और अपने भाव उसी के अनुरूप बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं । असल में हमारी सामुदायिक जिंदगी कुछ यूं ही चलती है । – योगेन्द्र

कितना अंतर है उनमें और हममें ! – किस्सा ड्राइविंग लाइसेंस का

August 17, 2009 by योगेन्द्र जोशी

यह वाकया करीब पच्चीस वर्ष पुराना है । तब मैं सपरिवार द्विवर्षीय उच्चानुशीलन (हायर स्टडीज) हेतु इंग्लैंड गया हुआ था । मेरा कार्यस्थल लंदन से एक सौ बारह  किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित साउथहैम्पटन विश्वविद्यालय था ।

ब्रिटेन में भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या काफी है । लंदन के साउथहॉल इलाके के प्रायः सभी बाशिंदे तो भारतीय ही हैं । वहां पहुंचने पर आपको लगेगा ही नहीं कि आप इंग्लैंड में हैं । अन्य प्रमुख शहरों में भी उनकी संख्या पर्याप्त है । अतः भारतीय भोजन की सामग्री तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं आपको सरलता से इन सभी जगहों पर मिल जायेंगी । साउथहैम्पटन में भी भारतीय मूल के लोगों की संख्या कम नहीं है ।

साउथहैम्पटन में हमारा किराए का आवास ‘बिटर्न’ नामक इलाके में था । आवास से सौ-डेड़-सौ मीटर की दूरी पर ही पंजाबी मूल का एक परिवार रहता था । मेरी पत्नी का उस परिवार से अच्छा-खासा परिचय हो गया था । परिवार के सदस्यों में एक बुजुर्ग महिला, उनका एकमात्र पुत्र, उसकी पत्नी, और उनके दो छोटे बच्चे शामिल थे । उन बुजुर्ग महिला को इंग्लैंड में रहते हुए वर्षों गुजर चुके थे, लेकिन वे अंगरेजी सीख नहीं पाईं । वे केवल पंजाबी ही बोल पाती थीं, हिंदी भी नहीं । उनके पुत्र का जन्म इंग्लैंड में ही हुआ था, अतः वह अंगरेजी तो जानता था, किंतु पंजाबी न के बराबर । उसकी पत्नी पंजाब की थी और शादी के बाद वहां पहुंची थी । वह पंजाबी और हिंदी के अतिरिक्त अंगरेजी भी जानती थी । मेरी पत्नी उनसे तो हिंदी में बातें कर लेती थीं, लेकिन उनकी सास की ठेठ पंजाबी मुश्किल से समझ पाती थीं ।

पंजाबी महिला (बहू) ने मेरी पत्नी को एक बार बताया कि वे तीन या चार दफे कार-चालन के लाइसेंस के लिए आवेदन कर चुकी हैं, किंतु हर बार वे परीक्षण में असफल हो जाती हैं । लाइसेंस के अभाव में कभी-कभी उन्हें परेशानी होती है, क्योंकि वे कार से कहीं अकेले आ-जा नहीं सकती हैं । बारबार की असफलता से उनका आत्मविश्वास डगमगा गया था । इस घटना के कुछ महीनों के बाद हम स्वदेश लौट आये । लौटने पर मेरी पत्नी का उनसे कुछ समय तक संपर्क बना रहा । अपने देश में उन दिनों टेलीफोन सुविधा मुश्किल से आम आदमी को उपलब्ध थी । अतः संपर्क का माध्यम चिट्ठी-पत्री ही थी । एक दिन अनायास उस महिला की चिट्ठी हम लोगों को मिली, जिसमें उन्होंने इस ‘खुशखबरी’ का जिक्र किया था कि उनको अंततोगत्वा वाहन-चालन का लाइसेंस मिल ही गया । यह लाइसेंस उनको संबंधित परीक्षण उत्तीर्ण करने के चौथे या पांचवें प्रयास के बाद मिल पाया था । हमने भी प्रत्युत्तर में उन्हें बधाई संदेश भेज दिया ।

इस किस्से का जिक्र मैं यह बताने के लिए कर रहा हूं कि ब्रिटेन में किसी आवेदक को वाहन-चालन का लाइसेंस तभी दिया जाता है जब वह तत्संबंधित अर्हता की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेता है । परीक्षण की प्रक्रिया गंभीर रहती है और वाहन-चालन के विभिन्न पहलुओं की उसकी जानकारी का मूल्यांकन कर लिया जाता है । कुछ ऐसी ही प्रक्रिया विश्व के सभी प्रमुख देशों में अपनाई जाती है । लेकिन हमारे देश में क्या होता है ? सब खानापूरी के तौर पर होता है । अपने यहां यह लाइसेंस किसी व्यक्ति की वाहन-चालन की योग्यता का प्रमाण नहीं है । वस्तुतः कभी जरूरत पड़ जाने पर यह महज कानूनी पचड़े से बचने के लिए मददगार एक दस्तावेज है, जिसका इंतजाम संबंधित कार्यालय जाकर आवेदन करके तथा आवश्यकता पड़ने पर सुविधा-शुल्क देकर, अथवा किसी दलाल की सहायता लेकर बखूबी किया जा सकता है ।

मैं उन भाग्यशाली व्यक्तियों में नहीं हूं जो ऐसे लोगों को जानते हों जिन्होंने वाहन-चालन के किसी सार्थक परीक्षण के बाद लाइसेंस प्राप्त किया हो । एक बार आंध्र प्रदेश निवासी मेरे एक छात्र ने अवश्य बताया था कि परिवहन कार्यालय के एक कर्मी ने उसके साथ स्कूटर में बैठकर कुछ दूरी तक उसे चलवाया था । लेकिन अन्य मामलों में किसी ने परीक्षण से गुजरने की बात नहीं कही । मेरा अनुमान है कि अपने शहर वाराणसी में वाहन-चालन का लाइसेंस किसी भी व्यक्ति को मिल सकता है – लूला-लंगड़ा-बहरा – किसी को भी । यह पुराने अनुभवों के आधार पर कह रहा हूं । अब चीजों में सुधार हो गया हो तो मुझे अवश्य आश्चर्य होगा । और तब मुझे क्षमा मांगनी होगी । – योगेन्द्र जोशी

मेरे घर के सामने रहते हैं जो

July 20, 2009 by योगेन्द्र जोशी

मेरे घर के सामने सड़क के उस पार पांच सगे भाइयों के अपने-अपने परिवार रहते हैं । सुनने में आता है कि पैंतालीस-पचास वर्ष पहले जब अपनी कॉलोनी की नींव डाली गयी थी तब उसके लिए खरीदे गये भूखंड के मालिकों में से एक इन भाइयों के पिता भी थे । उन बुजुर्ग महोदय को मैंने भी देखा है । कोई दसएक साल हो गये होंगे उन्हें गुजरे हुए । मुझे नहीं मालूम कि इन भाइयों की बहिनें कितनी थीं । जानने की कोशिश मैंने कभी नहीं की और संयोग से उन्हें कभी मैंने देखा भी नहीं । अवश्य ही वे सभी अपने-अपने गार्हस्थ जीवन में व्यस्त होंगी । इन भाइयों और आकार में बेरोक-टोक बढ़ते उनके परिवारों को मैं अवश्य ही करीब दो दशकों से देख रहा हूं । संख्या में परिवार कैसे तेजी से बढ़ते हैं इसका एक दृष्टांत ये परिवार प्रस्तुत करते हैं

ये पांच भाई सड़क से लगे सत्तर-पचहत्तर फुट चौड़े भूखंड पर अपने-अपने मकान बनवाकर रह रहे हैं । भूखंड की सड़क से लंबवत् गहराई नब्बे फुट तक होगी ऐसा मेरा अनुमान है । इस भूखंड को इन भाइयों ने चौढ़ाई में पांच बराबर हिस्सों में बांटकर अपने-अपने आशियाने बसाये हैं । हर आशियाना भूखंड की गहराई तक एक लंबी पट्टी के माफिक बना है जिसमें कमरों की कतार समाई है ।

इन सभी भाइयों में हरएक के औसतन आधा दर्जन संतानें हैं, कुछ लड़के तो कुछ लड़कियां । अवश्य ही एक के केवल दो बेटे और दो बेटियां हैं । शेष भाई संतानों के मामले में अधिक ‘भाग्यशाली’ हैं । औरों के मामले में मैं आजतक ठीक से हिसाब नहीं लगा सका कि किसके कितने बच्चे हैं । सामने छोटे-बड़े तमाम लड़के-लड़कियां नजर आते हैं, परंतु मैं भरोसे के साथ यह नहीं कह सकता कि कौन किस भाई की संतान है । सबसे छोटे भाई के घर में तो बस कुछएक महीने पूर्व ही पांचवीं या छटी संतान ने जन्म लिया है । मेरी जानकारी में पांचों भाई निरक्षर हैं और साग-सब्जी के कारोबार जैसे उद्यम से जीवनयापन करते हैं । लेकिन नई पीढ़ी के बच्चे थोड़ा-बहुत पढ़-लिख गये हैं या पढ़-लिख रहे हैं । उनमें से शायद केवल एक हाई-स्कूल भी पास कर चुका है ।

पिछले कुछ समय से मैं बड़े जिज्ञासु भाव से यह जानने और समझने की कोशिश करता आ रहा हूं कि क्या इन परिवारों की नई पीढ़ी, यानी इन पांच भाइयों की संतानों, में भी ‘परिवार वृद्धि’ के प्रति वही पुराने ढर्रे की सोच विद्यमान है ? या इनकी सोच कुछ हद तक बदली और ‘समझदारी’ भरी है ? उनके वयस्क हो चुके बच्चों से मैंने कभी पूछा नहीं । दरअसल हिम्मत ही नहीं होती है; पता नहीं क्या प्रतिक्रिया हो; कहीं बुरा न मान जायें ऐसे संवेदनशील मुद्दे को लेकर । लेकिन कुछ बातें हैं जिनसे मुझे लगता है कि बात कुछ बदल जरूर रही है ।

सबसे बड़े भाई के खुद के पांच लड़कों में से दो की शादी अंदाजन सात-आठ साल पहले हुई होगी । दोनों के पांच-पांच छः-छः साल के दो-दो बच्चे हैं जो अब स्कूल जाते हैं । इन लोगों के जिन लड़कियों की शादी वर्षों पहले हुई स्वयं उनके बच्चे भी स्कूल जाते हैं, जैसा उनमें से किसी एक ने कभी मुझे बताया था । लेकिन बीते सात-आठ सालों में इन चाचा-ताऊओं के अन्य लड़के-लड़कियों में से किसी की भी शादी नहीं हुई । कुल पच्चीस-तीस की संख्या वाले इन लड़के-लड़कियों की उम्र में परस्पर क्रमशः एक-एक साल या ऐसा ही अंतर होना चाहिए, अधिक नहीं । इस लिहाज से चार-पांच अन्य जनों की भी शादी हो ही जानी चाहिए थी, खासकर तब जब कि ये लोग पुरानी रूढ़ियों से बंधे हों और कम उम्र में विवाह की परंपरा निभाते आ रहे हों । फिर अन्य वयस्क संतानों का विवाह क्यों रुका होगा ? मेरी जिज्ञासा का यही विषय है ।

मुझे लगता है कि ये बच्चे आज की दुनिया देख रहे हैं, और वे भी संपन्न लोगों की तरह की जिंदगी जीना चाहते हैं । इसीलिए जिनकी शादी हो चुकी उनकी अपने बाप-दादों की तरह अधिक संतानें नहीं हैं । और जो अभी अविवाहित हैं वे कदाचित् जल्दी विवाह के पक्ष में नहीं हैं । वे चाहते होंगे कि अपनी आर्थिक स्थिति पहले कुछ सुधार लें । मेरे दिमाग में यह बात तब आई जब एक दिन इनमें से एक (हाई-स्कूल पास) ने मुझसे कहा था “अंकलजी, काश! हम भी आपके यहां पैदा हुए होते । तब हम भी कुछ कर पाये होते ।” उस समय मैंने यह कहते हुए बात टाल दी थी कि सभी लोग टाटा-बिड़ला के घरों में थोड़े ही पैदा होते । पर उसकी बात के अवश्य ही कुछ गहरे अर्थ थे ऐसा मैं सोचता हूं । नई पीढ़ी के ये बच्चे शायद पुराने ढर्रे पर नहीं जीना चाहते हैं । और अगर ऐसा है तो देश की बढ़ती आबादी के संदर्भ में यह शुभ संकेत होगा । – योगेन्द्र