जहां चाह वहां राह : वे अंत में वाइस-चांसलर बन ही गये!

अपने देश में उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों का नियुक्तियां अभी तक ‘कॉलेजियम’ नाम की चयन समिति की संस्तुति के आधार पर होती आ रही थीं । इस समिति में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं उनके चार वरिष्टतम सहयोगी भाग लेते थे । पिछले कुछ समय से यह बहस छिड़ी हुई थी कि इस पद्धति में सही चयन अक्सर नहीं होते हैं और अपेक्षया बेहतर योग्यता वाले व्यक्तियों के छूट जाने की संभावना अधिक रहती है । मौजूदा शासन इस पद्धति को समाप्त करके उसके बदले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (नैशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमिशन) का गठन करने जा रही है, जिसमें शासन की ओर से भी कुछ सदस्य होंगे ।

कॉलेजियम पद्धति के विरुद्ध ये तर्क दिया जा रहा था कि इसमें समिति के सदस्य अपने मित्रों-परिचितों-संबंधियों के प्रति झुकाव रखते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया अपना लेते हों इस बात की संभावना रहती है । मैं इस पद्धति का पक्षधर नहीं हूं, लेकिन यह विश्वास भी नहीं कर पाता कि नये आयोग के साथ ऐसी संभावना नहीं हो सकती । मैंने अपने अध्यापन-काल में यह अनुभव किया है कि विश्वविद्यालय जैसी संस्था में जहां चयन-प्रक्रिया प्रमुखतया साक्षात्कार पर आधारित रहती है ईमानदारी से कार्य होता हो ऐसा सामान्यतः नहीं होता । इन समितियों में प्रायः पांच या अधिक सदस्य रहते हैं, जिसके सदस्यगण आम तौर पर अभ्यर्थियों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जानते हैं अथवा उनकी सिफारिशें लिए रहते हैं । उनकी पूरी कोशिश रहती है कि जिनके प्रति वे झुकाव रखते हैं उनका चयन हो ।

वाइस-चासंलरों, जिन्हें कुछ संस्थाओं में कुलपति कहा जाता है तो अन्यत्र उपकुलपति, की नियुक्ति तो अधिक निष्ठा से होनी चाहिए, किंतु उसमें भी ‘अपनों’ को उपकृत करने की परंपरा रही है । इस अहम पद के लिए कदाचित सभी जगह केन्द्र अथवा राज्य सरकार प्रायः तीन सदस्यों की एक ‘खोज समिति’ (सर्च कमेटी) का गठन करती है, जिसके द्वारा संस्तुति-प्राप्त प्रत्याशियों में से किसी एक की नियुक्ति राष्ट्रपति/राज्यपाल (जो भी इस कार्य के लिए अधिकार-संपन्न हो) द्वारा की जाती है ।  मेरा उद्येश्य इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करना नहीं है । कॉलेजियम के गुणदोषों पर टीवी बहसों को देखते और तत्संबंधित लेखों को पढ़ते समय मुझे एक घटना याद आती रही कि किस प्रकार मेरे एक परिचित ने वाइस-चांसलर (वीसी) पद के लिए जी-जोड़ प्रयास किया और सफल भी हुए । उनकी नियुक्ति में संबंधित जनों ने पर्याप्त ईमानदारी बरती होगी ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जिस समाज में भ्रष्ट आचरण का मतलब केवल अवैध तरीके से धन कमाना लिया जाता हो, लेकिन जाति-धर्म आदि के आधार पर किसी के पक्ष में निर्णय लेना सामान्य परंपरा बन चुकी हो, परिचितों-मित्रों के भाई-भतीजों को अहमियत दी जाती हो, व्यक्ति के विवेकाधीन का अर्थ उसकी मनमर्जी माना जाता हो, सिफारिशें करना/मानना आम चलन में हो, उस समाज में कोई भी पद्धति अपनाई जाये सही कार्य होगा इस पर कम से कम मैं भरोसा नहीं कर पाता ।

अस्तु, मैं उन सज्जन के वीसी बनने की कहानी पर लौटता हूं । संबंधित व्यक्तियों/स्थानों को संदर्भ हेतु मैं काल्पनिक नामों से संबोधित कर रहा हूं । कोई दस-बारह वर्ष पुरानी घटना होगी जब मैं अपने दो सहशिक्षकों के साथ सांध्यकालीन चाय पीने हेतु विश्वविद्यालय (वि.वि.) परिसर स्थित विश्वनाथ मंदिर जा रहा था । मंदिर से किंचित दूरी पर ही उन सज्जन से भेंट हो गई जो रास्ते के दूसरी ओर से आ रहे थे । शिष्टाचार के नाते हम कुछ देर के लिए रुक गये और उनसे सामान्य बातचीत करने लगे । लगे हाथ हम में से किसी ने उन्हें छेड़ दिया, “अरे भई सक्सेना साहब, हमने सुना है कि आप जल्दी ही कौशाम्बी वि.वि. के वीसी बनने वाले हैं । कब जा रहे हैं अपने नये दायित्व पर ?”

“अरे यार क्या बताएं सब गड़बड़ हो गया । सब कुछ लगभग तय हो चुका था । चयन समिति में अपने भी परिचित थे, अतः अपना नाम तो आगे बढ़ा ही था । मैं पिछले कुछ समय से गर्वनर महोदय के पीए से भी मिलता आ रहा था । हाल ही में उन्होंने बताया भी था कि आप अपनी नियुक्ति हुई ही समझो, बस फाइनल सिग्नेचर होने की देरी है । मैं तो पूरी तरह आश्वस्त था, लेकिन क्या बताएं ! …” फिर मेरे सहयोगी की ओर मुखातिब होकर कहने लगे, “अरे, आपके वे प्रोफेसर शर्मा हैं न,  … आप तो उन्हें जानते ही हैं । पता नहीं वे कहां से टपक पड़े । बस, हमारा पत्ता काट दिया उन्होंने । धोखा खा गए ।”

हम लोगों ने चुटकी ली, “ये सब तो चलता रहता है । अभी खेल खत्म थोड़े ही हो गया है । कोशिशें जारी रखेंगे तो फिर मौका मिलेगा । हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं ।”

इतना कहते हुए हमने उनसे विदाई ली और चल दिए मंदिर की ओर चाय पीने । अपनी मंजिल तो मंदिर के पास का टी-स्टाल था न कि प्रदेश का राजभवन ।

सक्सेना साहब के प्रयास चलते रहे और एक दिन खबर मिली कि वे राज्य के किसी अन्य वि.वि. के वीसी नियुक्त हो गये हैं । उनकी पहुंच ने अंततः उन्हें मंजिल तक पहुचा ही दिया । यह कोर्ई माने नहीं रखता कि बाद में उन पर लगे आरोपों की चर्चा भी प्रादेशिक अखबारों में छपी थीं । अहम बात तो यह है कि पूर्व-कुलपति रह चुकने का तमगा तो उन्हें मिल ही गया । ऐसे तमगों का भी अपना आनन्द होता है । – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

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प्लास्टिक थैलियां इस्तेमाल न करने की बात और पहले आप पहले आप की चिरस्थायी नीति!

चंद रोज पहले की ही बात है । मैं अपने किराने-परचून की दुकान पर गया था घरेलू इस्तेमाल की दो-चार चीजें खरीदने के लिए । मैं अपने साथ सदा ही कपड़े का थैला ले जाया करता हूं उसमें सामान भरकर लाने के लिए । मेरा दुकानदार जानता है कि मैं पतले प्लास्टिक के थैलों के इस्तेमाल का धुर विरोधी हूं । जब कभी उसका सहायक प्लास्टिक के थैले में कोई चीज लाकर देने लगता है तो वह उसे टोक देता है, “देखते नहीं आप थैला लेकर आये हैं ? यह देखना भूल जाते हो कि कौन ग्राहक थैला लेकर आया है और कौन नहीं।”

मैं खुद भी उसके सहायक को अक्सर टोक देता हूं, अरे भई तपाक-से प्लास्टिक में सामान भर के मत थमा दिया करो । खुद भी कभी-कभार अपनी तरफ से ग्राहकों से कह दिया करो कि बाबूजी, थैला लेकर आते तो ज्यादा अच्छा होता । कोई तुम्हें मारने थोड़े ही आएगा । अगर कोई प्लास्टिक की मांग पर अड़ जाए तो दे दिया करो । लेकिन एक बार कह तो सकते हो न ।”

अपने शहर वाराणसी में प्लास्टिक की बहुत पतली थैलियों का दुकानदारी में बेरोक-टोक इस्तेमाल होता है । मेरी जानकारी में ऐसी थैलियों पर काननूी रोक है । लेकिन कानून बेचारा क्या करें ? उसके अपने हाथ-पांव तो होते नहीं कि खुद चलकर कानून के उल्लंघन को रोके । और प्रशासनिक तंत्र के पास काम का इतना बोझ रहता है कि वह हाथ पर हाथ रखकर सब कुछ होते हुए देखने में ही अपनी भलाई पाता है । अतः कानून तो बन जाते हैं, लेकिन उससे वस्तुस्थिति नहीं बदलती । जो अनर्थ लोग करने लगते हैं वह बदस्तूर चलता रहता है । हर कोई इस बात का इंतिजार करता है कि कानून डंडा लेकर दौड़ते हुए उसके पास आये और उसे रोके । कोई मुझे टोके इसका इंतिजार किए बिना ही मैं खुदबखुद कानून का पालन करूंगा ऐसी सोच ऊपर वाले ने उसे शायद दे ही नहीं रखी है ।

मेरे दुकानदार ने एक-दो बार अपने ग्राहकों को कपड़े की थैलियां बांटकर उनसे आग्रह किया था कि वे उन थैलियों को लेकर आएं । लेकिन जब लोगों ने कसम खा रखी हो कि जब तक उनका वश चलेगा वे कोई भला काम नहीं करेंगे, तो भला चीजें कहां सुधरने वाली । लिहाजा दुकानदार ने ही अपनी गलती सुधार ली । यों उसने मुझे बताया था कि प्लास्टिक का इस्तेमाल कुल मिलाकर उसे महंगा ही पड़ता है । लेकिन करे क्या ग्राहकों को नाखुश भी तो नहीं कर सकते !

उस दिन की घटना पर वापस लौटता हूं । मूल्य चुकता करके जब मैं अपना सामान साथ लाए कपड़े के झोले में संभाल रहा था तब दुकानदार का सहायक प्लास्टिक के एक बड़े-से थैले में अन्य ग्राहक का सामान भरकर ले आया । ग्राहक महोदय मेरे ही बगल में खड़े थे । अपरिचित होते हुए भी मैंने विनम्र भाव के साथ मुस्कराते हुए उनसे कहा, “झोला साथ लेकर अगर  आप भी सामान खरीद ले जाया करें तो अच्छा होगा । देखते ही होंगे कितना प्लास्टिक सड़कों-नालियों में पड़ा रहता है । अपने शहर में इसके निस्तारण का कोई प्रबंध तो है नहीं । अपनी तरफ से हम लोग इतना भी कर लें तो कुछ अंतर तो पड़ेगा ही ।”

मैं जब भी खरीद-फरोख्त करता हूं तो प्लास्टिक की थैली के लिए यथासंभव मना कर देता हूं । मेरी पत्नी एवं मैं आम तौर पर अपने साथ थैला आदि लेकर चलते हैं । कभी-कभार दुकानदार भी कपड़े के थैले में सामान भरके दे देता है । मैं अक्सर दुकानदार तथा अगल-बगल खड़े ग्राहकों को भी बिन मांगी सलाह दे बैठता हूं । ऐसी धृष्टता के साथ पेश आना मेरे स्वभाव का हिस्सा बन चुका है । और यही धृष्टता मैं इस बार भी कर बैठा । उक्त ग्राहक मेरी बात पर नाखुशी व्यक्त कर सकते थे, परंतु ऐसा हुआ नहीं । मेरी भावना को स्वीकार करते हुए बोले, “हां, आप ठीक कहते हैं, लेकिन झोला लेकर चलने की आदत ही नहीं बनी । दुकानदार प्लास्टिक के थैले में सामान दे देता है, तो उसी में सुविधा लगती है । दुकानदार ऐसे थैले देना बंद कर दे तो झोला साथ लाना शुरू हो जाए ।”

“लेकिन दुकानदार कहता है कि अनुरोध करने के बावजूद लोग अपने साथ थैला लाते ही नहीं । वे तो प्लास्टिक की थैली में ही सामान मांगते हैं । आप कहते हैं कि दुकानदार बंद करे ऐसी थैली देना, और दुकानदार कहता है कि ग्राहक मांगना बंद करें । पहले अंडा या मुर्गी वाला सवाल यहां खड़ा हो जाता है । इसलिए कुछ हो नहीं पाता ।” मैंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

वे बोले, “आप सही कह रहे हैं, मुझे कोशिश करनी चाहिए ।”

उनके इस कथन को सुनने के बाद मैंने उनसे विदाई ली और घर की राह चल पड़ा । – योगेन्द्र जोशी

 

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चालीस साल पहले हुआ था हिन्दी से जुड़ा एक अनुभव मद्रास (चेन्नै) में

मोदी सरकार ने हाल में राजभाषा हिन्दी के प्रयोग पर बल दिया है । इस नई सरकार के “हिन्दी प्रेम”के प्रति कई राजनेताओं ने विरोधात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है । प्रखर विरोध तमिलनाडु के दोनों प्रमुख दलों के शीर्षस्थ नेताओं की ओर से देखने को मिला है । अन्य राज्यों के नेताओं ने नाखुशी तो व्यक्त कर दी, लेकिन उनका विरोध जबर्दस्त नही कहा जा सकता है । वस्तुतः तमिल राजनीति हिन्दी विरोध पर टिकी है । वहां के नेतागण इसे अपनी तमिल अस्मिता से जोड़ते हैं । संविधान सभा में जब हिन्दी को राजभाषा बनाने की बात की जा रही थी तब भी यह विरोध था और आज भी है । दक्षिण भारत की अपनी हालिया यात्राओं में मैंने अनुभव किया है कि हिन्दी के प्रति उनके रवैये में बदलाव आता जा रहा है ।

हिन्दी विरोध की बात पर मुझे 1973 में संपन्न दक्षिण भारत की अपनी यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब मैं अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में नया-नया प्रविष्ट हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । तब बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । किसी अन्य शहर से चेन्नै-बेंगलूरु का आरक्षण रेलवे विभाग तार (टेलीग्राम) द्वारा किया करता था जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । लेकिन आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में होती भी नहीं थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । (प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर सोते हुए रातें गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है ।) कुछ ही देर में वहीं मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रह सकते हैं और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । पाश्चात्य समाजों में ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन से यह खासियत अब गायब होने लगी है ।

उन सज्जन को जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर तो हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।”

उनको जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।

उनका उत्तर था, “मैं केरला का रहने वाला हूं और कुछ देर बाद अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकलूंगा । दरअसल मुझे कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से नहीं बात कर सकते ।”

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनसे कहा, “मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उस विरोध का अनुभव भी कर रहा हूं । ऐसा विरोध तो केरला में भी होगा न ?”

“नहीं, ऐसा नहीं है । केरला के लोग व्यावहारिक हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं । आपने केरला की नर्सों को उत्तर भारत के अस्पतालों में भी देखा होगा । केरला के लोग जानते हैं हिन्दी से परहेज उनके हक में नहीं है ।”उनका उत्तर था ।

और कुछ समय बाद वे अपनी रेलगाड़ी पकड़ने चल दिए । इस दौरान उनसे अन्य कितनी तथा कैसी बातें हुई होंगी इसे आज ठीक-से बता पाना संभव नहीं । पर इतना जरूर कह सकता हूं कि ऊपर कही गईं बातें वार्तालाप का सारांश प्रस्तुत करती हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

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कबाड़ की कीमत एक रुपया

मैं अपने घर के अहाते में टहल रहा हूं । सड़क पर भोंपू की आवाज आती है – भोंपू जो आजकल मुश्किल से ही कहीं प्रचलन में दिखाई देता है । मैं समझ जाता हूं कि एक कबाड़ी घर के सामने से गुजरने वाला है । कबाड़ खरीदकर ले जाने वाले इस धंधे में लगे अन्य लोग भी इधर से गुजरते हैं, लेकिन कोई दूसरा भोंपू बजाते हुए नहीं निकलता है । हां, “रद्दी अखबार वालाऽ…”, “रद्दी कागज अखबार बेचोऽ…”, “कागज लोहा पेपर प्लास्टीकऽ…” जैसे बोल जोर-जोर से बोलते हुए वे लोग गुजरते जरूर हैं । जब भी संयोग से मुझे भोंपू की आवाज सुनाई देती है तो मैं समझ जाता हूं कि वही कबाड़ वाला गुजर रहा होगा । वह रोज ही यहां से निकलता है या दो-तीन दिन में एक बार यह मैं बता नहीं सकता ।

मुझे याद नहीं कि भोंपू वाले इस “कारोबारी”को मैंने पहले कभी कबाड़ का सामान दिया हो । मेरा मन होता है कि आज इसी को कबाड़ सौंप दूं । मैं अखबार की रद्दी, प्लास्टिक की बोतलें, या इसी प्रकार की बेकार हो चुकी चीजें घर में अधिक जमा नहीं होने देता हूं । बीच-बीच में जब भी ध्यान आता है सड़क पर गुजरते किसी भी कबाड़ी को बुलाकर दे देता हूं । सोचता हूं आज इसी को चुना लिया जाए । मैं अपने अहाते का प्रवेशद्वार खोलता हूं और जैसे ही वह नजदीक आता है इशारे से उसे बुलाता हूं ।

मैं घर के अंदर से चार-पांच किलो पुराने अखबार उठा लाता हूं और उसे सौंप देता हूं । फिर दुबारा अंदर जाकर प्लास्टिक का एक थैला लेकर वापस बाहर आता हूं । मैंने इस थैले में कबाड़ की छोटी-मोटी चीजें जमा कर रखीं हैं । थैला उसे देते हुए कहता हूं, “ये पूरा थैला लेता जाइएगा । इसमें पड़ी कुछ चीजें अगर कबाड़ के काम की भी न हों तो कूड़े में डाल दीजिएगा ।”

“और भी कुछ है, बाबूजी ?” वह जानना चाहता है ।

“नहीं, कबाड़ का और सामान तो अभी नहीं । इतना ही इस समय है; आपकी आवाज सुनी तो सोचा आपको ही क्यों न सौंप दूं । असल में मैं घर में कबाड़ की चीजें अधिक जमा नहीं होने देता हूं । थोड़ा बहुत जो भी बीच-बीच में जमा हो जाता है ध्यान आने पर किसी न किसी को सौंप देता हूं । आज आप ही सही ।”

वह अपना तराजू-बटखरा बोरे से बाहर निकालने लगता है । मैं उसे रोकते हुए कहता हूं, “ये सब तौलने की जरूरत नहीं है; ऐसे ही रख लीजिए ।”

“ऐसे ही रख लीजिए” मेरे इन शब्दों के अर्थ वह कदाचित यह लेता है कि इतना कम तौलने की जरूरत ही क्या है, जो उचित लगे अंदाजे से दे दीजिए । परंतु मेरा मंतव्य दरअसल ऐसा है नहीं । मैं उसे बेचने का इरादा नहीं रखता, बल्कि उसे मुफ्त में दे देना चाहता हूं । मैं कहता हूं, “अरे भई, इसका कोई पैसा नहीं लेना है मुझे । आप यूं ही रख लीजिए ।”

“मुफ्त में लेना भीख मांगना जैसा होगा, बाबूजी । मैं अपने काम से निकला ही हूं । अभी बोहनी का वक्त है, इसलिए आपको कुछ तो लेना ही होगा ।” कहते हुए वह अपना बटुआ खोलकर मेरी ओर बढ़ा देता है ।

“ठीक है, आप कहते हैं तो कुछ ले लेता हूं । बोलिए कितना लूं ?” मैं उससे पूछता हूं ।

“जो आप ठीक समझें ।”

“ठीक है, एक रुपया ले रहा हूं । चलेगा ?”

“ठीक है, जैसा आप चाहें । … लेकिन आप ये अखबार, प्लास्टिक बगैरह मुफ्त में क्यों देना चाहते हैं ?” वह जिज्ञासा व्यक्त करता है ।

“मैंने पिछले कुछ सालों से बेकार हो चुकीं घर की चीजें कबाड़ के तौर पर बेचना बंद कर दिया । मैंने सोचा कि ये सब चीजें मेरे लिए तो बेकार हैं ही; मेरी आमदनी इन पर आधारित तो है नहीं । मैं किसी को दे दूं तो मुझे किसी प्रकार के नुकसान का एहसास होने वाला नहीं । लेकिन कबाड़ की खरीद-फरोख्त में लगे आदमी के लिए ये चीजें रोजीरोटी का आधार हैं । उन्हें तो सभी जगह से इन्हें इकट्ठा करना होता है । उनके लिए ये कीमती चीजें हैं । इसलिए मेरे मन में एक बार विचार आया कि घर में बेकार पड़ी चीजें किसी को क्यों न दे दूं जिसके लिए उसका महत्व हो । बस तब से यह चल रहा है ।”

“ विचार तो अच्छा है, बाबूजी, लेकिन ऐसा कहां कोई सोचता है । अच्छी माली हालत वाला भी कहीं से दो पैसा मिल रहा हो तो छोड़ना नहीं चाहता । … अच्छा बाबूजी, चलूं, नमस्ते ।” कहते हुए वह विदा हो लेता है । – योगेन्द्र जोशी

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एक नहीं दो बार वोट, और वह भी एक को नहीं

इस बार मेरे शहर वाराणसी का लोकसभा चुनाव देश भर के लिए सर्वाधिक महत्व का रहा, क्योंकि यहां से बहुचर्चित प्रत्याशी थे नरेन्द्र मोदी और साथ में थे उनको चुनौती देने वाले नवोदित राजनेता अरविंद केजरीवाल । यों इनके अलावा भी मैदान में ताल ठोंकने वाले थे अपने-अपने दलों के प्रत्याशी अजय राय, कैलाश चौरसिया एवं विजय जायसवाल, जिनका अपना-अपना जनाधार रहा है । इन पाचों को मिलाकर मैदान में थे कुल 42 प्रत्याशी जिनमें अधिकांश अज्ञात श्रेणी के थे । इतनी बड़ी संख्या के लिए तीन-तीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था की गई थी प्रत्येक पोलिंग बूथ पर । इतने प्रत्याशी मैदान में क्यों उतरे होंगे यह वे ही बता सकते हैं, पर मतदान को पेचीदा बनाने में उनका योगदान अवश्य रहा ।

वस्तुतः वाराणसी इस बार “वीआईपी”चुनाव क्षेत्र बन गया था । मेरे लिएयह चुनाव इसलिए माने रखता था कि मैं एवं मेरी पत्नी स्थायी बाशिंदे होने के कारण इस क्षेत्र के लंबे अर्से से मतदाता हैं । इस बार के चुनाव में मुझे कुछएक ऐसे अनुभव हुए जो मेरी दृष्टि में चुनाव आयोग की घटिया कार्यप्रणाली दर्शाते हैं ।

हमारी कालोनी के चुनाव स्थल पर दो अलग-अलग कमरों में अलग-अलग मतदाता सूची के अनुसार मतदान प्रक्रिया चली । पहले कमरे पर मतदाताओं की संख्या इतनी कम थी कि वहां लाइन लगााने की जरूरत ही नहीं थी, जब कि दूसरे पर मतदाताओं को लंबी लाइन में इंतिजार करना पड़ रहा था । एक दिलचस्प लेकिन आपत्तिजनक बात जो मैंने वहां देखी वह है कि कुछ मतदाताओं के नाम दोनों ही सूचियों में मौजूद थे । पोलिंग बूथ पर पहुंचने पर जब हम अपने को मिले मतदाता पर्ची के अनुसार उस लंबी लाइन में लगे तो एक युवक हमारे पास पहुंचा और बोला, “अंकलजी, आप दोनों का नाम तो पहली सूची में भी है । क्यों न वहीं वोट डाल दें । लंबी लाइन में लगने से बच जाएंगे ।”

लाइन में लगने से बच जाएं और तुरंत मतदान करके छुट्टी पा जाएं इससे भला और क्या हो सकता था । लाइन छोड़ हम वहीं पहुंच गए । उस कमरे के प्रभारी ने आरंभ में मेरी पहचान पर शंका जाहिर की लेकिन फिर मान लिया कि मैं सही मतदाता हूं । मतदान की शेष प्रक्रिया संपन्न की गई और मैंने मशीन का वांछित बटन दबाकर मत व्यक्त कर लिया । लेकिन समस्या मेरी पत्नी के साथ आई जब मतदान कर्मचारियों ने कहा कि उनका नाम सूची में “विलोपित”श्रेणी में है । यानी वे मतदाता हुआ करती थीं लेकिन अब नहीं रहीं । अजीब बात कि पति-पत्नी सालों से साथ-साथ अपने निजी मकान में रहते आए हैं और उनमें से एक का नाम गायब ! बहस करना निरर्थक रहा । इस विलोपित श्रेणी को मतदाता सूची में रखने का औचित्य हमारी समझ से परे था । हम बाहर निकले और मेरी पत्नी वापस उसी लाइन में फिर से लग गईं जिसे छोड़कर आईं थी । इस बीच लाइन में और लोग जुड़ चुके थे, जिसके कारण अतिरिक्त विलंब झेलना पड़ा । डेड़एक घंटे में वह अपना मत दे पाईं ।

मैंने मतदाताओं की परस्पर भिन्न दो-दो सूचियों की बात ऊपर कही है और बता चुका हूं कि कुछ व्यक्तियों के नाम दोनों में मौजूद थे । ऐसी सूचियों को मैं आयोग की अकुशल एवं दोषपूर्ण कार्य प्रणाली के प्रमाण के तौर पर देखता हूं । ऐसी सूची दोहरे मतदान की संभावना कैसे पैदा करती हैं इसे मैं एक अनुभव से स्पष्ट करना हूं ।

मतदान के दूसरे दिन प्रातः मैं अपने घर के पास की सब्जीसट्टी पर गया । वहां मैं एक परिचित युवक के पास पहुंचा जो ठेले पर सजाकर सब्जी बेच रहा था । खरीद-फरोख्त के दौरान उसने पूछा, “अंकल, कल वोट तो दिया ही होगा । किसको दिया वोट ?” 

मैंने अपने वोट के बारे में बताने के बजाय उल्टे उसी से पूछ डाला, “तुम बताओ तुमने किसको वोट दिया ?”

  “मैंने तो दो-दो वोट डाले कल, दोनों अलग-अलग जनों को ।”उसका उत्तर था ।

“सो कैसे ?” मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा ।

“हुआ यह कि मैं सुबह ही वोट डाल आया । घर लौटने पर मेरे पड़ोसी दोस्त ने कहा, ‘तुम्हारा नाम तो दोनों लिस्ट में है । क्यों न दुबारा वोट डाल आते हो ।’सो मैं दुबारा वोट डाल आया ।”

“दूसरी बार भी उसी प्रत्याशी को वोट दिया होगा ।” मैंने अनुमान लगाया ।

“नहीं अंकलजी, पहली बार मैंने मोदी को वोट दिया और दूसरी बार केजरीवाल को । असल में दोनों ही अच्छे हैं । इसलिए दोनों को ही एक-एक वोट दे दिया ।” उसका जवाब था ।

“लेकिन तुम्हारी अंगुली पर तो स्याही का निशान रहा होगा; दुबारा कैसे वोट डाल पाए ?” मैंने सवाल किया ।

“दरअसल मेरे दोस्त ने उसकी काट भी मुझे बताई । उसने कहा कि निशान ताजा है सो पपीते के सफेद चेप से साफ हो जाएगा । वही मैंने किया । यों टॉयलेट की सफाई में इस्तेमाल होने वाले एसिड से भी साफ हो जाता है ।”

“अच्छा ठीक है, अभी तुम अपने ग्राहकों को सब्जियां तौलो ।” कहते हुए मैं घर लौट आया ।

इतना बता दूं कि वह युवक किसी अन्य पोलिंग बूथ का मतदाता था । उसकी बातें सुनकर मैं सोचने लगा कि अगर मतदाताओं के नाम एकाधिक सूचियों में हों और वे अंगुली पर लगा निशान मिटाकर दुबारा-तिबारा मत प्रयोग करें तो चुनाव परिणाम विश्वसनीय नहीं रह सकते । - योगेन्द्र जोशी

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आम रिक्शावालों से कुछ अलग था वह

दो रोज पहले की बात है जब मेरी मुलाकात एक ऐसे रिक्शा वाले से हुई जिसका व्यवहार आम रिक्शाचालकों से कुछ हटकर था, जिसकी सोच आम आदमी से भिन्न थी, और जिससे बात करना दिलचस्प था । हुआ यह कि कल मैं सपत्नीक घर से गोदौलिया कार्यवशात गया था । गोदौलिया मेरे शहर वाराणसी का पुराना और घनी बस्ती वाला व्यापारिक स्थान है, जिसके निकट ही सुचर्चित बाबा विश्वनाथ मंदिर और गंगातट का दशाश्वमेध घाट हैं । बेहद भीड़भाड़ वाले इस जगह के ‘गोदौलिया चौराहे’ पर आवागमन हेतु सामान्यतः रिक्शा ही उपलब्ध हो पाते हैं । थ्रीह्वीलर आटोरिक्शे करीब आधा-पौन किलोमीटर दूर मिलते हैं । वहां से हम रिक्शा से लौटे थे ।

संध्या का समय था । गौदौलिया से लौटते समय जब हम लंका तक के लिए रिक्शा खोज रहे थे तो संयोग से एक नौजवान रिक्शावाला बगल में आ खड़ा हुआ और बोला, “लंका चलना है न ? आइए, बैठिए ।” और आगे रिक्शाभाड़े के बाबत खुद ही कहने लगा, “वैसे तो लंका तक का किराया चालीस रुपया होता है, लेकिन चूंकि मुझे उसी तरफ जााना है, इसलिए केवल तीस रुपया दे दीजिएगा ।” (बताता चलूं कि लंका हमारे घर के निकट है और वहीं पर सुविख्यात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का प्रवेशद्वार है ।)

भाड़े पर हामी भरते हुए हम रिक्शे पर बैठ गये, और वह चल पड़ा । नौजवान होने के कारण रिक्शा चलाने में उसे खास मशक्कत नहीं करनी पड़ रही थी ऐसा मुझे लगा । मार्ग में वह रामभक्ति के गीत/भजन गाने लगा । बीच रास्ते हमने उससे कहा, “बेटा, हमें लंका के अगले चौराहे यूनिवर्सिटी गेट वाले से पास छोड़ देना ।”

“आप जहां कहें वहां छोड़ दूं ।” उसका जवाब था ।

“तो क्या तुम सुंदरपुर तक चलोगे ?” हमने उससे पूछा ।

“छोड़ तो देता लेकिन अब रिक्शा जमा करने का समय हो रहा है ।”

“यह रिक्शा किराये पर लिए हो क्या ? कितना किराया भरना पड़ता है इसका ? और लंका के पास ही रहते हो क्या ?”

“चालीस रुपया रोज पडता है । लंका से सामनेघाट की ओर कुछ दूरी पर है मालिक की दुकान । गंगा पार रामनगर में मेरा घर है; वहीं से निकल जाऊंगा घर के लिए ।” उसने उत्तर दिया ।

रास्ते भर मुक्त भाव से उसे भजन गुनगुनाते देख मैंने पत्नी से कहा कि लगता है यह व्यक्ति तनाव में नहीं रहता होगा । जिज्ञासावश मैंने उससे पूछा, “लगता है भजन-कीर्तन की पुस्तकें पढ़ने का शौक है । कितने तक पढ़े हो भई ।”

“बाबूजी, स्कूल गये तो थे लेकिन हमें कुछ आता नहीं था । बस टीचर लोग हर साल अगली कक्षा में बढ़ा देते थे । क्या बताऊं ?”

“फिर भी पढ़ना-लिखना तो आता ही होगा ।”

“हां, थोड़ा-बहुत पढ़-लिख लेता हूं काम भर का, ज्यादा नहीं ।”

तब तक हम लंका पहुंच चुके थे । मैंने पत्नी से इशारे से कहा, क्यों न चालीस रुपया भाड़ा दे दें । पत्नी ने सहमति जताई और उसे मैंने यह धनराशि चुका दी । वह बोला, “लेकिन बाबूजी मैंने तो आपसे तीस ही रुपये मांगे थे । चूंकि मुझे इधर आना था तो सोचा कि जो भी मिल जाए अच्छा ।”

“ठीक है, हम अपनी मरजी से दे रहे हैं ।” कहते हुए हम रिक्शे से उतरने लगे तो उसने रिक्शे के हत्थे पर लटक रहे अपने झोले से कागज के कुछ पन्ने निकाले और हमें सोंपते हुए बोला, “आपको याद होगा, अभी दो-चार पहले राहुल गांधी शहर के रिक्शाचालकों से मिले थे । मैं भी उनसे मिला था; उन्हें एक पत्र भी सोंपा था । यह उसी की कापी है । मैंने उन्हें एक गीत भी सुनाया ।”

उसने भोजपुरी में शब्दबद्ध एवं भारतमाता को संबोधित वही गीत, “माई, माई …” हमें सुना डाला । उस गीत के बोल हमें याद नहीं हैं, लेकिन इतना ध्यान है कि उसमें देश की गरीब जनता की व्यथा का जिक्र करते हुए भारत मां से उनके कष्ट मिटेंगे यह प्रश्न पूछा गया था । मेरे इस सवाल पर कि वह गीत किसका लिखा है, उसने बताया कि गीत स्वयं उसी का लिखा है । मैंने पूछा, “क्या इसकी लिखित प्रति भी रखे हो ? अगर हो तो वह भी दे दो ।”

उसका उत्तर था, “गीत की प्रति तो मेरे पास नहीं है, लेकिन आपको यह इंटरनेट पर मिल जाएगा । बनारस के रिक्शा वालों से आप राहुल जी की बातचीत उनकी जिस साइट पर मिलेगी वहीं यह भी मिल जाएगा ।”

उक्त वार्तालाप के पश्चात हमने उसकी रुचियों पर उसे बधाई के साथ शुभकामनाएं दीं और घर लौट आए । दरअसल धन-दौलत और ऐशो-आराम के बाबत भी उसने अपने खयालात हमारे सामने पेश किए थे । हम दोनों उसकी बातों से प्रभावित थे, क्योंकि वह हमें आम रिक्शावाले से कुछ हटकर लगा । बाद में मैंने इंटरनेट पर उस गीत को खोजने का प्रयास किया, किंतु मुझे वह मिल नहीं सका । गीत तो नहीं परंतु उसके द्वारा लिखित उपर्युक्त पत्र की प्रति वाकये के इस विवरण के साथ संलग्न है । – योगेन्द्र जोशी

Rickshawmans let2Rahul

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वरिष्ठ नागरिक होना भी माने रखता है

रेलगाड़ी एवं बसों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए बैठने के स्थान बहुधा आरक्षित रहते हैं । वरिष्ठ का मतलब उस व्यक्ति से है जो वयसा साठ साल या अधिक का हो चुका हो । बसों/रेलगाड़ियों के संदर्भ में तो यह परिभाषा काफी पहले से प्रचलन में रही है । इसके विपरीत आयकर विभाग कुछ वर्ष पहले तक पैंसठ अथवा उससे अधिक की उम्र ले चुके व्यक्ति को ही वरिष्ठ मानता था । परंतु अब उस विभाग में भी उक्त परिभाषा लागू हो चुकी है । वरिष्ठ नागरिकों को वहां भी आयकर की किंचित छूट प्राप्त हो जाती है । अन्य कई क्षेत्रों में भी वरिष्ठों को सिद्धांततः किसी न किसी प्रकार की रियायत देने के नियम हैं, जैसे अस्पतालों में । सभी वरिष्ठ नागरिकों को उन रियायतों की जानकारी हो ही यह आवश्यक नहीं है । जहां सुविधाएं आरक्षित हों वहां भी उसका लाभ मिल ही जाए जरूरी नहीं । संबंधित अन्य लोग इन प्रावधानों की परवाह करते ही हों यह आवश्यक नहीं ।

मेरी पत्नी एवं मैं वरिष्ठ नागरिक हैं । मुझे वरिष्ठ दिखना एवं कहलाना सम्मानजनक लगता है मैंने सुना है कि कुछ लोग उम्र छिपाने के इच्छुक होते हैं और वे उम्रदराज न लगें इसके लिए सिर के बालों को खिजाब से रंगते भी हैं । लेकिन मुझे उम्र के साथ बालों का सफेद होना स्वाभाविक लगता है । मेरे बालों में अभी सफेदी कम ही है, लेकिन मैं चाहता हूं कि वे हिमवत श्वेताभ हों । आखिर उम्र का सयानापन भी तो कहीं झलके । सयानापन न भी हो तो कम से कम उसका भ्रम तो पैदा हो । बुजुर्ग लगने वाले को लोग कुछ तो सम्मान देते ही हैं ऐसा मैं समझता हूं । कभी-कभी ऐसा स्पष्टतः अनुभव में आता भी है । इस संबंध में मुम्बई की एक हालिया घटना मेरे स्मरण में आती है, जिसका जिक्र मैं यहां पर करना चाहता हूं ।

हाल ही में कभी हम पति-पत्नी कुछ दिनों के प्रवास पर मुम्बई में थे । एक दिन हम उस महानगर के समुद्र तट पर स्थित ख्यातिप्राप्त “गेटवे-आफ-इंडिया” के आसपास भ्रमणार्थ निकले । वापसी के लिए हमने स्थानीय रेलगाड़ी यानी लोकल ट्रेन चुनी जो “चर्च-गेट रेलवे टर्मिनस” से लेनी थी । गेटवे-आफ-इंडिया से चर्च-गेट तक की दूरी हमने महानगर की स्थानीय बस सेवा से तय की । संबंधित नगरीय बस इन्हीं दो स्थानों के बीच चलती है । मेरे अनुमान में दोनों स्थानों के बीच की दूरी पांच-एक किलोमीटर से अधिक नहीं होगी ।

हमें जो बस मिली वह सवारियों से पहले ही भर चुकी थी, और तुरंत ही चलने को तैयार थी । अगली बस का इंतिजार करने के बजाय हमने उसी से गंतव्य तक जाने का विचार किया । बस के अंदर सभी सीटें भरी हुई थीं, अतः हम चालक के पास के प्रवेशद्वार के निकट खड़े हो लिए । उस भीड़ में हमारे लिए यह पता करना कठिन था कि कहीं आसपास की दो-एक सीटें वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित हैं या नहीं । दरअसल नगरीय बसों से चलने के आदी न होने के कारण हमें इस संभावना का ख्याल तक नहीं था । मेरा सोचना है कि अन्य सवारियां भी उस आरक्षण के प्रति सामान्यतः सचेत नहीं रहती होंगी । वरिष्ठ नागरिकों का आवागमन भी इन बसों के माध्यम से शायद कम ही होता होगा, जिसके कारण ये सीटें अक्सर खाली रहती होंगी और उन पर अन्य सवारियां बैठ जाती होंगी ।

बस के चल चुकने के एक-दो मिनट पश्चात एक युवती अपनी सीट से उठी और मेरी ओर मुखातिब होकर बोली, “आप इस सीट पर बैठ जाइए ।

मैंने पत्नी को इशारा किया कि वह अमुक सीट ग्रहण कर लें । उनके बैठ जाने पर बगल में बैठी पुरुष सवारी भी उठ खड़ी हुई, मुझे उस स्थान पर बैठने का संकेत करते हुए । शायद उसको भी लगा होगा कि बैठने का वह स्थान हम वरिष्ठों के लिए छोड़ देना चाहिए । इस प्रकार सौभाग्य से हमें बैठने की जगह मिल गई, वरिष्ठ नागरिक होने के नाते । हमने इस बात पर गौर नहीं किया कि वे सीटें वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित थीं अथवा नहीं । यह भी हो सकता है कि उन दो सवारियों ने मात्र सदाशयता के नाते हमारे लिए बैठने का स्थान छोड़ा हो । जो भी हुआ हो, ऐसे अवसरों पर एक प्रकार का संतोष-भाव मन में अवश्य उपजता है । – योगेन्द्र जोशी

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