Category Archives: Short Stories

मेरा शहर वाराणसी – अवयस्क गैरलाइसेंसशुदा ऑटोचालक

     लगभग साड़े-तीन साल पहले जब नरेन्द्र मोदीजी मेरे शहर वारणसी से सांसद चुने गए और तत्पश्चात्‍ प्रधनमंत्री बने तब नगरवासियों को उम्मीद बंधी कि शहर के हालात बदलेंगे, शहर दुर्व्यवस्था के रोग से मुक्त होगा, गंदगी से निजात मिलेगी, अव्यवस्थित यातायात का दौर समाप्त होगा, इत्यादि। और भी न जाने क्या-क्या उम्मीदें लोग पाल बैठे थे। साड़े-तीन साल के इस अंतराल के बाद यह निश्चित हो चुका है कि यहां कुछ भी बदलने वाला नहीं। जब योगी आदित्यनाथ ने राज्य की सत्ता संभाली तब एक बार फिर लगा कि पहले नहीं तो अब चीजें बदलेंगी, क्योंकि पहले प्रशासनिक तंत्र समाजवादी पार्टी के हाथ में था जिसका मोदीजी के प्रति विरोधात्मक रवैया रहा है। लेकिन योगीजी का राज भी कोई सुधार नहीं ला पाया है, और मुझे आगे भी उम्मीद नहीं है। कुछ लोग गंगाजी और वरुणा नदी के किनारों/घाटों तथा दो-चार पर्यटक स्थलों की साफ-सफाई और रंगरोगन की बात करते हुए कह सकते हैं कि कुछ तो हो रहा है। मेरा सवाल है कि शहर के अंदरूनी हिस्सों की व्यवस्था तो जस की तस या पहले से बदतर ही तो है।

     बीते रविवार के दिन घटित एक वाकये का जिक्र करता हूं। यह एक बानगी है जिससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हालात वाकई कितने गंभीर हैं। हमें (पत्नी एवं मैं) मुंबाई जाने के लिए प्रातः 10:25 बजे की रेलगाड़ी पकड़नी थी। हम करीब सवा घंटा पहले रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुए। मैंने एक ऑटो-रिक्शा (संक्षेप में ऑटो) तय किया और हम घर से चल दिए। रास्ते में ऑटो वाले से मार्ग में जाम के हालातों पर चर्चा करने लगे, क्योंकि अपने इस शहर वाराणसी में प्रायः हर रोज हर मुख्य मार्ग पर जाम की स्थिति बनी रहती है। हम तो साल में मुश्किल से एक-दो बार शहर की तरफ निकलते हैं, इसलिए इस बारे में अपना अनुभव खास नहीं है। किंतु स्थानीय अखबार में एतद्विषयक समाचार पढ़ने को मिलते ही रहते हैं। ऑटो वाले ने हमें बताया कि उस दिन रविवार होने के कारण काफी राहत रहेगी और हम 20-25 मिनट में स्टेशन पहुंच जाएंगे। हमने पूछा, “और दिनों क्या हालत रहती है?”

     “और दिनों मैं ऑटो नहीं चलाता। केवल इतवार को ही ऑटो निकालता हूं।” उसका सीधा जवाब था।

“केवल इतवार? ऐसा क्यों? और दिनों करते क्या हो फिर?” हमने सवाल दागा।

“मैं फलां-फलां एजेंसी (हमें नाम याद नहीं) में सेक्योरिटी का काम करता हूं। इतवार को मेरी छुट्टी रहती है। इसलिए उस दिन ऑटो निकालता हूं, और तबियत से ऑटो दौड़ाता हूं। डेढ़-दो हजार रुपये की कमाई कर लेता हूं।”

उसके बारे में हमारी जिज्ञासा बढ़ गई। उससे पूछा, “यह ऑटो किसी और का है क्या? इसके कागज-पत्तर तो दुरुस्त हैं न?”

“ऑटो तो मेरा ही है। शौकिया खरीद लिया और मौके-बेमौके काम देता है। लेकिन केवल इतवार को ही चलाता हूं। हफ्ते के छः दिन तो सिक्योरिटी का ही काम करता हूं, क्योंकि उसमें आराम है। ज्यादा काम नहीं रहता। रात में तबियत से सोने को मिल जाता है।” जवाब मिला।

जिज्ञासावश हमने पूछ लिया, “ड्राइविंग लाइसेंस तो रखे हो न?”

“नहीं अभी लाइसेंस नहीं है। छः महीने बाद बनाऊंगा, जब मेरी उम्र 18 पूरी हो जाएगी।”

उसकी बात सुन हमारा माथा ठनका। पहले मालूम होता तो उसे भाड़े पर न लेते। लेकिन तब आधे रास्ते में उसे छोड़ना भी संभव नहीं लगा। हमने पूछा, “क्यों भई, बिना लाइसेंस के चलाना जोखिम भरा नहीं है? रास्ते में पुलिस वाले पकड़ सकते हैं!”

“जेब में दो-चार सौ रुपये तो पड़े ही रहते है। दो सौ रुपये हाथ में टिका देंगे। उन्हें वसूली करने से मतलब। कौन-सा वाहन सीज़ (थाने में जमा) करते हैं जो डर लगे।”

“फिर भी लाइसेंस हो तो पैसा नहीं देना पड़ेगा। और कानून भी तो मानना चाहिए।”

“बनारस में कानून कौन मानता है। जहां तक पुलिस वालों को देने का सवाल है, वह तो करना ही पड़ेगा। जब वसूली करनी होती है तब दुरुस्त कागज-पत्रों के होते हुए भी वसूली करते हैं।”

उसकी बातें सुन हम निरुत्तर हो गए। आगे बोलें भी तो क्या बोलें! आए दिन अखबारों में पढ़ते रहते हैं कि पुलिस वसूली करती है और कानून के कार्यान्वयन में कोई रुचि नहीं लेते है। उस ऑटो-रिक्शा वाले की बातें सुनकर लगा कि हालात वाकई खराब हैं।

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तिरुमल तिरुपति के दर्शन का असफल प्रयास और बंगाली मोशाय की चिंता

इधर कुछ दिनों से तथाकथित बाबा राम रहीम की चर्चा समाचार माध्यमों में छाई हुई है। संबंधित समाचारों और उनको लेकर टीवी चैनलों पर प्रस्तुत बहसों को सुनकर मेरे मन में यह सवाल उठने लगा कि क्यों और कैसे लोग इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के अंध-भक्त बन जाते हैं। इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के तौर-तरीकों को देखने के बाद भी उनके मन में किसी प्रकार की शंका क्यों नहीं उठती? वे इनको भगवान तक का दर्जा कैसे दे बैठते हैं? किंचित् चिंतन करने पर मुझे लगने लगा कि आम आदमी वस्तुतः बहुत कायर होता है – कायर अज्ञात के प्रति, अज्ञात भविष्य के प्रति। अधिकांश मनुष्य अमूर्त शक्तियों में विश्वास करते हैं और उन्हें यह भय रहता है कि ऐसी शक्तियां यदि रुष्ट हो गयीं तो उनका अनिष्ट कर सकती हैं। जो व्यक्ति समस्याओं के दौर से गुजर रहा होता है वह उनके निदान एवं समाधान के लिए मंदिरों, पंडे-पुजारियों, ज्योतिषियों, और तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं आदि के पास पहुंचता है। मूल में अज्ञात शक्तियों का भय होता है ऐसा मेरा सोचना है।

विचार करते-करते मुझे कोई चौदह-पंद्रह वर्ष पहले की एक घटना की याद आ गई। अक्टूबर का महीना था और नौ-दिवसीय शारदीय नवरात्र का पर्व चल रहा था। मेरा प्रायशः पूरा जीवन उत्तर भारत में ही बीता है और यहां के अनुभवों के आधार पर मेरा सोचना यही रहा है कि नवरात्र का समय देवी दुर्गा (या उनके विभिन्न अवतारों) के दर्शन-पूजन का समय होता है। अपनी इसी धारणा से वशीभूत होकर मैंने शारदीय नवरात्र का समय तिरुमल (तिरुमला?) तिरुपति देवस्थानम् के दर्शन के लिए चुना, यह सोचते हुए कि इस देवी-पर्व के समय वहां तीर्थयात्रियों की भीड़ नहीं होगी। मैं अपनी पत्नी के साथ रेलगाड़ी से तिरुपति शहर पहुंच गया और वहां से तिरुमल पहाड़ियों पर स्थित तिरुमल तिरुपति वेंकटेश (श्रीपति वैकुण्ठेश भगवान विष्णु) मंदिर परिसर भी पहुंच गया।

वहां पहुंचने पर हमारी यह गलतफहमी दूर हो गई कि शारदीय नवरात्र-काल में तिरुमल में यात्रियों की भीड़ कम होगी। दरअसल इसी समय वहां भव्य “ब्रह्मोत्सव” का आयोजन होता है। पूरा मंदिर परिसर सजा रहता है। रात भर देवमूर्तियों की सजी हुई झांकियां विशाल मंदिर परिसर में घुमाई जाती हैं। उन्हीं में से एक में तिरुपति वेंकटेश की प्रतिकृति भी रहती है जिसके दर्शन-पूजन के लिए भीड़ उमड़ी रहती है। पूरे नवरात्र रात-दिन चहल-पहल रहती है।

तिरुमल में दर्शन के लिए अलग-अलग मूल्यों के टिकटों की व्यवस्था रहती है और उसी के अनुसार दर्शनार्थियों को छोटी-बड़ी पंक्तियों में खड़ा होना पड़ता है। इसके अतिरिक्त मुफ्त दर्शन वाली पंक्ति भी लगती है, परंतु उसमें दर्शन पाने में काफी समय लगता है। हम लोगों ने टिकट पाने की कोशिश की। पता चला कि पूरे नवरात्र भर के लिए सामान्यतः उपलब्ध टिकट बिक चुके हैं। विशेष मूल्य के टिकट (हजार-दो-हजार या अधिक के टिकट शायद मिल जायें ऐसा कइयों ने सुझाया। उपलब्ध जानकारी भ्रमित करने वाली ही थी। रात एक-डेड़ बजे तक हम भाग-दौड़ करते रहे, एक कार्यालय से दूसरे तक दौड़ते रहे, बैंक की शाखा (रात में भी खुली हुई) के चक्कर लगाते रहे, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

दूसरे दिन मुफ्त दर्शन के लिए ५००-६०० मीटर लंबी पंक्ति में हम भी लग लिए। तिरुमल में दर्शन की व्यवस्था मुझे अजीब और असुविधाजनक लगी। मैं अधिक विस्तार से वर्णन नहीं कर रहा हूं किंतु इतना बता दूं वहां १५-२० बड़े-बड़े हॉल हैं जिनमें दर्शानार्थियों को प्रतीक्षारत रहने के लिए टिका दिया जाता है। दर्शन के लिए एक-एक कर हॉलों को खोला जाता है और लोग आगे बढ़ते हैं। ब्रह्मोत्सव के समय भीड़ इतनी होती है कि उनको कभी-कभी आगे किसी और हॉल में फिर-से टिका दिया जाता है। हम भी एक हॉल में इंतिजार करने लगे। मालूम पड़ा कि दर्शन रात्रि ११-१२ बजे होंगे। हम संतुष्ठ थे कि चलो दर्शन तो हो ही जायेंगे। बाद में जानकारी को पुख्ता करने के लिए एक स्वयंसेवक (वॉलंटिअर) से पूछा तो पता चला कि दर्शन के लिए ११-१२ बजे का वक्त उस रात का नहीं बल्कि अगली रात का है।

हमारा माथा ठनका। हमारे लौटने का आरक्षण अगले दिन ३-४ बजे का था। हमने दर्शन का विचार त्यागा और बाहर आने के लिए तैयार हुए। पर यह क्या! हॉल के प्रवेश-द्वार पर तो ताला लटका था। वहां ठीक-से हिन्दी या अंग्रेजी समझने वाला स्वयंसेवक नहीं मिला जो हमारी समस्या समझ सके। बड़ी मुश्किल से एक युवक मिला जिसने हमारे मदद की। हम बाहर निकले और राहत की सांस ली। दूसरे दिन रेलगाड़ी से लौट आए बिना दर्शन किए।

इस घटना का रोचक पक्ष है एक बंगाली महाशय की दुश्चिंता जो हमारे देखने में आई। जब हम टिकट के लिए भाग-दौड़ कर रहे थे तब हमारी उनसे मुलाकात हुई। वे सज्जन तीस-बत्तीस वर्ष के युवा थे और कलकत्ता से पत्नी और छोटे बच्चों के साथ दर्शनार्थ आये थे। हमारी तरह वे भी परेशान थे। जब कहीं भी कोई उम्मीद नहीं दिखी तो उन्होंने हमारे सामने अपनी चिंता साझा की, “अब कैसे दर्शन होंगे? हम यहां अधिक समय टिकने की स्थिति में नहीं। बिना दर्शन के लौटना अनिष्टकारी होगा। हमें मालूम ही नहीं था कि इस समय दर्शन पाना इतना मुश्किल होगा।”

देव-दर्शन की कोई संभावना नहीं यह बात हमारे लिए भी निराशाजनक थी। जिस उद्देश्य से घर से चले थे उसका पूरा न हो पाना अच्छा तो नहीं लग रहा था। फिर भी इस बात को एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग मानकर हम सहज थे। इसके विपरीत वे महाशय बेहद चिंतित थे किसी अनिष्ट की आशंका को लेकर। उनके चेहर पर दुश्चिंता के भाव स्पष्ट झलक रहे थे। उनका कहना था, “देव-दर्शन किए बिना लौटना अनिष्टकारी तो होगा ही। अब हम क्या करें?”

हमने उनको समझाया, “देखिए दर्शन नहीं हो पा रहे हैं तो इसमें आपकी क्या गलती? परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि आपके लिए दर्शन संभव नहीं हो पा रहे हैं। क्या आप भगवान्‍ को इतना कमजोर समझते हैं कि एक साधारण मनुष्य़ की भांति वह भी बात-बात पर नाखुश हो जाएं? आपने मंदिर के दर्शन कर लिए, परिसर की झांकियों की भी झलक पा ली है। ये कम है क्या? यदि बहुत चिंता हो तो श्री व्यंकटेश से प्रार्थना करिए कि अगली बार दुबारा आने और दर्शन पाने का सुअवसर आपको प्रदान करें।”

मेरी बात उन्होंने गंभीरता से सुनी। मुझे लग रहा था कि उनको मेरी सलाह पसंद आ गई। उस रात हमने उनसे विदा ले ली। अगले दिन हम मुफ्त दर्शन पाने हेतु पंक्ति में लग लिए। उसके बाद क्या हुआ यह बता चुका हूं। उन चिंताग्रस्त महाशय से दुबारा भेंट नही हो सकी। उनकी दुश्चिंता यथावत्‍ बनी रही या नहीं मैं कह नहीं सकता। उस घटना से मुझे यह ज्ञान तो मिला ही कि सामान्य मनुष्य अनागत के बारे में सोच-सोचकर परेशान हो जाता है। वह अदृश्य शक्तियों में विश्वास ही नहीं करता बल्कि उनसे भय भी खाता है। वह सोचता है कि एक मनुष्य की भांति वे शक्तियां भी बात-बात पर रुष्ट हो सकती हैं और व्यक्ति का अहित कर सकती हैं। लेकिन वे शक्तियां क्या वास्तव में मनुष्य की तरह कमजोर होती हैं? मेरे मत में यह भ्रम मात्र है। – योगेन्द्र जोशी

 

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इंडियामाता की जय (स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर)

देशवासियों को पंद्रह अगस्त, स्वतंत्रता दिवस, की शुभकामनाएं

 

इस स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्रपति महोदय ने अपने हिन्दी में दिए सम्बोधन में कई बार “न्यू इंडिया” का जिक्र किया। वे “नये भारत” की बात कर सकते थे जो उन्होंने नहीं किया। “भारत(वर्ष)” यहां के बाशिंदों ने अपने देश को दिया हुआ प्राचीन नाम है, जो रामायण-महाभारत काल से प्रचलन में रहा है। किंतु अब इसको भुलाकर विदेशियों द्वारा दिए गये अपेक्षया नये नाम “इंडिया” का प्रयोग देशवासी कर रहे हैं। क्या यह भारत के, नहीं-नहीं इंडिया के, अंग्रेजीकरण की प्रक्रिया का फल है? जब देश का नाम इंडिया हो ही चुका तो “इंडियामाता की जय” क्यों न कहा जाए? इसी को केंद्र में रखकर लिखित एक लघुकथा।

 

पांच वर्षीय रग्घू (राघव) ने इस वर्ष पहली बार विद्यालय में कदम रखा था। उसने कक्षा चार में पढ़ रहे अपने बड़े भाई के साथ विद्यालय आना-जाना शुरू किया था। “के.जी.” स्तर की शिक्षा उसने घर पर ही पाई थी अपने मां से।

उस दिन पंद्रह अगस्त अर्थात्‍ देश का स्वतंत्रता दिवस था। रग्घू के विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस का राष्ट्रीय पर्व पारंपरिक तरीके से मनाया गया। वह विद्यालय में आयोजित कार्यकमों को लेकर उत्साहित था। आयोजन के दौरान उसकी प्रधानाध्यापिका ने ध्वजोत्तोलन के पश्चात्‍ बच्चों को देश की स्वतंत्रता के महत्व और देशवासियों के कर्तब्यों को समझाते हुए संबोधित किया था। संबोधन के अंत में बच्चों से “भारतमाता की जय” का उच्च स्वर में जयघोष करने को कहा गया। रग्घू के लिए आयोजन देखना नितांत नया अनुभव था, यद्यपि वह न तो संबोधन को समझ पा रहा था और न ही उस जयघोष को। अंत में विद्यालय में बंटी मिठाई खाते हुए वह बड़े भाई के साथ घर लौट आया।

घर पहुंचने पर मां ने रग्घू से विद्यालय में बीते उस दिन के अनुभवों के बारे में पूछा। उसने क्या देखा इसका उसने अपनी सीमित भाषाई सामर्थ्य के अनुसार चित्रण कर दिया। फिर मां के समक्ष अपनी जिज्ञासा प्रकट की, “अम्मा, स्कूल में हमारी प्रिंसिपल ने हम सभी से जोर से ’भारत माता की जय’ बोलने को कहा। ऐसा क्यों कहा होगा? और इसका मतलब क्या था?”

मां ने उसे देश, उसके नाम और उसकी स्वतंत्रता के मतलब समझाते हुए स्वतंत्रता दिवस के महत्व के बारे में बताया। ऐसे अवसरों पर हम देश का गुणगान करते हैं, उसकी ’जय हो’ कहकर पूजते हैं, वह कभी किसी से न हारे यह कहते हैं, इत्यादि कहते हुए कई तरीके से उस जयघोष के मतलब समझाए। जैसे कोई मां अपने बच्चे को पालती है उसी प्रकार यह देश हम सब को पालती है। खाने-पीने को भोजन, रहने को जगह और घूमने-फिरने की छूट यह सब हमें देश से ही मिलता है। इसीलिए हम इसे माता कहते हैं। हम दुनिया में सब जगह नहीं जा सकते क्योंकि वे हमारे देश के हिस्से नहीं होते हैं। मां ने इस प्रकार से बहुत कुछ उसे बताने का प्रयास किया।

रग्घू गंभीरता से मां की बात सुन रहा था। अभी वह बौद्धिक तौर पर इतना सक्षम नहीं था कि सभी बातों का निहितार्थ समझ सके। फिर भी वह महसूस कर रहा था कि उसका अपना एक देश है जिसे `भारत’ कहते हैं। उसे याद नहीं आ रहा था कि कभी उसने भारत नाम सुना हो। मां से उसने पूछा, “मैं टीवी पर क्रिकेट और दूसरे खेलों के प्रोग्राम देखता हूं। तुम्हारे साथ बैठकर न्यूज भी सुनता हूं। पर भारत कभी सुना हो याद नहीं आ रहा है।”

मां बोलीं, “भारत को इंडिया भी कहते हैं। तुमने टीवी पर कई मौकों पर लोगों के मुख से इंडिया सुना होगा, जैसे ’इंडिया की टीम’, ’इंडिया जीत गई’ आदि। तुम तो अमूल का ‘अमूल दूध पीता है इंडिया’ अक्सर गाते हो; याद है न?”

“हां अम्मा, टीवी पर तो इंडिया कई बार सुना है। खेलकूद के प्रोग्रामों में, न्यूज़ में, और ‘ऐड्ज़’ (विज्ञापनों) में। मेरे समझ में नहीं आ रहा है कि जब देश का नाम इंडिया है तो उसे भारत भी कहने की जरूरत क्या है? और क्यों नहीं ‘इंडियामाता की जय’ कहते हैं?” रग्घू ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की।

इस बार मां को सवालों का ठीक-ठीक जवाब नही सूझ रहा था। – योगेन्द्र जोशी

 

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शक-शुबहा की गुंजाइश हो तो?

घटना तब की है जब बीती गर्मियों में बैष्णवदेवी दर्शन के पश्चात् बेगमपुरा एक्सप्रेस नाम की गाड़ी से हम जम्मू-तवी से वाराणसी लौट रहे थे। जम्मू-तवी में मेरी शायिका (बर्थ) के सामने एक मध्यवयस्क यात्री बैठे थे। उनके साथ एक युवा यात्री भी बैठा था। दोनों की बातचीत से लग रहा था कि वे दोनों एक ही सरकारी संस्था में सेवारत हैं और वह युवक उन मध्यवयस्क यात्री के कनिष्ठ कर्मी के तौर पर कार्यरत है। यह भी पता चल रहा था कि वरिष्ठ यात्री को अंबाला कैंट पर उतरना है। उसके बाद वह शायिका किसी अन्य यात्री के लिए आरक्षित थी। उस युवा यात्री को आरक्षण नहीं मिल पाया था।

अंबाला कैंट पर उस युवक के वरिष्ठ सहकर्मी उतर गये और उस शायिका पर अन्य यात्री काबिज़ हो गया। अब उस युवा को रात्रिविश्राम के लिए उपयुक्त स्थान की चिंता सताने लगी। उसके पास एक अदद सामान – लाल बैग – था जिसे उसने शायिका के नीचे एक कोने पर सुरक्षित रख दिया था। फिर उसने मेरी पत्नी की ओर मुखातिब होकर कहा, “आंटी, आप जरा मेरा बैग देख दीजियेगा (यानी उसकी सुरक्षा का ध्यान रखियेगा); मैं देखने जा रहा हूं कि कहीं सीट मिल पाती है क्या?”

हमने उसका अनुरोध मानते हुए पूछा, “आपको जाना कहां है?”

उसने कहा, “मुझे लखनऊ उतरना है। वहां से कानपुर अपने घर जाऊंगा।”

उस रेलमार्ग पर लखनऊ वाराणसी से करीब तीन सौ कि.मी. पहले पड़ता है और हमारी गाड़ी का वहां पहुंचने का समय प्रातःकाल लगभग आठ बजे था।

वह युवक रात भर गायब रहा। उसे शायद कहीं बर्थ नहीं मिली होगी, अन्यथा वह अपना सामान लेने आया होता। उसने येनकेन प्रकारेण किसी डिब्बे में रात बिताई होगी।

प्रातःकाल गाड़ी लखनऊ से पहले भी एक-दो स्टेशनों पर रुकी थी। ग्रीष्मकाल में तो लखनऊ के आसपास छ: बजते-बजते अच्छी-खासी रोशनी हो चुकती है। इसलिए मैं यह उम्मींद कर रहा था कि वह युवक मौका पाते ही हम लोगों के डिब्बे में आ जायेगा। मैं समझता था कि उसे हमारे ही डिब्बे में आकर लखनऊ स्टेशन का इंतिजार करना चाहिए। उसे अपने बैग की सुध तो रखनी ही चाहिए।

मैं आश्वस्त होना चाहता था कि उस बैग में कुछ संदिग्ध सामग्री तो नहीं है। वह युवक और उसका वरिष्ठ सहकर्मी जम्मू से आ रहे थे इसलिए मेरे मन में यह शंका उठ रही थी कि वह व्यक्ति किसी अप्रिय घटना को अंजाम देने के विचार से तो बैग नहीं छोड़ गया। मैंने अपनी पत्नी से अपनी शंका साझा की। उनका कहना था, “ऐसा कुछ नहीं होगा; वह आता ही होगा। देख नहीं रहे थे कि वे दोनों जने (वह युवक और उसका वरिष्ठ साथी जो अंबाला कैंट पर उतरा था) अपनी संस्था की जुड़ी कितनी बातें कर रहे थे? उनकी हिन्दी भी सामान्य थी। इसलिए ऐसा कुछ नहीं होगा। वह लड़का आता ही होगा।”

मैंने पत्नी के समक्ष अपना तर्क रखा, “देखो, अतिवादी-आतंकवादी भी अपनी पहचान और अपने इरादे छिपाने के लिए ऐसा नाटक खेल सकते हैं। वे भी सामान्य सहयात्री दिखने की कोशिश कर सकते हैं। कौन जाने जो बातें वे कर रहे थे वे सच थीं या झूठ। मैं उस बैग के बारे में आश्वस्त नहीं हूं। अवश्य ही रात भर मैं ऐसी कोई कल्पना नहीं कर रहा था। लेकिन लखनऊ आने वाला है और उसका अता-पता नहीं है। उसे अपने बैग की चिंता तो होनी ही चाहिए थी।”

मैंने अपना संदेह गाड़ी में मौजूद सुरक्षाकर्मियों के समक्ष रखने का विचार किया। मैं अपने डिब्बे के परिचारक (अटेंडेंट) के पास पहुंचा और उससे सुरक्षाकर्मितों के बारे पूछा। उसने बताया, “गाड़ी में कोई सुरक्षाकर्मी नहीं रहते हैं। जम्मू से आते समय अंबाला कैंट तक वे मौजूद रहते हैं। उसके बाद गाड़ी में कोई नहीं रहता।”

उससे मैंने किसी सक्षम अधिकारी का फोन नं. मांगा जो उसके पास नहीं था। मेरा विश्वास था कि आजकल सभी प्रमुख गाड़ियों में सुरक्षा की समुचित व्यवस्था रहती है। ऐसा विश्वास करना मेरी मूर्खता थी।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। मैंने आसपास बैठे सहयात्रियों के सामने अपनी शंका व्यक्त की। उम्मीद के अनुरूप ही उनकी प्रतिक्रिया “ठीक है, क्यों परेशान हो रहे हैं? कुछ नहीं होगा। वह आ जाएगा।” वाली थी।

मैं शंकाग्रस्त था लेकिन क्या करूं यह समझ नहीं पा रहा था। अंततः लखनऊ का चारबाग स्टेशन भी आ गया। अन्य यात्रियों की भांति मैं भी प्रातःकालीन चाय-काफी के लिए स्टेशन पर उतरा और निकट की चाय-काफी-जलपान की दुकान की ओर तेजी से बढ़ा। मुझे काफी के दो कप पाने में चार-छः मिनट तो लग ही गए होंगे।

काफी के दो कप हाथ में लिए जब मैं अपने डिब्बे के पास पहुंचा तो देखा कि वह युवक कंधे पर बैग लटकाए हुए मेरी ओर ही आ रहा है। पास पहुंचने पर उसने मुझे धन्यवाद दिया और जब तक मैं प्रत्युत्तर में उसे दो-चार शब्द कहता, उससे पहले ही वह तेजी से आगे बढ़ गया। – योगेन्द्र जोशी

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अपूरित कामना

आज मन्नूभाई घर पर तशरीफ़ ले आए, अप्रत्याशित-से दोपहर के वक्त । तीन-चार सप्ताह में वे एक बार मिलने जरूर आते हैं और आते हैं तो संध्याकाल के समय। इस समय आना असामान्य ही था।

मन्नूभाई मेरे पुराने सहयोगी रहे हैं और इसी शहर में वे भी बस चुके हैं। घर में दो ही प्राणी हैं: पत्नी एवं वे स्वयं। शादीशुदा बेटी परिवार के साथ विदेश में जा बसी है, और बेटा-बहू हैदराबाद में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करते हैं। दोनों अच्छा कमा लेते हैं और समय की कमी की बात जरूर स्वीकारते हैं।

मन्नूभाई का म्लान-मुख देखकर मैंने चुटकी ली, “लगता है पत्नी से झगड़ के आ रहे हो। अरे मियां, सत्तर-उनहत्तर की इस उम्र में झगड़ना-वगड़ना छोड़ो। जिंदगी के बचे-खुचे दस-बारह साल तो प्यारमोहब्बत से बिता लो।”

“अरे सिन्हा, तुम्हें तो हर समय मजाक की सूझती है। आज बात ही कुछ ऐसी हो गई कि मन उदास हो गया। सोचा तुमसे मिलकर गम गलत कर लूं और तुम हो कि …।” शिकायती लहजे में बोले मन्नूभाई।

“माफ कर दो यार, और गुस्सा थूको … बोलो किस बात पै उदास हो?”

मन्नूभाई चंद लमहों तक चुप रहे और फिर बोले, “देखो भाई, तुम्हें मालूम ही है बेटे की शादी हुए छः-सात साल हो चुके हैं। दोनों पैंतीस पार कर चुके हैं। अभी तक उनके कोई बच्चा नहीं। जब कोई प्रसंग छिड़ता है तो टालू जवाब देते हैं। आज सुबह ही श्रीमतीजी की बेटे-बहू से फोन पर बात हुई। क्या बात हुई इसका विवरण मैंने पूछा नहीं। वे दो अभी तक दो ही बने हैं शायद इसी पर बात की होगी। और इसी मुद्दे को लेकर वे अपना दुखड़ा रोने लगीं। मैं भी उनके दुःख को समझता हूं, पर कर क्या सकता हूं? मैं खुद ही चाहता हूं कि उनके दो नहीं तो कम से कम एक बच्चा हो जाता तो हमें भी तसल्ली हो जाती। पत्नी को पोता-पोती – जो भी हो – के साथ खेलने-खिलाने का मौका मिल जाता। भला कौन नहीं चाहता है दादा-दादी बनना? उसका भी अपना अलग सुख होता है। … है न? अपने को देखो, बड़ा बेटा, उसकी बहू और बच्चे तुम्हारे साथ रहते हैं। खुशी मिलती है न?”

“देखो भई, यह सब संयोग की बातें हैं। संयोग ही समझो कि बहू नौकरी-पेशे में नहीं। भविष्य में जब बच्चे अपना काम खुद करने लगें तो हो सकता है वह भी काम पर निकल पड़े। लेकिन तुम्हारे बेटे-बहू की कहानी एकदम उलट है। दोनों पहले से ही नौकरी में रहे, और वह भी मोटी तनख्वाह के साथ। उस तनख्वाह का लालच छोड़ना आसान नहीं है। फिर भी बच्चे हो सकते थे। बच्चे पलेंगे कैसे शायद यह सवाल उनके सामने उठता होगा। तुम्हारी पत्नी खुद अस्वस्थ रहती हैं; वे भला क्या मदद करेंगी? न ही यह हम मर्दों के वश का काम है। बच्चे पालना कोई दो-चार महीनों का काम तो होता नहीं, कम से पांच-छः साल तो खास निगरानी की जरूरत होती है। तुम्हारी बहू के मायके वाले भी लंबे अरसे की जिम्मेदारी लेने की हिम्मत शायद जुटा न पा रहे हों।” मैंने समझाने की कोशिश की।

“बात तो तुम ठीक कह रहे हो, लेकिन सोच-सोचकर मानसिक कष्ट तो होता ही है, खास तौर पर धर्मपत्नी को।”

मन्नूभाई के चहरे पर चिंता की लकीरें उभर आती हैं। कुछ देर के लिए खामोसी छाई रही । इस बीच बहू चाय की दो प्यालियां पहुंचा गयी। हम चाय की  चुस्कियां लेने लगे। खामोसी बनी रही।

फिर मैंने चुप्पी तोड़ते हुए बात आगे बढ़ाई, “बुरा न मानो तो एक बात कहूं। … जमाना बहुत बदल गया है। वह जमाना गया जब हमारी-तुम्हारी शादी मां-बाप या घर के अन्य बुजुर्ग तय करते थे। तब दो-एक साल में बच्चे न हुए तो कानाफूसी शुरू हो जाती थी। लोगों की जुबान पर तरह-तरह के सवाल तैरने लगते थे। अब न कोई परवाह करता है, न कुछ कहता है। अब तो मध्यम वर्ग के कई नये विवाहित जोड़ों ने एकल संतान की नीति अपना ली है, और कुछ ने तो उसके आगे बढ़कर संतान नहीं का ही रास्ता चुन लिया है। मैं ऐसे मामले जानता हूं। तुम्हारे बेटा-बहू क्या सोचते हैं यह तो वही बता सकते हैं। मेरी मानो एक बार कुछएक दिनों के लिए उनके पास चले जाओ तुम दोनों, और खुलकर बात कर लो। याद रखो, हर बात टेलीफोन पर नहीं हो पाती है। सामने बैठकर बात करोगे तो वे टालने की कोशिश नहीं कर पायेंगे। समझे?”

“ठीक ही कह रहे हो। हो आयेंगे उनके पास। देखें क्या कहते हैं।”

“तब तक के लिए अपनी इस चिंता को भुला दो। …” कहते हुए मैंने प्रसंग की चर्चा पर विराम लगा दिया और वार्तालाप के विषय की दिशा बदल दी। चाय का अंतिम घूंट लेकर खाली प्याली मैंने मेज पर रख दी। – योगेन्द्र जोशी

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सवाल “भारत” के वजूद का

वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां हूं। कई अन्य मित्र-संबंधी भी पहुंचे हैं। घर में भावी समारोह की चहल-पहल है। घर के सदस्य आगामी आयोजन की तैयारी में जुटे हैं और कुछएक अतिथि उस कार्य में अपना योगदान भी दे रहे हैं। अधिकांश अन्य प्राप्तवयस्क, प्रौढ़, एवं अपेक्षया वृद्ध अतिथिगण बाहर खुले में दो-दो-तीन-तीन के समूह में परस्पर वार्तालाप में जुटे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफोन की महत्ता कम नहीं है, विशेषतः नवयुवाओं, किशोर-किशोरियों तथा प्राप्तवय बच्चों के लिए। इस मौके पर उक्त अल्पवयस्क वर्ग के कुछएक सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त हैं।

मैं एक कुर्सी पर बैठा हुआ चारों तरफ़ का नजारा देख रहा हूं। लोगों के परिधानों, उनके हावभावों, उठने-बैठने एवं हंसने-बोलने के तौर-तरीकों आदि को बारीकी से देखना मेरे लिए सदा से एक रोचक विषय रहा है। मैं ऐसे वैविध्यपूर्ण वातावरण में शायद ही कभी ऊबता हूं। इस समय भी मैं जिज्ञासु दृष्टि से सभी को देख रहा हूं।

मेरी नजर बगल की कुर्सी पर बैठे आठ-दश-वर्षीय एक बच्चे पर पड़ती है। वह भी एक स्मार्टफोन के साथ खेल रहा है, शायद अपने मित्रों के संदेश किसी “सोशल मीडिया” (सामाजिक संपर्क माध्यम?) पर देख रहा है। उसकी उंगलियां सधे अंदाज में फोन के पर्दे पर चलती हैं। मेरे पास भी स्मार्टफोन है पर उसका प्रयोग मैं वैसी प्रवीणता से नहीं कर पाता जैसी इन आधुनिक बच्चों में देखता हूं। मैं उस बच्चे से पूछना चाहता हूं वह क्या कर रहा है, क्या-क्या कर सकता है, इत्यादि। असमंजस में हूं कि पूछूं या नहीं। बड़ों की भांति बच्चे भी संवेदनशील हो सकते हैं। उस बच्चे की निजता में हस्तक्षेप करूं क्या? करूं तो किस बहाने? आज के युग में निजत्व बहुत माने रखने लगा है।

अंततः मैं उसकी एकाग्रता में खलल डाल ही लेता हूं और पूछता हूं, “क्या आप बताना चाहेंगे कि आप अभी क्या कर रहे हैं?”

आम तौर पर मैं बच्चों को आप कहकर नहीं पुकारता, लेकिन इस समय अनायास ही उसके प्रति औपचारिक हो रहा हूं। वह कहता है, “मैं व्हट्सऐप पर दोस्तों के साथ मैसेजेज़ शेयर कर रहा हूं। उसके पहले मैंने उनको यहां की फोटोज़ भेजीं।”

“अच्छा! फोन पर “गेम” भी खेलते होंगे? और भी बहुत-सी चीजें कर लेते होंगे?” मैं फिर पूछता हूं। मैं गेम कहने के बजाय खेल कहना पसंद करता हूं। लेकिन इस समय गेम शब्द ही मेरे मुख से निकलता है। मध्यम वर्ग के आजकल के बच्चे हिन्दी के शब्द बोलते ही कहां हैं?

वह जवाब देता है, “हां-हां, क्यों नहीं! गेम भी खेलता हूं। ई-मेल पढ़ सकता हूं। फोन रिचार्ज कर सकता हूं। ट्रेन-रेज़र्वेशन कर सकता हूं।”

“क्या आप गूगल-मैप के बारे में भी जानते हैं? अपने फोन पर उसे भी देख सकते हैं क्या?” मैं कुछ और जानना चाहता हूं।

वह भी मेरी बातों में दिलचस्पी लेता है। कदाचित् स्मार्टफोन की अपनी जानकारी से मुझे प्रभावित करना चाहता है। ऐसा करना मनुष्यों के स्वभाव में होता ही है और बहुत-से बच्चों में भी यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। मैं पूछता हूं, “क्या गूगल मैप के सहारे मुझे दिखा सकते हैं कि आप अभी किस जगह पर हैं।”

वह फोन के पर्दे पर जादुई अंदाज में अपना हाथ फेरता है और मुझे वैवाहिक स्थल तथा संबंधित शहर की स्थिति दिखा देता है। मैं फिर पूछता हूं, “क्या मैप में जापान कहां है इसे भी यह बता सकते हैं?”

वह उसी करिस्माई अंदाज से मैप में जापानी द्वीप-समूह की स्थिति दिखाता है और मुझसे कहता है, “आप क्या जापान के शहरों की लोकेशन भी जानना चाहेंगे?”

“नहीं, इतना काफी है। …” कहते हुए मैं प्रशंसात्मक शब्द बोलता हूं, “वाह, आपका फोन ही स्मार्ट नहीं, आप भी स्मार्ट हैं। … अच्छा, अब जरा भारत कहां है यह भी मैप में दिखा दें।”

दो-एक क्षणों तक उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। फिर अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोलता है, “आपका मतलब इंडिया से है क्या? मेरी टीचर ने एक बार बताया था कि इंडिया को भारत भी कहते हैं। लेकिन मुझे थोड़ा कंफ़्यूज़न है। …”

मैं हामी भरता हूं। उसके फोन के पर्दे पर इंडिया नजर आने लगता है।

“चलिए, इतना काफ़ी है। आपको इतनी देर डिस्टर्ब किया। अब आप अपना व्हट्सऐप वाले काम पर लौट चलिए।” कहते हुए मैं पास में काफी-प्यालों की ट्रे लिए घूम रहे व्यक्ति को इशारा करता हूं। वह पास आता है और मैं एक प्याली काफी ले लेता हूं।

सोचने लगता हूं कि क्या “भारत” का वजूद खत्म हो जायेगा? मेरा इशारा भारत देश की ओर नहीं है। मेरा मतलब तो “भारत” शब्द से है जिसे हमारे पुरखे उस भूभाग के संबोधन के तौर पर प्रयोग में लेते रहे हैं जिसे अब लोग इंडिया कहते हैं। क्या देश का “भारत” संबोधन आने वाली पीढ़ियों के लिए अपरिचित हो जायेगा?

शायद हां! – योगेन्द्र जोशी

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फुटकर काम की तलाश

पहले एक तस्वीर बीच सड़क खड़े पेड़ की:

Mid-Road Tree

मैं रखमुठी से अखनूर जा रहा हूं। जम्मूतवी-अखनूर-जोरिवां मार्ग पर स्थित सैन्य-क्षेत्र है रखमुठी जहां मैं कार्यवशात् चार-पांच दिनों के प्रवास पर आया हूं। यह स्थान अखनूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह के करीब 9:00 बजे हैं। मैं साइकिल से शौकिया अखनूर जा रहा हूं यह जांचने के लिए कि साइकिल से 30-32 कि.मी. आ-जा सकता हूं कि नहीं। मैं साइकिल की उपयोगिता का क़ायल हूं और उम्र के इस पड़ाव में भी साइकिल को ही अपने शहर में आवागमन के लिए यथासंभव इस्तेमाल में लेता हूं।

रास्ते में मैं चाय की छोटी-सी एक दुकान पर रुक जाता हूं, अपने साथ की बोतल से पानी पीने और उसके बाद एक कप चाय पीने के लिए। सड़क की हालत ठीक है, समतल और सपाट, गड्ढामुक्त! वाहनों का आवागमन अधिक नहीं है। फिर भी जो गुजर रहे हैं उनकी रफ़्तार अच्छी-खासी है, इसलिए दोनों तरफ़ देखकर ही सावधानी से ही सड़क पार करने जरूरत दिखती है।

सड़क की दूसरी तरफ़ एक नौजवान सुर्ख लाल टीशर्ट और हल्के सलेटी रंग की पैंट पहने हुए सड़क पार करने की फिराक में खड़ा है। उसके पास कोई सामान नहीं है सिवाय कंधे पर पड़े एक गमछे के और पैरों में पहनी एक जोड़ी  चप्पल के।

मैं पानी पीकर गिलास में परोसी गयी चाय पीने लगता हूं। तब तक वह युवक भी दुकान पर पहुंचता है और दुकानदार से एक कप (गिलास) चाय की मांग करता है। दुकानदार उसे गरम चाय का गिलास थमाता है। चाय की चुस्कियां लेते हुए वह पूछता है, “क्या आसपास कोई गांव है?”

दुकानदार और उसके दो साथी समवेत स्वर में कहते हैं, “यह तो गांव का ही इलाका है, हम सभी गांव के बाशिन्दे हैं। … आपको जाना किधर है?”

वह कोई जवाब नहीं देता है। उसके सवाल पूछने के अंदाज से मैं समझ जाता हूं कि वह उस स्थान से अनभिज्ञ है और उसे किसी खास गांव की तलाश नहीं है। मैं उसे गौर से देखता हूं। उसके हुलिये से लगता है कि वह एक अति सामान्य माली हालत का इंसान है या उससे भी कमजोर। वह काम की तलाश में कहीं दूर-दराज से आया होगा ऐसा मैं अनुमान लगाता हूं। सोचता हूं कि मैं उससे पूछूं, “आप इस अनजान-अजनबी इलाके में क्यों आये हैं? … रोजी-रोटी की तलाश में तो नहीं आये हैं?”। लेकिन यह सवाल पूछने में हिचकता हूं और चुप रहता हूं। अंत में उससे कैसे बात शुरू करूं यह सोचते हुए उस व्यक्ति से पूछ लेता हूं, “बुरा न मानिएगा … आप कहां से आये हैं?”

“मैं यूपी (उत्तर प्रदेश) से आया हूं।” उसका संक्षिप्त उत्तर है।

“यूपी में कहां से?” मैं ठीक-ठीक जानने के लिए पूछता हूं।

“लखनऊ-बाराबंकी से

“लखनऊ से या बाराबंकी से? … शहर? … गांव-देहात?” मैं फिर पूछता हूं।

वह “बाराबकी जिले से” कहके चुप हो जाता है।

बाराबंकी मेरे शहर वाराणसी से बहुत दूर नही है। जम्मू-तवी के निकट के उस इलाके से हजारएक कि.मी. दूर बाराबंकी से आए उस युवक से मैं एक प्रकार की निकटता-सी महसूस करता हूं। उससे मैं पूछता हूं, “आप चाय के साथ समोसा खाना चाहेंगे?”

वह नहीं कहते हुए मना कर देता है। हम एक-दूसरे के लिए एकदम अपरिचित हैं। इसलिए मैं अधिक जोर नहीं डालता।

तब तक वह चाय खत्म कर चुकता है और दुकानदार को उसकी कीमत चुकाता है। फिर सड़क पर दायें-बांये बारी-बारी से दो-तीन दफे नज़र डालता है। वाहनों का आवागमन अधिक न होने बावजूद वह सड़क पार करने में कुछ हिचकिचाहट दिखाता है। सड़कें पार करने का उसे शायद वैसा अभ्यास न हो जैसा आम शहरी को होता है। अंत में वह सड़क के उस पार वापस चला जाता है जिधर से वह आया था। फिर सड़क के किनारे के दो-चार मकानों और खेतों के बीच से गुजरने वाली एक गली में गुम हो हो जाता है।

उसके चले जाने और अपनी चाय पी चुकने के बाद मैं भी चाय की कीमत चुकाता हूं। फिर साइकिल पर चढ़कर रखमुठी का रास्ता तय करने लगता हूं।

रास्ते भर मैं उसके बारे में सोचता हूं। मुझे कोफ़्त होती है कि मैंने उससे अधिक बात करने की कोशिश नहीं की। मैंने पूछा होता कि क्यों वह घर से दूर उस अपेक्षया अपरिचित जगह पर पहुंचा है। अवश्य ही वह कामधंधे की तलाश में वहां आया होगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि के जगहों से कई श्रमिक फसल कटाई के समय पंजाब और हरियाणा पहुंचते हैं यह मैं सुनता आया हूं। हो सकता है कुछ जने जम्मू भी पहुंच जाते हों। रबी की फसल कई दिनों पहले तैयार हो चुकी है। कुछ खेतों से फसल उठ चुकी है। फिर भी अभी काम बचा है। मैं मन ही मन प्रर्थना करता हूं कि उस आदमी को आसपास के खेतों में काम और गांवों में ठहरने को मिल जाये। मन खिन्न होने लगता है यह सोचकर कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के आदमी को काम की तलाश में सुदूर प्रदेशों तक भटकना पड़ता है। – योगेन्द्र जोशी

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